संविधान वह दस्तावेज है, जो सरकार की शक्तियों पर अंकुश रखकर एक ऐसी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की स्थापना करता है, जिसमें सभी व्यक्तियों को कुछ अधिकार प्राप्त होते हैं|
संविधान के तीसरे भाग में मौलिक अधिकारों का वर्णन है तथा प्रत्येक मौलिक अधिकार के प्रयोग की सीमा का भी उल्लेख है|
मौलिक अधिकार व्यक्ति को प्राप्त होते हैं, जिनकी सुरक्षा की गारंटी होती है|
मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है तथा उनको लागू करवाया जा सकता है|
मौलिक अधिकार शोषण और सामाजिक अन्याय को रोकते हैं| उदाहरण-
1982 के एशियाई खेलों से पहले फ्लाईओवरों, स्टेडियम आदि के निर्माण के लिए ठेकेदारों ने गरीब मिस्त्री व मजदूरों की भर्ती की तथा उनसे दयनीय दशा में काम लिया तथा सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से भी कम मजदूरी दी|
तब समाज वैज्ञानिकों की एक टीम ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की तथा याचिका में कहा कि ‘न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी देना बेगार या बंधुआ मजदूरी के समान है तथा शोषण के विरुद्ध (अनुच्छेद 23) मौलिक अधिकार का उल्लंघन है|
न्यायालय ने याचिका को स्वीकार किया तथा सरकार को निर्देश दिया कि वह इन मजदूरों को उचित मजदूरी दिलाए|
संविधान सभी नागरिकों को ‘जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार’ देता है, जिसके तहत हर नागरिक को अपने मुकदमे की निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई का अधिकार है| उदाहरण-
असम में मचल लालुंग को 23 वर्ष की आयु में किसी को गंभीर चोट पहुंचाने के मुकदमे में गिरफ्तार किया गया|
मुकदमे की सुनवाई के दौरान मानसिक रूप से अस्वस्थ पाए जाने पर इलाज के लिए अस्पताल भेज दिया गया|
बाद में स्वस्थ होने पर जेल अधिकारियों ने 1967, 1996 में दो बार मुकदमा चलाने के लिए सरकार को चिट्ठी भेजी, लेकिन सुनवाई नहीं हुई और 77 वर्ष आयु तक लगभग 54 वर्ष जेल में रहे, बिना सुनवाई के|
इस तरह इस मामले में निष्पक्ष व त्वरित सुनवाई के अभाव में संविधान द्वारा प्रदत्त ‘जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार’ का उल्लंघन हुआ|
अधिकतर लोकतांत्रिक देशों में नागरिकों के अधिकारों को संविधान में सूचीबद्ध कर दिया जाता है| संविधान द्वारा प्रदान किए गए और संरक्षित अधिकारों की सूची को अधिकारों का घोषणा पत्र कहते हैं|
अधिकारों का घोषणा पत्र सरकार को नागरिकों के विरुद्ध काम करने से रोकता है और उसका उल्लंघन हो जाने पर उपचार सुनिश्चित करता है|
सरकार व्यक्ति के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हो क्योंकि सरकार के विभिन्न अंग अपने कार्यों के संपादन में व्यक्ति के अधिकारों का हनन कर सकते हैं|
1928 में मोतीलाल नेहरू समिति ने ‘अधिकारों के एक घोषणा पत्र’ की मांग उठाई थी|
मौलिक अधिकार अन्य अधिकारों से भिन्न होते हैं| जैसे-
जहां साधारण कानूनी अधिकारों को सुरक्षा देने और लागू करने के लिए साधारण कानून का सहारा लिया जाता है, वही मौलिक अधिकारों की गारंटी और सुरक्षा स्वयं संविधान करता है|
सामान्य अधिकारों को संसद कानून बनाकर परिवर्तित कर सकती है, लेकिन मौलिक अधिकारों में परिवर्तन के लिए संशोधन करना पड़ता है तथा सरकार का कोई भी अंग मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई कार्य नहीं कर सकता है|
Note- मौलिक अधिकार निरंकुश या असीमित नहीं है, सरकार मौलिक अधिकारों के प्रयोग पर ‘औचित्यपूर्ण प्रतिबंध’ लगा सकती है|
समता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)
स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद19 से 22)
शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23, 24)
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)
सांस्कृतिक व शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29, 30)
संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
समता का अधिकार-
कानून के समक्ष समता व कानूनों के समान संरक्षण (अनुच्छेद 14)
धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध व दुकानों, होटलों, कुओं, तालाबों, स्नानघाटों व सड़कों आदि में प्रवेश की समानता| (अनुच्छेद 15)
रोजगार में अवसर की समानता (अनुच्छेद 16)
छुआछूत का अंत (अनुच्छेद 17)
उपाधियों का अंत (अनुच्छेद 18)
समता का अधिकार सार्वजनिक स्थलों, जैसे- दुकान, होटल, मनोरंजन स्थल, कुआं, स्नानघाट और पूजा स्थलों में समानता के आधार पर प्रवेश देता है| (अनुच्छेद 15)
यहां केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमे में से किसी के आधार पर प्रवेश में कोई भेदभाव नहीं हो सकता| (अनुच्छेद 15)
यह केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्धव, जन्मस्थान, निवास या इनमें से किसी के आधार पर लोकसेवाओं में भेदभाव वर्जित करता है| (अनुच्छेद 16)
समता के अधिकार द्वारा छुआछूत की प्रथा को समाप्त कर दिया है| (अनुच्छेद 17)
समता का अधिकार केवल उन लोगों को छोड़कर जिन्होंने सेना या शिक्षा के क्षेत्र में गौरवपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की है, राज्य किसी भी व्यक्ति को कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा| (अनुच्छेद 18)
इस तरह समता का अधिकार भारत को एक सच्चे लोकतंत्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता है, जिसमें सभी नागरिकों को समान प्रतिष्ठा व गरिमा प्राप्त हो सके|
संविधान की प्रस्तावना में दो प्रकार की समानता का उल्लेख है-
प्रतिष्ठा की समानता और
अवसर की समानता
इसका अर्थ है कि समाज के सभी वर्गों को समान अवसर मिले|
अवसर की समता प्रदान करने के लिए (क्योंकि भारत में अनेक सामाजिक विषमताएं व्याप्त हैं) संविधान स्पष्ट करता है कि सरकार बच्चो, महिलाओं तथा सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की बेहतरी के लिए विशेष योजनाएं व निर्णय लागू कर सकती है|
अनुच्छेद 16(4) में अवसर की समता के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है|
अनुच्छेद 16(4)- ‘इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं है, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण का प्रावधान करने से नहीं रोकेगी|’
स्वतंत्रता का अधिकार-
व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19)-
भाषण और अभिव्यक्ति का
शांतिपूर्ण ढंग से जमा होने और सभा करने का
संगठित होने का
भारत में कहीं भी आने-जाने का
भारत के किसी भी हिस्से में बसने और रहने का
कोई भी पेशा चुनने, व्यापार करने का
अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण (अनुच्छेद 20)
अभियुक्त और सजा पाए गए लोगों के अधिकार (अनुच्छेद 20)
जीवन की रक्षा और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21)
शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21 क)
कुछ दशाओं में गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण (अनुच्छेद 22)
स्वतंत्रता का अर्थ मनमाना कार्य करना नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता का अर्थ बिना किसी अन्य की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाए और बिना कानून व्यवस्था को ठेस पहुंचाए, प्रत्येक व्यक्ति अपननी- अपनी स्वतंत्रता का आनंद ले सके|
