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अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण, अनुच्छेद 21(क) शिक्षा का अधिकार

     

    अनुच्छेद 21  प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण 


    अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण- किसी व्यक्ति को, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं| 


    व्याख्या-

    • अंबेडकर “यह संविधान का मेरुदंड तथा मैग्नाकार्टा है|”

    • इसे जीवन का अधिकार भी कहते हैं|

    • यह भी राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352) के समय निलंबित नहीं होता है|

    • इसके अनुसार किसी व्यक्ति को प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता से ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ (जापान से प्रेरित) के अनुसार वंचित किया जा सकता है, अन्यथा नहीं|

    • Note- S.C ने इसमें इच्छा मृत्यु को भी शामिल किया है|

    • इंग्लैंड के संविधान के समान ही भारतीय संविधान में भी दैहिक स्वतंत्रता, बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट द्वारा सुनिश्चित की गई है| (अनुच्छेद 32 और 226)


    • Note- 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1978 के बाद से अनुच्छेद 20 व 21 राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352) के समय राष्ट्रपतिआदेश अनुच्छेद 359 के तहत निलंबित नहीं किया जा सकते| 


    • A.K.गोपालन बनाम मद्रास राज्य वाद (1950)-

    • इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 21 के तहत मनमानी कार्यकारी प्रक्रिया के विरुद्ध सुरक्षा उपलब्ध है, न कि विधानमंडलीय प्रक्रिया के विरुद्ध| 

    • अर्थात राज्य प्राण व दैहिक स्वतंत्रता को कानूनी आधार पर रोक सकता है|



    A.K.गोपालन बनाम मद्रास राज्य वाद (1950)-

    • ए.के. गोपालन मद्रास राज्य के स्वतंत्रता के समय मुख्य साम्यवादी (CPI) नेता थे|  

    • उन्हें लोक व्यवस्था बिगाड़ने व सशस्त्र विद्रोह भड़काने के शक के चलते निवारक निरोध अधिनियम (1950) (अनुच्छेद 22) के तहत गिरफ्तार कर लिया|  

    • गोपालन ने प्राण व दैहिक स्वतंत्रता के तहत मुकदमा किया| 

    • इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने निवारक निरोध अधिनियम को ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के अनुसार सही कह कर छोड़ने से मना कर दिया तथा कहा कि प्राण व दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार मनमानी कार्यपालिका क्रियाओं के खिलाफ है, न कि व्यवस्थापिका क्रियाओं के| 



    • मेनका गांधी बनाम भारत संघ वाद (1978)-

    • इसमें गोपालन वाले निर्णय को पलट दिया गया| अर्थात अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षा मनमानी कार्यकारी प्रक्रिया व विधानमण्डलीय प्रक्रिया दोनों के विरुद्ध प्राप्त है|

    • इस मामले में दैहिक स्वतंत्रता का अर्थ गरिमामय जीवन बताया|

    • मेनका गांधी मामले में उच्चतम न्यायालय ने नैसर्गिक न्याय की संकल्पना का प्रतिपादन किया अर्थात अनुच्छेद 21 में विधि शब्द से तात्पर्य विधायिका द्वारा पारित विधि से नहीं है, बल्कि ऐसी विधि से है जो नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत पर आधारित है|

    • जब व्यक्ति को उसकी दैहिक स्वतंत्रता से वंचित करने वाली विधि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है तो वह अविधिमान्य होगी|  



    मेनका गांधी बनाम भारत संघ वाद (1978)

    • जनता पार्टी सरकार ने विदेश जाने से रोकने के लिए मेनका गांधी का पासपोर्ट जब्त कर लिया| 

    • मेनका गांधी सुप्रीम कोर्ट में चली गयी|  

    • इस वाद में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ को न्यायपूर्ण, उचित व युक्तिसंगत होना चाहिए| 

    • मेनका गांधी मामले में न्यायाधीश कृष्ण अय्यर ने कहा है कि “एक सरकार जो गोपनीयता के तहत काम करती है, न केवल लोकतांत्रिक शासन के विरुद्ध कार्य करती है अपितु स्वयं को कब्र में दफन कर लेती है|”



    • सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 में निम्न अधिकारों को सम्मिलित किया है-

    1. निशुल्क विधिक सहायता का अधिकार (सुकदास V/S अरुणाचल प्रदेश)

    2. आजीविका का अधिकार (पटरी वासियों का केस)

    3. प्राथमिक शिक्षा का अधिकार (मोहिनी जैन V/S कर्नाटक)

    4. चिकित्सा का अधिकार (परमानंद कटारा) 

    5. प्राइवेसी का अधिकार (फोन टैपिंग मामला)

    6. विदेश जाने का अधिकार (मेनका गांधी वाद)

    7. सौंदर्य प्रतियोगिता का अधिकार (हैदराबाद पुलिस कमिश्नर)

    8. हथकड़ी न लगाने का अधिकार (गुजरात कैदी)

    9. सूचना का अधिकार (हेल्थ उत्कर्ष समिति V/S एस्सार ऑयल लि.)

    10. नींद का अधिकार (श्याम सिंह)

    11. एकांतता का अधिकार (गोविंद V/S M.P)

    12. स्वच्छ जल व वायु का अधिकार (सुभाष कुमार V/S बिहार)

    13. आश्रय प्राप्ति का अधिकार (चमेली सिंह V/S U P)



    अनुच्छेद 21(क)  शिक्षा का अधिकार 


    अनुच्छेद 21क. शिक्षा का अधिकार- राज्य, छः वर्ष से चौदह वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा इस प्रकार प्रदान करेगा जिस प्रकार से राज्य विधि के अधीन निर्धारित करे| 


    व्याख्या-

    • मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य वाद 1992- इसमें सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा पाने के अधिकार को अनुच्छेद 21 में शामिल करने का निर्णय दिया| 

    • उन्नीकृष्णन बनाम आन्ध्रप्रदेश राज्य वाद 1993- इसमें उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के लिए निःशुल्क शिक्षा अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है|  

    • इसके बाद तपस्सु मजूमदार समिति (1999) ने अनुच्छेद 21A को शामिल करने की अनुशंसा की|  

    • इसके बाद अनुच्छेद 21(क) 86 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 के द्वारा जोड़ा गया|

    • इसमें घोषणा की गई कि राज्य 6-14 वर्ष के सभी बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा|

    • इसको लागू करने के लिए 2009 में राइट टू एजुकेशन अधिनियम बनाया गया| 


    • Note- यह व्यवस्था आवश्यक शिक्षा के लिए है, न कि उच्च या व्यवसायिक शिक्षा के लिए|



     



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