बहुसंस्कृतिवाद (Multiculturalism) एक राजनीतिक एवं सामाजिक अवधारणा है, जिसके अंतर्गत एक ही राज्य या समाज में विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं, धर्मों, जातीय समूहों और राष्ट्रीय पहचानों के सह-अस्तित्व को स्वीकार किया जाता है|
बहुसंस्कृतिवाद का प्रमुख उद्देश्य-
सांस्कृतिक विविधता को मान्यता प्रदान करना,
अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा करना तथा
समान नागरिकता के साथ विभिन्न सांस्कृतिक पहचानों के विकास के लिए उचित परिस्थितियाँ उपलब्ध कराना है|
विश्व के अधिकांश देश आंतरिक तौर पर बहुल है| एक देश के अंदर विभिन्न धर्म, जातियां एवं संस्कृतिया विद्यमान है|
लोकतंत्र के दायरे में इतने लोगों से कैसे समान रूप से व्यवहार किया जा सकता है? यह प्रश्न बहुसंस्कृतिवाद करता है तथा उसका उत्तर देने का प्रयत्न करता है|
बहुसंस्कृतिवाद को सैलेड बाउल (salad bowl) संस्कृति, मौजेक संस्कृति, मेल्टिंग पॉट संस्कृति (Melting Pot culture) के नाम से भी जाना जाता है|
बहुसंस्कृतिवाद सामाजिक व सांस्कृतिक विविधता के साथ-साथ संस्थागत प्रारूप को भी प्रभावित करता है| उदाहरण-
नीदरलैण्ड, स्विट्जरलैण्ड व बेल्जियम में 'समवर्ती संघवाद' (Consociational Federalism) के रूप में,
उत्तरी आयरलैण्ड में 'पॉवर शेयरिंग' (Power Sharing) के रूप में,
बोस्निया-हर्जेगोविना में 'बहुस्तरीय शासन' (Multilevel Government) के रूप में बहुसंस्कृतिवाद लागू है|
बहुसंस्कृतिवाद का विकास-
लापोज़ के अनुसार बहुसंस्कृतिवाद शब्दावली सर्वप्रथम 1971 में कनाडा में प्रयुक्त हुई| उसके बाद 1978 में ऑस्ट्रेलिया में प्रयुक्त हुई|
ग्लेजर (Glazer) ने कहा कि 1980 के दशक में अमेरिका और ब्रिटेन में बहुसंस्कृतिवाद आया|
बहुसंस्कृतिवाद एक नवीन अवधारणा है, जो 1960 के दशक में अमेरिकी अश्वेत आंदोलन में उभरी तथा 1980 व 1990 के दशक में अपने चरम पर थी|
सर्वप्रथम विविधता के मुद्दे से निपटने के लिए कनाडा में बहुसंस्कृतिवाद अवधारणा का उपयोग किया गया|
1971 में कनाडा ने ‘द्विभाषी ढाँचे के भीतर बहुसंस्कृतिवाद’ को औपचारिक रूप से सार्वजनिक नीति के रूप में अपनाया|
बहुसंस्कृतिवाद अधिनियम (Multiculturalism Act) 1988-
कनाडा ने 1988 में ‘बहुसंस्कृतिवाद अधिनियम’ (Multiculturalism Act) बनाया|
यह अधिनियम कनाडाई समाज की सांस्कृतिक, भाषायी व नस्लीय विविधता को व्यक्त करता है| यह अधिनियम बहुसांस्कृतिक (फ्रेंच भाषी) की माँगों को पूरा करने के लिए बनाया गया था|
यह अधिनियम कनाडा को ‘विषम या असममित संघ’ (Asymmetrical Federation) बनाता है, जहाँ सभी प्रांतों की स्वायत्तता व अधिकारो में अंतर हैं|
ऑस्ट्रेलिया ने भी 1970 के दशक में खुद को औपचारिक रूप से बहुसांस्कृतिक देश घोषित कर दिया
बहुसंस्कृतिवाद की पहली व्यवस्थित विवेचना विल किमलिका (Will Kymlicka) ने 1989 में प्रकाशित अपनी पुस्तक Liberalism, Community and Culture (1989) में की|
ऐतिहासिक अवस्थाएं-
विल किमलिका ने बहुसंस्कृतिवाद के विकास को तीन ऐतिहासिक अवस्थाओं में विभक्त किया है-
बहुसंस्कृतिवाद समुदाय के रूप में
बहुसंस्कृतिवाद उदारवादी ढांचे के रूप में
बहुसंस्कृतिवाद राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के रूप में
बहुसंस्कृतिवाद समुदायवाद के रूप-
समुदायवादियों के अनुसार, बहुसंस्कृतिवाद वैयक्तिक स्वायत्तता के भ्रांतिपूर्ण प्रभावो से समुदायों की सुरक्षा करने एवं समुदाय का मूल्य प्रदर्शित करने का एक उचित तरीका है|
बहुसंस्कृतिवाद उदारवादी ढांचे के रूप में-
जोसेफ राज के अनुसार “व्यक्ति की स्वायत्तता उसकी अपनी संस्कृति से संबंधों, अन्यो द्वारा उनकी संस्कृति व समृद्धि को दिए जाने वाले सम्मान एवं समाज के वृहतर संदर्भ में उसकी संस्कृति की पहचान से सीधे जुड़ी हुई है|”
बहुसांस्कृतिकवाद राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया के रूप में-
उदारवादी राज्य ने राष्ट्र निर्माण के किसी न किसी बिंदु पर एक राष्ट्रीय संस्कृति को फैलाने का प्रयास किया है, जो समान अवसरों, विश्वास एवं एकात्मकता जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय लक्ष्यों में लाभदायक हो सके|
बहुसांस्कृतिकवाद का लक्ष्य-
प्रथम लक्ष्य अल्पसंख्यक सांस्कृतिक समुदायों के प्रति भेदभाव को न्यूनतम तथा गैर विभेदीकरण के आदर्श को प्रोत्साहित करना है|
दूसरा लक्ष्य सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण है|
संस्कृतियों का वर्गीकरण-
एकल संस्कृतिवाद (Monoculturalism)
गलन-पात्र संस्कृतिवाद (Melting-Pot Culturalism)
सलाद बाउल संस्कृतिवाद (Salad Bowl Culturalism)
एकल संस्कृतिवाद (Monoculturalism)-
हितलर के जर्मनी की संस्कृति
सिर्फ आर्य संस्कृति व नस्ल ही श्रेष्ठ है
गलन-पात्र संस्कृतिवाद (Melting-Pot Culturalism)-