किसी भी लोकतंत्र में समता और स्वतंत्रता सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है, इनमें से एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती|
अनुच्छेद 21 जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण “किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं|”
किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता| (अनुच्छेद 21)
इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति को बिना कारण बताएं गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है| गिरफ्तार किए जाने पर उस व्यक्ति को अपने पसंदीदा वकील के माध्यम से बचाव करने का अधिकार है| साथ ही पुलिस के लिए आवश्यक है कि अभियुक्त को 24 घंटे के अंदर निकटतम न्यायाधीश के सामने पेश करें| न्यायाधीश ही इस बात का निर्णय करेगा कि गिरफ्तारी उचित है या नहीं| (अनुच्छेद 22)
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार जीवन के अधिकार में शोषण से मुक्त और मानवीय गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार अन्तर्निहित है|
न्यायालय ने माना कि जीवन के अधिकार का अर्थ व्यक्ति को आश्रय और आजीविका का भी अधिकार है|
इसका अर्थ किसी व्यक्ति को बिना अपराध के आशंका के आधार पर गिरफ्तार किया जा सकता है| यदि सरकार को लगे कि कोई देश की कानून- व्यवस्था या शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है|
लेकिन निवारक नजरबंदी अधिकतम 3 महीने के लिए हो सकती है, उसके बाद ऐसे मामले समीक्षा के लिए सलाहकार बोर्ड के समक्ष लाए जाते हैं|
प्रत्यक्ष रूप से निवारक नजरबंदी सरकार के हाथ में असामाजिक तत्वों और राष्ट्र विद्रोही तत्वों से निपटने का एक हथियार है|
लेकिन वास्तव में जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों तथा निवारक नजरबंदी के प्रावधानों में परस्पर विरोधाभास है, क्योंकि सरकार ने प्राय: इसका दुरुपयोग किया है|
स्वतंत्रता के अधिकार के प्रयोग पर सरकार कुछ प्रतिबंध लगा सकती है| जैसे-
भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कानून व्यवस्था, शांति और नैतिकता के आधार पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं|
सभा और सम्मेलन शांतिपूर्ण और बिना हथियारों के हो|
सरकार किसी क्षेत्र में पांच या पांच से अधिक लोगों की सभा पर प्रतिबंध लगा सकती है| (भारतीय दंड संहिता की धारा 141)
संविधान सभा में कुछ सदस्यों ने अधिकारों को प्रतिबंधित करने पर असंतोष जताया था| संविधान-सभा वाद-विवाद के दौरान 29 अप्रैल 1947 को सोमनाथ लाहिड़ी ने कहा था कि “मैं समझता हूं कि इनमें से अनेक मौलिक अधिकारों को एक सिपाही के दृष्टिकोण से बनाया गया है|---- आप देखेंगे कि काफी कम अधिकार दिए गए हैं और प्रत्येक अधिकार के बाद एक उपबंध जोड़ा गया है| लगभग प्रत्येक अनुच्छेद के बाद एक उपबंध है जो उन अधिकारों को पूरी तरह से वापस ले लेता है|---- मौलिक अधिकारों की हमारी क्या अवधारणा होनी चाहिए?---- हम उस प्रत्येक अधिकार को संविधान में पाना चाहते हैं जो हमारी जनता चाहती है|”
जब तक न्यायालय किसी व्यक्ति को किसी अपराध का दोषी नहीं ठहराता तब तक उसे दोषी नहीं माना जा सकता|
न्यायालय में निष्पक्ष मुकदमे के लिए संविधान तीन अधिकारों की व्यवस्था करता है (अनुच्छेद 20)-
किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से ज्यादा सजा नहीं मिलेगी|
कोई भी कानून किसी भी कार्य को पिछली तारीख से अपराध घोषित नहीं कर सकेगा|
किसी भी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए नहीं कहा जा सकेगा|
शोषण के विरुद्ध अधिकार-
मानव के दुर्व्यापार और बंधुआ मजदूरी पर रोक (अनुच्छेद 23)
