जीवन परिचय-
जन्म-
29 अगस्त 1632 ई.
इंग्लैंड के समरसेट के्रिंगटन नामक स्थान
प्यूरिटन संप्रदाय के एक मध्यम वर्गीय परिवार में
लॉक के पिता एक काउण्टी के जस्टिस ऑफ द पीस कार्यालय में एक क्लर्क थे|
लॉक जब 10 वर्ष का था, तब इंग्लैंड में गृह युद्ध छिड़ गया था| लॉक का जीवन तूफानों, संघर्षों में बीता था, लेकिन इसके दर्शन पर तूफानी प्रभाव नजर नहीं आता है|
1683 में जॉन लॉक राईहाउस षड्यंत्र से बचने के लिए होलेंड चले गए तथा 1685 में मोन माउथ विद्रोह में सक्रियता से हिस्सा लिया|
1688 की इंग्लैंड की गौरवपूर्ण क्रांति का लॉक ने समर्थन किया, इसी कारण इसे ‘क्रांति का दार्शनिक’ कहा जाता है|
जॉन लॉक व्हिग्स थे|
विलियम ऑफ़ ऑरेंज के शासनकाल में जॉन लॉक को कमिश्नर ऑफ अपील का पद प्रदान किया गया|
72 वर्ष की आयु में 1704 ई.में लॉक की मृत्यु हो गई|
लॉक को ‘उदारवाद का पिता’ कहा जाता है|
वेपर “लॉक का एक महान परंपरा उदारवाद का पहला प्रवक्ता तथा महान परंपरा मध्यकाल का अंतिम प्रवक्ता है|”
लॉक को सामान्य बुद्धि (COMMON SENSE) का दार्शनिक माना जाता है|
वाल्टेयर “शायद इससे अधिक संत समान, अधिक व्यवस्थित, असाधारण व्यक्ति, अधिक सटीक, तर्कवादी नहीं था, जितना कि लॉक|
लॉक की रचनाएं-
Essay on the law of nature 1676
First letter on toleration 1689 (सहिष्णुता पर पहला पत्र)
Two Treatises on government 1690 (शासन पर दो निबंध)
An Essay Concerning Human Understanding 1690 ( मानव बोध से संबंधित ग्रंथ)-
इस ग्रंथ में मानवीय ज्ञान के आधार पर अनुभववाद का वर्णन किया|
इस रचना पर ऑक्सफोर्ड और उसके अधीनस्थ कॉलेजो में प्रतिबंध लगा दिया गया था|
Second letter on Toleration 1690 (सहिष्णुता पर दूसरा पत्र)
Third letter on Toleration 1692 (सहिष्णुता पर तीसरा पत्र)
Fourth letter on Toleration 1692 (सहिष्णुता पर चौथा पत्र)
The Fundamentals of Constitution of Caroline 1692 (कैरोलाइन संविधान के मूल तत्व)
Some Thoughts Concerning Education 1693 (शिक्षा से संबंधित कतिपय विचार)
On The Reasonableness of Christianity 1695 (ईसाइयत की तर्कसंगता)
Two Treatises on Government 1690-
यह लॉक का सबसे प्रमुख ग्रंथ है|
इसमें सामाजिक समझौते का वर्णन है|
इस पुस्तक में गौरवपूर्ण क्रांति को न्यायसंगत ठहराया गया है|
इस पुस्तक के प्रथम खंड में फिल्मर की पुस्तक पेट्रिआर्की (Patriarchy) में वर्णित राजा के दैवीय अधिकारों का खंडन किया गया है|
द्वितीय खंड में हॉब्स के लेवियाथन की निरंकुश प्रभुसत्ता का विरोध किया है तथा सरकार की उत्पत्ति, स्वभाव और कार्य क्षेत्र का वर्णन किया है|
लॉक पहले खंड में फिल्मर की आलोचना करता है तथा दूसरे खंड में हॉब्स की, इसी वजह से प्रो.वाहन कहता है कि “लॉक की ‘ट्रीटाइज’ एक दो नाली की बंदूक है, जिसमें एक फिल्मर पर तथा दूसरी हॉब्स पर तनी हुई है|”
जबकि लॉसलेट का मानना है कि “लॉक का मुख्य विरोधी फिल्मर है, न कि हॉब्स|”
लॉक के चिंतन पर प्रभाव-
1688 की गौरवपूर्ण क्रांति का प्रभाव
हुकर के दर्शन का प्रभाव- हुकर का कहना था कि सरकार सामाजिक हित की प्रतिनिधि है, इसलिए सरकार समुदाय के प्रति उत्तरदायी है| इसका प्रभाव लॉक पर पड़ा है| रिचर्ड हुकर की पुस्तक- The Law of Ecclesiastical
हॉब्स के व्यक्तिवादी विचारों का प्रभाव|
लॉक की अध्ययन पद्धति-
लॉक की अध्ययन पद्धति अनुभववादी एवं विवेकवादी है| लॉक की मान्यता है कि अनुभव ज्ञान का स्रोत है|
लॉक के अनुसार मनुष्य के मस्तिष्क में जन्मजात कोई विचार नहीं होता है, जन्म के समय मनुष्य का मस्तिष्क एक कोरे कागज की तरह होता है, जो भी विचार मनुष्य के मस्तिष्क में उठते हैं वह अनुभव द्वारा ही उत्पन्न होते हैं|
अपने इसी विचार के प्रतिपादन के कारण लॉक को अनुभववाद का प्रतिपादक भी कहा जाता है|
जॉन लॉक के अनुसार मनुष्य एक असक्षम प्राणी है, जो इस अनंत, असीम ब्रह्मांड की सभी बातें नहीं जान सकता, अतः मनुष्य का ज्ञान उसके अज्ञान की तुलना में छोटा है|
लॉक के अनुसार “ज्ञान की उत्पत्ति का एकमात्र स्रोत अनुभव है, ज्ञान विवेकमुलक होता है, मनुष्य के ज्ञान का क्षेत्र उसके अज्ञान के क्षेत्र से बहुत छोटा है|”
मानव स्वभाव संबंधी लॉक के विचार-
लॉक के मानव संबंधी विचार हॉब्स के एकदम विपरीत हैं| लॉक ने मानव स्वभाव का सकारात्मक चित्रण किया है|
लॉक ने मनुष्य को सामाजिक, नैतिक, बुद्धिमान, विचारशील, परोपकारी, शांतिप्रिय, प्रेम व दया का पोषक प्राणी बताया है|
सभी मनुष्य नैतिक दृष्टि से परस्पर समान है, और उन्हें समान अधिकार प्राप्त है|
लॉक का मनुष्य नैतिक व्यवस्था को स्वीकार करने वाला तथा उनके अनुसार आचरण करने वाला प्राणी है|
लॉक के अनुसार सभी मानवीय क्रियाओं का स्रोत इच्छा है| इच्छा-पूर्ति के लिए मनुष्य कार्य करता है, इच्छा पूरी होने पर सुख तथा इच्छा पूरी न होने पर मनुष्य दुख का अनुभव करता है| मनुष्य सुख प्राप्त करना चाहता है|
लॉक ने मनुष्य को प्रकृति द्वारा दिए गए विवेक अथवा बुद्धि को दैविक प्रकृति स्पूलिंग कहा है|
जहां हॉब्स का मनुष्य कोरा जंगली पशु है, वही लॉक का मनुष्य एक नैतिक प्राणी है| हॉब्स का मनुष्य घोर स्वार्थी है, जबकि लॉक का मनुष्य परोपकारी भी है| हॉब्स का मनुष्य झगड़ालू है, जबकि लॉक का मनुष्य शांतिप्रिय है|
प्राकृतिक अवस्था-
प्राकृतिक अवस्था के संबंध में भी लॉक के विचार हॉब्स के विपरीत हैं|
लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था शांति, स्नेह, सहयोग, सद्भावना, शिष्टाचार व रक्षा की अवस्था थी|
इस अवस्था में व्यक्ति समान, स्वतंत्र तथा अपनी-अपनी संपत्ति के मालिक थे|
लॉक “कोई भी स्वभाव से किसी और के अधीन नहीं है| सभी मानव सामान पैदा होते हैं| प्रत्येक स्वयं का संप्रभु शासक है|”
लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में व्यवस्था भी विद्यमान है और यह विवेक द्वारा स्थापित व्यवस्था थी|
प्राकृतिक अवस्था में रहने वाले लोगों का समष्टिगत सामाजिक जीवन के रूप में एक समाज है|
डेनिंग के अनुसार “यह पूर्व सामाजिक अवस्था होने की अपेक्षा, केवल पूर्व राजनीतिक अवस्था है|”
प्राकृतिक नियम-
प्राकृतिक नियम के संबंध में हॉब्स तथा लॉक के विचार में काफी भिन्नता है|
वैसे लॉक व हॉब्स दोनों प्राकृतिक नियमों को मानव विवेक की उपज मानते हैं| लेकिन जहां हॉब्स प्राकृतिक नियमों की उत्पत्ति जीवन के असुरक्षित होने पर बताता है, वही लॉक प्राकृतिक अवस्था में शुरुआत से ही प्राकृतिक नियम बताता है|
लॉक की प्राकृतिक अवस्था शांतिपूर्ण थी, जो प्राकृतिक नियमों के अनुसार चलती थी| इस अवस्था में प्रत्येक मनुष्य दूसरे मनुष्य के साथ वैसा ही व्यवहार करता था जैसा कि वह अपने साथ चाहता था|
