यह किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी व निवारक निरोध कानून से संरक्षण प्रदान करता है|
हिरासत तो तरह की होती है-
दंड विषयक
निवारक
दंड विषयक-
इसमें एक व्यक्ति को तब हिरासत में लिया जाएगा, जब उसने अपराध स्वीकार कर लिया तथा अदालत ने दोषी ठहरा दिया|
निवारक निरोध-
इसमें व्यक्ति को शंका के आधार पर गिरफ्तार किया जा सकता है, ताकि भविष्य में होने वाले अपराध को रोका जा सके|
यह रोलेट एक्ट की पुनरावृति दिखाई देता है|
पंडित ठाकुर दास भार्गव ने संविधान सभा में निवारक निरोध को असफलताओं का शिरोमणि कहा था|
AK गोपालन वाद 1950 में सुप्रीम कोर्ट ने इसको संविधान का एक भद्दा प्रावधान कहा था|
निवारक निरोध के तहत पारित कानून-
भारत सरकार ने निवारक निरोध के अब तक निम्न कानून पारित किए हैं-
निवारक निरोध अधिनियम- 1950 (1969 में समाप्त)- AK गोपालन को इसी के तहत गिरफ्तार किया गया था|
आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (MISA) 1971, (1978 में समाप्त)- इसे इंदिरा गांधी ने बनाया था तथा 1975 के आपातकाल में इसका बहुत ज्यादा दुरूपयोग हुआ था|
विदेशी मुद्रा का संरक्षण एवं व्यवसन निवारण अधिनियम (COFEPOSA) 1974- COFEPOSA निवारक निरोध कानून वर्तमान में सक्रिय है| COFEPOSA विदेशी मुद्रा व मादक पदार्थों की तस्करी से संबंधित है|
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NASA )1980- रासुका नाम से चर्चित यह अधिनियम आज भी लागू है, जो कि सांप्रदायिक व जातीय दंगों को प्रेरित करने वालों पर लगता है|
चोर बाजारी निवारण और आवश्यक वस्तु प्रदान अधिनियम (PBMSECA) 1980
आतंकवादी और विध्वंसक क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (TADA) 1985 (1995 में समाप्त)
स्वापक औषधि और मन प्रभावी पदार्थ व्यापार निवारण (PITNDPSA) अधिनियम 1988
आतंकवाद निवारण अधिनियम (POTA) 2002, (2004 में समाप्त)- यह भारतीय संसद पर हमले के बाद लाया गया था| राज्यसभा में अटकने पर POTA को अटल बिहारी की सरकार ने संसद के संयुक्त अधिवेशन में पारित करवाया था|
अनुच्छेद 22(1)-
- किसी व्यक्ति को, जो गिरफ्तार किया गया है, ऐसी गिरफ्तारी के कारणों से यथाशीघ्र अवगत कराए बिना अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा या अपनी रुचि के विधि व्यवसायी से परामर्श करने और प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा|
व्याख्या-
गिरफ्तार व्यक्ति को यथाशीघ्र गिरफ्तारी का कारण बताएं बिना गिरफ्तार नहीं रखा जा सकता है तथा विधि व्यवसायी से परामर्श करने और प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से वंचित नहीं रखा जाएगा|
अनुच्छेद 22(2)-
- प्रत्येक व्यक्ति को, जो गिरफ्तार किया गया है और अभिरक्षा में निरुद्ध रखा गया है, गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर ऐसी गिरफ्तारी से चौबीस घंटे की अवधि में निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा और ऐसे किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना उक्त अवधि से अधिक अवधि के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा|
व्याख्या-
गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे (गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा समय को छोड़कर) की अवधि में निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा तथा मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता है|
अनुच्छेद 22(3)-
- खण्ड (1) और खण्ड (2) की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को लागू नहीं होगी जो-
(क) तत्समय शत्रु अन्यदेशीय है; या
(ख) निवारक निरोध का उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन गिरफ्तार या निरुद्ध किया गया है|
व्याख्या-
यह अपवाद है|
22(1) व 22(2) की बातें निम्न पर लागू नहीं होंगी-
(क) तत्कालीन शत्रु विदेशी व्यक्ति पर|
