लोक प्रशासन का अर्थ-
साधारण भाषा में लोक प्रशासन का अर्थ सरकार की उन सभी प्रकार की गतिविधियों से है, जिनके द्वारा वह जनसाधारण पर शासन करती है तथा जनसाधारण की देखभाल करती हैं|
लोक प्रशासन दो शब्दों से बना है- लोक व प्रशासन| अतः लोक प्रशासन का अर्थ समझने से पहले हमें लोक व प्रशासन का अर्थ समझना चाहिए|
लोक का अर्थ-
लोक के लिए अंग्रेजी शब्द Public प्रयुक्त होता है, जिसका सामान्य अर्थ ‘जनता’ है, लेकिन लोक प्रशासन में लोक का अर्थ ‘शासन’ या ‘सरकार’ या ‘सार्वजनिक’ है|
लोक प्रशासन में लोक का अर्थ व्यक्तिगत नहीं है, क्योंकि व्यक्तिगत स्थिति का शासन निजी प्रशासन कहलाता है|
यह सार्वजनिक है तथा सरकारी कार्यों से संबंधित है|
प्रशासन का अर्थ-
प्रशासन का अंग्रेजी पर्यायवाची Administration है| Administration शब्द में Ad लेटिन उपसर्ग है तथा Ministration शब्द लैटिन शब्द Ministrare से बना है, जिसका अर्थ है- सेवा करना| इस प्रकार Administration शब्द का अर्थ है- सेवा करना या प्रबंध करना या देखभाल करना|
प्रशासन शब्द संस्कृत शब्द ‘प्रशास्ता’ से बना है, प्रशास्ता वैदिक यज्ञो के मुख्य पुजारी को कहा जाता था| प्रशास्ता अन्य अधीनस्थ पुजारियों का निर्देशन यज्ञ के दौरान करता था| अतः प्रशास्ता का कार्य भी प्रशासन करना था|
कामंडकीय नीतिसार में प्रशासन को शासन संचालन के लिए या राजा के कार्यों के लिए प्रयुक्त किया गया|
ब्रिटेनिका डिक्शनरी में अर्थ- कार्यों का प्रबंध या कार्यों को पूर्ण करने की प्रक्रिया|
लोक प्रशासन का अर्थ-
लोक तथा प्रशासन के अर्थ के आधार पर लोकप्रशासन के दो अर्थ निकलते हैं-
पारंपरिक अर्थ या संकुचित अर्थ- ऐसा प्रशासन जो सरकारी क्षेत्र तक सीमित है|
आधुनिक अर्थ या विस्तृत अर्थ- सार्वजनिक उद्देश्यों को केंद्र में रखकर संचालित की जाने वाली प्रत्येक क्रिया लोक प्रशासन के अंतर्गत आती है|
दूसरे अर्थ में लोक प्रशासन मात्र सरकारी प्रशासन ही नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक स्वरूप की निजी गतिविधियां भी इसके अंतर्गत आ जाती है| उदाहरण- नगर निगम के कचरे उठाने में लगी ठेकेदारी कंपनी, स्वयंसेवी संस्थाएं, NGO,s आदि|
Note- वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में दूसरा व्यापक अर्थ ही मान्य है|
आधुनिक अर्थ के अनुसार लोक प्रशासन में निम्न शामिल होंगे-
सभी सरकारी गतिविधियां चाहे वह नियामकीय प्रकृति की हो या जनकल्याण प्रकृति की|
सरकारी वित्त द्वारा पोषित निजी संगठनों की वे गतिविधियां जिनका उद्देश्य सार्वजनिक हित है|
अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय या स्थानीय स्तर के सभी स्वयंसेवी संस्थाओं के वे कार्य जो सार्वजनिक प्रकृति के हैं|
अंतर्राष्ट्रीय शासकीय संगठनों द्वारा संचालित गतिविधियां| जैसे- UNO या मानवाधिकार आयोग आदि के कार्य|
निजी संगठन की गतिविधियां, जो सरकारी अनुबंध के तहत सार्वजनिक हित में संचालित है|
लोक प्रशासन के पारंपरिक व आधुनिक अर्थ में अंतर-
लोक प्रशासन की परिभाषाएं-
लोक प्रशासन लोक नीति या विधि का क्रियान्वयन है-
एल.डी. व्हाइट “लोक प्रशासन में वे सब कार्य आते हैं, जिनका उद्देश्य लोक नीति को लागू करना है|”
वुडरो विल्सन “विधि को क्रमबद्ध और विस्तृत रूप में लागू करना ही लोक प्रशासन है|”
वुडरो विल्सन “विधि के क्रियान्वयन की प्रत्येक क्रिया प्रशासनिक क्रिया है| जिस प्रकार राजनीति का संबंध नीति निर्माण से है, उसी प्रकार प्रशासन का संबंध नीति क्रियान्वयन से है|
गुडनाउ “प्रशासन राज्य की इच्छा के क्रियान्वयन का प्रतीक है|”
डिमॉक “कानून को कार्यरूप देना ही लोक प्रशासन है|”
लोक प्रशासन नीति क्रियान्वयन के साथ नीति निर्माण भी है-
एपलबी “नीति-निर्माण ही लोक प्रशासन का सार है| प्रशासनिक प्रश्न हमारे समय में (1950 का दशक) राजनीतिक प्रश्न भी हैं|”
Note- वहीं वुडरो विल्सन ने कहा था कि राजनीतिक प्रश्न प्रशासनिक प्रश्न नहीं होते|
मार्शल डिमॉक “प्रशासन सरकार के क्या (नीति) और कैसे (क्रियान्वयन) दोनों से संबंधित है|”
फिफनर “लोक प्रशासन सरकार के ‘क्या’ और ‘कैसे’ दोनों हैं|”
निग्रो “लोक प्रशासन लोक नीति का रचनाकार है|”
लोक प्रशासन मात्र कार्यपालिका से संबंधित कार्य है-
लूथर गुलिक “अपने वास्तविक अर्थ में लोक प्रशासन मुख्य रूप से सरकार के कार्यपालिका अंग से संबंधित है|”
विलोबी “अपने संकुचित अर्थ में लोक प्रशासन सरकार की प्रशासकीय शाखा (कार्यपालिका) के कार्यों से संबंधित है| विषय के लिए यही अर्थ मायने रखता है|”
साइमन “लोक प्रशासन का अर्थ है, वे कार्य जो केन्द्र, राज्य या स्थानीय कार्यपालिका करती है|”
डिमॉक “सरकार का कार्यकारी वाला भाग लोक प्रशासन है|”
पर्सी मैकक्वीन “लोक प्रशासन का सम्बन्ध सरकार की प्रकिया से है, चाहे वह स्थानीय हो या केंद्रीय|”
लोक प्रशासन सम्पूर्ण सरकार (उसके तीनों अंगों) से संबंधित कार्य है-
निग्रो “लोक प्रशासन सरकार के तीनों अंगों और उनके परस्पर संबंधों से संबंधित है|”
विलोबी “अपने व्यापक अर्थ में लोक प्रशासन समस्त सरकारी कार्यों के वास्तविक सम्पादन से संबंधित है, चाहे वह किसी भी शाखा के हों|”
आधुनिक समय में लोक प्रशासन बड़ा ही महत्वपूर्ण हो गया है, विभिन्न विद्वानों के अनुसार-
डब्ल्यू. बी. डॉनहैम “यदि आधुनिक मानव सभ्यता का पतन हुआ तो ऐसा मुख्यतः प्रशासन की असफलता के कारण होगा|”
मार्शल ई. डिमॉक “प्रशासन अब इतना विशाल क्षेत्र बन गया है, कि प्रशासन दर्शन अब जीवन दर्शन के समीप आ गया है|”
ड्वाइट वाल्डो “एक वाक्य अथवा एक अनुच्छेद में लोक प्रशासन को परिभाषित करने का तात्कालिक मतलब बौद्धिक उत्तेजना नहीं, बल्कि मानसिक दिवालियापन होता है|”
ग्लैडेन “लोक प्रशासन बहुरूपी है तथा इसकी परिभाषा करना अत्यन्त कठिन है| सरकार के बदलते हुए कार्यों के संदर्भ में ही इसे समझा जा सकता है|”
ऑर्डवे टीड “लोक प्रशासन एक नैतिक कार्य है और प्रशासक एक नैतिक अभिकर्ता|”
शेफरिट्ज एवं रसेल ने लोक प्रशासन की 28 परिभाषाएँ दी हैं| ये परिभाषाएँ 4 वर्गों में बंटी हैं-
राजनीतिक
कानूनी
व्यवसायिक
प्रबंधकीय
गोलम्ब्यूस्की का लोकस-फोकस विचार-