प्राकृतिक नियम के अनुसार सब लोग समान और स्वतंत्र हैं, इसलिए किसी को भी दूसरे के जीवन, स्वतंत्रता एवं संपत्ति को क्षति नहीं पहुंचानी चाहिए|
लॉक ने प्राकृतिक नियमों की नैतिक एवं तर्कमूलक व्याख्या की है|
प्राकृतिक अधिकार-
प्राकृतिक अवस्था में प्राप्त अधिकारों को लॉक प्राकृतिक अधिकार कहता है| ये अधिकार सभी व्यक्तियों को समान रूप से प्राप्त थे|
लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति को तीन प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है-
जीवन का अधिकार
स्वतंत्रता का अधिकार
संपत्ति का अधिकार
प्राकृतिक अधिकार असीमित या अनियंत्रित नहीं थे, इन पर प्राकृतिक नियमों का बंधन था|’
लॉक प्राकृतिक अधिकार के रूप में स्वतंत्रता को सार्वभौमिक अधिकार मानते हैं|
लॉक ने संपत्ति के अधिकार को सबसे महत्वपूर्ण अधिकार माना है| लॉक का कथन है कि “संपत्ति की सुरक्षा का विचार ही मनुष्यों को यह प्रेरणा देता है कि वह सामाजिक समझौता करें तथा प्राकृतिक अवस्था का त्याग करके नागरिक समाज की स्थापना करें|”
लॉक का सामाजिक समझौता-
हॉब्स की तरह लॉक भी राज्य की उत्पत्ति को सामाजिक समझौते द्वारा बताता है| लेकिन हॉब्स ने प्राकृतिक अवस्था के भयपूर्ण माहौल को समझौते का कारण बताया है., वही लॉक ने प्राकृतिक अवस्था की असुविधा को समझौते का कारण बताया है|
प्राकृतिक अवस्था की असुविधाएं- लॉक के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में तीन असुविधाएं थी-
प्राकृतिक नियम की स्पष्ट परिभाषा नहीं थी|
प्राकृतिक नियमों की व्याख्या करने वाला कोई अधिकारी नहीं था|
प्राकृतिक नियमों को लागू करने वाला कोई भी नहीं था|
इसलिए प्राकृतिक असुविधाओं से राहत पाने के लिए मनुष्य ने न्यूनतम प्रतिरोध का मार्ग अपनाते हुए समझौते के द्वारा राज्य का निर्माण किया|
समझौते का स्वरूप-
लॉक के अनुसार व्यक्तियों ने दो समझौते किए-
प्रथम समझौता-
लॉक की प्राकृतिक अवस्था में समाज था| प्रथम समझौते से मनुष्यो ने प्राकृतिक अवस्था को समाप्त करके राज्य या नागरिक समाज की स्थापना की| राज्य को लॉक नागरिक या (Civil Society) कहता है|
यह समझौता समाज के सभी व्यक्तियों का सभी व्यक्तियों के साथ किया गया|
इस समझौते का स्वरूप सामाजिक था| इसलिए समझौते के द्वारा कुछ अधिकार व्यक्तियों ने नागरिक समाज को सौंप दिए|
द्वितीय समझौता-
यह समझौता लोग सामूहिक रूप से राज्य या नागरिक समाज के साथ करते हैं|
यह शासन-विषयक समझौता था|
इस समझौते में मूल समझौते में स्वीकार की गई शर्तों को लागू करने के लिए सरकार की स्थापना की जाती है| सरकार की स्थापना एक ट्रस्ट के रूप में होती है|
इस प्रकार लॉक राज्य व सरकार में भेद करता है|
समझौते द्वारा सरकार की स्थापना हो जाने के बाद भी सरकार पर नागरिक समाज निगरानी रखता है|
लॉक के शब्दों में “समुदाय ऐसा ग्रहस्वामी है जो घर की रखवाली के लिए पहरेदार रखता है, फिर स्वयं जाग-जागकर यह देखता रहता है कि कहीं वह पहरेदार सो तो नहीं गया है|”
लॉक के अनुसार सामाजिक समझौते के तीन चरण होंगे-
प्रथम चरण- नागरिक समाज या समुदाय की स्थापना की जाएगी
द्वितीय चरण- सरकार व सरकारी संस्थाओं की स्थापना की जाएगी
तृतीय चरण- कर लगाने वाले प्राधिकरण की स्थापना की जाएगी (यह प्राधिकरण इसलिए आवश्यक है, क्योंकि उन लोगों की सहमति के बिना संपत्ति को जब्त या पुनर्वितरित नहीं कर सकती है जिनकी यह संपत्ति है)
समझौते की विशेषताएं-
लॉक का समझौता सर्वसहमति (सर्व सहमति का सिद्धांत) से संपन्न हुआ, यह जन इच्छा पर आधारित था| कोई भी व्यक्ति इस नवीन समाज में सहमति के बिना प्रविष्ट नहीं हो सकता है|
लॉक के समझौते का दोहरा स्वरूप था|
समझौते के बाद भी जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, संपत्ति का अधिकार ये तीनों प्राकृतिक अधिकार व्यक्ति के पास सुरक्षित रहते हैं|
व्यक्ति केवल प्राकृतिक कानून की व्याख्या करने, उसे क्रियान्वित करने और भंग करने वाले को दंड देने का अधिकार ही राज्य को सोपंता है|
व्यक्ति ने समझौते के द्वारा अपने अधिकार संपूर्ण समुदाय (नागरिक समाज) को सोपें हैं, ना कि व्यक्ति विशेष को|
समझौते से उत्पन्न नागरिक समाज पर व्यक्ति के अदेय अधिकारों तथा प्राकृतिक नियमों का बंधन था|
यह बहुमत के शासन पर आधारित था|
अगर सरकार समझौते के अनुसार कार्य नहीं करती है, तो उसके विरुद्ध क्रांति करके बदला जा सकता है|
इस समझौते से केवल प्राकृतिक अवस्था का अंत होता है, प्राकृतिक कानून का अंत नहीं होता है|
लॉक का सामाजिक समझौता दार्शनिक होने के साथ ऐतिहासिक भी है, जबकि हॉब्स का सामाजिक समझौता केवल दार्शनिक है, क्योंकि लॉक कहता है कि “इस प्रकार का पूरा संसार आरंभ में अमेरिका था” तथा लॉक मेफ्लावर समझौते का उदाहरण देते हैं, लेकिन इस तरह का कोई ऐतिहासिक उदाहरण हॉब्स नहीं देता है|
मेफ्लावर समझौता 1620- यह समझौता मेफ्लावर जहाज पर ब्रिटेन सम्राट जेम्स प्रथम के धार्मिक अत्याचारों से बचने के लिए अमेरिका जा रहे प्यूरिटन्स ने किया था| इस दस्तावेज द्वारा संसार में प्रथम बार लिखित व संवैधानिक सरकार का ढांचा प्रकट हुआ, जो बाद में संयुक्त राज्य अमेरिका बना|
लॉक के राज्य की विशेषताएं-
राज्य कृत्रिम संस्था है| राज्य साधन है तथा व्यक्ति साध्य है|
राज्य की उत्पत्ति का आधार जन सहमति है|
सरकार, नागरिक समाज (राज्य) का कार्यकारी अंग है| सरकार पर व्यक्ति के अदेय अधिकारों का बंधन है अतः सीमित सरकार है|
लॉक वैधानिक राज्य की अवधारणा का प्रतिपादन करता है, जिसके अंतर्गत विधि के शासन को अपनाया गया है, मनमाने शासन को नहीं|
लॉक का राज्य धार्मिक सहिष्णु राज्य है, जो धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता है|
लॉक का राज्य एक निषेधात्मक या अहस्तक्षेप राज्य है|
लॉक “जहां कानून समाप्त होता है, वहां से अत्याचार प्रारंभ होता है|”
सरकार के कार्य और उनकी सीमाएं-
लॉक के अनुसार “मनुष्यों के राज्य में संगठित होने तथा अपने आपको सरकार के अधीन रखने का मुख्य उद्देश्य अपनी संपत्ति की रक्षा करना है|” यहां लॉक संपत्ति में भौतिक संपदा के अलावा जीवन, स्वास्थ्य एवं स्वतंत्रता को सम्मिलित करता है|
लॉक ने शक्ति पृथक्करण की बात की है-
लॉक ने राज्य की तीन शक्तियां बतायी है-
पहली शक्ति विधायिका
दूसरी कार्यपालिका (लॉक कार्यकारिणी व न्यायपालिका में अंतर नहीं करता)
तीसरी शक्ति फैडरेटिव या संघात्मक (यह शक्ति अंतरराष्ट्रीय संबंधों का संचालन करती थी)
