भारतीय संविधान में वर्तमान में कुल छ: मौलिक अधिकार है-
समता का मौलिक अधिकार (14-18)
स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार (19- 22)
शोषण के विरुद्ध मौलिक अधिकार (23- 24)
धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार (25- 28)
संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार (29- 30)
संविधानिक उपचारों का मौलिक अधिकार (32)
Note- मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे| संपत्ति के मौलिक अधिकार को 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 के द्वारा हटा दिया गया तथा इसे संविधान के भाग- XII मे अनु.- 300 ‘क’ के तहत कानूनी अधिकार बना दिया गया है|
इसी संशोधन द्वारा 19(1)(च) को भी हटाया गया था|
इस समय जनता पार्टी मोरारजी देसाई की सरकार थी|
कुल अनुच्छेद 5 या कुल समता के अधिकार- 5
अनुच्छेद- 14 विधि के समक्ष समता- राज्य, भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा|
व्याख्या-
राज्य, भारत के राज्यक्षेत्र मे किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं रहेगा|
यह प्रत्येक व्यक्ति (नागरिक व विदेशी) के अतिरिक्त निगम, कंपनियों, पंजीकृत समितियों या किसी भी अन्य तरह के विधिक व्यक्ति को मिला हुआ है|
‘विधि के समक्ष समता’-
सामान्यत: यह माना जाता है कि यह ब्रिटेन से लिया गया है, लेकिन ‘विधि के समक्ष समता’ की अवधारणा जर्मनी के वाइमर संविधान की धारा 109 से ली गई है|
मौलिक अधिकारों संबंधी उप समिति के समक्ष मूल अधिकारों की सूची एवं उनके स्रोतों का उल्लेख करते समय बी एन राव ने वाइमर संविधान का ही उल्लेख किया था, न कि ब्रिटेन का|
यह नकारात्मक शब्द है|
इसका अभिप्राय है-
किसी व्यक्ति के पक्ष में विशिष्ट अधिकारों की अनुपस्थिति
साधारण विधि के तहत या न्यायालय द्वारा सभी व्यक्तियों के साथ समान व्यवहार|
कोई व्यक्ति (चाहे अमीर- गरीब, ऊंचा- नीचा, अधिकारी- गैर अधिकारी हो) विधि के ऊपर नहीं है|
विधि का शासन-
विधि के समक्ष समता का विचार ब्रिटिश न्यायविद A.V डायसी (पुस्तक- Introduction to the study of Law of constitution 1885) के ‘विधि के शासन’ सिद्धांत पर आधारित है|
विधि के शासन सिद्धांत की तीन अवधारणाएं है-
इच्छाधीन शक्तियों की अनुपस्थिति अर्थात किसी भी व्यक्ति को विधि के उल्लंघन के सिवाय दंडित नहीं किया जा सकता|
कोई भी व्यक्ति (चाहे अमीर- गरीब, ऊंचा- नीचा, अधिकारी- गैर अधिकारी) कानून के ऊपर नहीं है|
व्यक्तिगत अधिकारों की प्रमुखता अर्थात सविधान व्यक्तिगत अधिकारों का परिणाम है, न की व्यक्तिगत अधिकारों का स्रोत|
Note- पहला व दूसरा कारक ही भारतीय व्यवस्था में है तीसरा नहीं है अर्थात भारत में व्यक्तिगत अधिकारों का स्रोत ही संविधान है|
विधि का समान संरक्षण-
यह सकारात्मक शब्द है तथा अमेरिका के संविधान के 14 वें संशोधन 1868 की धारा 1 से लिया गया है|
इसका अभिप्राय है-
विधियों द्वारा प्रदत विशेषाधिकारों और अध्यारोपित दायित्वो मे समान परिस्थितियों के अंतर्गत समान व्यवहार किया जाएगा|
समान विधि के अंतर्गत सभी व्यक्तियों के लिए समान नियम होंगे|
बिना भेदभाव के समान के साथ समान व्यवहार होना चाहिए|
शिव शंकर वाद 1951 “विधि के समक्ष समता व विधियों का समान संरक्षण दोनों ही पहलुओं का मुख्य उद्देश्य समान न्याय है|”
E P रोय्यपा बनाम तमिलनाडु वाद 1974- इसमें सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि वर्गीकरण यानी भेदभाव युक्तिसंगत हो, और सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि समता व स्वेच्छाचारिता एक दूसरे की कट्टर शत्रु है|
मिनर्वा मिल्स वाद 1980 में विधि के शासन को संविधान का मूलभूत ढांचा घोषित किया गया|
एम नागराज बनाम भारत संघ वाद 2007 में समता के सिद्धांत को संविधान का मूल ढांचा बताया गया|
संजीव कोक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी वाद 2014 में SC ने निर्णय दिया कि जहां अनुच्छेद 31A की सीमा प्रारंभ होती है, वहां अनुच्छेद 14 की सीमा समाप्त हो जाती है|
विधि के समक्ष समता के अपवाद-
अनुच्छेद- 361 राष्ट्रपति और राज्यपालों और राजप्रमुखों का संरक्षण-
राष्ट्रपति व राज्यपाल अपनी पदावधि के दौरान पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्य पालन करते समय किए गए किसी भी कार्य के लिए किसी भी न्यायालय के प्रति उत्तरदायी नहीं है|
राष्ट्रपति और राज्यपाल के विरुद्ध उसकी पदावधि के दौरान किसी भी न्यायालय में किसी भी प्रकार की दांडीक कार्यवाही प्रारंभ नहीं की जा सकती है और न ही चालू रखी जा सकती है|
राष्ट्रपति व राज्यपाल की पदावधि के दौरान उसकी गिरफ्तारी या कारावास के लिए किसी भी न्यायालय द्वारा आदेश नहीं निकाला जा सकता है|
राष्ट्रपति या राज्यपाल के रूप में अपना पद ग्रहण करने से पहले या पश्चात व्यक्तिगत हैसियत से किए गए या किए जाने वाले कार्य के लिए दीवानी मुकदमा चलाया जाता है, तो राष्ट्रपति/ राज्यपाल को दो माह पूर्व सूचना देनी पड़ेगी|
अनुच्छेद 361(क)- संसद और राज्यों के विधानमंडलों की कार्यवाहीयों के प्रकाशन का संरक्षण-
यदि कोई व्यक्ति संसद या राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों या किसी एक सदन की सत्य कार्यवाही से संबंधित विषयवस्तु का प्रकाशन समाचार -पत्र, रेडियो और टेलीविजन में करता है, तो उस पर किसी भी प्रकार का दीवानी या फौजदारी मुकदमा देश के किसी भी न्यायालय में नहीं चलाया जा सकता है|
अनुच्छेद- 105(2)-
संसद या उसकी किसी समिति मे संसद के किसी सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए मत के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी|
अनुच्छेद- 194-
राज्य विधानमंडल या उसकी समिति में किसी विधानमंडल सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में उसके विरुद्ध न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती |
अनुच्छेद- 31 ‘ग’(C)-
यदि नीति निदेशक तत्व 39 ‘ख’ व 39 ‘ग’ को लागू करते समय यदि अनुच्छेद 14 व अनुच्छेद 19 का उल्लंघन होता है तो अनुच्छेद-13 के आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है|

Social Plugin