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संप्रभुता का बहुलवादी सिद्धांत/Pluralist theory of sovereignty By Nirban PK Sir || In Hindi

     संप्रभुता का बहुलवादी सिद्धांत

    • बीसवीं सदी में संप्रभुता के एकलवादी दृष्टिकोण के विरोध स्वरूप संप्रभुता के बहुलवादी सिद्धांत का विकास हुआ|

    • बहुलवादी दृष्टिकोण के अनुसार प्रभुसत्ता सीमित, विभाजित, मर्यादित है| राज्य एकलवादी दृष्टिकोण की तरह सर्वोच्च न होकर अन्य सामाजिक संस्थाओं के समान है| परंतु यह बहुलवादी दृष्टिकोण राज्य को समाज की आवश्यक संस्था मानते हैं|

    • जर्मन समाजशास्त्री गीयर्क तथा ब्रिटिश विद्वान मेटलैंड को आधुनिक राजनीतिक बहुलतावाद का जनक कहा जाता है|

    • संप्रभुता के बहुलवादी सिद्धांत के प्रमुख समर्थक- हेरल्ड जे लास्की, बार्कर, लिंडसे, क्रैब, डिग्वी, मैकाइवर, मिस फालेट, दुर्खीम, J.D.H कौल, विलियम जेम्स आदि|

    • बहुलवादी सत्ता के केंद्रीकरण के विरुद्ध है तथा राज्य व समाज को अलग मानते हैं| राज्य अन्य सामाजिक संस्थाओं की तरह समाज की एक संस्था है|


      संप्रभुता के बहुलवादी सिद्धांत के समर्थकों के विचार-

    • A.D लिंडसे “यदि हम वस्तुस्थिति को देखें तो यह सर्वथा स्पष्ट हो जाएगा कि प्रभुसत्तासंपन्न राज्य का सिद्धांत धाराशाही हो चुका है|”

    • अर्नेस्ट बार्कर “प्रभुसत्तासंपन्न राज्य की मान्यता जितनी निर्जीव और निरर्थक हो गई है उतनी और कोई राजनीतिक संकल्पना न हुई होगी|” 

    • हयुगो क्रैब “प्रभुसत्ता की धारणा को राजनीतिक सिद्धांत के विचार क्षेत्र से निकाल देना चाहिए|”

    • फिगिग्स “प्रभुसत्ता का विचार एक पूज्य अंधविश्वास के समान है और राजाओं के दैवी अधिकारों के समान समाप्त हो जाएगा|”

    • Note- बहुलवाद के समर्थक राज्य-प्रभुसत्ता सिद्धांत के आलोचक है| 


    लियो डिग्वी के विचार-

    • यह फ्रांसीसी विचारक है इसने राज्य के व्यक्तित्व और राज्य की प्रभुसत्ता दोनों को अस्वीकार किया है इसके मत में राज्य का व्यक्तित्व कोरी कल्पना है, व्यक्तित्व केवल मनुष्य का होता है|

    • इसके मत में राज्य प्रभुतासंपन्न नहीं है वह कानून की सीमाओं में बंधा है| कानून की उत्पत्ति राज्य से नहीं होती बल्कि कानून राज्य से पहले विद्यमान था| कानून का स्थान राज्य से ऊंचा है| कानून का आधार सामाजिक सुदृढ़ता है|

    • डिग्वी के मत में लोग कानून का पालन इसलिए करते हैं क्योंकि कानून सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति करता है|

    • डिग्वी के मत में राज्य का बुनियादी लक्षण जनसेवा है, प्रभुसत्ता नहीं|

    • डिग्वी के चिंतन में राज्य के कर्तव्यो को प्रमुखता दी गई है, अधिकारों को नहीं| इसके मत राज्य का कार्य पुलिस और प्रतिरक्षा तक सीमित है|

    • इस सिद्धांत को व्यवहार में लाने के लिए डिग्वी ने क्षेत्रीय विकेंद्रीकरण तथा प्रशासनिक और व्यवसायिक संघ व्यवस्था का सुझाव दिया|


    हयूगो क्रैब के विचार-

    • क्रैब के मत राज्य को अस्तित्व में लाने का श्रेय कानून को है| प्रभुसत्ता केवल कानून में निहित है| राज्य एक ऐसा समुदाय है जो कानूनी मूल्यों की स्थापना करके सार्वजनिक सेवाओं की व्यवस्था के लिए उपयुक्त साधन जुटाता है|


    अर्नेस्ट बार्कर के विचार-

    • बार्कर का विचार है कि समूहों को अस्तित्व में लाने का श्रेय राज्य का नहीं है, बल्कि वे पहले से विद्यमान होते हैं प्रत्येक समूह एक न्यायिक व्यक्तित्व से संपन्न होता है उसके सारे सदस्य उसे अपना मिला-झूला उद्यम समझते हैं|


    लॉस्की के विचार

    • हेरल्ड जे लॉस्की अंग्रेज दार्शनिक है, जिन्होंने एकलवादी सिद्धांत की आलोचना की है तथा प्रभुसत्ता का बहुलवादी सिद्धांत प्रस्तुत किया है|


    बहुलवादी सिद्धांत के संबंध में उनके प्रमुख तर्क निम्न है-


    1. रीति रिवाज की भूमिका- रीति-रिवाज प्रभुसत्ताधारी की शक्ति को सीमित करते हैं| जब रीति-रिवाजों को मानने के लिए प्रभुसत्ताधारी बाध्य होता है तो उसकी इच्छा सर्वोपरि कहां रहती है|