जोखिम वाले कामों में बच्चों से मजदूरी कराने पर रोक (अनुच्छेद 24)
बेगार, बंधुआ मजदूरी, दास आदि शोषण के अंतर्गत आते हैं| इसे दंडनीय अपराध घोषित किया गया है| (अनुच्छेद 23)
14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी कारखाने, खदान या अन्य किसी खतरनाक काम में नियोजित नहीं किया जाएगा| इस बाल श्रम को अवैध या दंडनीय अपराध घोषित किया गया है| (अनुच्छेद 24)
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार-
आस्था और प्रार्थना की आजादी (अनुच्छेद 25)
धार्मिक मामलों के प्रबंधन की आजादी (अनुच्छेद 26)
किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिए कर अदायगी की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 27)
कुछ शिक्षा संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या उपासना में उपस्थित होने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 28)
इस स्वतंत्रता को लोकतंत्र का प्रतीक माना जाता है|
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने का अधिकारहै|
प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म चुनने और उसका पालन का अधिकार है|
धार्मिक स्वतंत्रता में अंतकरण की स्वतंत्रता भी समाहित है|
अंतःकरण की स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्ति किसी भी धर्म को चुन सकता है, या निर्णय ले सकता है कि वह किसी भी धर्म का पालन नहीं करेगा|
धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ है व्यक्तियों को अपने धर्म को अबाध रूप से मानने, उसके अनुसार आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा|
धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध-
लोकव्यवस्था
नैतिकता
स्वास्थ्य
कुछ सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए सरकार धार्मिक मामले में हस्तक्षेप कर सकती है| जैसे- सती प्रथा, एक से अधिक विवाह, मानव बली आदि|
संविधान ने सभी को अपने धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता दी है, इसमें लोगों को एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन के लिए मनाने का अधिकार भी शामिल है, लेकिन जबरन धर्म परिवर्तन नहीं कराया जा सकता है| यह धार्मिक स्वतंत्रता राजनीतिक विवाद का विषय बन जाती है|
इसका अर्थ है कि सरकार विशेष धर्म का पक्ष नहीं लेगी| भारत का कोई राजकीय धर्म नहीं है| भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, न्यायाधीश या अन्य किसी सार्वजनिक पद पर कार्य करने के लिए हमें किसी विशेष धर्म का सदस्य होना जरूरी नहीं है|
सरकारी नौकरियों में नियुक्ति के संबंध में सरकार धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करेगी| (अनुच्छेद 16)
राज्य द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थाओं में न तो किसी धर्म का प्रचार किया जाएगा, न ही कोई धार्मिक शिक्षा दी जाएगी, न ही उसमें प्रवेश के लिए किसी धर्म को वरीयता दी जाएगी| (अनुच्छेद 28)
इन प्रावधानों से धर्मनिरपेक्षता को बल मिलता है|
सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार-
अल्पसंख्यकों की भाषा और संस्कृति के संरक्षण का अधिकार (अनुच्छेद 29)
अल्पसंख्यकों को शैक्षिक संस्था स्थापित करने का अधिकार (अनुच्छेद 30)
भारतीय समाज में काफी विविधता है, जिसमें कुछ अल्पसंख्यक व कुछ बहुसंख्यक समुदाय है|
हमारा संविधान मानता है कि विविधता हमारे समाज की मजबूती है| अतः अल्पसंख्यक का अपनी संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार भी मौलिक अधिकार है|
किसी समुदाय को धर्म, भाषा, संस्कृति के आधार पर अल्पसंख्यक माना जाता है|
