संविधान का दर्शन
संविधान के दर्शन का क्या आशय है-
प्रत्येक संविधान का एक दर्शन होता है|
दर्शन का संबंध मूल्य और नैतिकता से होता है|
कुछ लोगों का मानना है, कि संविधान सिर्फ कानूनों से बनता है| कानून अलग बात है और नैतिकता व मूल्य अलग बात है|
यह सत्य है कि हर कानून में नैतिक तत्व नहीं होता है, किन्तु बहुत से ऐसे कानून हैं, जिनका हमारे मूल्यों और आदर्शों से गहरा संबंध है|
समानता एक मूल्य है| कोई कानून धर्म व भाषा के आधार पर व्यक्तियों में भेदभाव समाप्त करता है अर्थात समानता की स्थापना करता है| इस प्रकार कानून और नैतिक मूल्यों के बीच गहरा संबंध है|
संविधान के प्रति राजनीतिक दर्शन के नजरिये से हमारा क्या आशय है| इसमें तीन बातें शामिल हैं-
संविधान कुछ अवधारणाओं के आधार पर बना है| इन अवधारणाओं की व्याख्या दर्शन के आधार पर ही हो सकती है| जैसे- अधिकार, नागरिकता, अल्पसंख्यक, लोकतंत्र|
प्रत्येक समाज और शासन व्यवस्था के कुछ आदर्श व बुनियादी अवधारणाएँ होती हैं| संविधान का निर्माण भी इन आदर्शो व अवधारणाओं की भूमिका पर होता है| अतः इन आदर्शों व अवधारणाओं की समझ के लिए दर्शन की आवश्यकता होती है|
भारतीय संविधान को संविधान सभा की बहसों के साथ जोड़कर पढ़ा जाना चाहिए, ताकि सैद्धान्तिक रूप से हम मान सकें कि ये आदर्श कहाँ तक और क्यों ठीक हैं तथा उनमें कौनसे सुधार किए जा सकते हैं|
संविधान के अन्तर्निहित नैतिक तत्व को जानने और उसके दावे के मूल्यांकन के लिए संविधान के प्रति राजनीतिक दर्शन का नजरिया अपनाने की आवश्यकता है|
संविधान के बहुत से मूल्यों व आदर्शों की अलग-अलग व्याख्याएँ की जाती रही हैं| अलग-अलग तरह से व्याख्या के कारण इन व्याख्याओं के बीच विरोध पैदा होता है| अतः कौनसी व्याख्या सही है, इसकी जाँच-परख में संविधान के आदर्शों का इस्तेमाल एक कसौटी के रूप में होना चाहिए|
संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपने अंतिम भाषण में कहा कि “संविधान एक निर्जीव वस्तु है, इसकी जान तो, इसे चलाने वाले लोगों के हाथ में होती है|”...यह निर्भर करेगा कि संविधान किन हाथों में जाएगा|”
जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में कहा कि “हम आज भारत के लिए संविधान बनाने जा रहे हैं| इसमें यह साफ होगा कि हम भारत को क्या देने जा रहे हैं और इसका विश्व पटल पर बहुत प्रभाव पड़ने वाला है, सिर्फ इसलिए नहीं कि भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में दुनिया में आ रहा है, बल्कि इसलिए कि भारत कम समय में ही विश्व में अपनी एक खास जगह बनाने में कामयाब होगा| जब हम आज स्वतंत्रता के मुहाने पर खड़े हैं तब ही भारत विश्व में अपनी भूमिका अदा करने लगा है| इसलिए भारत की संविधान सभा को हमेशा इस वैश्विक पक्ष को जेहन में रखना चाहिए|”
न्यायाधीश H R खन्ना “संविधान बनाने की प्रक्रिया एक उच्चतम राज्य संरचना है, इसे बनाने वाले व्यक्ति को दूरदर्शी होना चाहिए एवं जमीनी हकीकत से रूबरू होना चाहिए|”
हरजिंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य वेयरहाउसिंग कॉरपोरेशन 2010 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ‘न्यायालयों का दृष्टिकोण संवैधानिक दर्शन के अनुकूल होना चाहिए, जिसका राज्य नीति निदेशक सिद्धांत एक अभिन्न अंग है|’
भारतीय संविधान के दर्शन का आधार पंडित नेहरू का उद्देश्य संकल्प व उद्देशिका है|
उद्देश्य संकल्प पं. जे.एल. नेहरू द्वारा 13 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में प्रस्तावित किया गया|
संविधान सभा ने 22 जनवरी 1947 को उस उद्देश्य संकल्प को अंगीकार किया|
यह संकल्प इस प्रकार है-
संविधान सभा भारत को स्वतंत्र प्रभुत्वसम्पन्न गणराज्य के रूप में घोषित करने के अपने दृढ़ और सत्यनिष्ठ संकल्प की और भारत के भावी शासन के लिए संविधान बनाने की घोषणा करती है|
जिसमें उन राज्य क्षेत्रों का जो ब्रिटिश भारत में समाविष्ट हैं, उन राज्य क्षेत्रों का जो अभी देशी रियासतों के भाग हैं और भारत के उन अन्य भागों का जो अभी ब्रिटिश भारत के बाहर हैं और ऐसी रियासतों का तथा ऐसे अन्य राज्य क्षेत्रों का जो स्वतंत्र प्रभुत्वसम्पन्न भारत के भाग बनने के लिए सहमत हैं, मिलकर एक संघ बनेगा, और
उक्त राज्यक्षेत्र, अपनी वर्तमान सीमाओं से या ऐसी सीमाओं से जो संविधान सभा द्वारा या उसके पश्चात् सांविधानिक विधि के अनुसार अवधारित की जाएं, स्वायत्त इकाइयों की प्रास्थिति रखेंगे और बने रहेंगे| उन्हें अवशिष्ट शक्तियां होंगी और वे सरकार और प्रशासन की सभी शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग करेंगे केवल ऐसी शक्तियों और कृत्यों को छोड़कर जो संघ में निहित या संघ को समनुदिष्ट हैं या जो संघ में अन्तर्निहित या विवक्षित हैं या उसके परिणामस्वरूप हैं, और