गोलम्ब्यूव्स्की ने लोक प्रशासन का अर्थ एवं क्षेत्र स्पष्ट करते हुए ‘लोकस’ एवं ‘फोकस’ का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है|
लोकस (Locus)-
लोकस (Locus) लोक प्रशासन के क्षेत्र का निर्धारण करता है|
अर्थात् यह तय करता है कि लोक प्रशासन कहाँ (Where) राजनीति का भाग है अथवा उससे विलग है|
आमतौर पर लोक प्रशासन का लोकस ‘सार्वजनिक नौकरशाही’ माना जाता है|
फोकस (Focus)-
इसका तात्पर्य है, कि लोक प्रशासन का अध्ययन बिन्दु क्या (What) है|
कभी लोक प्रशासन के अध्ययन का फोकस ‘प्रशासन के सिद्धांत’ थे, बाद में ‘लोकनीति’ थी| समय व परिस्थितियों के अनुसार फोकस बदलता रहता है|
प्रशासन (Administration) व प्रबंधन (Management) में अन्तर-
प्रशासन एक व्यापक शब्द है, जिसके तहत नीति-निर्धारण से सम्बन्धित समस्त गतिविधियाँ आ जाती हैं|
प्रबंधन तो प्रशासन का ही एक भाग है| प्रबंध, प्रशासन द्वारा निर्धारित नीतियों का क्रियान्वयन करता है|
लोक प्रशासन का विकास-
लावेल ने प्रबंध के बारे में लिखा है कि यह प्राचीनतम कला तथा नवीनतम विज्ञान है, यही बात लोक प्रशासन के बारे में भी कहीं जा सकती है|
लोक प्रशासन का विकास: प्राचीन काल
कला के रूप में लोक प्रशासन जब आदिमानव वन्य जीवन व्यतीत कर रहा था, उस समय भी था, किंतु विषय के रूप में इसका विधिवत विवेचन और व्यवस्थित अध्ययन 18वीं सदी के अंतिम चरण से आरंभ हुआ|
लोक प्रशासन प्रबंध की क्रिया तथा ज्ञान की पृथक शाखा या विषय दोनों है|
प्रबंध क्रिया के रूप में लोक प्रशासन उतना ही पुराना है, जितना सामाजिक जीवन|
प्राचीन मिस्त्र, चीन, भारत और मेसोपोटामिया की नदी-घाटियों में लोक प्रशासन के आरंभ के संकेत मिलते हैं|
रामायण, महाभारत, कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी प्रशासन का विवेचन मिलता है|
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में तो लोक प्रशासन विषय का विस्तृत और व्यवस्थित ढंग से विवेचन किया गया है|
प्राचीन यूनानी नगर राज्यों में भी लोक प्रशासन का संगठित रूप प्राप्त होता है|
यूनानी विचारक अरस्तु की पॉलिटिक्स और प्लेटो की रिपब्लिक में भी प्रशासन का पर्याप्त वर्णन मिलता है|
चीन के कन्फ्यूशियसवाद (600 BC) में भी प्रशासन पर चिंतन मिलता है|
रोमन शासको ने भी लोक प्रशासन को वैधानिक मानदंड एवं स्वरूप प्रदान किया|
मध्य युग में अबुल फजल की आईने अकबरी में भी प्रशासन का वर्णन मिलता है|
मैक्यावली की रचना प्रिंस में भी शासन संचालन व प्रशासन की विस्तृत व्याख्या मिलती है|
हॉब्स के लेवियाथन में भी प्रशासन का वर्णन मिलता है|
मध्यकालीन सामंतवाद ने प्रशासन के क्षेत्र में एक अराजकतापूर्ण विकेंद्रीकरण का समावेश किया|
लेकिन बाद में फ्रांस, इंग्लैंड प्रशा व रूस के नवोदित राजतंत्रो ने पुन: केंद्रीकरण का समावेश किया|
राजा की सत्ता के विस्तार तथा केंद्रीकरण के फलस्वरुप राजमहल के कर्मचारियों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती गई, जिस कारण राज्य के प्रशासन कार्य को मंत्रालयों, विभागों और क्षेत्रीय कार्यकलापों में बांटा गया|
प्रशा संसार का सबसे पहला देश था, जिसने लोकसेवा के कर्मचारियों को योग्यता व गुणों के आधार पर भर्ती किया|
लोक प्रशासन का विकास: आधुनिक काल-
एक क्रिया के रूप में तो लोक प्रशासन काफी प्राचीन है, लेकिन अध्ययन की शाखा या विद्या के रूप में इसका उदय वर्तमान काल में हुआ है|
यूरोप में लोक प्रशासन शब्द का प्रचलन 17वीं शताब्दी में हुआ, जब सम्राटों द्वारा लोक कार्य में प्रशासन तथा उनके निजी घरेलू व्यवस्था के बीच अंतर किया जाने लगा|
आधुनिक लोक प्रशासन का अध्ययन पहली बार प्रशा (जर्मनी) में प्रारंभ हुआ, जहां लोक प्रशासन को परिवीक्षाधीन लोक कर्मचारियों के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में स्थान दिया गया|
जर्मनी और आस्ट्रिया में 1500 से 1700 के बीच पनपे कैमरलवादियों ने लोक प्रशासन के अध्ययन में रुचि ली|
कैमरलवादियों ने सरकारी कर्मचारियों के कैडर, स्वरूप, कार्यों और अपेक्षित व्यवहार के क्षेत्र में अनुसंधान पर जोर दिया|
संयुक्त राज्य अमेरिका में 18वीं शताब्दी के अन्त में प्रकाशित ‘विश्वकोश फेडरलिस्ट’ के 72वें परिच्छेद में अमेरिका के पहले वित्तमंत्री अलेक्जेंडर हैमिल्टन ने लोक प्रशासन के अभिप्राय और क्षेत्र की स्पष्ट व्याख्या की|
लोक प्रशासन विषय की पहली पुस्तक 1812 में फ्रेंच लेखक चार्ल्स जीन बोनिन (Charles Jean Bounin) ने Principles D’ Administration Publique (लोक प्रशासन के सिद्धांत) लिखी|
लोक प्रशासन शब्द का पहली बार प्रयोग करने का श्रेय चार्ल्स जीन बोनिन को दिया जाता है|
बोनिन ने ही नेपोलियन के शासन काल में 1800 के प्रारम्भिक काल में हुई प्रशासनिक क्रान्ति के बाद सरकारी अधिकारियों के लिए प्रशासनिक संहिता का मसौदा तैयार किया था|
एक विषय के रूप में लोक प्रशासन का जन्म 1887 में हुआ, जब वुडरो विल्सन का लेख A Study of Administration (1887) पॉलिटिकल साइंस क्वार्टरली में प्रकाशित हुआ|
अमेरिका की प्रिस्टन यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर वुडरो विल्सन लोक प्रशासन के जनक माने जाते हैं|
वाल्डो ने लोक प्रशासन का जन्म 1887 में लिखे गये वुड्रो विल्सन के लेख A Study of Administration से माना है|
सर्वप्रथम वाल्डो ने ही 1950 में विल्सन को एक विद्या या विषय के रूप में लोक प्रशासन का जनक कहा था|
वाल्डो ने लोक प्रशासन के विकास को दो भागों में रखा-
1940 के पहले का लोक प्रशासन, जिसमें परंपरावाद का बोलबाला था|
1940 के बाद का लोक प्रशासन, जिसमें पहले रूप में व्यवहारवाद का और फिर उत्तर व्यवहारवाद का प्रभाव आया|
लोक प्रशासन विकास के चरण-
प्रथम चरण (1887 से 1926) [ लोक प्रशासन का जन्म व राजनीति- प्रशासन द्विभाजकता (Dichotomy) का युग ]-
सम्बंधित विद्वान- वुड्रो विल्सन, फ्रैंक J गुडनाउ, एल.डी. व्हाइट
वुडरो विल्सन-
एक विषय के रूप में लोक प्रशासन का जन्म 1887 में, अमेरिका में हुआ|
अमेरिका की प्रिस्टन यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर वुडरो विल्सन लोक प्रशासन के जनक माने जाते हैं|
वुडरो विल्सन ने 1887 में ‘पॉलिटिकल साइंस क्वार्टली’ नाम की पत्रिका में ‘A Study of Administration’ शीर्षक एक लेख प्रकाशित कराया|