यू.एस.ए. की संस्कृति
यहाँ बाहर से आए विभिन्न समूह अपनी सांस्कृतिक विशिष्टताओं को छोड़ अमेरिकी सामान्य संस्कृति के साथ एकाकार हो जाते हैं|
हॉरेस एम. कैलन (Horace M. Kallen) ने अपने लेख में Democracy Versus the Melting-Pot 1915 में अमेरिकी संस्कृति के आत्मसात्करण का विचार दिया|
आत्मसात्करण वह प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से आप्रवासी समुदाय ‘मेजबान’ समाज के मूल्यों, विश्वासों और जीवन-शैली को समायोजित करके अपनी सांस्कृतिक विविधता खो देते हैं|
सलाद बाउल संस्कृतिवाद (Salad Bowl Culturalism)-
पहचान खोए बिना जातीय बहुलता को बने रहना|
गलेजर ने सलाद बाउल को ‘शानदार मोज़ेक’ (Glorious Mosaic) कहता हैं|
बहुसंस्कृतिवाद की विशेषताएं-
विल किमलिका और भीखू पारेख ने बहुसंस्कृतिवाद की निम्न विशेषताएं बतायी है-
पहचान की राजनीति
मान्यता की राजनीति
प्रतिनिधित्व की राजनीति
बहुसंस्कृतिवाद के प्रमुख प्रकार-
एंड्र्यू हेवुड के अनुसार बहसंस्कृतिकवाद प्रकार-
उदार बहुसंस्कृतिवाद (Liberal Multiculturalism)
बहुलतावादी बहुसंस्कृतिवाद (Pluralist Multiculturalism)
सर्वदेशीय बहुसंस्कृतिवाद (Cosmopolitan Multiculturalism)
उदार बहुसंस्कृतिवाद (Liberal Multiculturalism)-
इस दृष्टिकोण के अनुसार कुछ सांस्कृतिक समूहों को कुछ विशेष अधिकार दिए जा सकते हैं, बशर्ते वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समान नागरिकता और उदार लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ संगत हों|
स्वतंत्रता व स्वायत्तता पर आधारित
सभी सांस्कृतिक समूहों द्वारा अपनी मान्यता, प्रथाएँ, जीने का तरीका चुनना
उदाहरण- फ्रांस का गणतांत्रिक बहुसंस्कृतिवाद
प्रमुख विचारक- विल किमलिका, पियरे ट्रूडो
बहुलतावादी बहुसंस्कृतिवाद (Pluralist Multiculturalism)-
प्रमुख विचारक- भिखु पारेख, इशाया बर्लिन
पारेख सांस्कृतिक विविधता को समझने के लिए केवल एक ही नैतिक या सांस्कृतिक दृष्टिकोण पर निर्भर रहने की आलोचना करते हैं|
बहुलतावादी बहुसंस्कृतिवाद समाज में मौजूद विभिन्न सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई समूहों के मूल्यों और पहचान की समानता की वकालत करती है|
सांस्कृतिक विविधता पर बल
मूल्य बहुलवाद पर आधारित
सर्वदेशीय बहुसंस्कृतिवाद (Cosmopolitan Multiculturalism)-
संवदेशीय बहुसंस्कृतिवाद सांस्कृतिक विविधता और पहचान की राजनीति का समर्थन करता है|
लेकिन उदार और बहुलवादी दोनों विचारों के विपरीत, उन्हें राजनीतिक संवेदनाओं और संक्रमणकालीन राज्यों के पुनर्निर्माण को प्राथमिकता देने के तौर पर देखता है|
प्रमुख विचारक- जेरेमी वाल्ड्रॉन
पीटर मैकलारेन (Peter McLaren) के अनुसार बहसंस्कृतिकवाद प्रकार-
पुस्तक- Critical Pedagogy and Predatory Culture: Oppositional Politics in a Postmodern 1995
बहुसंस्कृतिवाद के चार प्रकार-
रूढ़िवादी बहुसंस्कृतिवाद
उदार बहुसंस्कृतिवाद
उदार-वामपंथी बहुसंस्कृतिवाद
आलोचनात्मक (Critical)/ प्रतिरोधी बहुसंस्कृतिवाद
रूढ़िवादी बहुसंस्कृतिवाद (Conservative Multiculturalism)-
यह एक प्रमुख अथवा प्रभुत्वशाली संस्कृति की श्रेष्ठता पर बल देता है।
अल्पसंख्यक समुदायों से अपेक्षा की जाती है कि वे मुख्यधारा की संस्कृति के अनुरूप स्वयं को ढालें|
सांस्कृतिक वर्चस्व में विश्वास - यह सांस्कृतिक विविधता को स्वीकार करने के बजाय सांस्कृतिक समरूपीकरण एवं आत्मसातीकरण को प्राथमिकता देता है|
श्वेत वर्चस्व में विश्वास|
नस्लीय श्रेष्ठता को दर्शाता है|
उदार बहुसंस्कृतिवाद (Liberal Multiculturalism)-
यह सभी सांस्कृतिक समूहों की समानता और समान अवसरों पर बल देता है।
असमानता को मुख्यतः अवसरों की कमी से जोड़ता है|
सापेक्ष समानता कुछ सुधारों और संशोधनों के साथ प्राप्त की जा सकती है|
यह समान नागरिक अधिकारों का समर्थन करता है|
उदार-वामपंथी बहुसंस्कृतिवाद (Left-Liberal Multiculturalism)-
यह सांस्कृतिक समूहों के बीच भिन्नताओं और विशिष्ट पहचानों पर अधिक बल देता है|
प्रत्येक समुदाय की संस्कृति, अनुभव और पहचान को मान्यता देने का समर्थन करता है|
आलोचनात्मक (Critical)/ प्रतिरोधी बहुसंस्कृतिवाद (Critical Multiculturalism)-
पीटर मैकलारेन स्वयं इसी के समर्थक हैं|
यह मार्क्सवादी मानवतावाद से प्रभावित है|
इसका उद्देश्य केवल सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, दमनकारी संरचनाओं में परिवर्तन तथा मुक्ति को बढ़ावा देना है|
डेविड हॉलिंगर (David A. Hollinger) के अनुसार बहसंस्कृतिकवाद प्रकार-
पुस्तक- Postethnic America: Beyond Multiculturalism (1995)
डेविड हॉलिंगर ने बहुसंस्कृतिवाद के दो मॉडलों के बीच अंतर किया है-
बहुलतावादी मॉडल (Pluralist Model)
विश्वनागरिकतावादी मॉडल (Cosmopolitan Model)
बहुलतावादी मॉडल (Pluralist Model)-
