अनुच्छेद 23(1)-
मानव का दुर्व्यापार और बेगार तथा इसी प्रकार का अन्य बलात्श्रम प्रतिषिद्ध किया जाता है और इस उपबंध का कोई भी उल्लंघन अपराध होगा जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा|
व्याख्या-
अनुछेद 23(1) मानव के दुर्व्यापार और बेगार तथा किसी प्रकार के अन्य बलात श्रम प्रतिषेध करता है|
और यह इस उपबंध का कोई भी और उल्लंघन अपराध घोषित करता है तथा विधि के अनुसार दंडनीय घोषित करता है|
यह किसी व्यक्ति को न केवल राज्य के खिलाफ बल्कि व्यक्तियों के खिलाफ भी सुरक्षा प्रदान करता है|
मानव दुर्व्यापार का अर्थ-
पुरुष, महिला व बच्चों की वस्तु के सामान खरीद- बिक्री
महिलाओं व बच्चों का अनैतिक दुर्व्यापार, इसमें वेश्यावृत्ति भी शामिल है|
देवदासी
दास
Note- इन कार्यों को रोकने के लिए संसद ने अनैतिक दुर्व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 बनाया है|
Note- राजस्थान में प्रचलित रही हाली या सागड़ी प्रथा पर रोक इसी अनुच्छेद के आधार पर लगी है|
बेगार का अर्थ-
बिना पारिश्रमिक के काम करना
बलात श्रम का अर्थ-
किसी व्यक्ति से बलपूर्वक उसकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करवाना|
न्यूनतम मजदूरी से कम पर काम कराना भी बलात श्रम है|
अनुच्छेद 17 की तरह अनुच्छेद 23 के संबंध में भी संसद को अनुच्छेद 35 के तहत कानून बनाकर दंड का प्रावधान करने की शक्ति है|
बेगार व बलात श्रम को रोकने के लिए संसद ने निम्न कानून बनाये है-
बंधुआ मजदूरी व्यवस्था (निरसन) अधिनियम 1976
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948
ठेका श्रमिक अधिनियम 1970
समान परिश्रमिक अधिनियम 1976
दीना बनाम भारत संघ वाद 1983- कैदियों को अपने काम हेतु उचित मजदूरी पाने का हक है अर्थात उचित पारिश्रमिक बगैर काम कराना बलात श्रम है|
Note- मनरेगा कार्यक्रम में न्यूनतम मजदूरी अनुच्छेद 23(1) व अनुच्छेद 43 का समर्थन करता है|
अनुच्छेद 23(2)-
इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए अनिवार्य सेवा अधिरोपित करने से निवारित नहीं करेगी| ऐसी सेवा अधिरोपित करने में राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा|
व्याख्या-
यह 23(1) का अपवाद है|
राज्य सार्वजनिक प्रयोजन के लिए किसी सेवा को अनिवार्य सेवा अधिरोपित कर सकता है, ऐसी सेवा अधिरोपित करने में राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा
चार आधार- 1 धर्म, 2 मूल वश, 3 जाति, 4 वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा, इनके अलावा भेदभाव किया जा सकता है|
गुजरात राज्य बनाम आरनेबल गुजरात हाईकोर्ट वाद 1998- कठोर कारावास से दण्डित व्यक्ति से अनिवार्य शारीरिक श्रम कराना असंवैधानिक निर्णय नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि यह अनुच्छेद 23(2) के प्रावधान के संगत है अर्थात वे सार्वजनिक प्रयोजन की सेवा करते हैं|
चंद्रावती देवी वाद 2021- अनुच्छेद 23 की कोई परिसीमा नहीं है| इसकी परिधि व्यापक व असीमित है|

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