इस लेख में उन्होंने कहा कि राजनीति और प्रशासन के कार्य अलग-अलग है, अर्थात राजनीति व प्रशासन के पृथक्करण की बात की तथा कहा कि संविधान बनाना आसान है, चलाना कठिन है|
इस तरह पहले चरण में लोक प्रशासन का जन्म हुआ|
वुडरो विल्सन ने कहा है कि विधि को क्रमबद्ध और विस्तृत रूप में लागू करना ही लोक प्रशासन है| इस तरह वुडरो विल्सन लोक प्रशासन के कानूनी उपागम के समर्थक हैं|
लोक प्रशासन में वुडरो विल्सन का योगदान-
प्रशासन का विज्ञान-
विल्सन का मत था कि प्रशासन का एक विज्ञान होना चाहिए|
विल्सन का मत है कि प्रशासन एक विज्ञान है, जो उस राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन का नवीनतम फल है, जो स्वयं 2200 वर्ष पहले शुरू हुआ था|
विल्सन का मत है कि प्रशासन का विज्ञान इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि संविधान बनाने (राजनीतिक कार्य) से ज्यादा मुश्किल काम संविधान को चलाना (प्रशासनिक कार्य) है|
विल्सन “सरकार के रास्तों को प्रशस्त करने वाला प्रशासन का एक विज्ञान होना चाहिए ताकि सरकार के काम थोड़े कम सरकारी लगे, सरकारी संगठनों को सुदृढ़ व स्वच्छ बनाया जा सके और इनके अन्दर दायित्व बोध का संचार किया जा सके|”
राजनीति-प्रशासन द्विभाजन-
वुड्रो विल्सन ने राजनीति- प्रशासन के द्विभाजन पर बल दिया|
राजनीति-प्रशासन द्विभाजन (Dichotomy) को ‘विल्सोनियन पुकार’ कहा जाता है|
विल्सन को राजनीति-प्रशासन द्विभाजन का जनक माना जाता है|
विल्सन “राजनीति का संबंध नीति निर्माण से है, जबकि प्रशासन का संबंध नीति क्रियान्वयन से है|”
वुडरो विल्सन “राजनीति को प्रशासन में तथा प्रशासन को राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए|”
विल्सन “प्रशासन उसी प्रकार राजनीतिक जीवन का भाग है, जिस प्रकार घरों की गिनती की पद्धति सामाजिक जीवन का और मशीनें उत्पादित वस्तुओं का भाग है|”
व्यवसायिक प्रशासन-
विल्सन “प्रशासन व्यवसाय है और व्यवसाय की तरह प्रशासन स्वयं को राजनीति के प्रश्नों में शामिल नहीं करता|”
विल्सन “प्रशासन का क्षेत्र एक व्यवसाय का क्षेत्र है, जो राजनीति की हड़बड़ी व अनबन से अलग है|”
विल्सन “सरकार का प्रशासन, व्यवसाय जैसा हो सकता है और होना चाहिए, परन्तु यह व्यवसाय नहीं है| यह सार्वजनिक जीवन है|”
प्रशासन के तुलनात्मक अध्ययन के लिए प्रारम्भिक पहल-
मोहित भट्टाचार्य ने विल्सन को तुलनात्मक लोक प्रशासन का जनक कहा है|
विल्सन ने प्रशा सरकार के व्यवहारों का अध्ययन करने के लिए जर्मन भाषा सीखी थी|
फ्रैंक जे.गुड़नाऊ-
कोलंबिया विश्वविद्यालय (USA) में प्रशासनिक कानून के प्रोफेसर
अमेरिकी प्रशासनिक कानून के जनक
गुड़नाऊ को अमेरिकी लोक प्रशासन का पितामह कहा जाता है|
1903 में वे अमेरिकन पॉलिटिकल साइंस एसोसिएशन (APSA) के पहले अध्यक्ष बने
पुस्तक- Politics and Administration 1900
फ्रैंक जे.गुड़नाऊ ने विल्सन के इस विचार कि ‘राजनीति, प्रशासन से अलग है और प्रशासन का जन्म हमारे देश अमेरिका में हुआ है’ को पूर्णता प्रदान की|
गुड़नाऊ ने अपनी पुस्तक ‘राजनीति और प्रशासन’ (Politics and Administration) 1900 में लिखा कि-
राजनीति राज्य की इच्छा का प्रतीक है, जबकि प्रशासन उस इच्छा के क्रियान्वयन का प्रतीक है|
जब दोनों के कार्य अलग-अलग हैं, अतः दोनों को प्रथक-प्रथक होना चाहिए|
L.D व्हाइट-
पूरा नाम- लियोनार्ड डुपी व्हाइट
प्रसिद्ध अमेरिकी इतिहासकार व राजनीति वैज्ञानिक
पुस्तक- Introduction of the Study of Public Administration 1926
यह पुस्तक भी राजनीतिक प्रशासन द्वैतभाव पर बल देती है|
यह लोक प्रशासन विषय की प्रथम पाठ्य पुस्तक मानी जाती है|
इस पुस्तक के प्रकाशन के साथ ही लोक प्रशासन को ‘स्वायत्त अकादमी स्तर’ प्राप्त हुआ और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में यह स्वतंत्र रूप से पढ़ाया जाने लगा|
कला बनाम विज्ञान की अवधारणा- व्हाइट ने प्रशासन को मुख्य रूप से कला माना है, जो भविष्य में विज्ञान के रूप में विकसित हो सकता है|
प्रथम चरण की विशेषताएं-
लोक प्रशासन का उदय
राजनीति व प्रशासन का विभाजन
कार्यकुशलता और मितव्ययिता लोक प्रशासन के केंद्र बिंदु हैं|
द्वितीय चरण (1927 से 1937) [सिद्धांतों का स्वर्ण युग]-
सम्बंधित विद्वान- विलोबी, F W टेलर, लूथर गुलिक, उर्विक, फेयोल, मूने व रैले, फोलेट
इस युग को सिद्धांतों का स्वर्ण युग माना जाता है, क्योंकि इस समय सिद्धांतों पर विशेष बल दिया गया|
इस चरण को पुरातन अथवा ऑर्थोडॉक्सी की अवस्था भी कहा जाता है, क्योंकि संगठन के औपचारिक ढांचे पर बल दिया गया| अतः शास्त्रीय या परंपरावादी विचारधारा पुष्ट हुई|
प्रशासन व प्रबंध के वैज्ञानिकीकरण का प्रयास किया गया|
सार्वभौमिक सिद्धांतों पर बल दिया गया|
इस चरण में राजनीति-प्रशासन द्विविभाजन के विचार के पुनर्निरीक्षण पर बल दिया गया|
इस चरण की प्रमुख मान्यता यह रही कि प्रशासन के कुछ सिद्धांत होते हैं, जिनका पता लगाना और उनका समर्थन करना विद्वानों का काम है|
यह माना कि प्रशासन एक मूल्य मुक्त एक यांत्रिक संरचना है, जिसके निश्चित सिद्धांत है|
प्रशासन का स्वरूप सार्वभौमिक है|
व्यक्ति एवं संगठन में संगठन को निर्णायक माना गया|
लोक व निजी प्रशासन को एक माना|
प्रबंधन पर बल तथा कार्य क्षमता व कार्य निपुणता पर बल|
टेलर ने वैज्ञानिक प्रबंधनवाद के माध्यम से सिद्धांतो की खोज की|
Note- लोक प्रशासन इस चरण में अपने चरम पर था|
W.F विलोबी-
लोक प्रशासन, बजट एवं प्रशासनिक संगठन के एक प्रसिद्ध अमेरिकी विद्वान और लेखक
पुस्तक- Principle of Public Administration 1927
इस पुस्तक से द्वितीय चरण की शुरुआत हुई|
इस पुस्तक में विलोबी ने प्रशासन के सिद्धांतों पर बल दिया|
विलोबी ने इस पुस्तक में माना कि प्रशासन में अनेक सिद्धांत है और इनको कार्यान्वित करने से लोक प्रशासन में सुधार हो सकता है|
विलोबी के अनुसार प्रशासन में कुछ सामान्य सिद्धांत खोजे और लागू किए जा सकते हैं, जिनसे प्रशासन की दक्षता और मितव्ययिता बढ़ाई जा सकती है|
हेनरी फियोल-
फ्रांसीसी विद्वान, फ्रांसीसी खनन इंजीनियर
पुस्तक-
Industrial and General Management 1916