इसका मुख्य जोर ‘समूहों के संरक्षण’ पर है, क्योंकि यह मानता है कि व्यक्ति की पहचान उसके जन्मजात समूह (जाति, नस्ल, धर्म) से संबंधित होती है|
जातीय एवं सांस्कृतिक समूहों की विशिष्ट पहचान को बनाए रखने पर बल देता है|
समूहों के अधिकारों और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण का समर्थन करता है|
विश्वनागरिकतावादी मॉडल (Cosmopolitan Model)-
यह व्यक्तिगत पसंद व सांस्कृतिक मिश्रण पर बल देता है|
यह समूह के घेरे को सुरक्षित रखने की बजाय सीमाओं को तोड़ने की बात करता है, अर्थात एक व्यक्ति कई संस्कृतियों का हिस्सा हो सकता है|
व्यक्ति को अपनी जातीय-सांस्कृतिक संबद्धता चुनने, बदलने या उसका महत्त्व कम करने की स्वतंत्रता देता है|
आयलेट शचर (Ayelet Shachar) के अनुसार बहसंस्कृतिकवाद प्रकार-
पुस्तक- Multicultural Jurisdictions: Cultural Differences and Women's Rights (2001)
शोध-पत्र- On Citizenship and Multicultural Vulnerability 2000
आयलेट शचर ने दो प्रकार बताये है-
प्रबल बहुसंस्कृतिवाद (Strong Multiculturalism)
कमजोर बहुसंस्कृतिवाद (Weak Multiculturalism)
प्रबल बहुसंस्कृतिवाद (Strong Multiculturalism)-
इसमें समूह की पहचान और सामूहिक अधिकारों को प्राथमिकता दी जाती है|
मुख्य चिंता विभिन्न सांस्कृतिक समूहों के बीच होने वाला अन्याय है|
इसकी संभावित समस्या यह है कि समूह की संस्कृति के संरक्षण के नाम पर महिलाओं एवं कमजोर सदस्यों के व्यक्तिगत अधिकार प्रभावित हो सकते है|
कमजोर बहुसंस्कृतिवाद (Weak Multiculturalism)-
इसमें समूह के भीतर मौजूद जटिलताओं और असमानताओं पर ध्यान दिया जाता है|
व्यक्तिगत अधिकारों तथा सामूहिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने पर बल दिया जाता है।
सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करते हुए समूह के सदस्यों की स्वतंत्रता एवं समानता की रक्षा करना इसका महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है|
बहुसंस्कृतिवादी असुरक्षा का विरोधाभास (Paradox of Multicultural Vulnerability)-
आयलेट शचर की अवधारणा
शचर के अनुसार, अल्पसंख्यक संस्कृति को संरक्षण देने वाली राज्य की नीतियाँ कभी-कभी उसी समूह के कमजोर सदस्यों, विशेषकर महिलाओं, के अधिकारों को नुकसान पहुँचा सकती हैं|
रॉबर्ट ई. गुडिन (Robert E. Goodin) के अनुसार बहसंस्कृतिकवाद प्रकार-
प्रमुख लेख- Liberal Multiculturalism: Protective and Polyglot (2006)
रॉबर्ट ई. गुडिन ने अपने लेख में उदार बहुसंस्कृतिवाद (Liberal Multiculturalism) के दो मॉडल प्रस्तुत किए हैं-
संरक्षणात्मक बहुसंस्कृतिवाद (Protective Multiculturalism)
बहुभाषिक/ बहुसांस्कृतिक आदान-प्रदान वाला बहुसंस्कृतिवाद (Polyglot Multiculturalism)
संरक्षणात्मक बहुसंस्कृतिवाद (Protective Multiculturalism)-
इसका उद्देश्य अल्पसंख्यक संस्कृतियों को बहुसंख्यक संस्कृति के दबाव से सुरक्षित रखना है|
यह सांस्कृतिक आत्मसातीकरण (Assimilation) और सांस्कृतिक समरूपीकरण (Homogenization) का विरोध करता है|
अल्पसंख्यक समूहों के अधिकारों एवं सांस्कृतिक विशिष्टताओं के संरक्षण पर बल देता है|
बहुभाषिक/ बहुसांस्कृतिक आदान-प्रदान वाला बहुसंस्कृतिवाद (Polyglot Multiculturalism)-
इसका उद्देश्य विभिन्न संस्कृतियों के बीच आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना है|
बहुसंख्यक संस्कृति भी अल्पसंख्यक संस्कृतियों से सीख सकती है तथा उनके रीति-रिवाजों, विचारों और जीवन-शैलियों को अपना सकती है|
यह व्यक्ति के चयन के अवसरों (Context for Choice) का विस्तार करता है|
बहुसंस्कृतिवाद के प्रमुख विचारक-
आइज़ाया बर्लिन (Isaiah Berlin)-
पुस्तक-
Two Concepts of Liberty (1958)
Four Essay on liberty 1969
Two Concepts of Liberty (1958) में स्वतंत्रता के दो रूप बताए- नकारात्मक स्वतंत्रता एवं सकारात्मक स्वतंत्रता
मूल्य बहुलवाद (Value Pluralism)-
आइज़ाया बर्लिन की अवधारणा
बर्लिन के अनुसार, मानव जीवन में अनेक वास्तविक मूल्य होते हैं, जो कभी-कभी एक-दूसरे के साथ संघर्ष कर सकते हैं| जैसे- स्वतंत्रता और समानता के बीच संघर्ष, न्याय और दया के बीच संघर्ष
सभी मूल्यों को किसी एक सार्वभौमिक सिद्धांत के अंतर्गत समाहित करना संभव नहीं है|
एडवर्ड सईद (Edward Said)-
प्रमुख पुस्तकें-
Orientalism (1978)
Culture and Imperialism (1993)
प्राच्यवाद (Orientalism)-
एडवर्ड डब्ल्यू. सईद की अवधारणा
सईद की प्रसिद्ध पुस्तक Orientalism (1978) का केंद्रीय विचार है कि पश्चिमी विद्वत्ता, साहित्य और सांस्कृतिक विमर्श में पूर्वी समाजों का चित्रण अक्सर पश्चिमी सत्ता एवं औपनिवेशिक दृष्टिकोण से प्रभावित रहा है|
यूरोप-केंद्रित (Eurocentrism) दृष्टिकोण व पश्चिम प्रभुत्व की आलोचना-