लॉक ने व्यवस्थापिका और कार्यपालिका को पृथक मानते हुए कार्यपालिका को व्यवस्थापिका के अधीन बताया है|
लॉक ने नागरिक समाज तथा सरकार के पारस्परिक संबंध बताने के लिए ट्रस्ट शब्द का प्रयोग किया है| जन-कल्याण के लिए स्थापित सरकार ट्रस्ट की अवहेलना करने पर पदच्युत की जा सकती है|
सरकार के रूप-
समझौते के माध्यम से शक्ति एक ऐसे बहुमत को दे दी जाती है, जो सबकी ओर से फैसले करेगा|
बहुमत या समुदाय, सत्ता शक्ति का किस प्रकार प्रयोग करता है, इस आधार पर लॉक ने सरकार के तीन रूप बताए हैं-
जनतंत्र- इसमें बहुमत, सत्ता शक्ति अपने पास रखता है, या किसी विधायी संस्था सौंप सकता है|
कुलीनतंत्र- इसमें सत्ता शक्ति कुछ गिने-चुने लोगों को सौंप दी जाती है|
संविधानिक राजतंत्र- इसमें सत्ता शक्ति एक व्यक्ति को सौंप दी जाती है|
Note- लॉक की प्राथमिकता एक ऐसे प्रतिनिधि जनतंत्र के लिए है, जिसमें बहुमत ने अपनी विधायी शक्ति को एक निर्वाचित विधानमंडल को समर्पित कर दिया है|
धर्म संबंधी लॉक के विचार-
लॉक ने अपने ग्रंथ ‘Letters On Toleration’ में धर्म संबंधी विचारों का उल्लेख किया है| लॉक धर्म के मामलों में ‘साहिष्गुणता’ का समर्थन करता है|
लॉक के मत में धर्म व्यैक्तिक वस्तु है, जिससे राज्य का तब तक कोई मतलब नहीं है जब तक धार्मिक गिरोह अव्यवस्था उत्पन्न न करें|
राज्य को धार्मिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए|
लॉक के धार्मिक विचार आधुनिक धर्मनिरपेक्ष अवधारणा से साम्यता रखते हैं|
क्रांति के अधिकार संबंधी लॉक के विचार-
लॉक छीनने (Usurpation) को विजय (Conquest) जैसा ही मानता है और यही विचार उसके क्रांति सिद्धांत की कुंजी है|
लॉक “विजय विदेशियों से छीनना है और छीनना घरेलू विजय है|”
लॉक के मत में यदि राजा किसी का कुछ छीनता है, तो उसकी आज्ञा माने जाने का अधिकार स्वत: निरस्त हो जाता है|
लॉक के मत में यदि सरकार के तीनों अंग छीना-झपटी और अत्याचार का समर्थन करते हैं; तो वह सरकार ही नहीं है और राजनीतिक समाज उससे लड़ने के लिए स्वतंत्र है|
इस प्रकार जब सरकार समझौते के अनुसार अपने उद्देश्य पूरे नहीं कर पाती है, तो लॉक जनता को सरकार के विरुद्ध विद्रोह और क्रांति का अधिकार देता है|
क्रांति करने पर केवल सरकार भंग होती है या बदलती है नागरिक समाज या राज्य बना रहता है|
लॉक क्रांति को Appeal to Heaven (स्वर्ग से अपील) यानी विरोध का अधिकार कहता है|
राजनीतिक समाज स्थायी है, क्योंकि यह समाज केवल विदेशी आक्रमण की स्थिति को छोड़कर कभी नष्ट नहीं होता है|
लॉक क्रांति के अधिकार पर दो प्रतिबंध/ शर्तें लगाता है-
जब तक सरकार अपने कर्तव्यों को पूरा करती है, तब तक क्रांति नहीं करनी चाहिए|
केवल बहुसंख्यक लोग ही सरकार को पलट सकते हैं|
व्यक्तिवाद एवं उदारवाद-
हॉब्स की तरह लॉक भी व्यक्तिवादी विचारक है|
वाहन के शब्दों में “लॉक की व्यवस्था में हर वस्तु व्यक्ति के चारों तरफ चक्कर काटती है, प्रत्येक वस्तु को इस प्रकार सजा कर रखा गया है कि व्यक्ति की संप्रभुता सुरक्षित रहे|”
निम्न तथ्य हैं, जो लॉक को व्यक्तिवादी सिद्ध करते हैं-
लॉक का चिंतन व्यक्ति केंद्रित है|
राज्य को अधिकार व्यक्ति की सहमति से प्राप्त होते हैं|
राज्य की उत्पत्ति व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए होती है, अतः राज्य साधन तथा व्यक्ति साध्य है|
किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध राज्य का सदस्य बनने के लिए विवश नहीं किया जा सकता|
प्रोफ़ेसर वाहन “लॉक व्यक्तिवादियों का शिरोमणि है|”
सी बी मैकफ़र्सन “लॉक वास्तव में अंग्रेजी उदारवाद का मूल स्रोत था|”
लॉक को उदारवाद का पिता माना जाता है|
उदारवादी लॉक को अमेरिका का राजनीतिक राजा कहा जाता है तथा अमेरिका को लॉकवादी व्यक्तिवाद का देश कहा जाता है|
लॉक द्वारा व्यक्तिवाद, स्वतंत्रता, सहमति पर आधारित सरकार, न्यूनतम राज्य, संवैधानिक सरकार, कानून का शासन, बहुमत का सिद्धांत, सत्ता का पृथक्करण, बहुलवाद, सहिष्णुता, संपत्ति का अधिकार व प्रतिनिधि जनतंत्र जैसे विचार दिए गए, इसलिए लॉक को उदारवाद का पिता कहा जाता है|
लॉक का अनुभववाद-
लॉक के अनुसार “जन्म के समय व्यक्ति का मस्तिष्क कोरी प्लेट (Tabula Rasa) या खाली प्लेट के समान होता है बाद में अनुभव से उसको ज्ञान की प्राप्ति होती है|
लॉक ने अनुभवाद का उल्लेख “An Essay Concerning Human Understanding” में किया है|
लॉक का श्रम सिद्धांत-
इसको स्वामित्व का श्रम सिद्धांत भी कहा जाता है|
लॉक का यह विचार है, कि प्रकृति के साथ अपना श्रम मिलाने से संपत्ति जन्म लेती है|
लॉक ने संपत्ति को दो भागों में बांटा है-
व्यक्तिगत संपत्ति- वह संपत्ति जिसको मनुष्य अपने शारीरिक श्रम द्वारा प्राप्त करता है| इस पर मनुष्य का पूरा व्यक्तिगत नियंत्रण होता है|
सामान्य संपत्ति- वह संपत्ति जो प्रकृति द्वारा स्वतः उपजती है, जैसे- पशु| इस संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार न होकर सभी का अधिकार होता है|
डेविड रिकार्डो ने अपने मूल्य का श्रम सिद्धांत व कार्ल मार्क्स ने अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत की प्रेरणा लॉक के श्रम सिद्धांत से ली थी|
लॉकियन शर्त (Lockean Proviso)-
लॉक का संपत्ति का अधिकार असीमित नहीं है, बल्कि लॉक इस पर तीन सीमाएं लगता है|
लॉक ने संपत्ति पर जो सीमाएं लगाई है, उसको लॉकियन शर्त (Lockean Proviso) भी कहा जाता है|
श्रम सीमा- जितना श्रम, उतनी ही संपत्ति
पर्याप्तता सीमा- संपत्ति की जितनी आवश्यकता उतनी ही रखना, बाकि की संपत्ति दूसरों के लिए छोड़ देना
विनाश सीमा- जितनी संपत्ति का सदुपयोग हो सके उतनी ही रखना, ताकि अधिक संपत्ति नष्ट ना हो|
लॉकियन शर्त (Lockean Proviso) शब्द रॉबर्ट नॉजिक (पुस्तक- Anarchy, State and Utopia 1974) ने गढ़ा है|
नॉजिक के अनुसार “कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता व परिश्रम से कितनी भी संपत्ति बना सकता है, पर लॉकियन शर्त यह है कि इससे बाकि लोगों की स्थिति पहले से खराब ना हो|”
स्त्री संबंधी विचार-
जहां हॉब्स पितृसत्तात्मकता की ओर झुके हुए हैं, वही लॉक स्त्री को ज्यादा अधिकार व समानता का दर्जा देते हैं|
बटलर ने लिखा है कि “स्त्रियों की ओर हमदर्दी रखने के कारण लॉक को आरंभिक स्त्रीवादी माना गया है, जो पितृसत्ता का दुश्मन है|”
संप्रभुता संबंधी विचार-
जॉन लॉक सीमित संप्रभुता के समर्थक हैं|
लॉक संप्रभुता के लिए All Supreme Power (सर्वोच्च सत्ता) शब्द का प्रयोग करते हैं|
लॉक प्रभुसत्ता के दो प्रकार बताता है-
निन्द्रित प्रभुसत्ता- समुदाय या नागरिक समाज के पास