The Reform of Public Service 1918
The Industrialisation of the State 1919
फेयोल को आधुनिक प्रबंध सिद्धांत का जनक कहा जाता है|
सार्वभौम व्यक्ति (The Universalist) के उपनाम से प्रसिद्ध- क्योंकि देश, काल तथा परिस्थिति के अनुसार अधिकांश चिंतकों के विचार या तो अप्रासंगिक हो जाते हैं अथवा उनकी उपादेयता में कमी आ जाती है, किन्तु हेनरी फेयोल के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक दिखाई देते हैं, जितने कि वे एक सदी पूर्व थे|
Industrial and General Management पुस्तक में फेयोल ने 14 सिद्धांत दिए है|
फेयोल ने प्रबंधन में पदाधिकारियों के सम्बन्ध ‘स्केलर चेन’ (Hierarchy के तुल्य) व ‘गैंगप्लांक व्यवस्था’ का सुझाव दिया|
‘स्केलर चेन’-
Hierarchy (पदानुक्रम) के तुल्य,
उच्च अधिकारी से निम्न अधिकारी की क्रमिक श्रृंखला
गैंगप्लांक व्यवस्था (Gangplank System)-
समान स्तर के अधिकारियों को आवश्यकता पड़ने पर सीधे संपर्क की अनुमति|
सूचना पदानुक्रम श्रृंखला से होकर भेजी जाए, तो समय की बर्बादी और संचार में देरी हो सकती है|
इसी समस्या के समाधान के लिए उन्होंने गैंगप्लांक (Gangplank) की व्यवस्था का सुझाव दिया|
गैंगप्लांक के अंतर्गत समान स्तर पर कार्य करने वाले दो अधिकारियों को विशेष या तात्कालिक परिस्थिति में सीधे आपस में संपर्क करने की अनुमति दी जाती है|
फेयोल का POCCC दृष्टिकोण-
फेयोल ने प्रशासन के 5 कार्य बताए|
जो निम्न है- POCCC अर्थात् P- Planning (नियोजन), O- Organising (संगठन बनाना), C- Commanding (आदेश) , C- Coordinating (समन्वय) और C- Controlling (नियंत्रण)
गुलिक व उर्विक-
लेख- Papers on the Science of Administration 1937
अन्य रचनाएँ-
Administrative Reflections from World War II- 1948
The Coming Age of Cities- 1956
Program Planning for National Goals- 1968
उर्विक ने 8 तथा गुलिक ने 10 सिद्धांत दिए बाद में उर्विक ने 29 सिद्धांतों का वर्णन किया|
लिण्डल एल. उर्विक-
इंग्लैंड के विद्वान
रचनाएँ-
The Elements of Administration (1943)
प्रशासन एवं प्रबन्ध के क्षेत्र में इतिहासकार उपनाम से प्रसिद्ध
Colombo Plan के परामर्शदाता उर्विक 1956 में भारत में प्रबंधन शिक्षा एवं प्रशिक्षण से संबंधित विशेषज्ञ के रूप में आए थे|
उर्विक ने 15 मार्च 1956 को भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली में Management and Government विषय पर व्याख्यान दिया|
उर्विक “सामान्यतः प्रोफेसर्स वही पढ़ाते हैं जो वे पढ़ाना चाहते हैं न कि वह बात जिसे विद्यार्थी सीखना चाहते हैं|”
लूथर एच. गुलिक-
अमेरिकी लोक प्रशासन के प्रमुख शास्त्रीय प्रशासनिक सिद्धांतकार
POSDCORB दृष्टिकोण-
प्रशासन तथा प्रबन्ध के सम्बन्ध में गुलिक ने POSDCORB का दृष्टिकोण दिया|
P- Planning (योजना बनाना), O- Organizing (संगठन बनाना), S- Staffing (कर्मचारियों की व्यवस्था करना), D- Directing (निर्देशन करना), CO- Co-ordinating (समन्वय करना), R- Reporting (रिपोर्ट तैयार करना), B- Budgeting (बजट तैयार करना)
4P सिद्धांत-
गुलिक ने विभागीयकरण (Departmentalisation) (विभाग निर्माण) के चार आधार बताए हैं| जिसको 4P की अवधारणा कहा जाता है|
ये आधार निम्न है-
Purpose (उद्देश्य)
Process (प्रक्रिया)
Persons (व्यक्ति)
Place (स्थान)
गुलिक “युद्धकाल का लोक प्रशासन, शांतिकाल के लोक प्रशासन से भिन्न होता है|”
ब्रायन आर. फ्राई ने लूथर गुलिक को लोक प्रशासन का डीन कहा है|
मुने व रैले-
रचनाएँ-
Onward Industry 1931
Principles of Organisation 1939
मुने व रैले ने चार सिद्धांत दिए- समन्वय, लाइन और स्टाफ, श्रम विभाजन, पद सोपान
इन्होंने समन्वय को संगठन का प्रथम सिद्धांत माना है|
मेरी पार्कर फॉलेट-
रचना- Creative Experience 1924
मेरी पार्कर फॉलेट शास्त्रीय व व्यवहारवाद दोनों के मध्य योजक कड़ी का कार्य करती है|
फॉलेट को प्रबंधन का पैगम्बर (Prophet of Management) कहा जाता है| पीटर एफ. ड्रकर ने कहा था|
इनकी रचनात्मक संघर्ष (Constructive Conflict) व ‘स्थिति का कानून’ (Law of Situation) प्रमुख अवधारणाएँ हैं|
रचनात्मक संघर्ष (Constructive Conflict)-
मैरी पार्कर फॉलेट के अनुसार संघर्ष हमेशा नकारात्मक नहीं होता है, बल्कि यदि उसे उचित तरीके से संभाला जाए तो यह संगठन के लिए रचनात्मक और उपयोगी हो सकता है|
फॉलेट ने संघर्ष के समाधान के तीन तरीके बताये है-
प्रभुत्व (Domination)- एक पक्ष दूसरे पक्ष पर अपनी इच्छा थोप देता है|
समझौता (Compromise)- दोनों पक्ष अपनी कुछ माँगें छोड़कर बीच का रास्ता अपनाते हैं|
एकीकरण (Integration)- दोनों पक्षों की वास्तविक आवश्यकताओं को समझकर ऐसा समाधान निकाला जाता है, जिसमें दोनों के हितों की पूर्ति हो सके|
फॉलेट ने एकीकरण (Integration) को संघर्ष समाधान का सर्वाधिक रचनात्मक तरीका माना है|
‘स्थिति का कानून’ (Law of Situation)-
मैरी पार्कर फॉलेट के अनुसार संगठन में आदेश देने या निर्णय लेने का आधार किसी व्यक्ति का पद या व्यक्तिगत अधिकार नहीं, बल्कि परिस्थिति की वास्तविक आवश्यकताएँ होनी चाहिए| अर्थात-
निर्णय स्थिति और तथ्यों के आधार पर लिया जाना चाहिए|
अधिकारी को केवल अपने पद के अधिकार के आधार पर आदेश नहीं देना चाहिए|
तृतीय चरण (1938 से 1947) [सिद्धांतों की प्रतिक्रिया/ आलोचना/ चुनौतियों का युग]-
सम्बंधित विद्वान- एल्टन मेयो, चेस्टर बनार्ड, हरबर्ट साइमन, रॉबर्ट डहल, डवाइट वाल्डो, मेरी पार्कर फोलेट
इसे सिद्धांतों की प्रतिक्रिया का युग कहते हैं, क्योंकि अब प्रशासन में सिद्धांतों को चुनौती देने का युग आरंभ हो गया|
सार्वभौमिक सिद्धांतों की आलोचना की गई|
द्वितीय चरण में प्रतिपादित यांत्रिक दृष्टिकोण के विरुद्ध प्रतिक्रिया हुई|
शास्त्रीय दृष्टिकोण को नकार दिया गया|
यह चरण लोक प्रशासन में ध्वंसकारी अधिक रहा|
इस चरण में लोक प्रशासन का अध्ययन चुनौतियो व आलोचनाओं का शिकार बना|
लोक प्रशासन विज्ञान नहीं पर, विज्ञान बनाने की क्षमता रखता है|
राजनीति-प्रशासन द्विभाजन को चुनौती- राजनीति व प्रशासन का विभाजन यथार्थ पर आधारित नहीं है|
अनौपचारिक कारकों को प्राथमिकता दी गई|
संगठनात्मक तत्वों की कठोरता का विरोध किया गया|