सईद पश्चिमी संस्कृति को सार्वभौमिक मानक और गैर-पश्चिमी संस्कृतियों को उससे कमतर मानने वाली धारणाओं की आलोचना करते है|
अन्य विचार- सांस्कृतिक विविधता की मान्यता, सांस्कृतिक वर्चस्व की आलोचना, हाशिए के समुदायों की आवाज
चार्ल्स टेलर (Charles Taylor)-
प्रमुख पुस्तक- Multiculturalism and “The Politics of Recognition” (1992)
निबंध- The Politics of Recognition
मान्यता की राजनीति (Politics of Recognition)-
चार्ल्स टेलर मुख्य अवधारणा
इसके अनुसार, व्यक्ति और समुदाय अपनी पहचान केवल स्वयं नहीं बनाते, बल्कि दूसरे लोगों, समाज और संस्थाओं के साथ संवाद के माध्यम से भी अपनी पहचान विकसित करते हैं|
इसलिए किसी व्यक्ति या समुदाय की पहचान को सम्मानपूर्वक स्वीकार करना उसकी गरिमा और आत्म-पहचान के लिए आवश्यक है|
मान्यता की राजनीति के दो प्रमुख रूप- चार्ल्स टेलर ने मान्यता की राजनीति के दो प्रमुख रूपों में अंतर किया है-
समान गरिमा की राजनीति (Politics of Equal Dignity)- सभी मनुष्यों की समान गरिमा को स्वीकार करना
भिन्नता की राजनीति (Politics of Difference)- प्रत्येक व्यक्ति और समुदाय की विशिष्ट पहचान को मान्यता देना
भीखू पारेख (Bhikhu Parekh)-
प्रमुख पुस्तक- Rethinking Multiculturalism: Cultural Diversity and Political Theory (2000)
मुख्य अवधारणा- सांस्कृतिक बहुलवाद (Cultural Pluralism), अंतर-सांस्कृतिक संवाद (Intercultural Dialogue) या संवाद आधारित बहुसंस्कृतिवाद (Dialogue Based Multiculturalism)
सांस्कृतिक विविधता के तीन रूप-
पारेख ने आधुनिक समाजों में सांस्कृतिक विविधता के तीन प्रमुख रूपों पर चर्चा की है-
उपसंस्कृतिगत विविधता (Subcultural Diversity)- जब किसी समाज की व्यापक संस्कृति के भीतर कुछ समूह अपनी विशिष्ट जीवन-शैली, रुचियों या सामाजिक प्रथाओं के आधार पर अलग पहचान रखते हैं|
परिप्रेक्ष्यगत विविधता (Perspectival Diversity)- जब समाज के कुछ सदस्य प्रचलित संस्कृति के मूल्यों और मान्यताओं की आलोचना करते हैं तथा उन्हें बदलने की माँग करते हैं| जैसे- पितृसत्तात्मक सामाजिक मान्यताओं की नारीवादी आलोचना
सामुदायिक विविधता (Communal Diversity)- जब एक ही राजनीतिक समाज में अलग-अलग सांस्कृतिक समुदाय अपनी विशिष्ट भाषा, धर्म, इतिहास और परंपराओं के साथ मौजूद रहते हैं|
बहुसंस्कृतिवाद के पाँच मॉडल-
पारेख ने बहुसंस्कृतिवाद के पाँच मॉडल बताए हैं-
पृथकतावादी बहुसंस्कृतिवाद (Isolationist)- समुदाय अपनी संस्कृति को सुरक्षित रखते हुए अन्य समुदायों से सीमित संपर्क करता है|
समायोजनवादी बहुसंस्कृतिवाद (Accommodative)- व्यापक समाज अल्पसंख्यक समुदायों की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार समायोजन करता है|
स्वायत्ततावादी बहुसंस्कृतिवाद (Autonomous)- सांस्कृतिक समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान और जीवन-पद्धति बनाए रखने की स्वतंत्रता चाहता है|
अंतःक्रियात्मक बहुसंस्कृतिवाद (Interactive)- विभिन्न संस्कृतियाँ संवाद, आलोचना और परस्पर सीखने के माध्यम से एक-दूसरे को समृद्ध करती हैं|
विश्वनागरिकतावादी बहुसंस्कृतिवाद (Cosmopolitan)- विभिन्न संस्कृतियों के विचारों एवं प्रथाओं को अपनाने के लिए अधिक खुलापन रहता है|
अंतर-सांस्कृतिक संवाद (Intercultural Dialogue) या संवाद आधारित बहुसंस्कृतिवाद (Dialogue Based Multiculturalism)
पारेख के विचारों का केंद्रीय तत्त्व है कि विभिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद होना चाहिए|
कोई भी संस्कृति मानवीय ज्ञान और नैतिकता पर अंतिम अधिकार नहीं रखती है|
प्रत्येक संस्कृति में कुछ मूल्यवान अंतर्दृष्टियाँ और कुछ सीमाएँ होती हैं|
अत: संस्कृतियों को एक-दूसरे की आलोचना सुनने और उनसे सीखने के लिए तैयार रहना चाहिए|
जेम्स टुल्ली (James Tully)-
पुस्तक- Strange Multiplicity: Constitutionalism in an Age of Diversity (1995)
मुख्य अवधारणा- सांस्कृतिक विविधता की संवैधानिक मान्यता (Constitutional Recognition of Cultural Diversity)
विविधताओं की जटिल बहुलता (Strange Multiplicity)-
यह टुल्ली की प्रमुख पुस्तक का शीर्षक है|
आधुनिक समाजों में अनेक सांस्कृतिक, भाषायी, जातीय और राजनीतिक पहचानों का सह-अस्तित्व होता है|
इन सभी पहचानों को किसी एक राष्ट्रीय या सांस्कृतिक पहचान में समाहित करना आवश्यक नहीं है|
समाज की एकता किसी एक जैसी संस्कृति पर नहीं, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच सहमति और सहयोग पर आधारित हो सकती है|
बहुसांस्कृतिक संविधानवाद के प्रणेता-
टुल्ली के अनुसार संविधान एक निश्चित या अंतिम सत्य दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह निरंतर अंतर सांस्कृतिक संवाद (Intercultural Dialogue) से बनने वाला व बदलने वाला दस्तावेज है|