प्रभुत्वसम्पन्न स्वतंत्र भारत की सभी शक्तियां और प्राधिकार, उसके संघटक भाग और शासन के सभी अंग लोक से व्युत्पन्न है, और
भारत की जनता को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; प्रतिष्ठा और अवसर की तथा विधि के समक्ष समता; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना, व्यवसाय, संगम और कार्य की स्वतंत्रता विधि और सदाचार के अधीन रहते हुए होगी, और
अल्पसंख्यकों के लिए, पिछड़े और जनजाति क्षेत्रों के लिए और दलित और अन्य पिछड़े हुए वर्गों के लिए पर्याप्त रक्षोपाय किए जाएंगे, और
गणराज्य के राज्यक्षेत्र की अखण्डता और भूमि, समुद्र तथा आकाश पर उसके प्रभुत्वसम्पन्न अधिकार, न्याय और सभ्य राष्ट्रों की विधि के अनुसार बनाए रखे जाएंगे, और
यह प्राचीन भूमि विश्व में अपना समुचित और गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त करेगी और विश्व शांति तथा मानव कल्याण के लिए स्वेच्छा से अपना पूरा सहयोग प्रदान करेगी|
पं. नेहरू “उद्देश्य संकल्प, संकल्प से कुछ अधिक है| यह एक घोषणा है, एक दृढ़ निश्चय है, एक प्रतिज्ञा है, एक वचन है और हम सभी के लिए यह एक समर्पण है|”
इस उद्देश्य संकल्प में जो आदर्श रखे गए हैं वे संविधान की उद्देशिका में दिखाई पड़ते हैं|
उद्देशिका में संविधान के ध्येय और उसके उद्देश्यों का संक्षेप में वर्णन है|
उद्देशिका-
“हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को :
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता,
प्रतिष्ठा और अवसर की समता
प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की
एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता
बढ़ाने के लिए
दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26-11-1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं|”
‘उद्देशिका को न्यायालय में प्रवर्तित नहीं किया जा सकता है’- गोपालन बनाम मद्रास राज्य वाद 1950, यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मदन गोपाल वाद 1954
लेकिन जहाँ संविधान की भाषा में संदिग्धता होती है, वहाँ उद्देशिका संविधान के विधिक निर्वचन में सहायता करती है- बेरुबारी यूनियन वाद 1960
उद्देशिका से दो प्रयोजन सिद्ध होते हैं-
उद्देशिका यह बताती है कि संविधान के प्राधिकर का स्रोत क्या है|
यह उद्देशिका यह बताती है कि संविधान किन उद्देश्यों को संवर्धित या प्राप्त करना चाहता है|
स्वतंत्र और प्रभुसत्तासंपन्न-
भारत का संविधान ब्रिटिश पार्लियामेंट की देन नहीं है|
यह पूर्ववर्ती भारत शासन अधिनियमों से भिन्न है|
इसे भारत के लोगों ने एक प्रभुत्व संपन्न संविधान सभा में समवेत अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से अधिकथित किया था|
यह संविधान सभा अपने देश का राजनीतिक भविष्य निर्धारित करने के लिए सक्षम थी|
जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा की बहस के दौरान कहा था कि “भारत संप्रभु होने के लिए बाध्य है, यह स्वतंत्र होने के लिए बाध्य है और यह गणराज्य होने के लिए बाध्य है|”
गोपालन बनाम मद्रास राज्य वाद 1950 तथा यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मदन गोपाल वाद 1954 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि “हम भारत के लोग.... इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।” — ये शब्द भारत के लोगों की सर्वोच्च प्रभुता की घोषणा करते हैं और इस बात की ओर संकेत करते हैं कि संविधान का आधार उन लोगों का प्राधिकार है|
यहाँ प्रभुता से तात्पर्य है कि राज्य को स्वतंत्र अधिकार है अर्थात राज्य को किसी भी विषय पर विधायन करने की शक्ति है तथा राज्य किसी अन्य राज्य या बाह्य शक्ति के नियंत्रण में नहीं है|
प्रभुत्व सम्पन्नता राष्ट्रकुल की सदस्यता से असंगत नहीं है-
26 जनवरी 1950 को जब संविधान प्रवृत हुआ, तब इंग्लैंड के सम्राट का भारत में कोई विधिक या साविधानिक प्राधिकार नहीं रहा|
भारत का कोई भी नागरिक ब्रिटिश सम्राट के प्रति निष्ठा नहीं रख सकता|
यद्यपि भारत ने अपने आपको 26 जनवरी 1950 को गणराज्य घोषित कर दिया, फिर भी उसने ब्रिटिश राष्ट्रकुल से अपने सभी संबंध समाप्त नहीं किए|
वहीं आयरलैंड में रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड एक्ट 1948 बनाकर संबंध समाप्त कर दिए थे|
भारत के राष्ट्रकुल में बने रहने के विनिश्चय के कारण राष्ट्रकुल की संकल्पना ही बदल गयी, क्योंकि भारत ने सम्राट के प्रति निष्ठा रखना स्वीकार नहीं किया|