हाथोर्न प्रयोगों ने संगठनात्मक ढांचे में औपचारिकता को ठेस पहुंचायी तथा मनुष्य के अनौपचारिक संबंधों पर बल दिया|
चेस्टर बनार्ड-
अमेरिकी विद्वान
पुस्तक- The function of Executive 1938
इस पुस्तक से तृतीय चरण की शुरुआत मानी जाती है|
चेस्टर बनार्ड ने इस पुस्तक में एक भी सिद्धांत का वर्णन नहीं किया|
इन्होंने इस पुस्तक में संगठनात्मक विश्लेषण हेतु मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहार पर आश्रित उपकरणों पर बल दिया|
‘सत्ता की स्वीकृति’ का सिद्धांत (Acceptance Theory of Authority)-
चेस्टर बर्नार्ड ने सत्ता (Authority) के संबंध में ‘सत्ता की स्वीकृति’ (Acceptance Theory of Authority) सिद्धांत का प्रतिपादन किया है|
बर्नार्ड के अनुसार, सत्ता आदेश देने वाले अधिकारी में मात्र निहित नहीं होती, बल्कि अधीनस्थ द्वारा उस आदेश को स्वीकार करने पर प्रभावी होती है|
अर्थात् आदेश तभी वास्तविक सत्ता बनता है, जब अधीनस्थ उसे स्वीकार करके उसका पालन करता है|
‘सहकारी व्यवस्था’ (Cooperative System)-
इन्होंने संगठन को एक ‘सहकारी व्यवस्था’ (Cooperative System) के रूप में परिभाषित किया है|
संगठन में व्यक्ति सहयोग पर बल देते हैं| सहयोग का जन्म उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए होता है, जिनकी प्राप्ति अकेले नहीं हो सकती है|
अर्थात संगठन केवल व्यक्तियों का समूह नहीं है, बल्कि सहयोग, समन्वय और साझा उद्देश्य पर आधारित एक व्यवस्था है|
उदासीनता का क्षेत्र (Zone of Indifference)-
चेस्टर बर्नार्ड के संगठन सिद्धांत में Zone of Indifference का अर्थ उस स्वीकार्यता के क्षेत्र से है, जिसमें अधीनस्थ उच्च अधिकारी के आदेशों को बिना उनके औचित्य पर सवाल उठाए या विशेष रूप से बिना विरोध किए स्वीकार कर लेता है|
बर्नार्ड के अनुसार, अधीनस्थ हर आदेश को समान रूप से स्वीकार नहीं करता| कुछ आदेश ऐसे होते हैं जिन्हें वह स्वाभाविक रूप से स्वीकार कर लेता है| इन आदेशों के लिए उसे यह सोचने की आवश्यकता नहीं होती कि आदेश उचित है या नहीं|
इसी क्षेत्र को Zone of Indifference कहा जाता है|
हरबर्ट ए साइमन-
अमेरिकी विद्वान
रचनाएं-
लेख- The Proverbs of Administration 1946 ((प्रशासन की कहावतें)-
साइमन ने इस लेख में सिद्धांतों का उपहास करते हुए सिद्धांतों को कहावतों, मुहावरों, प्रकृतिवादी भ्रांति की संज्ञा दी है|
साइमन “वास्तव में कोई सार्वभौमिक सिद्धांत नहीं हैं, प्रत्येक सिद्धांत के विपरीत उतना ही मान्य दूसरा सिद्धांत दिया जा सकता है|”
साइमन “प्रशासन के ये सिद्धांत मनुष्यों के रहने लायक मकान निर्मित करने की अपेक्षा क्रम में लगी छोटी-छोटी गुमटियों की श्रृंखला हैं|”
पुस्तक- Administration behaviour 1947-
इसमें साइमन ने कहा है कि “तथाकथित सिद्धांत मात्र भ्रम है, क्योंकि ये वास्तविकता पर आधारित नहीं है|”
साइमन लोक प्रशासन के एकमात्र विद्वान है, जिन्हें अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार (1978) दिया गया| यह उन्हें Administration behaviour पुस्तक दिए गए में निर्णय निर्माण मॉडल पर दिया गया|
‘प्रशासनिक मानव मॉडल’ या परिसीमित तार्किकता मॉडल (Bounded Rationality) या व्यवहारीय विकल्प मॉडल-
साइमन के निर्णय निर्माण मॉडल को ‘प्रशासनिक मानव मॉडल’ या परिसीमित तार्किकता मॉडल या व्यवहारीय विकल्प मॉडल कहा जाता है|
साइमन निर्णय को तर्क पर आधारित बताता है, कि निर्णयकर्ता प्रत्येक निर्णय से पहले विकल्पों पर तर्कपूर्ण विचार करता है|
लेकिन यह तार्किकता सीमित होती है| इसका कारण मनुष्य की बौद्धिक क्षमता है, क्योंकि मनुष्य की बौद्धिक क्षमता की एक सीमा होती है|
संतोषजनक निर्णय (Satisficing Decision)-
मनुष्य हमेशा सबसे सर्वोत्तम विकल्प खोजने में सक्षम नहीं होता है, वह उपलब्ध विकल्पों में ऐसा विकल्प चुन सकता है, जो पर्याप्त या संतोषजनक (Satisfactory) हो|
इसे साइमन Satisficing Decision कहता है|
राबर्ट डहल-
अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक और लोकतंत्र, शक्ति तथा बहुलवाद (Pluralism) के महत्वपूर्ण सिद्धांतकार
Essay- The Science of Public Administration- Three Problems 1947
रॉबर्ट डहल ने अपने इस निबन्ध में कहा कि लोक प्रशासन विज्ञान नहीं है और प्रशासन के विज्ञान के विकास में तीन बाधाएँ हैं-
मूल्य की समस्या- विज्ञान मूल्य मुक्त होता है, जबकि मूल्य प्रशासन को प्रभावित करते हैं|
मानव व्यवहार की अनिश्चतता- प्रशासन के अध्ययन में मानव व्यवहार का अध्ययन करना जरूरी है| विज्ञान की तरह मानव व्यवहार के निश्चित सिद्धांत नहीं बनाई जा सकते|
सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ की समस्या- प्रशासन अलग-अलग देशों और समाजों की ऐतिहासिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है| अत: किसी एक देश के प्रशासनिक सिद्धांतों को सार्वभौमिक मानकर अन्य सभी देशों पर लागू नहीं किया जा सकता| इसी कारण डाहल ने तुलनात्मक अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया|
रॉबर्ट डहल “लोक प्रशासन के तुलनात्मक पहलुओं की उपेक्षा की गयी है| जब तक लोक प्रशासन का अध्ययन तुलनात्मक नहीं होता, तब तक लोक प्रशासन को विज्ञान मानने का दावा खोखला है|”
ड्वाइट वाल्डो-
नव लोक प्रशासन के जनक
रचना- The Administrative State 1948
लेख- Public Administration in a Time of Revolution (क्रांति के समय में लोक प्रशासन), जो 1968 में Public Administration Review में प्रकाशित हुआ था|
ड्वाइट वाल्डो “वर्तमान में राजनीति व प्रशासन के बीच अलगाव एक ‘घिसापिटा मंच’ बन चुका है|”
एफ मॉर्सटीन मार्क्स-
जर्मन-अमेरिकी राजनीति एवं लोक प्रशासन के विद्वान
पुस्तक- Elements of Public Administration 1946
एफ मॉर्सटीन मार्क्स ने नौकरशाही के 4 प्रकार बताये हैं-
अभिभावक नौकरशाही
जातीय नौकरशाही
संरक्षक नौकरशाही
योग्यता आधारित नौकरशाही
The Administrative State: An Introduction to Bureaucracy 1957
इस पुस्तक में एफ मॉर्सटीन मार्क्स ने प्रशासनिक राज्य (Administrative State) और नौकरशाही (Bureaucracy) की प्रकृति एवं भूमिका का अध्ययन किया|
एल्टन मेयो-