अल्पसंख्यक वह समूह है, जिनकी अपनी एक भाषा या धर्म होता है और देश के किसी एक भाग में या पूरे देश में संख्या के आधार पर वे अन्य समूह से छोटा होता है| ऐसे अल्पसंख्यक समूह को अपनी भाषा, लिपी, संस्कृति को सुरक्षित रखने और उसे विकसित करने का अधिकार है| (अनुच्छेद 29)
भाषाई या धार्मिक अल्पसंख्यक अपने शिक्षण संस्थान खोल सकते हैं| (अनुच्छेद 30)
अल्पसंख्यक समुदाय की शिक्षण संस्थानों को वित्तीय अनुदान देने में सरकार भेदभाव नहीं करेगी| (अनुच्छेद 30)
सरदार हुकुम सिंह ने संविधान सभा के वाद- विवाद के दौरान 26 मई 1949 को कहा था कि “बहुसंख्यकों पर एक गंभीर उत्तरदायित्व है कि वे देखें कि अल्पसंख्यक सुरक्षित महसूस करें|--- केवल एक धर्मनिरपेक्ष शासन में ही अल्पसंख्यक सुरक्षित रहेंगे| उनके लिए राष्ट्रवादी होना लाभकारी है| बहुसंख्यकों को अपने राष्ट्रीय दृष्टिकोण का दिखावा नहीं चाहिए|--- उन्हें स्वयं को अल्पसंख्यकों की स्थिति में रखकर उनकी आशंकाओं को समझना चाहिए| सुरक्षा की सभी मांगे उसी आशंका पर आधारित है, जो अल्पसंख्यकों के मन में अपनी भाषा, लिपी और नौकरियों के अवसर के संबंध में है|”
संवैधानिक उपचारों का अधिकार-
मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए न्यायालय में जाने का अधिकार (अनुच्छेद32)
मौलिक अधिकारों को व्यवहार में लाने तथा उल्लघन होने पर अधिकारों की रक्षा हो सके, इसके लिए संवैधानिक उपचारों के अधिकार की व्यवस्था की गई है|
डॉ अंबेडकर ने इस अधिकार को ‘संविधान का हृदय और आत्मा’ की संज्ञा दी है|
इसके अंतर्गत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर व्यक्ति सीधा सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है|
सर्वोच्च या उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए सरकार को आदेश और निर्देश दे सकते हैं, जिन्हें प्रादेश या रिट कहते हैं|
बंदी प्रत्यक्षीकरण-
बंदी प्रत्यक्षीकरण के द्वारा न्यायालय किसी गिरफ्तार व्यक्ति को न्यायालय के सामने प्रस्तुत करने का आदेश देता है| यदि गिरफ्तारी का तरीका या कारण गैर कानूनी या असंतोषजनक हो, तो न्यायालय गिरफ्तार व्यक्ति को छोड़ने का आदेश दे सकता है|
परमादेश-
यह आदेश तब जारी किया जाता है, जब न्यायालय को लगता है कि कोई सार्वजनिक पदाधिकारी अपने कानूनी और संवैधानिक दायित्वों का पालन नहीं कर रहा है और इससे किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहा है|
निषेध आदेश-
जब कोई निचली अदालत अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करके किसी मुकदमे की सुनवाई करती है तो ऊपर की अदालतें (उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय) उसे ऐसा करने से रोकने के लिए ‘निषेध आदेश’ जारी करती हैं|
अधिकार पृच्छा-
जब न्यायालय को लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिस पर उसका कोई कानूनी हक नहीं है तब न्यायालय ‘अधिकार पृच्छा आदेश’ के द्वारा उसे उस पद पर कार्य करने से रोक देता है|
उत्प्रेषण रिट-
जब कोई निचली अदालत या सरकारी अधिकारी बिना अधिकार के कोई कार्य करता है, तो न्यायालय उसके समक्ष विचाराधीन मामले को उससे लेकर उत्प्रेषण द्वारा उसे ऊपर की अदालत या अधिकारी को हस्तांतरित कर देता है|
मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका के अलावा कुछ अन्य संस्थाओं का भी निर्माण किया गया है| जैसे- राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग आदि|
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) या पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (PUDR) जैसी संस्थाएं अधिकारों के हनन के विरुद्ध चौकसी करती हैं|