    1. मानवता के प्रति उत्तरदायित्व- मानवता के प्रति उत्तरदायित्व से भी राज्य की प्रभुसत्ता का विचार निरर्थक हो जाता है|


    1. संघीय व्यवस्था प्रभुसत्ता के विरुद्ध है- लॉस्की ने कहा कि अमेरिका में प्रभुसत्ता के सही स्थान का पता लगाना मुश्किल है|


    1. राज्य और सरकार में अंतर- राज्य की प्रभुसत्ता का प्रयोग सरकार करती है| सरकार मनुष्यो से बनी होती है यदि प्रभुसत्ता के नाम सरकार को पूर्ण असीम शक्ति दे दी जाय तो मनमानी और अत्याचार बढ़ जाएगा क्योंकि मनुष्य स्वार्थी होते हैं| इसलिए प्रभुसत्ता के विचार को त्याग देना जरूरी है|


    1. राज्य को निष्ठा की मांग करने से पहले अपनी सत्ता का औचित्य सिद्ध करना चाहिए-

      • राज्य को मनुष्यो से निष्ठा की मांग करने का अधिकार तभी प्राप्त हो सकता है जब जनहित के अनुसार सभी मानवीय संगठनों के हितों में तालमेल स्थापित कर सकें| 

      • लास्की के शब्दों में “क्योंकि समाज का स्वरूप संघात्मक है इसलिए सत्ता का स्वरूप भी संघात्मक होना चाहिए|


    1. शक्ति का लोकतंत्रीकरण आवश्यक है- लास्की के मत में समाज के बुनियादी साधनों पर पूरे समुदाय का  नियंत्रण होना चाहिए|


    A D लिंडसे के विचार

    • अंग्रेज विचारक लिंडसे ने कहा कि समाज में निगमित व्यक्तियों की संख्या अनंत होती है| उनमें कई छोटे-छोटे समूह इतने एकसार होते हैं जितना स्वयं राज्य भी नहीं होता है|


    R.M मैकाइवर के विचार-

    • अमेरिकी मनोवैज्ञानिक R.M मैकाइवर ने अपनी दो कृतियों द मॉडर्न स्टेट और द वैब ऑफ गवर्नमेंट के अंतर्गत समाजवैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रभुसत्ता सिद्धांत का खंडन किया है|

    • मैकाइवर के अनुसार प्रभुसत्ता कोई असीम शक्ति नहीं है, ज्यादा से ज्यादा इसे राज्य का एक कार्य मान सकते हैं|


     बहुलवादी दृष्टिकोण के संबंध मैकाइवर के प्रमुख तर्क निम्न है-

    1. राज्य किसी निश्चित इच्छा की अभिव्यक्ति नहीं है|

    2. राज्य रीति रिवाज का रक्षक है|

    3. राज्य कानून की घोषणा करता है उसका सृजन नहीं करता है|

    4. किसी व्यापारिक निगम की तरह राज्य के भी अपने अधिकार और दायित्व होते हैं|

    5. राज्य अन्य संगठनों के आंतरिक मामलों का नियमन नहीं कर सकता है|


    • मैकाइवर के अनुसार राज्य कानून का पिता व शिशु दोनों है|

    • मैकाइवर के अनुसार राज्य और समाज को एक मानना भोंडी जल्दबाजी है|


    बहुलवादियों की मान्यताएं- 

    1. राज्य केवल एक समुदाय है|

    2. संप्रभु का आदेश ही कानून नहीं है|

    3. अन्य समुदाय भी उतने ही आवश्यक हैं जितना राज्य|

    4. राज्य सेवक है स्वामी नहीं|

    5. विश्व शांति के लिए राज्य की प्रभुसत्ता घातक है|

    6. राज्य का पूर्णतया असीमित और निरंकुश होना असत्य है|

    7. सीमित प्रभुसत्ता में विश्वास

    8. विकेंद्रीकरण में विश्वास

    9. व्यवसायिक प्रतिनिधित्व का समर्थन


    अन्य तथ्य -

    • लास्की की रचनाएं

    1. ए ग्रामर ऑफ पॉलिटिक्स

    2. एन इंट्रोडक्शन ऑफ सावरेंटी

    3. द स्टेट इन थ्योरी एंड प्रैक्टिस

    4. अथॉरिटी इन द मॉडर्न स्टेट


    • लास्की “राज्य को एक साधन के रूप में व्यक्तियों की ऐसी साझेदारी कहा जा सकता है जिसका उद्देश्य सामान्य जीवन को उत्कृष्ट बनाना है| इस प्रकार राज्य भी अन्य संघों की भांति एक संघ है|

    • लियो डिग्वी “कानून संप्रभु की आज्ञा नहीं वरन सामाजिक समरसत्ता की शर्त है|”

    • रॉस्को पाउंड-“सारा महत्वपूर्ण कानून समाज की देन है उसकी उत्पत्ति सामाजिक हितों से होती है और साधारणत: उनका पालन तभी होता है जब उसे लोकतंत्र का समर्थन प्राप्त हो|

    • बार्कर ने राज्य को संघों का संघ कहा है|

    • लिंडसे ने राज्य को संगठनों का संगठन कहा है|

    • निरंकुश वैधानिक संप्रभुता- थॉमस हॉब्स

    • स्थापित व अर्जित संप्रभुता- थॉमस हॉब्स

    • राजनीतिक संप्रभुता (सीमित संप्रभुता)- जॉन लॉक

    • राजनीतिक संप्रभुता व विधिक संप्रभुता में भेद- डायसी

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