प्रमुख पुस्तकें
The Human Problems of an Industrial Civilization 1933
The Social Problems of an Industrial Civilization 1945
ऑस्ट्रेलिया में जन्मे मनोवैज्ञानिक, औद्योगिक शोधकर्ता और संगठन सिद्धांतकार
हावर्ड विश्वविद्यालय में ‘इंडस्ट्रियल प्रोफेसर’
The First Enquiry- एल्टन मेयो का यह हार्थोन प्रयोग से संबंधित शोध पत्र था|
एल्टन मेयो को मानव संबंध विचारधारा का पितामह कहा जाता है|
एल्टन मेयो ने हार्थोन प्रयोग (1924–1932) किये|
हार्थोन प्रयोगों को मेयो ने ‘क्लिनिकल मेथड’ कहा है|
इन प्रयोगों ने कामगारों के उत्पादन पर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक उपकरणों के शक्तिशाली प्रभाव का स्पष्ट प्रदर्शन करके वैज्ञानिक प्रबंध को चुनौती दी|
हॉथोर्न प्रयोगों के कारण यांत्रिक दृष्टिकोण को चुनौती मिली|
हॉथोर्न प्रयोगों ने ‘मानव संबंध दृष्टिकोण’ को जन्म दिया, जिसमें औपचारिक के बजाय अनौपचारिक संगठन पर बल दिया गया|
चतुर्थ चरण (1948 से 1970) [‘स्वरूप की संकटावस्था का युग या उथल-पुथल का काल’]-
चतुर्थ चरण के प्रमुख विद्वान- साइमन, वाल्डो, फ्रेडरिग्स, रॉबर्ट डहल
इसे ‘स्वरूप की संकटावस्था का युग या उथल-पुथल का काल’ कहा जाता है|
इसे ‘क्रांतिकारी’ अथवा ‘संकट का काल’ भी कहा जाता है|
इसे ‘पहचान की संकट का काल’ (Crisis of Identity) भी कहा जाता है|
कहने का कारण-
आलोचनाओं व चुनौतियों के कारण लोक प्रशासन का अस्तित्व खतरे में पड़ गया| लोक प्रशासन ने एक पृथक पहचान खो दी|
इस समय वियतनाम युद्ध में अमेरिका असफल हो गया था, अतः प्रशासन पर असफल होने के आरोप लग रहे थे|
इस युग में लोकप्रशासन ने मोटे तौर पर दो रास्ते अपनाये- प्रथम कुछ विद्वान राजनीति शास्त्र के अंतर्गत आ गये,तथा द्वितीय लोक प्रशासन के विकल्प की खोज की| लोक प्रशासन के जिस विकल्प की खोज हुई वह था- प्रशासनिक विज्ञान| लोक प्रशासन व्यापार प्रबंध ने मिलकर प्रशासनिक विज्ञान की नींव डाली|
1956 में Administrative Science Quarterly नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ| (प्रशासनिक विज्ञान के साथ जुड़े विद्वानों ने यह पत्रिका निकाली)
प्रशासन के अंत: अनुशासनात्मक दृष्टिकोण की शुरुआत हुई|
इस समय लोक प्रशासन के अंतर्गत निम्न नविन प्रवृतियों का उदय हुआ-
नव मानव संबंध दृष्टिकोण-
इसका विकास मानव संबंध दृष्टिकोण की सीमाओं के विरुद्ध हुआ|
इसमें कर्मचारी को केवल सामाजिक प्राणी ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र आवश्यकताओं, प्रेरणाओं, मूल्यों और आत्म-विकास की आकांक्षा रखने वाला व्यक्ति माना गया|
इसे सामाजिक-मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण भी कहा जाता है|
मानव संबंध दृष्टिकोण बनाम नव मानव संबंध दृष्टिकोण-
समर्थक विद्वान-
क्रिस आर्गीरिस (Chris Argyris)-
पुस्तक- Personality and Organization : The Conflict Between System and the Individual 1957
परिपक्वता– अपरिपक्वता सिद्धांत (Maturity–Immaturity Theory)- आर्गीरिस के अनुसार व्यक्ति सामान्यतः संगठन में काम करते हुए अपरिपक्वता से परिपक्वता की ओर विकसित होना चाहता है|
संलयन प्रक्रिया- व्यक्ति अपने लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु संगठन व संगठन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु व्यक्ति का प्रयोग करता है|
T-Group प्रशिक्षण- अनौपचारिक व सामूहिक प्रशिक्षण, जो व्यक्ति की सहनशीलता या संवेदनशीलता को बढ़ाता है|
Double-Loop Learning- संगठन केवल अपनी गलतियों को सुधारने के बजाय अपनी मूल धारणाओं और नीतियों की भी समीक्षा करे|
आर्गीरिस का लेख- Double Loop Learning in Organizations 1977 में प्रकाशित
Organizational Learning- संगठनों में सीखने की प्रक्रिया और परिवर्तन पर विशेष बल|
क्रिस आर्गीरिस और डोनाल्ड ए. शॉन (Donald A. Schon) की रचना Organizational Learning: A Theory of Action Perspective 1978
मैकग्रेगर- अभिप्रेरणा की X-Y Theory
मैस्लो- अभिप्रेरणा के संबंध में आवश्यकता का सोपान क्रम
हर्जबर्ग- अभिप्रेरणा के संबंध में द्वि-कारक सिद्धांत या हाईजीन कारक सिद्धांत
रेंसिस लिकर्ट (मिशिगन विश्वविद्यालय), प्रबंधकीय मॉडल-
लिकर्ट ने अभिप्रेरणा को ‘प्रबंध को ह्रदय’ कहा है|
1961 में लिकर्ट ने 4 प्रकार की प्रबंधकीय या नेतृत्व शैलियाँ बताई हैं-
शोषणकारी अधिकारिक (Exploitive-Authoritative)- सबसे घटिया
परोपकारी अधिकारिक (Benevolent-Authoritative)
परामर्शकारी (Consultative)
सहभागी समूह लोकतांत्रिक (Participative Group System)- सबसे अच्छी
कुर्त लेविन-
समूह गतिशीलता (Group Dynamics) व क्षेत्र सिद्धांत
समूह गतिशीलता- यह सामाजिक समूहों के निर्णय-निर्माण को समझाती है| समूह निर्णय तीन कारकों से प्रभावित होते हैं-
Environmental Factor
Personal Factor
Leadership Factor
Field Theory- मनोवैज्ञानिक कुर्त लेविन की यह Gestalt Psychological Theory है, यानी एक व्यक्ति का व्यवहार व कार्य उसके क्षेत्र व Environment से प्रभावित होता है|
तुलनात्मक लोक प्रशासन (Comparative Administration)-
फ्रेड रिग्स, फेरेल हेडी, ड्वाइट वाल्डो, रॉबर्ट डहल
इसका जन्म द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका में हुआ|
मेक्रेडिज- तुलनात्मक लोक प्रशासन के अग्रदूत
F W रिग्स- तुलनात्मक लोक प्रशासन के पिता
फेरेल हेडी ने 1960 के दशक को तुलनात्मक प्रशासन आंदोलन का स्वर्ण युग कहा है|
विकास प्रशासन (Development Administration)-
विडनर, फ्रेड रिग्स, लूसियन पाई
विकास प्रशासन का उद्भव 1950- 60 के दशक में हुआ, जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद का अंत आरंभ हुआ तथा नव स्वतंत्र व विकासशील देशों के समक्ष राष्ट्र निर्माण व आर्थिक समस्याएं आई|
‘विकास प्रशासन’ शब्दावली का प्रथम बार प्रयोग भारतीय विद्वान यू एल गोस्वामी ने अपने लेख ‘The Structure of Development Administration in India’ में किया था, जो 1955 में भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) के जर्नल में छपा था|
अमेरिकी विद्वान जॉर्ज ग्रांट को विकास प्रशासन का पिता या जनक माना जाता है| इनकी पुस्तक ‘Development Administration: Concept, Goals and Method’ 1979 में प्रकाशित हुई|