अधिकारों के हनन के विरुद्ध चौकसी के परिप्रेक्ष्य में वर्ष 1993 में मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया|
सदस्य-
सर्वोच्च न्यायालय का एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश,
किसी उच्च न्यायालय का एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश
तथा मानवाधिकारों के संबंध में ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले दो और सदस्य|
कार्य-
मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायतें मिलने पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग स्वयं अपनी पहल पर या किसी पीड़ित व्यक्ति की याचिका पर जाँच कर सकता है|
जेलों में बंदियों की स्थिति का अध्ययन करने जा सकता है|
मानवाधिकार के क्षेत्र में शोध कर सकता है या शोध को प्रोत्साहित कर सकता है|
विशेष- आयोग को स्वयं मुकदमा सुनने का अधिकार नहीं है| यह सरकार या न्यायालय को अपनी जाँच के आधार पर मुकदमे चलाने की सिफारिश कर सकता है|
Note- मानवाधिकार आयोग का सबसे प्रभावी हस्तक्षेप पंजाब में युवकों के गायब होने तथा गुजरात दंगों के मामले में जाँच के रूप में रहा|
संविधान निर्माताओं को पता था कि स्वतंत्र भारत को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा| इसमें सभी नागरिकों में समानता लाना और सबका कल्याण करना सबसे बड़ी चुनौती थी|
इन्हीं समस्याओं के हल के लिए नीति-निदेशक तत्वों की व्यवस्था संविधान में की गई|
नीति-निदेशक तत्व वाद योग्य नहीं हैं, क्योंकि संविधान निर्माता इन नीतियों को भावी सरकारों के लिए बाध्यकारी नहीं बनाना चाहते थे|
वाद योग्य नहीं का अर्थ है कि यह एक संविधान का हिस्सा है, जिसे न्यायपालिका द्वारा लागू नहीं करवाया जा सकता|
नीति-निदेशक तत्वों की सूची में तीन प्रमुख बातें हैं-
वे लक्ष्य और उद्देश्य जो एक समाज के रूप में हमें स्वीकार करने चाहिए|
वे अधिकार जो नागरिकों को मौलिक अधिकारों के अलावा मिलने चाहिए और
वे नीतियाँ जिन्हें सरकार को स्वीकार करना चाहिए|
नोट- नीति-निदेशक तत्वों से हमें संविधान निर्माताओं की भारत की कल्पना का आभास होता है|
जमींदारी उन्मूलन कानून, बैंको का राष्ट्रीयकरण, न्यूनतम मजदूरी निर्धारण, कुटीर एवं लघु उद्योगों को प्रोत्साहन तथा अनुसूचित जाति और जनजातियों के उन्नयन के लिए आरक्षण, शिक्षा का अधिकार, पंचायती राज व्यवस्था, रोजगार गारंटी योजना, मिड-डे-मिल आदि|
लोगों का कल्याण; सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय| (अनुच्छेद 38)
जीवन स्तर ऊँचा उठाना, संसाधनों का समान वितरण| (अनुच्छेद 39)
अंतरराष्ट्रीय शांति को बढ़ावा| (अनुच्छेद 51)
समान नागरिक संहिता| (अनुच्छेद 44)
मद्यपान निषेध| (अनुच्छेद 47)
घरेलू उद्योगों को बढ़ावा| (अनुच्छेद 43)
उपयोगी पशुओं को मारने पर रोक| (अनुच्छेद 48)
ग्राम पंचायतों को प्रोत्साहन| (अनुच्छेद 40)
पर्याप्त जीवन यापन| (अनुच्छेद 39)
महिलाओं और पुरुषों को समान काम की समान मजदूरी| (अनुच्छेद 39)
आर्थिक शोषण के विरुद्ध अधिकार| (अनुच्छेद 39)
काम का अधिकार| (अनुच्छेद 42)
छः वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देख-रेख और शिक्षा| (अनुच्छेद 45)
ये दोनों एक-दूसरे के पूरक है|
मौलिक अधिकार सरकार के कुछ कामों पर प्रतिबंध लगाते हैं, वहीं नीति-निदेशक तत्व सरकार को कुछ कार्यों को करने की प्रेरणा देते हैं|
मौलिक अधिकार व्यक्ति के अधिकारों को संरक्षित करते हैं, पर नीति-निदेशक तत्व पुरे समाज के हित की बात करते हैं|
मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्वों के मध्य संबंधों पर उठे विवाद के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण मूल संविधान में दिया गया संपत्ति अर्जन, स्वामित्व और संरक्षण का मौलिक अधिकार था|