सांस्कृतिक विविधता की संवैधानिक मान्यता (Constitutional Recognition of Cultural Diversity)-
सांस्कृतिक मान्यता के तीन संवैधानिक सिद्धांत
पारस्परिक मान्यता (Mutual Recognition)- विभिन्न सांस्कृतिक समुदायों को एक-दूसरे की पहचान और विशिष्टताओं को स्वीकार करना चाहिए|
सहमति (Consent)- संवैधानिक व्यवस्थाएँ विभिन्न समुदायों के संवाद और सहमति से विकसित होनी चाहिए|
सांस्कृतिक निरंतरता (Cultural Continuity)- समुदायों को अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और पहचानों को बनाए रखने का अवसर मिलना चाहिए|
आधुनिक संवैधानिकतावाद की आलोचना-
टुल्ली आधुनिक पश्चिमी संवैधानिकतावाद की उस प्रवृत्ति की आलोचना करते हैं, जिसमें एक राष्ट्र, एक समान राजनीतिक पहचान और एकरूप कानूनी व्यवस्था को आदर्श माना जाता है
उनके अनुसार, ऐसी व्यवस्था सांस्कृतिक विविधता को आत्मसात करने या हाशिये पर रखने का दबाव पैदा कर सकती है|
इसके स्थान पर वे ऐसे संवैधानिकतावाद का समर्थन करते हैं, जो विविध समुदायों के बीच निरंतर बातचीत और समझौते के लिए जगह बनाए|
जेरेमी वाल्ड्रॉन (Jeremy Waldron)-
प्रमुख लेख- Minority Cultures and the Cosmopolitan Alternative (1992)
प्रमुख विचार- विश्वनागरिकतावाद (Cosmopolitanism)
विश्वनागरिकतावाद (Cosmopolitanism)-
जेरेमी वाल्ड्रॉन बहुसंस्कृतिवाद की उस धारणा की आलोचनात्मक समीक्षा करते हैं, जिसमें यह माना जाता है कि किसी व्यक्ति की पहचान और स्वतंत्रता के लिए उसे एक विशिष्ट, स्थिर एवं सीमाबद्ध संस्कृति से जुड़ा रहना आवश्यक है|
जेरेमी वाल्ड्रॉन के अनुसार व्यक्ति अनेक संस्कृतियों से विचार, मूल्य और जीवन-पद्धतियाँ ग्रहण कर सकता है|
सांस्कृतिक मिश्रण (Cultural Mélange)-
जेरेमी वाल्ड्रॉन के अनुसार संस्कृतियाँ एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं रहतीं, वे निरंतर संपर्क और आदान-प्रदान से बदलती हैं|
व्यक्ति एक ही समय में अनेक सांस्कृतिक परंपराओं से प्रभावित हो सकता है|
आइरिस मैरियन यंग (Iris Marion Young)-
प्रमुख लेख- Polity and Group Difference: A Critique of the Ideal of Universal Citizenship (1989)
पुस्तक- Justice and Politics Difference 1990
मुख्य अवधारणा- समूहगत भिन्नता और विभेदित नागरिकता (Differentiated Citizenship)
विभेदित नागरिकता (Differentiated Citizenship)-
यंग के अनुसार, केवल औपचारिक समानता स्थापित कर देना वास्तविक समानता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं है|
समाज में महिलाओं, जातीय अल्पसंख्यकों और अन्य वंचित समूहों को संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है|
इसलिए कुछ परिस्थितियों में समूह-विशिष्ट अधिकारों और प्रतिनिधित्व की आवश्यकता हो सकती है|
दमन या उत्पीड़न (Oppression) के पाँच रूप-
यंग ने Justice and the Politics of Difference (1990) में उत्पीड़न (Oppression) के पाँच प्रमुख रूपों की पहचान की-
शोषण (Exploitation)
हाशियाकरण (Marginalization)
शक्तिहीनता (Powerlessness)
सांस्कृतिक साम्राज्यवाद (Cultural Imperialism)
हिंसा (Violence)
विल किमलिका (Will Kymlicka)-
प्रमुख पुस्तक- Multicultural Citizenship: A Liberal Theory of Minority Rights (1995)
मुख्य अवधारणा- उदार बहुसंस्कृतिवाद (Liberal Multiculturalism)
प्रमुख योगदान- अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों को उदार लोकतंत्र एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ संगत सिद्ध करना
बहुसंस्कृति शब्द का प्रयोग विल किमलिका एक छतरी की तरह करते हैं और कहते हैं कि इसी अर्थ में कुछ बहुसंस्कृतिवादियो ने बहुसंस्कृतिवाद का एक सामान्य सिद्धांत विकसित करने का प्रयास किया है|
किमलिका कनाडाई अनुभव को यूरोपीय अनुभवो की दृष्टि से देखने की आलोचना करते हैं| इसका अर्थ यह है कि बहुसंस्कृतिवाद के अनेक देशज प्रतिमान होते हैं|
अल्पसंख्यक अधिकारों के तीन प्रकार-
किमलिका ने Multicultural Citizenship में समूह-विभेदित अधिकारों (Group-Differentiated Rights) के तीन प्रमुख प्रकार बताए हैं-
स्वशासन के अधिकार (Self-Government Rights)- राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों को अपने आंतरिक मामलों में स्वशासन का अधिकार
बहुजातीय अधिकार (Polyethnic Rights)- प्रवासी एवं जातीय-धार्मिक अल्पसंख्यकों की विशिष्ट सांस्कृतिक और धार्मिक प्रथाओं को मान्यता देना
विशेष प्रतिनिधित्व अधिकार (Special Representation Rights)- राजनीतिक संस्थाओं में अल्पसंख्यक समूहों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करना
बाह्य संरक्षण बनाम आंतरिक प्रतिबंध-
बाह्य संरक्षण (External Protections)- ऐसे अधिकार जो अल्पसंख्यक समुदाय को बहुसंख्यक समाज के दबाव या निर्णयों से बचाते हैं|
