अनुच्छेद 20 अपराध के लिए दोषसिद्धि के संबंध में कुछ संरक्षण प्रदान करता है|
यह दोषी करार व्यक्ति को मनमाने या अतिरिक्त दंड से सुरक्षा प्रदान करता है|
यह अधिकार राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352) के समय भी निलंबित नहीं होता है|
अनुच्छेद 20 (1)-
- कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए तब तक सिद्धदोष नहीं ठहराया जाएगा, जब तक कि उसने ऐसा कोई कार्य करने के समय, जो अपराध के रूप में आरोपित है, किसी प्रवृत्त विधि का अतिक्रमण नहीं किया है या उससे अधिक शास्ति का भागी नहीं होगा जो उस अपराध के किए जाने के समय प्रवृत्त विधि के अधीन अधिरोपित की जा सकती थी|
व्याख्या-
20 (1) भूतलक्षी विधि (Ex Post Facto Law) का प्रतिषेध-
यह भूतलक्षी दांडिक विधान जिसे साधारणत: घटना के पश्चात् का विधान कहा जाता है, को प्रतिषिद्ध करता है|
किसी भी व्यक्ति को अपराध के रूप में आरोपित विधि के अतिक्रमण करने पर ही दोषी ठहराया जा सकता है| तथा दंड अपराध के समय प्रवृत्त विधि के अनुरूप ही दिया जा सकता है, अर्थात न्यायालय नवीन विधि के अनुसार दंड नहीं दे सकता है| कोई विधि पूर्व तिथि से लागू नहीं होगी|
Note- भूतलक्षी विधि अपराधिक कानूनों में ही लागू होती है, सिविल कानूनों में नहीं| अर्थात जन उत्तरदायित्व या एक कर को पूर्वव्यापी रूप में लगाया जा सकता है|
अनुच्छेद 20 (2)-
- किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दण्डित नहीं किया जाएगा|
व्याख्या-
20(2) दोहरे दंड से सुरक्षा (Double Jeopardy)-
यह दोहरे दंड से सुरक्षा प्रदान करता है|
दोहरा दंड अमेरिकी विधि में प्रयुक्त अभिव्यक्ति है, हमारे संविधान में इसका प्रयोग नहीं हुआ है|
किसी व्यक्ति को एक अपराध के लिए एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जा सकता है|
Note- दोहरे दंड में सरकारी विभागीय कार्यवाही को सम्मिलित नहीं किया जाता है| यह केवल कानूनी, न्यायालय या न्यायिक अभिकरण के समक्ष कार्यवाहियों में ही लागू होता है|- वेंकटरमन बनाम भारत संघ वाद 1954
अनुच्छेद 20 (3)-
- किसी अपराध के लिए अभियुक्त किसी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा|
व्याख्या-
20(3) स्वयं के विरुद्ध गवाही से छूट-
किसी अपराध के लिए अभियुक्त किसी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है|
Note- स्वयं के विरुद्ध गवाही से छूट मौखिक या लिखित दोनों ही रूपों में है|
यह खंड अभियुक्त की चिकित्सीय परीक्षा को या अंगूठे की छाप या नमूने का हस्ताक्षर लेने से नहीं रोकता है|- काथी कालू बनाम बॉम्बे राज्य वाद 1961
सेलवी बनाम कर्नाटक राज्य वाद 2010- S.C ने इस निर्णय में कहा था कि नारको टेस्ट, पॉलीग्राफ़ टेस्ट को केवल संवेदनशील मामलों में ही अनुमति दी जाये, सामान्य मामलों में नहीं|

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