जाग्रत प्रभुसत्ता- राजा के पास
सहमति संबंधी विचार-
लॉक के मत में समझौते द्वारा निर्मित नागरिक समाज व सरकार जन सहमति पर आधारित है|
लॉक दो प्रकार की सहमति बताता है-
प्रत्यक्ष सहमति-
यह राज्य या नागरिक समाज के निर्माण के समय दी गई सहमति है तथा उसके बाद व्यस्क होने पर लोग नागरिक समाज में शामिल होने के लिए नागरिक समाज के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं|
अप्रत्यक्ष सहमति-
राज्य की संपत्ति, पदाधिकार व कानूनों के प्रति लोगों की वफादारी अप्रत्यक्ष सहमति है, जिसमें शपथ या घोषणा की आवश्यकता नहीं होती है|
जॉन लॉक का मूल्यांकन-
प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धांत का जनक-
जॉन लॉक को प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत का जनक माना जाता है|
बेंथम लॉक के प्राकृतिक अधिकार सिद्धांत का आलोचक है| बेंथम ने प्राकृतिक अधिकारों को अलंकृत या कोरी बकवास कहा है, क्योंकि राज्य व सरकार से पूर्व अधिकार काल्पनिक बकवास है|
लॉक का महत्व और प्रभाव-
फ्रांस (1789) व अमेरिका (1776) की जनक्रांतियो पर लॉक का प्रभाव पड़ा है|
लॉक ने ‘बहुमत के शासन’ पर बल दिया है|
कार्यपालिका को व्यवस्थापिका के अधीन करके संवैधानिक शासन का समर्थन करता है|
लॉक के अनुभववाद का प्रभाव बर्कले, ह्यूम और मांटेस्क्यू पर पड़ा|
लॉक इंग्लैंड की गौरवपूर्ण क्रांति के चिंतक हैं|
लॉक पूंजीवादी दर्शन के प्रणेता माने जाते हैं|
लॉक अनुभववाद के पिता माने जाते हैं|
लॉक सीमित सरकार व सीमित संप्रभुता के प्रणेता माने जाते हैं|
जॉन रॉल्स ने जॉन लॉक के सामाजिक समझौते सिद्धांत के आधार पर अपने न्याय के सिद्धांत का प्रतिपादन किया|
रॉबर्ट नॉजिक ने भी लॉक के सामाजिक समझौते के अनुरूप सरकार को एक ट्रस्ट माना है|
लॉक से संबंधित कुछ अन्य तथ्य-
सी बी मैकफ़र्सन ने जॉन लॉक को स्वत्वमूलक व्यक्तिवादी, बुर्जुआ तानाशाही का प्रवक्ता व पूंजीवादी भावना का प्रतिनिधि कहा है|
वुड ने लॉक को कृषि पूंजीवाद का प्रवक्ता कहा है|
बट्रेंड रसैल ने कहा है कि “जॉन लॉक के उत्तराधिकारी, प्रथम बर्कले व ह्यूम है, द्वितीय वे फ्रेंच दार्शनिक है, जो रूसो के स्कूल से नहीं हैं, तृतीय बेंथम व आमूल परिवर्तनवादी दार्शनिक हैं, चतुर्थ प्रमुख यूरोपीय भूखंड का दर्शन, कार्ल मार्क्स और उनके शिष्य हैं|”
लॉक का मत है कि हॉब्स के व्यक्ति के मस्तिष्क की कोठरी (Closet) का प्रत्येक दरवाजा हिंसक मृत्यु के भय से टूट पड़ा था|
सिबली के मत में लॉक का व्यक्ति काफी सीमा तक बौद्धिक दृष्टि से जिज्ञासु है और मूलतः अर्धसामाजिक है|
जीवन परिचय-
जन्म-
28 जून 1712 ई.
स्वीटजरलैंड के गणतंत्रीय नगर जेनेवा में हुआ|
पिता- आइजक रूसो था, जो एक निर्धन घड़ी-साज था|
माता का देहांत जन्म के समय ही हो गया था|
प्रारंभिक जीवन रूसो ने आवारागर्दी में बिताया था| दांते जमीनों ने रूसो को ‘एकांत आवारा’ की संज्ञा दी है|
रूसो का भाग्य 1749 में तब पलटता है जब उसने “Has The Revival of the Sciences And The Arts Helped to Purify Or To Corrupt Morals” (विज्ञान तथा कला की प्रगति ने नैतिकता को भ्रष्ट करने में योग दिया है अथवा उसकी विशुद्धि में) प्रतियोगिता में भाग लिया|
यह निबंध प्रतियोगिता थी, जो Academy Of De jon के द्वारा करवाई जा रही थी| रूसो ने निबंध में लिखा कि विज्ञान तथा कला की प्रगति से ही सभ्यता का हास, नैतिकता का विनाश और चरित्र का पतन हुआ है|
इस निबंध में एक स्थान पर रूसो लिखता है कि “हमें फिर से अज्ञान, भोलापन और निर्धनता दे दो, केवल वे ही हमें सुखी बना सकते हैं|”
इसके बाद रूसो प्रसिद्ध हो गया तथा पेरिस के साहित्यिक क्षेत्रों में उसे सम्मान मिला|
1754 में रूसो ने Academy Of De jon की अन्य निबंध प्रतियोगिता में भाग लिया जिसका विषय था “मनुष्यों में विषमता उत्पन्न होने का क्या कारण है? क्या प्राकृतिक कानून इसका समर्थन करता है|”
2 जुलाई 1779 को 66 वर्ष की आयु में रूसो की मृत्यु हो गयी|
रूसो ने प्रत्यक्ष प्रजातंत्र का समर्थन किया है|
राजनीति विज्ञान में रूसो ने पहली बार ‘समानता की संकल्पना’ को स्थान दिया|
रूसो को फ्रांसीसी क्रांति (1789) का आध्यात्मिक पिता कहा जाता है|
रचनाएं-
A discourse On the moral effects of the Art and Science- 1749
(कलाओ और विज्ञानो के नैतिकता पर प्रभाव पर एक निबंध)
इस निबंध में कला व विज्ञान के विकास को सभ्यता के हास, नैतिकता के विनाश, चरित्र के पतन का कारण बताया है|
संक्षेप- A discourse On Art and Science
यह निबंध Academy on De jon द्वारा पुरस्कृत किया गया था|
Discourses on the Origin of Inequality Among Men 1755
(व्यक्तियों के बीच असमानता के उद्भव एवं आधार पर निबंध या विषमता पर वार्ता)
इसमें रूसो ने असमानता का कारण निजी संपत्ति को बताया|
इसमें रूसो ने राज्य और फ्रेंच राजतंत्र की भी आलोचना की थी|
यह जिनेवा निवासियों को समर्पित है|
An Introduction to Political Economy- 1758
इस ग्रंथ में आदर्श राज्य के सिद्धांतों का वर्णन है|
The Social Contract 1762- इसमें रूसो के राजदर्शन का वर्णन है|
The Emile- 1762
शिक्षा पर लिखी गई प्रसिद्ध कृति है|
अन्य नाम- On education या Treatise on Education
The Emile ग्रंथ के कारण रूसो को ‘Progressive Education’,का जनक माना जाता है|
इसमें रूसो ने धार्मिक शिक्षा का विरोध किया है तथा इसी में ‘प्रकृति की ओर लौटो’ का नारा दिया है|
रूसो की अध्ययन पद्धति व रूसो पर प्रभाव-
रूसो ने ऐतिहासिक व अनुभूतिमुलक अध्ययन पद्धति का प्रयोग किया है| यह मनोविज्ञान युक्त थी|
रूसो जिनेवा में प्रचलित प्रजातांत्रिक व्यवस्था से बहुत प्रभावित था|
यूनानी और रोमन साहित्य तथा काल्विन के धार्मिक विचारों से भी वह प्रभावित था|
मैक्यावली, हॉब्स, लॉक, बोदा, मांटेस्क्यू ,वाल्टेयर आदि का प्रभाव भी रूसो पर पड़ा है|
मानव स्वभाव पर रूसो का विचार-
रूसो मनुष्य को स्वभाव से भोला, अच्छा, सुखी, सीधा, चिंतारहित, शांतिप्रेमी, निष्पाप, निर्दोष और एकांत प्रिय मानता है|
मनुष्य नैतिकता के विचारों से रहित और सहज भावना से काम करने वाला बुद्धिहीन प्राणी है|
W T जोन्स “मानव स्वभाव के संबंध में रूसो की धारणा प्लेटो और अरस्तु की धारणा से मेल खाती है|”
Note- रूसो के शब्दों में मनुष्य एक आदर्श बर्बर (Noble savage) था| अर्थात रूसो ने प्राकृतिक अवस्था के मनुष्य के लिए आदर्श बर्बर (Noble savage) शब्द का प्रयोग किया है|
मनुष्य स्वभाव से बुरा नहीं होता है, बल्कि भ्रष्ट कला के कारण बुरा बन जाता है| संसार में पाए जाने वाले पाप, भ्रष्टाचार, दुष्टता आदि भ्रष्ट सामाजिक संस्थाओं की उत्पत्ति है|