(ख) निवारक निरोध कानून के तहत गिरफ्तार व्यक्ति पर|
अनुच्छेद 22(4)-
- निवारक निरोध का उपबंध करने वाली कोई विधि किसी व्यक्ति का तीन मास से अधिक अवधि के लिए तब तक निरुद्ध किया जाना प्राधिकृत नहीं करेगी जब तक कि—
(क) ऐसे व्यक्तियों से, जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं या न्यायाधीश रहे हैं या न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित हैं, मिलकर बने सलाहकार बोर्ड ने तीन मास की उक्त अवधि की समाप्ति से पहले यह प्रतिवेदन नहीं दिया है कि उसकी राय में ऐसे निरोध के लिए पर्याप्त कारण हैं;
परन्तु इस उपखण्ड की कोई बात किसी व्यक्ति का उस अधिकतम अवधि से अधिक अवधि के लिए निरुद्ध किया जाना प्राधिकृत नहीं करेगी जो खण्ड (7) के उपखण्ड (ख) के अधीन संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा विहित की गई है; या
(ख) ऐसे व्यक्ति को खण्ड (7) के उपखण्ड (क) और उपखण्ड (ख) के अधीन संसद द्वारा बनाई गई विधि के उपबन्धों के अनुसार निरुद्ध नहीं किया जाता है|
व्याख्या-
निवारक निरोध कानून के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को 3 महीने से अधिक गिरफ्तार सलाहकार बोर्ड के प्रतिवेदन पर ही रखा जा सकता है|
सलाहकार बोर्ड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, या H.C के पूर्व न्यायधीश या H.C मे न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए योग्य व्यक्तियों से मिलकर बनेगा|
अनुच्छेद 22(5)-
- निवारक निरोध का उपबन्ध करने वाली किसी विधि के अधीन किए गए आदेश के अनुसरण में जब किसी व्यक्ति को निरुद्ध किया जाता है तब आदेश करने वाला प्राधिकारी यथासम्भव शीघ्र उस व्यक्ति को यह संसूचित करेगा कि वह आदेश किन आधारों पर किया गया है और उस आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन करने के लिए उसे शीघ्रातिशीघ्र अवसर देगा|
व्याख्या-
निवारक निरोध कानून के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को यथासम्भव शीघ्र निवारक निरोध आदेश जारी करने वाला प्राधिकारी आदेश के आधार बतायेगा तथा आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन करने के लिए उसे शीघ्रातिशीघ्र अवसर देगा|
अनुच्छेद 22 (6)-
- खण्ड (5) की किसी बात से ऐसा आदेश, जो उस खण्ड में निर्दिष्ट है, करने वाले प्राधिकारी के लिए ऐसे तथ्यों को प्रकट करना आवश्यक नहीं होगा जिन्हें प्रकट करना ऐसा प्राधिकारी लोकहित के विरुद्ध समझता है|
व्याख्या-
आदेश जारी करने वाले प्राधिकारी आदेश के आधारों को बताना लोकहित के विरुद्ध समझता है, तो आधारों को बताना आवश्यक नहीं होगा|
अनुच्छेद 22(7)-
- संसद विधि द्वारा विहित कर सकेगी कि—
(क) किन परिस्थितियों के अधीन और किस वर्ग या वर्गों के मामलों में किसी व्यक्ति को निवारक निरोध का उपबन्ध करने वाली किसी विधि के अधीन तीन मास से अधिक अवधि के लिए खण्ड (4) के उपखण्ड (क) के उपबन्धों के अनुसार सलाहकार बोर्ड की राय प्राप्त किए बिना निरुद्ध किया जा सकेगा;
(ख) किसी वर्ग या वर्गों के मामलों में कितनी अधिकतम अवधि के लिए किसी व्यक्ति को निवारक निरोध का उपबन्ध करने वाली किसी विधि के अधीन निरुद्ध किया जा सकेगा; और
(ग) खण्ड (4) के उपखण्ड (क) के अधीन की जाने वाली जांच में सलाहकार बोर्ड द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया क्या होगी|
व्याख्या-
(क) कुछ परिस्थितियों के लिए और किसी वर्ग या वर्गों के मामलों में सलाहकार बोर्ड की राय के बिना किसी भी व्यक्ति को तीन मास से अधिक अवधि के लिए गिरफ्तार रखने के लिए संसद विधि बना सकती है|
(ख) किसी वर्ग या वर्गों के मामलों में संसद विधि बनाकर निवारक निरोध कानून के तहत गिरफ्तारी की अधिकतम अवधि तय कर सकती है|
(ग) सलाहकार बोर्ड की जांच प्रक्रिया का निर्धारण संसद विधि बनाकर कर सकती है|

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