अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित आयोग-
राष्ट्रपति अनुच्छेद 340 के तहत सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग व उनकी पहचान के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग बना सकता है|
अब तक ऐसे तीन आयोग बने हैं-
काका कालेलकर आयोग (1953)-
29 जनवरी 1953 को प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन काका कालेलकर की अध्यक्षता में किया गया|
इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट 30 मार्च 1955 को दी|
तत्कालीन प्रधानमंत्री J.L नेहरू ने इस आयोग की रिपोर्ट को खारिज कर दिया|
मंडल आयोग (1979)-
1 जनवरी 1979 को मोरारजी देसाई सरकार ने द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन B.P मंडल (बिंदेश्वरी प्रसाद) की अध्यक्षता में किया|
इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट 12 दिसंबर 1980 को दी| जिस समय इंदिरा गांधी सरकार आ चुकी थी, जिसने इस आयोग की रिपोर्ट को खारिज कर दी|
काका कालेकर आयोग की तरह बी पी मंडल आयोग ने भी पिछड़े वर्ग का निर्धारण जाति के आधार पर करने की सलाह दी|
इसने 3743 जातियो की पहचान की, जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई थी| (जनसंख्या में हिस्सा 52% था)
आयोग ने अन्य पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण की सिफारिश की|
Note- 1990 में सर्वप्रथम V.P सिंह सरकार ने 13 अगस्त 1990 को BP मंडल आयोग की सिफारिश (27% आरक्षण) को लागू करने की घोषणा की| जिसका व्यापक विरोध हुआ था|
1991 मे नरसिम्हा राव सरकार ने 27% आरक्षण अन्य पिछड़े वर्ग के साथ 10% आरक्षण उच्च जाति के आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को प्रदान किया|
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ वाद 1992 या मंडल केस 1992-
इंदिरा साहनी, मंडल रिपोर्ट के आधार पर दिए गए आरक्षण के विरोध में सर्वोच्च न्यायालय चली गई|
जिस पर सर्वोच्च न्यायालय के 9 न्यायाधीशों की पीठ ने निर्णय दिया| सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश M H कानिया उस पीठ के अध्यक्ष थे|
इसे मंडल वाद भी कहते हैं|
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में अन्य पिछड़ा वर्ग की पहचान का आधार जाति को सही माना|
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने OBC के 27% आरक्षण को वैध माना| लेकिन सवर्ण का 10% आरक्षण, जो आर्थिक आधार पर दिया गया है, उसको समाप्त कर दिया तथा OBC के क्रीमीलेयर सिद्धांत की बात की| OBC को प्रोन्नति में आरक्षण नहीं होगा|
आरक्षण कोटा 50% से ज्यादा नहीं होना चाहिए, लेकिन कुछ असाधारण परिस्थितियों में 50% से ज्यादा हो सकता है|
Note-
आरक्षण की सीमा 50% से ऊपर नहीं होगी, पर तमिलनाडु इस मामले में अपवाद है, जहां आरक्षण 69% है| यह नोवी अनुसूची में शामिल|
76 वे संविधान संशोधन 1995 में तमिलनाडु राज्य में 69% आरक्षण का प्रावधान कर उसे नोवी अनुसूची में शामिल किया गया|
रोहिणी आयोग 2017-
जस्टिस G रोहिणी की अध्यक्षता में तीसरा पिछड़ा वर्ग आयोग रोहिणी आयोग का गठन राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 340 के तहत किया|
उद्देश्य-
OBC में उपवर्गीकरण व विभाजन के संबंध में सुझाव देना|
केंद्र की ओबीसी सूची में शामिल जातियों के बीच आरक्षण के लाभों के असमान वितरण का अध्ययन करना|
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC)
मंडल वाद के निर्णय के बाद अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) की पहचान के लिए मंडलवाद में सुप्रीम कोर्ट के कहने पर 1993 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया|
यह संसदीय अधिनियम से बना विधिक या सांविधिक आयोग था|
मोदी सरकार ने इसे संवैधानिक दर्जा दे दिया, अब यह संवैधानिक आयोग है|
102 वां संविधान संशोधन अधिनियम 2018 के द्वारा अनुच्छेद 338B जोड़ कर इसको संवैधानिक दर्जा दिया गया|
क्रीमीलेयर सिद्धांत-
क्रीमीलेयर की पहचान के लिए 1993 में रामनंदन समिति का गठन किया गया|
क्रीमीलेयर की अवधारणा केवल ओबीसी पर लागू होती है, लेकिन जरनैलसिंह बनाम लक्ष्मी नारायण वाद 2018 में यह निर्णय दिया गया कि क्रीमीलेयर की अवधारणा SC व ST पर लागू की जा सकती है, लेकिन इस संदर्भ में अंतिम निर्णय सरकार को लेना है|
क्रीमीलेयर में पिछड़े वर्ग के कुछ छात्र सम्मिलित होंगे, जिन्हें आरक्षण का लाभ प्राप्त नहीं होगा-
संवैधानिक पद धारण करने वाले व्यक्ति| जैसे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, SC व H.C के न्यायधीश, UPSC के सदस्य व अध्यक्ष, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्य, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, CAG आदि के बच्चे|
केंद्रीय या राज्य सेवा के ग्रुप A व क्लास-1, ग्रुप B व क्लास-2 की सेवा के अधिकारी, निजी कंपनी, बैंक, बीमा, विश्वविद्यालय के समकक्ष अधिकारियों के बच्चे|
सेना में कर्नल व इसके ऊपर के रैंक का अधिकारी या नौसेना व वायुसेना में समकक्ष अधिकारी के बच्चे|
डॉक्टर, इंजीनियर, कलाकार, लेखक, सलाहकार आदि के बच्चे|
व्यापार, वाणिज्य, उद्योग में लगे व्यक्तियों के बच्चे|
बड़े जमींदार के बच्चे|
जिनकी पारिवारिक आय सालाना आय 8 लाख से अधिक है, जिसमें वेतन व कृषि आय को शामिल नहीं किया गया| अर्थात आय वेतन व कृषि आय से अलग होनी चाहिए, जैसे- किराया, उधोग आदि|
रोहित नाथन बनाम भारत संघ वाद-
रोहित नाथन ने IAS परीक्षा में ओबीसी वर्ग में 174 वी रैंक प्राप्त की|
इनके पिता प्राइवेट सेक्टर में काम करते थे, जिनके वेतन को उनके पारिवारिक आय में जोड़ा गया तथा क्रीमीलेयर में मानकर ओबीसी आरक्षण से वंचित किया गया|
2018 में अपील की गई| जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को निर्णय दिया|
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि केवल माता-पिता की आय ही क्रीमीलेयर के निर्धारण का आधार नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यक्ति की वास्तविक पद की स्थिति व सामाजिक स्थिति भी देखी जाए|
तथा रोहित नाथन को क्रीमीलेयर के तहत नहीं माना|

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