विकास प्रशासन की पहली स्पष्ट अवधारणा देने का श्रेय एडवर्ड वीडनर को है|
नव लोक प्रशासन (New Public Administration- NPA)-
ड्वाइट वाल्डो इसके जनक हैं|
ड्वाइट वाल्डो के नेतृत्व में हुए मिन्नोब्रुक सम्मेलन 1968 ने नव लोक प्रशासन को जन्म दिया|
वाल्डो का लेख 1968 में ‘Public Administration in a Time of Revolution’ के नाम से ‘Public Administration Review’ में छपा|
वाल्डो के इस लेख में चौथे चरण के उथल-पुथल काल को ‘क्रांतिकाल की संज्ञा’ दी|
1971 में फ्रैंक मेरीनो ने नव लोक प्रशासन की पहली पुस्तक ‘Towards a New Public Administration- minnowbrook Perspective’ लिखी
1971 में वाल्डो ने Public Administration in a Time of Turbulence पुस्तक का प्रकाशन किया|
तार्किक चयन दृष्टिकोण (Rational Choice Theory)-
विन्सेंट ऑस्ट्रॉम, जेम्स बुकानन, निस्केनन, गार्डन टूल्लॉक, एंथनी डाउन्स|
तर्कसंगत विकल्प सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति उपलब्ध विभिन्न विकल्पों में से ऐसा विकल्प चुनने का प्रयास करता है, जिससे उसका अपेक्षित लाभ/ उपयोगिता अधिकतम हो और लागत कम से कम हो|
संबंधित स्कूल या संप्रदाय-
वर्जीनिया स्कूल- जेम्स बुकानन, गार्डन टूल्लॉक
रोचेस्टर स्कूल- विलियम राइकर
पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण (Ecological Approach)-
एफ. डब्ल्यू. रिग्स
पर्यावरण या वातावरण अपने प्रशासन को प्रभावित और निर्धारित करता है|
फ्रेडरिग्स ने 1961 में प्रकाशित अपनी कृति “The Ecology of Public Administration” में संरचनात्मक-कार्यात्मक (Structural-Functional) दृष्टिकोण का प्रयोग करते हुए प्रत्येक समाज या संरचना की पांच कार्यात्मक विशेषता बतायी है-
आर्थिक (Economic)
सामाजिक (Social)
संचारात्मक (Communicational)
प्रतीकात्मक (Symbolic)
राजनीतिक (Political)
पंचम चरण (1971 से 1990) अंत अनुशासनात्मक अध्ययन का युग या लोक अभिरुचि अध्ययन का युग या लोक नीति विज्ञान का युग-
इस चरण में अंत: अनुशासनात्मक दृष्टिकोण का विकास हुआ अर्थात लोक प्रशासन को अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, एंथ्रोपोलॉजी, राजनीति शास्त्र आदि विषयों से अंतरसंबंधित किया गया|
Note- समाजशास्त्रों में सबसे अधिक अंतर्विषयी विषय लोक प्रशासन ही है|
Note- अंत- विषय दृष्टिकोण के प्रणेता द्रोर है|
लोक प्रशासन द्वारा नीति विज्ञान (Public Policy) का रूप ले लिया गया, अर्थात लोक प्रशासन का मुख्य केंद्र लोक नीति विश्लेषण हो गया|
अब नीतिविज्ञान, राजनीतिक मितव्ययिता, नीति निर्माण, नीति विश्लेषण में विद्वान अत्याधिक रुचि ले रहे थे|
नव-लोक प्रशासन, पारिस्थितिकीय मॉडल भी इस युग की विशेषता रही है|
पाश्चात्य देशों के अलावा अन्य देशों में लोक प्रशासन का अध्ययन प्रारंभ हुआ|
प्रशासन- पर्यावरण अंत: सम्बन्धों को पर्याप्त महत्व दिया गया|
षष्टम चरण 1990 के बाद से- वर्तमान तक-
मिन्नोब्रुक द्वितीय सम्मेलन 1988 तथा उरुग्वे चक्र ने 1980 के बाद के दशक में विश्व को एक ग्लोबल विलेज में परिवर्तित कर रही परिस्थितियों को रेखांकित किया गया| और माना कि नये परिदृश्य में वही लाभ उठा पाएगा, जो अपने यहां प्रशासनिक सुधारों को आर्थिक सुधारों के अनुरूप करेगा|
मिंनोब्रुक (अमेरिका) सम्मेलन- द्वितीय, सितंबर 1988-
द्वितीय मिंनोब्रुक सम्मेलन में लोक प्रशासन के 4 नये सिद्धांत (4-D) दिए गए-
D-Bureaucracy (विनौकरशाही)- कठोर नियमों- कानूनों का सरलीकरण करना|
D-Centralization (विकेंद्रीकरण)- सत्ता व कार्य दोनों के विकेंद्रीकरण पर बल|
D-Investment (विनिवेशीकरण)- सरकार व्यापारिक- व्यावसायिक और औद्योगिक प्रवृत्ति के कार्यों से अपने को बाहर निकाले और ये कार्य बाजार के हवाले कर दिए जाय|
D-Government (असरकारीकरण)- सरकारी कार्यों का एक हिस्सा निजी क्षेत्रों को हस्तांतरित कर दिया जाय|
इन प्रवृत्तियों ने नव लोक प्रबंधनवाद New Public Management (NPM) की नींव रखी|
इसको प्रबंधवाद, बाजार- उन्मुखी लोक प्रशासन भी कहा जाता है|
सर्वप्रथम 1991 में ‘नवीन लोक प्रबन्ध’ शब्द क्रिस्टोफर हुड ने गढ़ा|
क्रिस्टोफर Hood ने नव लोक प्रबंध के तीन आधारभूत मूल्य बताएं हैं-
सिग्मा- मितव्ययिता, दक्षता, उद्देश्यात्मकता
थिटा- सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता
लेक्डा- प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कार्य करने के लिए संगठन सशक्त हो|
NPM के अन्य नाम-
डेविड ऑसबोर्न व टेड गैबलर- उद्यमी शासन या व्यवसायी शासन
माइकल बार्ज़ले- उत्तर नौकरशाही प्रतिमान
पोल्लीत- प्रबंधनवाद
नव लोक प्रबंधनवाद 3Es की प्राप्ति पर बल देता है| 3Es-
Efficiency (दक्षता)
Economy (मितव्ययिता)
Effectiveness (प्रभावशीलता)
इस चरण में लोकप्रशासन में प्रबंधकीय प्रवृत्तियों का विकास हुआ|
नवीन लोक प्रबन्ध ‘लोक चयन विचारधारा’ एवं ‘प्रबन्धवाद’ पर निर्भर है|
इसका प्रमुख बल बाजार एवं निजी क्षेत्र प्रबन्ध के महत्व पर है|
नवीन लोक प्रबन्ध प्रशासन में प्रबन्धवाद को बढ़ावा देता है|
यह लोक प्रशासन में प्रतिस्पर्धात्मक तत्व सम्मिलित करता है|
सुशासन के लिए सार्वजनिक भूमिका को सीमित, लेकिन सक्षम बनाने पर बल दिया|
प्रशासन में लोकोन्मुखी प्रणालियों का विकास हुआ|
LPG (उदारीकरण, निजीकरण व भूमण्डलीकरण) की अवधारणा के बाद लोक प्रशासन ने ‘नवीन लोक प्रबन्धन’, ‘उद्यमी शासन’, ‘कॉर्पोरेट शासन’ का रूप ग्रहण कर लिया है|
नव लोक सेवा उपागम-
आजकल लोक प्रशासन में ‘नव लोक सेवा उपागम’ (New Public Service Approach) (NPS) पर बल दिया जा रहा है|
NPS के अनुसार लोक प्रबन्ध का मुख्य बल (focus) ‘नागरिक, समुदाय और नागरिक समाज’ पर है|
NPS के अनुसार लोक सेवा अर्थात् नौकरशाही का ध्यान नागरिक की मदद करने तथा उनके हितों को पूरा करने पर होना चाहिए न कि समाज पर नियंत्रण करके उसे चलाने में|
J V डेनहार्ट तथा R B डेनहार्ट ने अपनी कृति The New Public Service: Serving, Not Steering, 2011 में नव लोक सेवा उपागम की विस्तार से व्याख्या की है|