भारत के इस निर्णय के कारण ब्रिटिश राष्ट्रकुल का जो साम्राज्यवाद का अवशेष था, वह परिवर्तित होकर राष्ट्रकुल के समादरणीय नाम से स्वाधीन राष्ट्रों का एक स्वतंत्र संघ हो गया|
राष्ट्रकुल में बने रहने का यह ऐतिहासिक निर्णय लंदन में 27 अप्रैल 1949 को प्रधानमंत्रियों के सम्मेलन में लिया गया|
इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की कि “भारत प्रभुत्व संपन्न स्वतंत्र गणराज्य बन जाने के पश्चात भी राष्ट्रकुल का पूर्ण सदस्य बना रहेगा और वह सम्राट को स्वधीन राष्ट्रों के स्वतंत्र संगम के प्रतीक के रूप में राष्ट्रकूल के अध्यक्ष के रूप में स्वीकृत देगा|’’
यह घोषणा विधि से बाहर है, भारत के संविधान में इसका उल्लेख नहीं है|
यह स्वैच्छिक घोषणा है, यह एक स्वतंत्र सगम है, जिसमें कोई बाध्यता नहीं है|
पंडित नेहरू “यह स्वेच्छा से किया गया करार है और इसे स्वेच्छा से समाप्त किया जा सकेगा|’’
इसका अर्थ है-
राजनीतिक अधीनता समाप्त हो जाने के बाद भी भारत इंग्लैंड के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों का त्याग नहीं करेगा|
यह नया संगम स्वाधीन राज्यों के बीच एक सम्मान्य संगम है|
भारत इंग्लैंड के सम्राट को राष्ट्रकुल के प्रतीकात्मक अध्यक्ष के रूप में ही स्वीकार करता है|
राष्ट्रकुल के सम्मेलनों में किए गए विनिश्चय भारत पर बाध्यकारी नहीं होंगे|
राष्ट्रकुल से भारत का स्वैच्छिक संबंध किसी भी प्रकार से भारत की प्रभुता को प्रभावित नहीं करता है|
जब भी भारत को लगे कि संघ में बने रहना सम्मानजनक या उपयोगी नहीं है, तो वह इस संबंध को तोड़ सकता है|
गणराज्य-
संविधान के अधीन सभी प्राधिकारों का स्रोत भारत के लोग हैं|
किसी बाहरी प्राधिकारी के प्रति कोई अधीनता नहीं है|
जहां पाकिस्तान 1956 तक ब्रिटिश डोमिनियन बना रहा, लेकिन भारत डोमिनियन नहीं बना और 1949 में संविधान की रचना के बाद से भारत ने अपने आपको गणराज्य घोषित कर दिया|
भारत 26 जनवरी 1950 को संविधान के पूर्ण लागू होने के दिन से गणराज्य बन गया|
गणराज्य का अर्थ है ‘जनता के द्वारा जनता के लिए बनाई गई सरकार|’
हमारे राष्ट्र का प्रमुख निर्वाचित राष्ट्रपति है और राष्ट्रपति सहित सभी पदों पर किसी भी नागरिक की नियुक्ति हो सकती है|
न्यायाधीश हिदायतुल्लाह “गणराज्य एक ऐसा राज्य होता है, जिसमें अंतिम विश्लेषण में सर्वोच्च शक्ति जनता में निहित होती है, न कि राजा जैसे किसी एक व्यक्ति में निहित होती है|”
अन्तर्राष्ट्रीय शांति की अभिवृद्धि-
भारत निष्ठा पूर्वक विश्व शांति के प्रवर्तन के लिए कटिबद्ध है| संविधान के अनुच्छेद 51 में अन्तर्राष्ट्रीय शांति की अभिवृद्धि का जिक्र है|
अनुच्छेद 51 अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि- राज्य,-
(क) अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का,
(ख) राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का,
(ग) संगठित लोगों के एक-दूसरे के बीच व्यवहारों में अन्तर्राष्ट्रीय विधि और संधि बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का, और
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को माध्यस्थम द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का,
प्रयास करेगा|
संविधान में जिस बंधुता की बात कही गई है, वह राष्ट्र की सीमा तक ही बंधी न होकर वसुधैव कुटुम्बकम् के ऊंचे आदर्श पर आधारित है|
पं. नेहरू के शब्दों में “हमारे राष्ट्र का अन्य राष्ट्रों के साथ मिलकर एक यही सामान्य उद्देश्य संभव हो सकता है, कि हम मिलकर विश्व के लिए एक संरचना तैयार करें, चाहे उसे एक विश्व कहे या कुछ और|”
लोकतंत्र-
उद्देशिका में उल्लेखित लोकतांत्रिक गणराज्य में लोकतंत्र राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से लोकतंत्र है|
अर्थात न केवल शासन में लोकतंत्र होगा, बल्कि समाज भी लोकतंत्रात्मक होगा, जिसमें न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व की भावना होगी|
प्रतिनिधि लोकतंत्र-
भारत में प्रतिनिधि लोकतंत्र है| यहाँ लोग अपनी प्रभुता का प्रयोग केन्द्र में संसद तथा प्रत्येक राज्य में विधानमंडल के माध्यम से करते हैं|
इसे संसदात्मक लोकतंत्र भी कहते हैं। यह (i) लोक प्रतिनिधित्व (ii)उत्तरदायी सरकार और (iii) मंत्रिमंडल के विधानमंडल के प्रति उत्तरदायित्व की परिकल्पना करती है|
एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य वाद 2001- “विधानमंडल के सदस्यो को शक्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में जनता से प्राप्त होती है|”
जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन-
भारत के संविधान की उद्देशिका में लोकतंत्रात्मक गणराज्य को स्पष्ट करने के लिए दो निर्देश पर्याप्त हैं-