आंतरिक प्रतिबंध (Internal Restrictions)- ऐसे प्रतिबंध जिनके माध्यम से कोई समूह अपनी ही सदस्यता रखने वाले व्यक्तियों की स्वतंत्रता सीमित करता है|
किमलिका बाह्य संरक्षण को उदार बहुसंस्कृतिवाद के अनुकूल मानते हैं| इसके विपरीत, वे ऐसे आंतरिक प्रतिबंधों को अस्वीकार करते हैं, जो समुदाय के सदस्यों की स्वतंत्रता और समानता का उल्लंघन करते हैं|
बहुसंस्कृतिवाद के पाँच मॉडल-
किमलिका ने बहुसंस्कृतिवाद के पाँच मॉडल बताये है-
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक (National Minorities) मॉडल-
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक के दो प्रकार- 1. उप-राज्यीय राष्ट्र (Sub-state Nations) और 2. मूलनिवासी समुदाय (Indigenous Peoples)
इनकी प्रमुख माँगें- स्वशासन, क्षेत्रीय स्वायत्तता और सांस्कृतिक संरक्षण
उदाहरण- कनाडा में क्यूबेक की फ्रांसीसी भाषायी पहचान
आप्रवासी समूह (Immigrant Groups) मॉडल-
ऐसे समूह जो दूसरे देश से आकर किसी नए देश में बसते हैं|
ये व्यापक समाज में भागीदारी करते हुए अपनी भाषा, धार्मिक प्रथाओं और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना चाहते हैं|
इनकी प्रमुख माँगें- बहुजातीय अधिकार (Polyethnic Rights) और उचित सांस्कृतिक समायोजन
पृथकतावादी जातीय-धार्मिक समूह (Isolationist Ethnic-Religious Groups) मॉडल-
ऐसे समूह जो अपनी धार्मिक या सांस्कृतिक विशिष्टता बनाए रखने के लिए व्यापक समाज से सीमित संपर्क रखना चाहते हैं|
इनकी प्रमुख माँगें- सांस्कृतिक स्वतंत्रता और समुदाय के सदस्यों के व्यक्तिगत अधिकारों के बीच संतुलन
मेटिक्स (Metics) मॉडल-
इस वर्ग में ऐसे गैर-नागरिक या अस्थायी प्रवासी शामिल हो सकते हैं, जिन्हें देश में रहने या काम करने की अनुमति है, लेकिन पूर्ण नागरिकता प्राप्त नहीं है|
इनकी प्रमुख माँगें- कानूनी स्थिति, श्रम अधिकार, सामाजिक सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी
अफ्रीकी-अमेरिकी (African Americans) मॉडल-
यह समूह ऐतिहासिक नस्लीय भेदभाव, दासता की विरासत और संरचनात्मक असमानताओं का शिकार रहा है|
इसकी प्रमुख समस्याएँ- नस्लीय भेदभाव, समान अवसर, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय
इनकी प्रमुख माँगें- ऐतिहासिक अन्याय और संरचनात्मक असमानताओं को दूर करना
चंद्रन कुकथास (Chandran Kukathas)-
प्रमुख पुस्तक- The Liberal Archipelago: A Theory of Diversity and Freedom (2003)
मुख्य अवधारणा- उदार द्वीपसमूह (Liberal Archipelago)
मुख सिद्धांत- संघ बनाने की स्वतंत्रता (Freedom of Association), अंतःकरण की स्वतंत्रता (Liberty of Conscience) और सहिष्णुता (Toleration)
उदार द्वीपसमूह (Liberal Archipelago)-
कुकथास के अनुसार, एक स्वतंत्र समाज द्वीपसमूह की तरह हो, जिसमें अनेक सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक समुदाय मौजूद हों तथा जहा राज्य का हस्तक्षेप बहुत कम होता है|
जोसेफ राज (Joseph Raz)-
पुस्तक- The Morality of Freedom 1986, Ethics in the Public Domain 1994
मुख्य अवधारणा- नैतिक बहुलवाद (Moral Pluralism)
बहुसंस्कृतिवाद का उदारवादी आधार-
जोसेफ राज नैतिक बहुलवाद के आधार पर सांस्कृतिक पहचान की राज्य द्वारा सुरक्षा पर बल देते हैं|
जोसेफ राज गैर उदार राज्यों का विरोध करता है, क्योंकि यह समूह संस्कृतियों को मान्यता नहीं देता है|
व्यक्तिगत स्वायत्तता (Individual Autonomy) पर बल-
उनके अनुसार, व्यक्ति को स्वतंत्र जीवन जीने के लिए केवल बाहरी हस्तक्षेप से मुक्ति पर्याप्त नहीं है, उसके पास सार्थक विकल्प भी होने चाहिए|
सांस्कृतिक बहुलवाद (Cultural Pluralism)-
राज के अनुसार, समाज में केवल बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक ही नहीं होते, बल्कि समाज में अनेक सांस्कृतिक समूह होते हैं, जिनकी अपनी पहचान, परंपराएँ और जीवन-पद्धतियाँ होती हैं|
सभी संस्कृतियों को एक ही जीवन-पद्धति अपनाने के लिए बाध्य करना आवश्यक नहीं है|
सांस्कृतिक समूहों की पहचान और समृद्धि का सम्मान करना चाहिए|
ब्रायन बैरी (Brian Barry)-
पुस्तक- Culture and Equality: An Egalitarian Critique of Multiculturalism 2000
मुख्य दृष्टिकोण- समतावादी उदारवाद (Egalitarian Liberalism)
बहुसंस्कृतिवाद की आलोचना-
बैरी ने बहुसंस्कृतिवाद की आलोचना की है|
सांस्कृतिक विविधता का सम्मान आवश्यक है, लेकिन न्याय और समानता के लिए सभी नागरिकों पर समान सार्वजनिक नियम लागू होना भी महत्त्वपूर्ण है|
बैरी के अनुसार, सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों की समस्याओं का समाधान हमेशा विशेष समूहगत अधिकार प्रदान करना नहीं है| कई बार समान नागरिक अधिकारों, निष्पक्ष कानूनों और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को दूर करने वाली नीतियों से बेहतर समाधान प्राप्त हो सकता है|