लेकिन संविधान में स्पष्ट कहा गया था कि सरकार लोक-कल्याण के लिए संपत्ति का अधिग्रहण कर सकती है|
केशवानंद भारती मुकदमे 1973 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में ‘संपत्ति के अधिकार’ को ‘संविधान के मूल ढाँचे’ का तत्व नहीं माना और कहा कि संसद को संविधान का संशोधन करके संपत्ति के अधिकार को प्रतिबंधित करने का अधिकार है|
1978 में जनता पार्टी की सरकार ने 44वें संविधान संशोधन के द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से निकाल दिया और संविधान के अनुच्छेद 300 (क) के अंतर्गत उसे एक सामान्य कानूनी अधिकार बना दिया|
क्या संसद संविधान में संशोधन कर सकती है| इस पर भी विवाद रहा है|
यह विवाद केशवानंद भारती मुकदमे के निर्णय से समाप्त हुआ|
इसमें सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संविधान की कुछ ‘मूल ढांचागत’ विशेषताएं हैं, जिनका संसद संशोधन नहीं कर सकती है|
42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों की एक सूची का समावेश किया गया, जिसमें कुल दस कर्तव्यों का उल्लेख किया गया था|
42 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा तथा सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर भाग 4 ‘क’ व अनुच्छेद 51 ‘क’ जोड़ा गया, जिसमें 10 मौलिक कर्तव्य जोड़े गए|
वर्तमान में इनकी संख्या 11 है| 86 वें संशोधन 2002 के द्वारा 11 वा मौलिक कर्तव्य जोड़ा गया|
11 वा मौलिक कर्तव्य- माता-पिता या संरक्षक अपने 6-14 वर्ष के बच्चों या प्रतिपाल्य को यथास्थिति शिक्षा प्राप्त करने का अवसर प्रदान करेगा|
प्रमुख मौलिक कर्तव्य-
नागरिक के रूप में हमें अपने संविधान का पालन करना चाहिए,
देश की रक्षा करनी चाहिए,
सभी नागरिकों में भाईचारा बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए,
पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए|
Note- मौलिक कर्तव्यों को लागू करने के संबंध में संविधान मौन है|
विशेष- परंतु यह ध्यान देने की बात है कि संविधान मौलिक कर्तव्यों के अनुपालन के आधार पर या उनकी शर्त पर हमें मौलिक अधिकार नहीं देता| इस दृष्टि से संविधान में मौलिक कर्तव्यों के समावेश से हमारे मौलिक अधिकारों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा|
अधिकारों का महत्व-
अधिकारों का घोषणा पत्र-
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार-
भारतीय संविधान में कुल 6 मौलिक अधिकार है-
अवसर के समानता-
जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार-
निवारक नजरबंदी (अनुच्छेद 22)-
अन्य स्वतंत्रताएं-
आरोपी या अभियुक्त के अधिकार (अनुच्छेद 20)-
आस्था और प्रार्थना की स्वतंत्रता-
सभी धर्मों में समानता-
अल्पसंख्यक समूह-
प्रादेश या रिट
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग-
राज्य के नीति-निदेशक तत्व-
नीति-निदेशक तत्व क्या हैं?
नीति-निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए सरकार द्वारा समय-समय पर निम्न प्रयास किए गए-
नीति-निदेशक तत्वों के उद्देश्य-
नीति-निदेशक तत्वों की नीतियाँ-
नीति-निदेशक तत्वों में ऐसे अधिकार जिनके लिए न्यायालय में दावा नहीं किया जा सकता-
नीति-निदेशक तत्वों और मौलिक अधिकारों में संबंध-
Note- कभी- कभी जब सरकार नीति-निदेशक तत्वों को लागू करने का प्रयास करती है, तो वे नागरिकों के मौलिक अधिकारों से टकरा सकते हैं| ऐसी समस्या सरकार द्वारा जमींदारी उन्मूलन कानून बनाने पर हुई| इसका विरोध किया गया कि यह संपत्ति के मौलिक अधिकार का हनन है|

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