भ्रष्ट सामाजिक संस्थाओं की वजह से मानव का पतन होता है|
रूसो मानव स्वभाव की दो प्रमुख नियामक प्रवृतियां बताता है-
आत्मप्रेम अथवा आत्मरक्षा की भावना
सहानुभूति या परस्पर सहायता की भावना
रूसो का कहना है कि इन दोनों भावनाओं में कभी-कभी संघर्ष होना स्वभाविक है|
अत: आत्मरक्षा एवं सहानुभूति इन दोनों भावनाओं में सामंजस्य और अन्य भावनाओं का विकास करने में अंतःकरण एवं विवेक दोनों का योगदान होता है|
रूसो तर्क का भी विरोध किया है| रूसो ने लिखा है कि “चिंतनशील या तर्कशील मानव एक पतित दुराचारी पशु के समान है|”
प्राकृतिक अवस्था पर रूसो के विचार-
रूसो अपने लेख Discourse on the Origin of Inequality में प्राकृतिक अवस्था के मानव का वर्णन करता है|
रूसो की प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य प्रकृति की गोद में स्वछंदतापूर्वक जीवन यापन करता था| प्राकृतिक अवस्था भय व चिंता से मुक्त थी|
प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य भोला, असभ्य, संतुष्ट, स्वस्थ एवं निर्भय था तथा पशु के समान अकेला जीवन बिताता था|
प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य के पास न भाषा थी, न कला, न विज्ञान था, न मनुष्य सुखी था न दुखी था|
रूसो की प्राकृतिक अवस्था समाज पूर्व व राज्य पूर्व दोनों है|
रूसो की दृष्टि में स्पार्टा प्राकृतिक सरलता का सर्वोपरि उदाहरण है|
रूसो ने प्राकृतिक अवस्था के तीन चरण बताएं हैं-
आदिम प्राकृतिक अवस्था-
इस अवस्था में गुण-अवगुण, ऊंच-नीच, तेरे-मेरे का अभाव था| व्यक्तिगत संपत्ति का उदय नहीं हुआ था| ज्ञान, विज्ञान, कला, विद्या का भी विकास नहीं हुआ था|
इस अवस्था के व्यक्ति को रूसो भद्र पशु या आदर्श बर्बर या उत्कृष्ट बर्बर (Noble savage) कहा है|
मध्यवर्ती प्राकृतिक अवस्था (पितृसत्तात्मक चरण)-
इस अवस्था में असमानता का प्रारंभ हुआ और संचयवृति बढ़ गयी, जिसका कारण जनसंख्या की वृद्धि और तर्क का उदय था|
व्यक्तिगत संपत्ति व परिवार का उदय होता है| स्थायी आवास बनाए जाते हैं| निर्धन व धनी के मध्य असमानता बढ़ जाती है|
संपत्ति के प्रादुर्भाव से मनुष्य की स्वतंत्रता परतंत्रता में बदल गई, जिसके संबंध में रूसो कहता है कि “मनुष्य स्वतंत्र उत्पन्न होता है, किंतु वह सर्वत्र बेड़ियों में जकड़ा हुआ है|”
रूसो “जिस क्षण से एक व्यक्ति के पास दो व्यक्तियों के लायक सामान इकट्ठा होने लगा, समानता समाप्त हो गई, संपत्ति पैदा हो गई, कार्य आवश्यक हो गया, विशाल जंगल उपजाऊ खेत बन गए, जहां गुलामी व दुख, फसल के साथ पैदा हुए|”
तृतीय चरण-
यह दमन तथा अत्याचार की अवस्था थी, जो असहनीय अवस्था थी, जिसमें मनुष्य की गति बुरे से सर्वनाश की ओर की थी|
रूसो प्राकृतिक अवस्था को काल्पनिक मानता है|
रूसो का सामाजिक समझौता-
रूसो ने सोशल कॉन्ट्रैक्ट पुस्तक में भ्रष्टाचार से मुक्त वैकल्पिक समाज या वैकल्पिकआदर्श राज्य की संभावना खोजी है|
रूसो ने भी हॉब्स तथा लॉक की तरह राज्य की उत्पत्ति सामाजिक समझौते से मानी है|
समझौते का कारण-
प्राकृतिक अवस्था का तृतीय चरण असहनीय था|
रूसो के अनुसार “वह प्रथम व्यक्ति ही नागरिक समाज का वास्तविक संस्थापक था, जिसने भूमि के एक टुकड़े को घेर लेने के बाद यह कहा था कि यह मेरा है और उसी समय समाज का निर्माण हुआ था, जब अन्य लोगों ने उसकी देखा-देखी स्थानों और वस्तुओं को अपना समझना प्रारंभ किया|”
इस समय मनुष्य ने प्रकृति की ओर वापस चलने (back to nature) का नारा दिया|
समझौते की प्रक्रिया-
रूसो के शब्दों में “हम में से प्रत्येक अपने शरीर को और समूची शक्ति को अन्य सब के साथ संयुक्त सामान्य इच्छा के सर्वोच्च निर्देशन में रखते हैं और सामूहिक स्वरूप में हम प्रत्येक सदस्य को समष्टि (समुदाय) के अविभाज्य अंश के रूप में स्वीकार करते हैं|”
अर्थात समझौता इस शर्त पर किया जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपना शरीर, सारे अधिकार, शक्तियां समुदाय (राज्य) को सोपते हैं तथा प्रत्येक सदस्य इस समुदाय का अंश होगा|
यह समझौता दो पक्षों में किया जाता है| एक पक्ष में मनुष्य अपने व्यक्तिक रूप में होते हैं, दूसरे पक्ष में मनुष्य अपने सामूहिक रूप में होते हैं|
समझौते से एक नैतिक तथा सामूहिक निकाय का जन्म होता है जिसकी अपनी एकता, अपनी सामान्य सत्ता, अपना जीवन तथा अपनी इच्छा होती है|
रूसो के अनुसार समझौते से बने समुदाय को पहले नगर राज्य कहते थे, अब उसे गणराज्य अथवा राजनीतिक समाज कहते हैं| जब यह निष्क्रिय रहता है तो राज्य कहते हैं और जब सक्रिय होता है तो संप्रभु कहते हैं| जब ऐसे ही अन्य निकायों से इसकी तुलना करने में इसे शक्ति कहते हैं|
समझौते के परिणाम-
समझौते द्वारा निर्मित राज्य को सामान्य इच्छा कहा जाता है|
समझौते के बाद समाज/ राज्य की सामान्य इच्छा सभी व्यक्तियों के लिए सर्वोच्च हो जाती है|
समझौता निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, व्यक्ति सामान्य इच्छा में निरंतर भाग लेता रहता है|
समझौते के फलस्वरुप समाज अथवा राज्य का रूप जैविक या सावयिक (organic) होता है| प्रत्येक व्यक्ति राज्य का अविभाज्य अंग होता है वह ना तो राज्य से अलग हो सकता है और न ही राज्य के विरुद्ध आचरण कर सकता है|
समझौते से एक नैतिक व सामूहिक प्राणी का जन्म होता है, जिसे रूसो ‘सार्वजनिक व्यक्ति’ कहता है|
राज्य का सावयिक स्वरूप बताते हुए रूसो लिखता है कि “विधि-निर्माण शक्ति सिर के समान, कार्यकारणी बाहु के समान, न्यायपालिका मस्तिष्क के समान, कृषि, उद्योग तथा वाणिज्य पेट के समान और राजस्व रक्त संचार के समान है|”
प्राकृतिक अवस्था और सामाजिक समझौते की आलोचना-
रूसो सामान्य इच्छा की आड़ में राज्य को निरकुंश बना देता है| इसलिए आलोचक रूसो के राज्य को ‘शिशकटा लेवियाथन’ कहते हैं|
वॉल्टियर रूसो को ‘असभ्यता का विचारक’ कहता है|
S. R. लॉर्ड “रूसो एक ही क्षण में हॉब्स के समान निरकुंशवादी है और लॉक से भी अधिक प्रजातंत्रवादी है|”
सर हेनरी मैन “समाज तथा सरकार की उत्पत्ति के इस वर्णन से बढ़कर व्यर्थ की वस्तु ओर क्या हो सकती है|”
रूसो की सामान्य इच्छा संबंधी धारणा-
सामान्य इच्छा की अवधारणा पहले रूसो की पुस्तक इंट्रोडक्शन ऑन पॉलिटिकल इकोनॉमी में प्रस्तावित की गई बाद में इसको सोशल कॉन्ट्रैक्ट पुस्तक में विकसित किया गया|
‘सामान्य इच्छा’ को समझने के लिए व्यक्ति की इच्छा को समझना जरूरी है|
रूसो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की दो इच्छाएं होती हैं-
यथार्थ इच्छा (Actual will)
आदर्श इच्छा या असली इच्छा (Real will)