(1) सभी लोगों के लिए मताधिकार
(2) स्त्री-पुरुष समानता
लोकतांत्रिक समाज-
लोकतांत्रिक गणराज्य सभी लोगों की भलाई के लिए है| यह सिद्धांत कल्याणकारी राज्य की संकल्पना में समाहित है|
कल्याणकारी राज्य की संकल्पना राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में निहित है|
भारत का संविधान न केवल राजनीतिक बल्कि, सामाजिक लोकतंत्र का भी वचन देता है|
डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में अपने समापन भाषण में कहा था कि “यदि राजनीतिक लोकतंत्र का आधार सामाजिक लोकतंत्र नहीं है, तो वह नष्ट हो जाएगा| सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ है वह जीवन पद्धति जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुता को मान्यता देती है| जिसमें ये तीनों अलग-अलग न होकर त्रिमूर्ति के रूप में माने जाते हैं| यदि एक को हम दूसरे से अलग कर दें, तो लोकतंत्र का आशय निष्फल हो जाएगा| स्वतंत्रता को समानता से अलग नहीं किया जा सकता, समानता को स्वतंत्रता से पृथक नहीं किया जा सकता| इसी प्रकार स्वतंत्रता और समानता को बंधुत्व से विलग नहीं किया जा सकता|”
“लोकतांत्रिक समाज में राज्य को अपनी शक्ति अपने स्वतंत्र और समान नागरिकों की सह और आवेश रहित इच्छा प्राप्त होती है।” स्टेट ऑफ पंजाब बनाम जी.एस. गिल वाद 1997
“सामाजिक एवं आर्थिक प्रजातंत्र वह नींव है, जिसके आधार पर भारतीय व्यवस्थित समाज में राजनीतिक प्रजातंत्र का जीवन व्यतीत करने का का मार्ग बनता है।” सामंथा बनाम स्टेट ऑफ आंध्रप्रदेश वाद 1997
संविधान : लोकतांत्रिक बदलाव का साधन-
संविधान राज्य को निरंकुश बनने से रोकता है|
संविधान गहरे सामाजिक बदलाव के लिए शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक साधन भी प्रदान करता है|
संविधान औपनिवेशिक दासता में रहे लोगों के लिए राजनीतिक आत्मनिर्णय का उद्घोष है|
जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में “संविधान सभा की माँग पूर्ण आत्मनिर्णय की सामूहिक माँग का प्रतिरूप है, क्योंकि सिर्फ भारतीय जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों से बनी संविधान सभा को ही बगैर बाहरी हस्तक्षेप के भारतीय संविधान बनाने का अधिकार है|”
नेहरू “संविधान सभा सिर्फ जन-प्रतिनिधियों अथवा योग्य वकीलों का जमावड़ा भर नहीं है, बल्कि स्वयं में राह पर चल पड़ा एक राष्ट्र है, जो अपने अतीत के राजनीतिक और सामाजिक बंधनों के खोल से निकलकर अपने बनाए नए आवरण को पहनने की तैयारी कर रहा है|”
राजनीतिक न्याय-
राजनीतिक न्याय का अर्थ है राजनीतिक क्षेत्र में मनुष्य और मनुष्य के बीच के बीच कोई मनमाना भेदभाव नहीं किया जाएगा|
यह सुनिश्चित करना कि भारत के राज्यक्षेत्र में प्रत्येक व्यक्ति सम्पत्ति व शिक्षा पर ध्यान दिए बिना राजनीतिक व्यवस्था में भाग ले सके|
बिना किसी शर्त के सार्वजनिक मताधिकार प्राप्त हो|
आर्थिक न्याय-
लोक नियोजन के विषय में जाति और मत पर ध्यान दिए बिना स्त्रियों और पुरुषों को समान अवसर प्रदान करना|
आर्थिक न्याय तभी प्राप्त हो सकेगा, जब लोकतंत्र ‘राजनीतिक लोकतंत्र’ तक ही सीमित न रहे| पं. नेहरू के शब्दों में “भूतकाल में लोकतंत्र को राजनीतिक लोकतंत्र के रूप में ही पहचाना गया, जिसमें मोटे तौर से एक व्यक्ति का एक मत होता है, किन्तु मत का उस व्यक्ति के लिए कोई महत्व नहीं होता जो निर्धन और निर्बल है या ऐसे व्यक्ति के लिए जो भूखा है, राजनीतिक लोकतंत्र अपने आप में पर्याप्त नहीं है| उसका आर्थिक लोकतंत्र और समानता में धीरे-धीरे वृद्धि करने के लिए और जीवन की सुख-सुविधाओं को दूसरों तक पहुँचाने के लिए तथा सभी असमानताओं को हटाने के लिए प्रयोग किया जाना चाहिए|”
डॉ. राधाकृष्णन “जो गरीब लोग इधर-उधर भटक रहे हैं, जिनके पास कोई काम नहीं है, जिन्हें कोई मजदूरी नहीं मिलती और जो भूख से मर रहे हैं, जो निरंतर कचोटने वाली गरीबी के शिकार हैं, वे संविधान या उसकी विधि का गर्व नहीं कर सकते|”
आर्थिक न्याय का लक्ष्य आर्थिक लोकतंत्र और कल्याणकारी राज्य की स्थापना है|
आर्थिक न्याय का आदर्श प्रतिष्ठा की समानता लाना और सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रतिष्ठा और अवसर की असमानता को दूर करके जीवन को सार्थक और संतोषपूर्ण बनाना है- डालमिया सीमेंट (भारत) लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया वाद 1996
सामाजिक न्याय-
भारतीय संविधान सामाजिक न्याय के लिए ‘जाति आधारित सकारात्मक कार्य योजना’ (Affirmative Action Programme) अपनाता है, अर्थात आरक्षण व्यवस्था लागू करता है|