डेनहार्ट तथा डेनहार्ट “सरकार को एक व्यवसाय की तरह नहीं चलाया जाना चाहिए, इसे लोकतंत्र की तरह संचालित किया जाना चाहिए|”
आज Government की बजाय Governance की बात होती है, जिसके तहत आज Good Governance (सुशासन) व E-Governance का बोलबाला है|
भारत में लोक प्रशासन का विकास-
भारत में लोक प्रशासन के अध्ययन की शुरुआत करने का श्रेय M.P शर्मा को दिया जाता है|
1930 में सर्वप्रथम लखनऊ विश्वविद्यालय में MA राजनीति विज्ञान के अंतर्गत लोक प्रशासन को एक अनिवार्य प्रश्न पत्र के रूप में पढ़ाये जाने की शुरुआत हुई|
1937 में मद्रास विश्वविद्यालय में ‘विश्व लोक प्रशासन’ नाम से एक डिप्लोमा पाठ्यक्रम शुरू किया गया| इसलिए भारत में लोक प्रशासन की शुरुआत 1937 से ही मानी जाती है|
1941 में बेनी प्रसाद की पहल पर स्थानीय सरकार विषय पर स्नात्कोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम की शुरुआत इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई| जिसकी विषय वस्तु का निर्माण और कार्यक्रम का संचालन प्रो. महादेव प्रसाद शर्मा ने किया| इसलिए महादेव शर्मा को भारत में लोक प्रशासन का प्रथम अध्यापक कहा जाता है|
1943 में लखनऊ विश्वविद्यालय में लोक प्रशासन में डिप्लोमा पाठ्यक्रम की शुरुआत हुई|
1947 में हैदराबाद में Administrative Staff College की स्थापना की गई| यहाँ सरकारी व निजी क्षेत्र के उच्चाधिकारियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है|
अखिल भारतीय सेवाओं व अन्य उच्च स्तरीय सेवाओं के अधिकारियों के प्रशिक्षण हेतु मसूरी में 1949 में ‘National Academy of Administration” (Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration) खोली गई|
1949 में नागपुर विश्वविद्यालय ने ‘Department of Local Self-Government’ की स्थापना की, जिसे 1950 में ‘Department of Public Administration and Local Self-Government’ के रूप में पुनर्गठित/ नामित किया गया| इस विभाग की स्थापना M.P प्रसाद के निर्देशन में की गई| यहीं से भारत में लोकप्रशासन को पहली बार पूर्ण अकादमी स्वायत्तता प्राप्त हुई|
लोकप्रशासन में सर्वप्रथम स्नातकोत्तर डिग्री देने का तथा स्वतंत्र विभाग की स्थापना का श्रेय नागपुर विश्वविद्यालय को है|
लोक प्रशासन पर पाल एपलबी की रिपोर्ट 1953 के आधार पर नई दिल्ली में 1954 में भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (IIPA) की स्थापना की गई|
IIPA लोक सेवकों को प्रशिक्षण प्रदान करती है तथा लोक प्रशासन में अनुसंधान तथा विकास के कार्य संपादित करती है|
IIPA इंडियन जनरल ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन नामक एक पत्रिका भी निकालता है|
1987 में UPSC द्वारा आयोजित IAS की परीक्षा में लोक प्रशासन को पूर्णत: स्वतंत्र विषय के रूप में शामिल कर लिया गया|
राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर में सर्वप्रथम M.B माथुर के नेतृत्व में 1957 में लोक प्रशासन में M.A पाठ्यक्रम शुरू हुआ| 1965 में लोक प्रशासन का स्वतंत्र विभाग स्थापित हुआ|
लोक प्रशासन का क्षेत्र-
संकीर्ण दृष्टिकोण-
लोक प्रशासन का सम्बन्ध केवल सरकार की कार्यपालिका शाखा से है|
समर्थक- साइमन, लूथर गुलिक
साइमन “लोक प्रशासन का अर्थ है, वे कार्य जो केन्द्र, राज्य या स्थानीय कार्यपालिका करती है|”
लूथर गुलिक “अपने वास्तविक अर्थ में लोक प्रशासन मुख्य रूप से सरकार के कार्यपालिका अंग से संबंधित है|”
व्यापक दृष्टिकोण-
लोक प्रशासन का सम्बन्ध सरकार के तीनों अंगों व्यवस्थापिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका से है|
समर्थक- एल.डी. व्हाइट, निग्रो
एल.डी. व्हाइट “लोक प्रशासन में वे सब कार्य आते हैं, जिनका उद्देश्य लोक नीति को लागू करना है|”
निग्रो “लोक प्रशासन सरकार के तीनों अंगों और उनके परस्पर संबंधों से संबंधित है|”
POSDCORB दृष्टिकोण-
समर्थक- लूथर गुलिक
इस दृष्टिकोण अनुसार लोक प्रशासन में केवल मुख्य कार्यपालक या प्रबंधक के कार्य ही आते हैं|
उर्विक व फेयोल भी इसी के समर्थक हैं|
पाठ्य विषय-वस्तु दृष्टिकोण-
समर्थक- लेविस मेरियम
लेविस मेरियम ने अपनी पुस्तक Public Service and Special Training 1939 में POSDCORB दृष्टिकोण को प्रशासन का मात्र एक पक्ष कहकर आलोचित किया था|
मेरियम के अनुसार प्रशासन के दो पक्ष होते हैं-
पाठ्य विषय वस्तु
POSDCORB जैसी तकनीके
मेरियम “लोक प्रशासन कैंची के दो फलकों के समान है| एक फलक POSDCORB से युक्त ज्ञान है, तो दूसरा फलक विषय का ज्ञान या तकनीक का है| दोनों फलको का धारदार होना जरूरी हैं|”
पर्सी मेकिविन का 3-M सिद्धांत-
पर्सी मेकिविन के अनुसार लोक प्रशासन में मात्र 3M का अध्ययन किया जाता है-
Man (मनुष्य)
Material (सामग्री)
Method (पद्धति)
लोक प्रशासन की प्रकृति-
प्रबन्धकीय दृष्टिकोण-
समर्थक- गुलिक, उर्विक, फेयोल
इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रशासन प्रबंध है|
केवल प्रबंधक के कार्य इसमें शामिल होते हैं|
इस दृष्टिकोण के अनुसार लोक व निजी प्रशासन एक है|
एकीकृत दृष्टिकोण-
समर्थक- एल. डी. व्हाइट, F M मार्क्स
इस दृष्टिकोण के अनुसार केवल प्रबंधक ही नहीं तकनीकी, लिपकीय यहाँ तक कि चपरासी आदि समस्त कर्मचारियों के कार्य लोक प्रशासन में शामिल है|
लोक प्रशासन जनसेवा से ज्यादा सम्बन्धित है|
स्वरूपगत प्रकृति-
लोक प्रशासन कला है-
आर्डवे टीड “प्रशासन एक उच्च कोटि की सुन्दर कला (Fine Art) है|”
ऊर्विक “प्रशासन एक कला है, जिसको अन्य कलाओं की भांति खरीदा नहीं जा सकता|”
लोक प्रशासन विज्ञान है-
वुडरो विल्सन- लोक प्रशासन के जनक विल्सन ने लोक प्रशासन को ‘प्रशासन का विज्ञान’ कहा है|
विलोबी- प्रशासन में कुछ ऐसे मूलभूत सिद्धांत होते हैं, जो सामान्य व्यवहार में किसी वैज्ञानिक सिद्धांत के समान होते हैं|”
लोक प्रशासन दर्शन है-
मार्शल ई. डिमॉक पहला विद्वान है, जिसने प्रशासन को दर्शन की संज्ञा दी है|
अपनी पुस्तक A Philosophy of Administration (1958) में डिमॉक कहता है कि “प्रशासन का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत होने के कारण प्रशासन का दर्शन ही जीवन दर्शन हो गया है|”

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