यथार्थ इच्छा-
यह इच्छा व्यक्ति के ‘निम्न स्व’ पर आधारित है|
यह इच्छा स्वार्थगत, संकीर्ण एवं परिवर्तनशील है|
यह भावना प्रधान एवं विवेकहीन इच्छा है|
इसमें व्यक्ति अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगा रहता है|
आदर्श इच्छा या असली इच्छा-
यह ‘श्रेष्ठ स्व’ पर आधारित इच्छा है|
यह स्वार्थहीन, सूसंस्कृतम्, कल्याणकारी तथा सामाजिक हित, विवेक, ज्ञान पर आधारित इच्छा है|
रूसो के अनुसार यह सर्वश्रेष्ठ इच्छा है एवं स्वतंत्रता की द्योतक है तथा व्यक्ति में स्थायी रूप से निवास करती है|
मनुष्य की इस इच्छा का अभिव्यक्तिकरण व्यक्ति और समाज के मध्य होता है|
सामान्य इच्छा-
सामान्य इच्छा समाज के सभी व्यक्तियों की आदर्श इच्छाओं का जोड़ है|
समझौते के बाद सभी व्यक्ति अपना सर्वस्व राज्य को सौंप देते है अतः सामान्य इच्छा सर्वसाधारण की पूर्णप्रभुत्व संपन्न इच्छा ही है|
सामान्य इच्छा विवेक पर आधारित विवेकशील इच्छा है, जो गुणात्मक है, न कि मात्रात्मक अर्थात सामान्य इच्छा का तात्पर्य बहुमत की इच्छा नहीं है यह एक या कुछ व्यक्तियों की भी इच्छा हो सकती है|
सामान्य इच्छा, जनमत की इच्छा और समस्त की इच्छा में अंतर-
रूसो सामान्य इच्छा, जनमत की इच्छा और समस्त की इच्छा में अंतर करता है|
सामान्य इच्छा से केवल सामान्य हित पर बल दिया जाता है लेकिन जनमत में बहुसंख्या के हित पर|
सामान्य इच्छा का मतलब समाज के समस्त व्यक्तियों की आदर्श इच्छाओं का योग है, लेकिन समस्त इच्छा का मतलब सभी व्यक्तियों की सभी इच्छाएं|
सामान्य इच्छा की विशेषताएं-
एकता
अदेयता- रूसो प्रत्यक्ष प्रजातंत्र का समर्थक था|
स्थायित्व-
औचित्य-
संप्रभुताधारी-
अप्रतिनिधित्वकारी-
कानून का स्रोत- विधि-निर्माण एकमात्र सामान्य इच्छा का कार्य है|
लोक कल्याणकारी- सामान्य इच्छा व्यक्तियों की आदर्श इच्छाओं का योग होती है और व्यक्तियों की ये आदर्श इच्छाएं जनकल्याण से प्रेरित होती हैं|
सामान्य इच्छा सिद्धांत की आलोचना-
वाहन “रूसो ने अपनी समग्रतावादी अवधारणा के द्वारा व्यक्ति की हैसियत को शून्य में बदल दिया है|”
हर्नशा “लेवियाथन का कटा सिर ही रूसो की सामान्य इच्छा है|”
वेपर “यदि सामान्य इच्छा सर्वोच्च है तो सामाजिक समझौता अनावश्यक है और यदि सामाजिक समझौता महत्वपूर्ण है तो सामान्य इच्छा सर्वोच्च नहीं हो सकती है|”
रूसो की संप्रभुता संबंधी धारणा (अप्रतिनिधित्वकारी संप्रभुता)-
रूसो लोकप्रिय संप्रभुता का प्रतिपादन करता है|
रूसो ने संप्रभुता को सामान्य इच्छा केंद्रित माना है, जो असीम, अविभाज्य, अदेय, अप्रतिनिधित्वकारी सार्वभौमिक है|
रूसो की संप्रभुता का कोई प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता है| रूसो के शब्दों में “जिस क्षण वहां कोई स्वामी होगा, वहां कोई संप्रभुता नहीं रह जाएगी|”
असीमित, सर्वोच्च होते हुए भी संप्रभुता सामान्य हित के विरुद्ध कार्य नहीं कर सकती है| इस प्रकार रूसो लोकप्रिय संप्रभुता का प्रतिपादन करता है|
रूसो की पुस्तक सोशल कॉन्ट्रैक्ट के मुख्य पृष्ठ पर शीश कटे लेवियाथन का चित्र है, जिसका अर्थ है संप्रभुता एक व्यक्ति या अंग विशेष में नहीं, बल्कि समस्त समुदाय या जनता में है|
प्रो.वाहन “निसंदेह उनकी सामान्य इच्छा हॉब्स का लेवियाथन है, जिसका सिर काट दिया गया है|”
शासन संबंधी रूसो के विचार-
रूसो राज्य और शासन या सरकार में अंतर स्पष्ट करता है|
समझौते द्वारा निर्मित निकाय राज्य होता है, जो संपूर्ण समुदाय है जबकि शासन या सरकार वह व्यक्ति या व्यक्ति समूह जिसको राज्य द्वारा शासन संचालन का अधिकार दिया जाता है|
शासन का वर्गीकरण- सरकार की बागडोर के आधार पर रूसो ने चार प्रकार के शासन बताये हैं-
राजतंत्र- सरकार की बागडोर एक व्यक्ति के हाथ में|
कुलीन तंत्र- सरकार की बागडोर कुछ व्यक्तियों के हाथ में|
जनतंत्र- बागडोर संपूर्ण जनता या बहुमत के हाथ में|
मिश्रित
रूसो के अनुसार परिस्थिति व देशकाल के अनुसार कोई सा भी शासन सर्वोत्तम या निकृष्टतम हो सकता है|
रूसो के मत में शासन की प्रगति का निश्चित चिन्ह जनसंख्या है, जिस राज्य की जनसंख्या बढ़ती जाएगी, समझना चाहिए वह राज्य प्रगति की ओर बढ़ता जाएगा|
प्रत्यक्ष लोकतंत्र का समर्थन-
रूसो प्रत्यक्ष लोकतंत्र का समर्थक है|
रूसो ने व्यावहारिक कारणों से प्रतिनिधि लोकतंत्र की आलोचना की है|
वह प्रतिनिध्यात्मक लोकतंत्र को सच्चा लोकतंत्र नहीं मानता है|
ब्रिटेन की निर्वाचन प्रथा के विषय में रूसो का मत है कि वहां नागरिक केवल निर्वाचन काल में ही स्वतंत्र होते हैं, इसके बाद दास बन जाते हैं|
कानून संबंधी रूसो के विचार-
रूसो अपने निबंध Political Economy (1758) में कानून का महत्व दर्शाता है|
कानून का लोगों द्वारा पालन किया जाना चाहिए|
Social contract (1762) ग्रंथ में रूसो ने कानून के चार प्रकार बताएं-
राजनीतिक या आधारभूत कानून- इन कानूनों के द्वारा संप्रभुता का राज्य के साथ संबंध निर्धारण होता है|
दीवानी कानून- इसके द्वारा नागरिकों के पारस्परिक संबंध निर्धारित होते हैं|
फौजदारी कानून- यह कानून, कानून की आज्ञा के उल्लंघन का दंड निश्चित करते हैं|
जनमत, नैतिकता तथा रीति-रिवाज- रूसो के मतानुसार ये राज्य के वास्तविक संविधान है और नागरिकों के हृदय पटल पर अंकित है|
स्वतंत्रता संबंधी रूसो के विचार-
रूसो स्वतंत्रता को राज्य प्रदत नागरिक अधिकार मानता है|
रूसो स्वतंत्रता को अत्यंत आवश्यक मानते हुए कहते हैं कि “आजादी का त्याग मनुष्य होने के दावे का त्याग है, मानवता के अधिकारों का समर्पण है तथा कर्तव्यो का भी समर्पण है|”
अपने ग्रंथ Social contract में रूसो ने लिखा है कि “स्वतंत्रता मानव का परम आंतरिक तत्व है| स्वतंत्रता नैतिकता का आधार है|”
रूसो “स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता या मनमाना कार्य करना नहीं है, बल्कि सामान्य हित की दृष्टि से बनाए गए नियम व कानूनों की पालना करने में स्वतंत्रता है|” अर्थात रूसो के मत में स्वतंत्रता सामान्य इच्छा के प्रति समर्पण है|”
इस प्रकार रूसो ने स्वतंत्रता का सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है|
स्वतंत्रता का उपासक होने के कारण ही रूसो ने दास प्रथा की आलोचना की तथा स्वतंत्र राष्ट्रों को यह संदेश दिया कि “स्वतंत्रता प्राप्त की जा सकती है, परंतु दुबारा हस्तगत कभी नहीं की जा सकती|”
हॉब्स ने जीवन रक्षा और शांति के लिए मनुष्य के सारे अधिकार और स्वतंत्रताए लेवियाथन को सौंप दी तो इसकी आलोचना में रूसो ने कहा कि “शांति तो कारागृह में भी पाई जाती है, तो क्या वह रहने लायक जगह होती हैं?”