इस मामले में भारत दूसरे राष्ट्रों से आगे है| जहाँ USA में सकारात्मक कार्य योजना 1964 के नागरिक अधिकार आन्दोलन के बाद आरम्भ हुई, वहीं भारत ने इसे संविधान प्रारम्भ से ही अपना लिया था|
जवाहरलाल नेहरू “ऐसे सामाजिक न्याय ने सदैव संवेदनशील व्यक्तियों को आकर्षित किया है| मेरे विचार में मार्क्सवाद के प्रति करोड़ों लोगों का बुनियादी आकर्षण इसलिए नहीं था, कि उसने वैज्ञानिक सिद्धांत को अपनाने का प्रयास किया, बल्कि उसका कारण था सामाजिक न्याय के प्रति गहरा लगाव|”
सामाजिक न्याय मूल अधिकार है|- अशोक कुमार गुप्ता बनाम स्टेट ऑफ U.P. 1997
सामाजिक न्याय सामाजिक ढाँचे के विभिन्न समूहों या वर्गों या व्यक्तियों के प्रतिद्वंदात्मक दावों या हितों में विधि द्वारा सामंजस्य पैदा करके सामाजिक असंतुलन को दूर करने का व्यापक रूप है, जिसके द्वारा ही लोक कल्याणकारी राज्य बनाना संभव है|- डालमिया सीमेंट (भारत) लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया वाद 1996
स्वतंत्रता, समानता और बंधुता-
इन तीनों को विधि-सम्मत शासन के अधीन सभी नागरिकों को सामाजिक न्याय, आर्थिक सशक्तिकरण और राजनीतिक न्याय देकर सुरक्षित एवं संरक्षित किया जाना है|- S S बोला बनाम B D सारडाना वाद 1997
स्वतंत्रता-
सही अर्थ में लोकतंत्र की स्थापना तभी हो सकेगी, जब स्वतंत्र और सभ्य जीवन के लिए आवश्यक न्यूनतम अधिकार समुदाय के प्रत्येक सदस्य को प्राप्त हों|
स्वतंत्रता को सामाजिक आत्मसंयम से संयुक्त होना चाहिए और सामान्य प्रसन्नता के लिए सर्वाधिक लोगों को स्वतंत्रता के अधीन होना चाहिए|- S S बोला बनाम B D सारडाना वाद 1997
समानता-
प्रत्येक व्यक्ति को कुछ अधिकार देना अर्थहीन हो जाएगा, यदि सामाजिक संरचना से असमानता दूर नहीं की जातीं है और प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता सुनिश्चित नहीं की जाती है|
संविधान में नागरिक समानता के प्रावधान दिए गए है-
अनुच्छेद 14- विधि के समक्ष समता एवं विधि का समान संरक्षण
अनुच्छेद 15- सामाजिक समानता
अनुच्छेद 16- अवसर की समानता
अनुच्छेद 17- अस्पृश्यता का अंत
राजनीतिक समानता के लिए सार्वजनिक वयस्क मताधिकार का प्रावधान किया गया है| (अनुच्छेद 326)|
आर्थिक समानता का प्रावधान नीति-निदेशक तत्वों में किया गया है-
अनुच्छेद 39 (क)- पुरुष व स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार
अनुच्छेद 39 (घ)- पुरुषों और स्त्रियों को समान कार्य के लिए समान वेतन
समाजवाद-
संविधान में कल्याणकारी राज्य व समाजवादी राज्य की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है|
कांग्रेस ने 1955 में अवाड़ी अधिवेशन में एक संकल्प द्वारा समाज की समाजवादी संरचना के उद्देश्य तय किए|
42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा उद्देशिका में ‘समाजवादी’ शब्द अंत: स्थापित किया गया|
भारत का समाजवाद, समाजवाद से भिन्न है| इसमें सभी धन के साधनों का राष्ट्रीयकरण नहीं किया जाता है|
इन्दिरा गाँधी के शब्दों में “हमने यह सदैव कहा है, कि हमारा समाजवाद अपने ढंग का है| हम उन्हीं क्षेत्रों में राष्ट्रीयकरण करेंगे, जिनमें हम आवश्यकता समझते है| केवल राष्ट्रीयकरण करना यह हमारा समाजवाद नहीं है|”
भारतीय संविधान में ‘समाजवाद’ शब्द का स्पष्टीकरण नहीं किया गया है|
लेकिन उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों में समाजवाद का उद्देश्य आय, प्रास्थिति और जीवन स्तर में असमानता को दूर करना है और कमजोर श्रमजीवी लोगों को शिष्ट जीवन स्तर प्राप्त कराना है|
भारतीय संविधान निजी सम्पत्ति का उन्मूलन नहीं करता है, केवल उस पर कुछ प्रतिबंध लगाता है| यह उद्योगों के पूर्ण राष्ट्रीयकरण के स्थान पर मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाता है|
लेकिन 1992 के बाद से अब इसका झुकाव निजीकरण की ओर है|
Note- जनता पार्टी ने 45 वें संविधान संशोधन विधेयक 1978 द्वारा अनुच्छेद 366 का संशोधन करके ‘समाजवाद’ की व्याख्या करनी चाही थी, किन्तु राज्यसभा में विपक्षी कांग्रेस ने इस बिल को पारित नहीं होने दिया|
42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 43 (क) उद्योगों के प्रबंधन में कर्मकारों का भाग लेना भी समाजवाद का प्रावधान है|
भारतीय समाजवाद का ध्येय ‘मार्क्सवाद और समाजवाद का सम्मिश्रण’ है, जिसका झुकाव गाँधीवादी समाजवाद की ओर है|- नकरा बनाम भारत संघ वाद, 1983
राष्ट्र की एकता और अखण्डता-
42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा राष्ट्र की एकता शब्द की जगह राष्ट्र की एकता और अखण्डता शब्द जोड़ा गया|
भारत की एकता के प्रोन्नयन में, भारत की संस्कृति और विरासत की, जो संस्कृत भाषा पर आधारित है, प्रमुख भूमिका होनी चाहिए|- संतोष बनाम सचिव वाद 1995