उत्तर-आधुनिकतावाद (Postmodernism) 20वीं सदी के उत्तरार्ध 1970 और 1980 के दशक में उभरा एक बौद्धिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक आंदोलन है|
उत्तर-आधुनिकतावाद ज्ञानोदय (Enlightenment), आधुनिकता (Modernity), वस्तुनिष्ठ सत्य (Objective Truth) और सार्वभौमिक राजनीतिक सिद्धांतों के विरुद्ध एक व्यवस्थित प्रतिक्रिया प्रस्तुत करता है|
यह आंदोलन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के निराशावाद, शीत युद्ध के दौर और आधुनिक ज्ञानोदय परियोजनाओं (तर्कवाद, विज्ञानवाद, प्रगति के दावे) के विफल होने के अनुभव से पैदा हुआ|
जहां आधुनिकतावाद मानता था कि मानव बुद्धि, विज्ञान और सार्वभौमिक सिद्धांतों (जैसे लोकतंत्र, समाजवाद, राष्ट्र-राज्य) के माध्यम से एक आदर्श समाज की रचना संभव है| उत्तर-आधुनिकतावाद इस दावे को खारिज करता है|
उत्तर-आधुनिकतावाद के अनुसार कोई एक परम सत्य या सार्वभौमिक वास्तविकता नहीं होती| जो भी हम 'सत्य' या 'तथ्य' के रूप में जानते हैं, वह भाषा, शक्ति-संबंधों और ऐतिहासिक संदर्भों द्वारा निर्मित (Constructed) होता है|
उत्तर आधुनिकतावाद आधुनिकतावाद के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया है| आधुनिकतावाद आंग्ल अमेरिकी है, वही उत्तर आधुनिकतावाद महाद्वीपीय यूरोपीय है और विशेषकर फ्रांसीसी दार्शनिकों की देन है|
उत्तर-आधुनिकता के दार्शनिक स्रोत 18वीं शताब्दी में खोजे जा सकते हैं| उस समय भी कुछ विचारक थे, जिन्होंने ज्ञानोदय युग की विचारधाराओं का विरोध किया था|
उसमें प्रमुख जोहान जॉर्ज हैमन (1730–1788) तथा उनके शिष्य जोहान गॉटफ्रीड हर्डर (1744–1803) हैं|
इन्होंने प्रति-विवेकवाद तथा रोमांटिसिज्म की स्थापना की थी| इन्होंने 19वीं शताब्दी के कई विचारकों जैसे- सोरेन क्रीकगार्ड, (नीत्शे) एवं शोपेनहावर के विचारों को प्रभावित किया|
ज्ञानोदय के कट्टर आलोचक आर्थर शोपेनहावर (1788–1860) ने अपनी पुस्तक The World as Will and Representation (1880) में इस शास्त्रीय विश्वास को व्यक्त किया कि मानवीय मस्तिष्क वास्तविकता के परे भी जा सकता है और वास्तविकता के आधार को समझ सकता है|
शोपेनहावर के शिष्य नीत्शे ने उनके विचारों को आगे बढ़ाया और आधुनिकता की समस्याओं को उजागर किया| इसलिए उनके विचारों को शून्यवाद (Nihilism) का दर्शन माना जाता है, जिसमें मूल्य, अर्थ और इच्छाओं की पूर्ण समाप्ति की बात की जाती है|
नीत्शे ने अपनी पुस्तक The Birth of Tragedy में लिखा है कि वास्तविकता द्वैत है- एक तो वह जो दिखती है और एक वह जो वास्तविक है|
उत्तर-आधुनिकता शब्दावली का प्रथम बार प्रयोग इतिहासकार अर्नाल्ड टॉयनबी ने 1920 में ब्रिटेन के संदर्भ में किया था| अर्नाल्ड टॉयनबी ने इसका प्रयोग 19वीं सदी के अंतिम वर्षों के लिए (1875 के बाद) किया, जब पूँजीवाद, साम्राज्यवाद व पाश्चात्य सभ्यता ढलान पर थी|
1979 में जीन फ्रांसिस्को ल्योतार्द ने Postmodern Condition: Report on Knowledge पुस्तक लिखी, जिसमें इस अवधारणा का व्यापक विवेचन किया गया|
उत्तर-आधुनिकतावाद की प्रमुख विशेषताएं-
वृहद आख्यानों का विरोध (Rejection of Meta-narratives)-
ज्यां-फ्रांस्वा ल्योतार्द के अनुसार, उत्तर-आधुनिकतावाद उदारवाद, मार्क्सवाद, राष्ट्रवाद या ईसाई धर्म जैसे सभी सार्वभौमिक मुक्तिवादी आख्यानों (Grand Narratives) के प्रति अविश्वास है|
शक्ति और ज्ञान का अंतर्संबंध (Power-Knowledge Nexus)-
मिशेल फूको का तर्क है कि 'ज्ञान' तटस्थ या वस्तुनिष्ठ नहीं होता| ज्ञान का निर्माण शक्ति द्वारा होता है, और ज्ञान स्वयं शक्ति का प्रयोग करने का उपकरण बनता है|
विखंडनवाद (Deconstruction)-
जैक्स डेरिडा के अनुसार किसी भी पाठ (Text) का कोई एकल या निश्चित अर्थ नहीं होता| प्रत्येक पाठ में अंतर्विरोध छिपे होते हैं, जिन्हें विखंडन की विधि से उजागर किया जाता है|
बहुलतावाद और विखंडन (Pluralism and Fragmentation)-
यह सार्वभौमिक पहचानों (जैसे 'मानव', 'सर्वहारा', 'नागरिक') के बजाय हाशिए पर मौजूद अस्मिताओं, स्थानीय संदर्भों और विविधताओं को मान्यता देता है|
सार्वभौमिक नैतिकता का अभाव-
यह किसी सार्वभौमिक न्याय, अधिकार या प्राकृतिक कानून को नहीं मानता, इसके अनुसार न्याय और नैतिकता संदर्भ-सापेक्ष (Contextual) होते हैं|
प्रमुख उत्तर-आधुनिकतावादी विचारक
ज्याँ बॉद्रिलार्ड, ज्यां-फ्रांस्वा ल्योतार्द, जैक्स डेरिडा, मिशेल फूको, फ्रेडरिक जेमसन, पियरे बोरदियू, जेड बोमन, गिली डेल्यूज, ल्यूस इरिगरे
नारीवादी उत्तर-आधुनिकतावादी- नैन्सी फ्रेजर, लिंडा निकोलसन
ज्याँ बॉद्रिलार्ड-
ज्याँ बॉद्रिलार्ड (1929–2007) फ्रांसीसी समाजशास्त्री, दार्शनिक एवं उत्तर-आधुनिकतावादी चिंतक थे|
प्रमुख पुस्तके-
Symbolic Exchange and Death 1976