बाध्यकारिता द्वारा स्वतंत्रता का सिद्धांत-
रूसो का तर्क है कि समझौता एक खोखला फार्मूला नहीं है| यदि कोई व्यक्ति सामान्य इच्छा की आज्ञा मानने से मना करता है, तो उसको सामान्य इच्छा के पालन के लिए बाध्य किया जा सकता है| रूसो के मत में स्वतंत्रता सामान्य इच्छा का पालन करने में है, अतः व्यक्ति को स्वतंत्र होने के लिए बाध्य किया जा सकता है|
Social Contract पुस्तक की अंतिम पंक्ति है “मनुष्य को स्वतंत्र होने के लिए बाध्य किया जा सकता है|”
आरोपण द्वारा स्वतंत्रता का सिद्धांत-
रूसो के मत में स्वतंत्रता शक्ति या बल के द्वारा लोगों पर आरोपित की जा सकती है|
रूसो के मत में कानून तोड़ने वाले को फांसी दी जाती है, तो यह स्वतंत्रता है, न कि स्वतंत्रता को सीमित करती है|
एक सरकार जो सामान्य इच्छा पर आधारित है, एक व्यक्ति को मारकर भी उसे आजाद या स्वतंत्र कर सकती है|
स्वतंत्रता का विरोधाभास (Paradox of Freedom)-
रूसो ने अपनी पुस्तक सोशल कॉन्ट्रैक्ट में लिखा है कि मनुष्य को स्वतंत्र होने के लिए बाध्य किया जा सकता है|
रूसो के अनुसार स्वतंत्रता सामान्य इच्छा का पालन करने में है| अतः रूसो यहां निरंकुशतावादी बन जाता है| सेबाइन ने इसको स्वतंत्रता का विरोधाभास कहा है|
इसी सिद्धांत के कारण रूसो को फासीवाद का दार्शनिक पिता कहा जाता है|
समानता विषयक रूसो के विचार-
रूसो का मत है कि समानता के अभाव में स्वतंत्रता नहीं रह सकती है|
प्रकृति में सर्वत्र असमानता पाई जाती है, रूसो इस प्राकृतिक असमानता के बदले सामाजिक अनुबंध जनित नैतिक समानता की स्थापना करता है|
कानूनी दृष्टि से रूसो सभी को समान बनाता है| रूसो आर्थिक समानता की भी स्थापना करना चाहता है|
रूसो ने असमानता को दो भागों में बांटा है-
प्राकृतिक असमानता- प्रकृति प्रदत
परंपरागत असमानता या नैतिक असमानता- समाज द्वारा उत्पन्न, इस असमानता को दूर करने की मांग ही मानव करता है|
धर्म संबंधी विचार-
रूसो धर्म को राज्याधीन मानता है| रूसो ने धर्म के तीन प्रकार बताए हैं-
वैयक्तिक धर्म
नागरिक धर्म
पुरोहित धर्म
वैयक्तिक धर्म-
यह धर्म मनुष्य की अपनी संस्थाओं और अपने आंतरिक विश्वासों पर आधारित है|
यह धर्म सर्वश्रेष्ठ है, किंतु सांसारिक दृष्टि से अव्यावहारिक है|
वैयक्तिक धर्म ईश्वरीय नियमों पर आधारित आडंबरहीन सहज धर्म है|
नागरिक धर्म-
यह धर्म राष्ट्रीय तथा बाह्य है| यह धर्म संस्कारों, रूढ़ियों तथा विधियों पर आधारित है|
रूसो ने इस धर्म के पांच विधेयात्मक सूत्र बताए है-
ईश्वर की सत्ता में विश्वास करना और यह मानना कि वह परमज्ञानी, दूरदर्शी और दयालु है|
पुनर्जन्मवाद में विश्वास
पुण्यात्मा सुख पाएंगे
पापात्मा दंड भोगेगे
सामाजिक अनुबंध और विधियों की पवित्रता की रक्षा करना महत्वपूर्ण कर्तव्य है|
नागरिक धर्म का एक निषेधात्मक सूत्र है, वह है असहिष्णुता अर्थात असहिष्णु व्यक्ति का राज्य में कोई स्थान नहीं है|
रूसो के मत में नागरिक धर्म के विरुद्ध आचरण करने वाले व्यक्ति को मार देना चाहिए|
पुरोहित धर्म-
यह वह धर्म है, जो पुरोहित-पादरियों द्वारा दिया जाता है|
यह धर्म सबसे निकृष्ट है| जो दो तरह की सत्ताओ को जन्म देता है| राज्य में संघर्ष का वातावरण पैदा करता है तथा राज्य की प्रगति में बाधा पहुंचाता है|
शिक्षा संबंधी विचार-
रूसो के शिक्षा संबंधी विचार उसके ग्रंथ Emile में हैं|
इसमें शिक्षा का उद्देश्य ‘मनुष्य की निर्वासित प्रकृति की पुनर्स्थापना’ बतलाया गया है|
इस ग्रंथ के कारण रूसो को ‘प्रगतिवादी शिक्षा (Progressive Education)’ का जनक माना जाता है|
रूसो अपने समय की शिक्षा का विरोधी था|
बाल- शिक्षा को पादरियों के हाथों से निकाल लेना तथा किशोरावस्था तक धर्म शिक्षा का निषेध करने के कारण पादरी वर्ग रूसो से नाराज हो गया| Emile को अग्नि में जला दिया और फ्रांस की संसद तथा जेनेवा की सरकार ने रूसो की निंदा की|
तर्क के प्रति विद्रोह-
डिसकोर्सेज ऑन आर्ट एंड साइंस लेख में रूसो की तर्क के प्रति विद्रोह की भावना झलकती है|
यह लेख इतिहास की व्याख्या करता है|
कला व विज्ञान ने व्यक्ति का पतन किया है, क्योंकि इससे व्यक्ति विचारशील व तर्कशील होता है| तर्कशील व्यक्ति भ्रष्ट प्राणी होता है|
इसके संबंध में रूसो ने लिखा है कि “तर्कशील व विवेकशील मानव पतित दुराचारी पशु के समान होता है|”
रूसो ने लिखा है कि “विज्ञान एक निष्क्रिय उत्सुकता का परिणाम है, दर्शन शास्त्र केवल बौद्धिक आडंबर है तथा शिष्ट जीवन की सुख सुविधाएं चमकीले रंगीन फीते हैं|”
इसके संबंध में रूसो ने एथेंस व रोमन साम्राज्य का उदाहरण दिया है| एथेंस इसलिए बर्बाद हुआ, क्योंकि वहां शोभा, वैभव, संपत्ति, कला व विज्ञान की प्रचुरता थी| जब तक रोमन निर्धन व सीधे थे तब तक वे अन्य साम्राज्यो पर विजय प्राप्त कर रहे थे, लेकिन जैसे ही वैभव, विलासिता, धन आया रोमन साम्राज्य बर्बाद हो गया|
पुनर्जागरण काल में तर्क, विज्ञान, विवेक का जो विकास हुआ, रूसो उसे सरल मानव सभ्यता के लिए घातक बताया है|
इस प्रकार इस लेख में रूसो प्रबोधनकाल (Enlightenment) की समालोचना करता है|
स्त्री और परिवार संबंधी रूसो के विचार-
रूसो ने पितृसत्तात्मक परिवार का समर्थन किया है| परिवार प्राकृतिक प्रेम पर आधारित सबसे पुरानी संस्था थी, जिसका स्रोत प्रजनन था|