बंधुता-
यदि सभी लोगों के बीच बंधुता की भावना उत्पन्न नहीं होगी, तो हमारा लोकतंत्र खोखला रहेगा|
UNO द्वारा अंगीकृत मानव अधिकारों की घोषणा 1948 के अनुच्छेद-1 में कहा गया है कि “सभी मनुष्य जन्म से ही गरिमा और अधिकारों की दृष्टि से स्वतंत्र और समान हैं| उन्हें बुद्धि और अंतश्चेतना प्रदान की गई हैं| उन्हें परस्पर भ्रातृत्व की भावना से कार्य करना चाहिए|”
अम्बेडकर “बंधुता का अर्थ है सभी भारतीयों के सर्वसामान्य भाईचारे की, सभी भारतीयों के एक होने की भावना| यही सिद्धांत सामाजिक जीवन को एकता तथा अखंडता प्रदान करता है| इसे प्राप्त करना कठिन है|”
‘हमारे संविधान की उद्देशिका में बंधुता की वही भावना दृष्टिगोचर होती है, जो UNO द्वारा अंगीकृत मानव अधिकारों की घोषणा के अनुच्छेद-1 में होती है|’- बोम्मई बनाम भारत संघ वाद 1994, श्री आदि विश्वेश्वर ऑफ काशी विश्वनाथ टेम्पल वाराणसी बनाम U.P. राज्य वाद 1997
पंथनिरपेक्ष राज्य-
इसका अर्थ है, कि राज्य सभी मतो की समान रूप से रक्षा करेगा और स्वयं किसी भी मत को राज्य के धर्म के रूप में नहीं मानेगा|
42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा उद्देशिका में ‘पंथ निरपेक्ष’ शब्द अन्तःस्थापित किया गया|
पंथनिरपेक्षता संविधान के आधारिक लक्षणों में से एक है|- बोम्मई बनाम भारत संघ वाद 1994, श्री आदि विश्वेश्वर ऑफ काशी विश्वनाथ टेम्पल वाराणसी बनाम U.P. राज्य वाद 1997
भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता मॉडल से भिन्न है|
जहाँ पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता को धर्म और राज्य के पारस्परिक निषेध के रूप में देखा गया है, वहीं भारतीय धर्मनिरपेक्षता अलग है|
भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता मॉडल से दो रूप में अलग है-
धार्मिक समूहों के अधिकार
राज्य का हस्तक्षेप करने का अधिकार
धार्मिक समूहों के अधिकार-
भारत में अल्पसंख्यक वर्गों, धार्मिक समूहों को विशेष अधिकार दिए गए हैं|
जैसे- धार्मिक समुदायों को शिक्षा संस्थान स्थापित करने और चलाने का अधिकार- अनुच्छेद 30
राज्य का हस्तक्षेप करने का अधिकार-
भारतीय राज्य धर्म के मामलों में नकारात्मक व सकारात्मक हस्तक्षेप कर सकता है|
नकारात्मक हस्तक्षेप- जैसे अस्पृश्यता का अंत- अनुच्छेद 17
सकारात्मक हस्तक्षेप- जैसे धार्मिक शिक्षा संस्थानों को सहायता- अनुच्छेद 30(2)
भारत में धर्म और राज्य के अलगाव का अर्थ पारस्परिक निषेध नहीं है, बल्कि राज्य की धर्म से सिद्धान्तगत दूरी है| यह एक जटिल विचार है| इससे राज्य को सभी धर्मों से दूरी रखने की छूट मिलती है, ताकि वह अवसर के अनुकूल धर्म के मामलों में हस्तक्षेप कर सके अथवा दखल देने से बचा रहे|
व्यक्ति की गरिमा-
जब तक प्रत्येक सदस्य की गरिमा की रक्षा न की जाए, तब तक बंधुता की स्थापना नहीं हो सकेगी|
व्यक्ति की गरिमा के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए संविधान प्रत्येक व्यक्ति को समान मूल अधिकार देता है|
हमारे उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है, कि “गरिमा का अधिकार मूल अधिकार है|”- भारतीय जीवन बीमा निगम बनाम कंज्यूमर वाद 1995
मूल अधिकार एवं मूल कर्तव्य-
संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकार दिए गए हैं|
42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा अनुच्छेद 51(A) अन्तःस्थापित करके मूल कर्तव्य जोड़े गए हैं|
उद्देशिका में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को समानता और बंधुता से जोड़ने का जो प्रयास किया गया है, उसे महात्मा गाँधी ने ‘मेरे स्वप्नों का भारत’ कहा है|
महात्मा गाँधी ने अपनी पुस्तक इंडिया ऑफ माई ड्रीम्स में लिखा है कि “ऐसा भारत जिसमें गरीब से गरीब भी यह समझेगा कि यह उसका देश है, जिसके निर्माण में उसका हाथ है| ... वह भारत जिसमें सभी समुदाय पूर्णतया समरस होकर रहेंगे| ऐसे भारत में अस्पृश्यता के श्राप के लिए या मादक पेय और स्वापक द्रव्यों के लिए कोई स्थान नहीं होगा| स्त्री और पुरुष समान अधिकारों का उपभोग करेंगे|”
अर्नेस्ट बार्कर ने अपनी पुस्तक सोशल एंड पोलिटिकल थ्योरी के प्रारम्भिक भाग में भारतीय संविधान की उद्देशिका के उद्देश्य को उद्धरित किया है| अर्नेस्ट बार्कर ने लिखा है कि “उद्देशिका इस पुस्तक के समस्त तर्क संक्षेप में समाहित है और वह इस पुस्तक की कुंजी के रूप में कार्य कर सकती है|”
उदारवाद-
भारतीय संविधान यूरोपीय शास्त्रीय परंपरा परम्परा के अर्थ में उदारवादी नहीं है, बल्कि उससे अलग है|
शास्त्रीय उदारवाद सामाजिक न्याय और सामुदायिक जीवन मूल्यों के ऊपर हमेशा व्यक्ति को तरजीह देता है, जबकि भारतीय संविधान का उदारवाद इससे अलग है|
भारतीय संविधान सामाजिक न्याय से जुड़ा है|
भारतीय संविधान विविधता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान करता है|
K M पणिक्कर (पुस्तक- इन डिफेन्स ऑफ लिबरलिज़्म 1962) के अनुसार-
भारतीय उदारवाद की दो धाराएँ है-
प्रथम धारा की शुरुआत राजा राममोहन राय से होती है, जिन्होंने व्यक्ति के अधिकारों खासकर महिलाओं के अधिकारों पर जोर दिया|
दूसरी धारा में स्वामी विवेकानन्द, K.C. सेन और ज्योतिराव फुले जैसे चिंतक शामिल हैं| इन चिंतकों ने पुरातनी हिंदू धर्म के दायरे में सामाजिक न्याय का जज्बा जगाया| विवेकानन्द के लिए हिंदू समाज की ऐसी पुनर्संरचना कर पाना उदारवादी सिद्धान्तों के बिना संभव नहीं है|
सार्वभौमिक मताधिकार-
भारत के लिए औपचारिक रूप से संविधान तैयार करने के पहले प्रयास ‘कॉन्स्टीट्यूशन ऑफ इंडिया बिल 1895 में कहा गया कि “प्रत्येक नागरिक अर्थात भारत में जन्मे हर व्यक्ति को देश के मामलों में भाग लेने तथा सरकारी पद हासिल करने का हक है|”
मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट 1928 में कहा गया कि “24 वर्ष की आयु के हर व्यक्ति को (स्त्री या पुरुष हो) लोकसभा के लिए मतदान करने का अधिकार होगा|”
संविधान सभा के वाद-विवाद के दौरान 23 नवम्बर 1949 को अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा कि “सभा ने आम आदमी और लोकतांत्रिक नियमों की पूरी सफलता पर भरपूर भरोसा करते हुए तथा इस विश्वास के साथ वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को अपनाया है कि वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतांत्रिक शासन की यह शुरुआत सबका भला करेगी|”
संघवाद-
भारतीय संविधान में पूर्वोत्तर से सम्बन्धित अनुच्छेद 371 को जगह देकर ‘असमतोल संघवाद’ की अवधारणा को अपनाया है|
भारतीय संघ में केन्द्रीय सरकार मजबूत है, अर्थात केन्द्रीय सरकार की तरफ झुकाव वाला संघ है|
असमतोल संघवाद का अर्थ है- भारत संघ की विभिन्न इकाइयों (राज्यों) की कानूनी हैसियत और विशेषाधिकारों में अंतर है| सभी इकाइयों में समानता नहीं है|
जैसे- अनुच्छेद 371A पूर्वोत्तर के प्रदेश नागालैंड को विशेष दर्जा प्रदान करता है| यह अनुच्छेद नागालैंड में पहले से लागू नियमों को मान्यता प्रदान करता है तथा आप्रवास पर रोक लगाकर स्थानीय पहचान की रक्षा करता है|
अमेरिकी संघवाद समतोल है, अर्थात सभी इकाइयों की कानूनी हैसियत समान है|
वर्तमान में भारत एक बहु-भाषिक संघ है| यहां हर बड़े भाषाई समूह की राजनीतिक मान्यता है|
राष्ट्रीय पहचान-
संविधान में समस्त भारतीय जनता की एक राष्ट्रीय पहचान पर बल दिया गया है|
इसके लिए एकल नागरिकता अपनाई गई| विविधता में एकता पर बल किया गया है|
प्रक्रियागत उपलब्धि-
निम्न उपलब्धियाँ प्रक्रियागत हैं-
भारतीय संविधान का विश्वास राजनीतिक विचार-विमर्श में है| संविधान निर्मात्ता असहमति और विरोध को एक सकारात्मक मूल्य के रूप में देखते थे|
संविधान निर्मात्ता सुलह और समझौते में विश्वास रखते थे|
संविधान सभा वाद-विवाद के दौरान 25 मई 1949 को सरदार पटेल ने कहा कि “लेकिन आगे चलकर यह भूलना सबके हित में होगा कि इस देश में अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक जैसी कोई चीज है| भारत में सिर्फ एक समुदाय है|”
आलोचना-
यह संविधान अस्त-व्यस्त है|
इसमें सबकी नुमाइंदगी नहीं हो सकी|
यह संविधान भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल नहीं है|
भारतीय संविधान विदेशी दस्तावेज है|
संविधान सभा वाद-विवाद के दौरान 17 नवम्बर 1949 को K. हनुमंथैया ने कहा कि “हम वीणा या सितार का संगीत सुनना चाहते थे, लेकिन यहाँ तो अंग्रेजी बैंड बज रहा है| ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि हमारे संविधान निर्माता उसी रूप में शिक्षित हुए थे| यह ठीक वैसा ही संविधान है जैसा महात्मा गाँधी नहीं चाहते थे और जिसके बारे में उन्होंने सोचा तक न था|”
ग्रेनविल ऑस्टिन : संविधान का दर्शन-
प्रसिद्ध अमेरिकी इतिहासकार व भारतीय संविधान के विशेषज्ञ
2011 में भारत सरकार से पद्मश्री से सम्मानित हुए|
भारतीय संविधान का जीवनीकार या बायोग्राफर कहलाते हैं|
पुस्तकें-
The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation (1966)
Working a Democratic Constitution: The Indian Experience (1999)
Retrieving Times (2008)
ऑस्टिन ने भारतीय संविधान को एक ‘सामाजिक दस्तावेज’ , ‘आम सहमति का दस्तावेज’ व ‘राष्ट्र की आधारशिला’ कहा है|