रूसो स्त्री को राजनीतिक व्यवस्था में विखंडनकारी शक्ति मानते थे| एक अच्छी स्त्री को सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा न लेकर परिवार में ही रहना चाहिए|
रूसो ने समाज में स्त्री को निम्नतर स्थान दिया है|
रूसो ने पुरुष और स्त्री के गुणों में अंतर किया है| पुरुष का गुण उसकी विचार बुद्धि होती है, जबकि स्त्री का गुण उसके स्त्रियोंचित गुण हैं| जैसे- चरित्र शुद्धता, कोमलता, आदेश पालन|
पुरुष को स्त्री पर शासन करना चाहिए, ताकि वह चरित्रवान बनी रहे|
रूसो के अनुसार स्त्री जीवन का यह रूप स्वयं प्रकृति और तर्क ने तय किया है|
रूसो अरस्तु के समान परिवार को समाज का प्रथम स्वरूप मानते थे|
महिलाओं की स्थिति के संदर्भ में रूसों ने एथेंस का उदाहरण देते हुए कहा कि “वहां स्त्रियां घर में रहकर पत्नी, माता और घर की संरक्षिका की भूमिका अदा करती थी|” जब यूनानी स्त्रियां विवाह करती थी तो सार्वजनिक जीवन से हट जाती थी और घर की चारदीवारी के अंदर वे स्वयं को परिवार की देखभाल में समर्पित कर लेती थी|”
उदारवादी नारीवादी मेरी वोलस्टोनक्राफ्ट ने अपनी कृति A Vindication of the Rights of women 1792 में रूसों के नारी संबंधी विचारों की आलोचना की है|
रूसो का मूल्यांकन
महत्व व राजनीति विज्ञान को देन-
G.D.H कोल ने रूसो को राजदर्शन का पिता कहा है और उसके सोशियल कॉन्ट्रैक्ट को राजदर्शन के ऊपर महानतम ग्रंथ बताया है|
वेपर “तर्क का उत्साही धर्मदूत, जिसने अविवेक के काल में राह प्रशस्त करने हेतु औरो से अधिक किया|”
स्ट्रास “रूसो राजनीतिक दर्शन में आधुनिकता की दूसरी लहर के प्रवर्तक हैं|”
रूसो के विचार का प्रभाव फ्रांस की क्रांति, अमेरिका की क्रांति, मानव अधिकारों की घोषणा में दिखता है|
नेपोलियन ने कहा है कि “यदि रूसो न हुआ होता तो फ्रांस में क्रांति भी नहीं होती|”
रूसो प्रथम विचारक है, जिसने प्रभुसत्ता का निवास मात्र जनता में बताया है| रूसो की प्रभुसत्ता की धारणा को ‘लोकप्रिय प्रभुसत्ता’ कहा जाता है|
रूसो को ‘प्रत्यक्ष लोकतंत्र’ का प्रणेता माना जाता है|
रूसो स्वतंत्रता पर बल देता है| हीगल के अनुसार “रूसो के ग्रंथों में स्वतंत्रता की बुद्धिपूर्वक अभिव्यक्ति हुई है|”
कोल के अनुसार “रूसो वास्तव में जर्मन व ब्रिटिश आदर्शवाद का अग्रदूत है|”
समुदायवाद’ के प्रणेता के रूप में-
सामान्य इच्छा सिद्धांत के कारण रूसो को ‘समुदायवाद’ का प्रणेता माना जाता है|
जहां हॉब्स व लॉक व्यक्तिवादी है, वहीं रूसो समुदायवादी है|
वाहन ने रूसो को सामूहिकतावादी कहा है तथा कार्ल पॉपर ने रूसो को रोमांटिक सामूहिकतावादी कहा है|
आधुनिक समाजवाद के आध्यात्मिक प्रणेता के रूप में-
रूसो व्यक्तिगत संपत्ति को गरीबी, शोषण व असमानता का मूल कारण मानते थे| इस अर्थ में वे आधुनिक समाजवाद के आध्यात्मिक प्रणेता थे|
पर रूसो ने संपत्ति का विरोध प्लेटो की तरह नैतिक आधार पर किया है, न कि मार्क्स की तरह आर्थिक शोषण के आधार पर|
रूसो समाजवादियों की तरह सामूहिक संपत्ति के भी समर्थक नहीं थे, उन्होंने संपत्ति के अधिकार को पवित्र अधिकार माना है|
आधुनिक राष्ट्रवाद के बौद्धिक पितामह के रूप में-
सामान्य इच्छा सिद्धांत व समुदायवाद पर बल देने के कारण रूसो को आधुनिक राष्ट्रवाद का बौद्धिक पितामह भी कहा जाता है|
रूडोल्फ रोकर के अनुसार रूसो संयुक्तकारी चरम राष्ट्रवाद का बौद्धिक पूर्वज है|
आलोचना-
सामान्य इच्छा सिद्धांत के कारण डयूगिट, टालमोन, अल्फ्रेड कोबान ने रूसो को आधुनिक निरंकुशवाद का संस्थापक कहते हैं|
डयूगिट “रूसो जैकोबियन निरकुंशतंत्र व सीजेरीयन तानाशाही का जनक है, जिसने कॉट व हीगल के निरपेक्ष सिद्धांतों को प्रेरित किया है|”
टालमोन (Talmon) ने अपनी कृति The origin of Totalitarian Democracy 1960 में लिखा है कि “रूसो बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिकारवाद का बौद्धिक अग्रदूत है|”
अल्फ्रेड कोबान “तानाशाही, सामान्य इच्छा के लोकतंत्रीय सिद्धांत का तार्किक एवं ऐतिहासिक परिणाम है|”
कॉन्स्टेंट ने रूसो को प्रत्येक प्रकार के अधिनायकवाद का सबसे भयानक मित्र कहा है|
लुसिओ कोलेटी ने अपनी पुस्तक From Rousseau to Lenin 1972 में लिखा है कि “रूसो का चिंतन पूंजीवाद व पूंजीवादी समाज का विवरण है|”
नीत्शे ने अपनी महामानव (Superman) की अवधारणा में महामानव को सामान्य इच्छा का प्रतिनिधि बताया है|
वाल्टेयर ने रूसो की आलोचना करते हुए कहा है कि “रूसो हमें चारों पैरों पर चलवाना चाहता है|”
रूसो से संबंधित कुछ तथ्य-
रूसो ने एक आदर्श राज्य की जनसंख्या 10000 बताई है|
जॉन्स के अनुसार मानव स्वभाव के संबंध में रूसो की धारणा प्लेटो और अरस्तू की धारणा से मेल खाती है|
पैटमेन के अनुसार रूसो कपटपूर्ण उदार सामाजिक अनुबंध का आलोचक है|
बर्क ने रूसो को राष्ट्रीय असेंबली का पागल सुकरात कहा है|
रूसो ने अपने लेख A Lasting Peace through the Federation of Europe 1974 में स्थाई शांति की स्थापना व युद्धों की रोकथाम के लिए यूरोपीय राष्टों को एक संघ के रूप में संगठित करने की सलाह दी थी|
सिबली का मत है कि रूसो को बहुआयामी राजनीतिक विविधताओ व अभिव्यक्तियों का पितामह कहा जा सकता है|”
रूसो की सामान्य इच्छा के उत्साह का महात्मा गांधी ने समर्थन किया है|
चैपमेन व रॉबर्ट देराथे रूसो को व्यक्तिवाद का महान चैंपियन बताते हैं|
हॉब्स, लॉक व रूसो के सामाजिक समझौते की तुलना-

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