उन्होंने भाग-3 (मौलिक अधिकार) व भाग-4 (नीति निदेशक तत्व) को ‘संविधान की अन्तरात्मा’ कहा है|
ग्रेनविल ऑस्टिन के अनुसार संविधान दर्शन के मुख्य बिंदु-
सामाजिक क्रान्ति का दस्तावेज-
इनके अनुसार संविधान का प्राथमिक उद्देश्य केवल शासन प्रणाली चलाना नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त असमानता, जातिगत भेदभाव और गरीबी को दूर कर सामाजिक क्रांति लाना था|
ऑस्टिन सामाजिक क्रांति को भारतीय संविधान का परिवर्तनकारी लक्ष्य बताते हैं, जिसका उद्देश्य भारतीय समाज को इस तरह से पुनर्गठित करना है, कि सभी को न्याय, समानता और सम्मान प्राप्त हो सके|
संविधान निर्माताओं ने सामाजिक क्रांति को अपना प्राथमिक उद्देश्य माना था| जातिगत भेदभाव, आर्थिक असमानता, अन्याय को समाप्त करने के एक साधन के रूप में|
आम सहमति और प्रत्यायन या सामंजस्य-
इनका मानना है कि संविधान का निर्माण आम सहमति और जनमत के समन्वय से हुआ था|
निर्बाध जाल-
इन्होंने संविधान को एक ‘निर्बाध जाल’ (Seamless Web) कहा है, जिसके विभिन्न प्रावधान एक दूसरे से गुंथे हुए हैं|
असाधारण आदर्शवाद और दृढ़ संकल्प-
इनके अनुसार संविधान निर्माताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन से प्रेरित ‘असाधारण आदर्शवाद और दृढ़ संकल्प’ के साथ अपना कार्य किया|
संविधान एक जीवंत दस्तावेज-
इनके अनुसार भारतीय संविधान एक जीवंत दस्तावेज है, जो केवल कानूनी नियमों का संग्रह मात्र ही नहीं है, बल्कि यह नैतिक खाका है, राष्ट्रीय नवीनीकरण का मार्गदर्शक है|
ऑस्टिन ने अपनी पुस्तक The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation में संविधान सभा, संविधान निर्माण तथा भारतीय राजनीतिक प्रणाली की व्याख्या की है|
इस पुस्तक के प्रथम अध्याय ‘संविधान सभा : बीज से वृक्ष की ओर’ में संविधान सभा को ‘भारत का सूक्ष्मचित्र’ कहा है|
घनिष्ट त्रिकोण-
संविधान सभा, कांग्रेस, सरकार (केंद्र व प्रांतों में) अलग-अलग निकाय होने के बावजूद भी इनके सदस्यों में अन्तर्व्याप्ति थी| कांग्रेस का वर्चस्व संविधान सभा में भी था तथा सरकार में भी था|
अल्पतंत्र-
संविधान सभा में पं. नेहरू, सरदार पटेल, अब्दुल कलाम आजाद की महत्वपूर्ण भूमिकाएँ थीं| इसी कारण ऑस्टिन ने इनको अल्पतंत्र की संज्ञा दी|
सौहार्दपूर्ण संघ या सहयोगी संघ-
ऑस्टिन ने भारतीय संघ को सौहार्दपूर्ण संघ या सहयोगी संघ कहा है|
भारत में राज्य धन के लिए केंद्र पर तथा केंद्र योजना क्रियान्वयन के लिए राज्यों पर निर्भर हैं|
तीन मूल तत्व-
ऑस्टिन ने भारतीय संविधान को तीन तत्वों का संगम बताया-
राष्ट्रीय एकता
लोकतंत्र
सामाजिक क्रांति
सामाजिक क्रांति के तीन विकल्प-
ऑस्टिन सामाजिक क्रांति के तीन विकल्प बताते हैं-
गाँधीवाद
समाजवाद (नीति निर्देशक तत्वों में)
उदारवाद (मूल अधिकारों में)
संविधान सभा की कार्यप्रणाली-
ऑस्टिन ने संविधान सभा की कार्यप्रणाली के तीन आधार बताए है-
सर्वसम्मति पर आधारित निर्णय
सामंजस्य का सिद्धांत- जैसे कठोर व लचीलेपन का समन्वय
चयन व समायोजन- विभिन्न देशों के संविधानों से चयन
ऑस्टिन के कथन-
“संविधान सभा एक दलीय देश में एक दलीय निकाय थी|”
“संविधान सभा ही कांग्रेस थी और कांग्रेस ही संविधान सभा|”
“नीति निर्देशक तत्व सामाजिक क्रांति के वाहक हैं, जिसे मानवीय सामाजिक पहलु से प्राप्त किया जाएगा|”
“कांग्रेस कभी गाँधीवादी नहीं थी|”
“भाषा का मुद्दा एक आधा-अधूरा समझौता था|”
“भारत की आजादी के बाद शुरुआत अच्छी नहीं रही, स्वतंत्रता आंदोलन केवल शक्ति हस्तांतरण का आंदोलन था|”
“भारतीय संविधान नया धर्मशास्त्र व पारसमणि है|”
“आपातकाल (1975-76) USA के मैकार्थी युग की तरह था|”
केशवानंद भारती वाद (1973) ‘रथ के दो पहियों’ की तरह था, जो संसद व न्यायपालिका की शक्तियों में समन्वय स्थापित करता है|”
“भारतीय संविधान एक सामाजिक दस्तावेज है|”
“संविधान की सफलता का श्रेय भारत की जनता को जाता है|”
“42वें संविधान संशोधन (1976) में इतनी खामियों के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय, न्यायपालिका की शक्तियों, मूल अधिकारों व संसद की शक्तियों को चोट नहीं पहुँची|”
भारत में जाति स्थानीय स्तर पर निर्णय-प्रक्रिया को उसी प्रकार प्रभावित करती है, जैसे- दबाव समूह|
“उदार प्रजातंत्रीय संविधान भारत को आदिम कालीन ग्रामीण अर्थव्यवस्था से बाहर लाकर वैज्ञानिक व नियोजित कृषि एवं औद्योगिक अर्थव्यवस्था में ले जाएगा|”
“भारतीय संविधान समय की परीक्षा में सफल होकर दृढ़ खड़ा हुआ है|”
उपेन्द्र बख्शी ने अपनी पुस्तक The Impossibility of Constitutional Justice में ऑस्टिन के योगदान का वर्णन किया है|”

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