Simulacra and Simulation 1981
बॉद्रिलार्ड की उत्तर-आधुनिकतावाद की प्रमुख अवधारणाएँ-
उपभोक्तावादी समाज (Consumer Society)-
बॉद्रिलार्ड की पुस्तक The Consumer Society (1970) में आधुनिक उपभोक्तावादी समाज का विश्लेषण मिलता है|
उनके अनुसार, आधुनिक पूँजीवादी समाज में उपभोग केवल आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन नहीं है, बल्कि यह सामाजिक प्रतिष्ठा, पहचान और जीवनशैली को व्यक्त करने का माध्यम भी बन गया है|
उदाहरण के लिए- कोई व्यक्ति मोबाइल फोन केवल बातचीत के लिए नहीं खरीदता, बल्कि ब्रांड, प्रतिष्ठा और सामाजिक पहचान के लिए भी खरीदता है|
संकेत-मूल्य (Sign Value)-
बॉद्रिलार्ड ने वस्तुओं के मूल्य को समझने के लिए संकेत-मूल्य (Sign Value) की अवधारणा दी है|
वस्तु का मूल्य केवल उसके उपयोग-मूल्य (Use Value) और विनिमय-मूल्य (Exchange Value) से नहीं समझा जा सकता| वह किस प्रतिष्ठा, वर्ग, पहचान या जीवनशैली का संकेत देती है, यह भी महत्त्वपूर्ण है|
उदाहरण के लिए- दो घड़ियाँ समय बताने का समान कार्य करती हैं, लेकिन महँगी ब्रांडेड घड़ी सामाजिक प्रतिष्ठा का संकेत भी होती है|
अनुकरण (Simulation)-
बॉद्रिलार्ड के अनुसार, उत्तर-आधुनिक समाज में लोग वास्तविकता के बजाय निर्मित छवि का अनुकरण करते है|
उदाहरण के लिए- सोशल मीडिया पर व्यक्ति की संपादित छवि और जीवनशैली को देखकर लोग उसके वास्तविक जीवन के बजाय निर्मित छवि को वास्तविक मान सकते हैं|
प्रतिरूप या सिमुलाक्रा (Simulacra)-
बॉद्रिलार्ड के चिंतन में इसका अर्थ ऐसे प्रतिरूपों या संकेतात्मक प्रतियों से है, जो वास्तविकता की जगह लेने लगते हैं|
उदाहरण के लिए- किसी पर्यटन स्थल की विज्ञापन-छवि इतनी आदर्श रूप में प्रस्तुत की जाए कि लोग वास्तविक स्थान की तुलना में उसी निर्मित छवि को अधिक महत्त्व देने लगें|
अतियथार्थ (Hyperreality)-
बॉद्रिलार्ड की सबसे प्रसिद्ध अवधारणा
अतियथार्थ ऐसी स्थिति है जिसमें वास्तविकता और उसके संकेतात्मक या मीडिया-निर्मित प्रतिरूपों के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है|
प्रतिरूप वास्तविकता से भी अधिक प्रभावशाली और विश्वसनीय दिखाई देने लगते हैं|
उदाहरण-
सोशल मीडिया पर अत्यधिक संपादित जीवन को वास्तविक जीवन का आदर्श मान लेना|
किसी घटना को प्रत्यक्ष अनुभव के बजाय मीडिया की छवियों के माध्यम से समझना|
उत्पादन-केंद्रित मार्क्सवाद की आलोचना-
बॉद्रिलार्ड ने अपनी पुस्तक The Mirror of Production (1973) में मार्क्सवादी चिंतन की उत्पादन-केंद्रित दृष्टि की आलोचना की है|
बॉद्रिलार्ड ने तर्क दिया कि आधुनिक उपभोक्तावादी समाज को केवल उत्पादन और वर्ग-संबंधों के आधार पर पूरी तरह नहीं समझा जा सकता|
उनके अनुसार, उपभोग, संकेतों, प्रतीकों और सामाजिक प्रतिष्ठा की भूमिका को भी समझना आवश्यक है|
मीडिया और वास्तविकता-
बॉद्रिलार्ड के अनुसार, आधुनिक जनसंचार माध्यम केवल घटनाओं की सूचना नहीं देते, बल्कि घटनाओं की सामाजिक समझ को निर्मित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं|
खाड़ी युद्ध और मीडिया-
बॉद्रिलार्ड की पुस्तक The Gulf War Did Not Take Place (1991) विशेष रूप से प्रसिद्ध है|
उनका तर्क था कि टेलीविजन और तकनीकी माध्यमों द्वारा प्रस्तुत युद्ध की छवि ने युद्ध को समझने के तरीके को गहराई से प्रभावित किया|
जीन फ्रांस्को ल्योतार्द (Jean-François Lyotard)-
फ्रांसीसी दार्शनिक तथा उत्तर-आधुनिकतावादी
पुस्तक- The Postmodern Condition: A Report on Knowledge (1979)- इस पुस्तक को उत्तर आधुनिकतावाद की बाइबल कहा जाता है|
ल्योतार्द की उत्तर-आधुनिकतावाद की प्रमुख अवधारणाएँ-
महावृत्तांतों के प्रति अविश्वास (Incredulity toward Meta-narratives)-
ल्योतार्द के उत्तर-आधुनिक चिंतन की सबसे प्रमुख एवं केंद्रीय अवधारणा
ल्योतार्द के अनुसार, आधुनिकता ने मानव इतिहास, ज्ञान और समाज को समझाने के लिए कुछ व्यापक सिद्धांतों का सहारा लिया| ये सिद्धांत यह दावा करते हैं कि वे इतिहास की दिशा, सामाजिक परिवर्तन और मानव मुक्ति की सार्वभौमिक व्याख्या कर सकते हैं|
ल्योतार्द का तर्क है कि किसी एक व्यापक आख्यान को सभी ज्ञान, समाज और इतिहास की अंतिम एवं सार्वभौमिक वैधता का आधार नहीं मानना चाहिए|
लघु-वृत्तांत (Local Narratives)-
ल्योतार्द के अनुसार, उत्तर-आधुनिक स्थिति में किसी एक सार्वभौमिक आख्यान के स्थान पर विविध स्थानीय आख्यानों तथा ज्ञान-रूपों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है, जिनको ये लघु-वृत्तांत कहते है|
लघु-वृत्तांत विशिष्ट समुदाय, परिस्थिति या अनुभव से संबंधित होते है|
लघु-वृत्तांत बहुलता एवं विविधता को महत्त्व देते है|
ज्ञान की वैधता (Legitimation of Knowledge)-
ल्योतार्द ने अपनी पुस्तक The Postmodern Condition में ज्ञान की प्रकृति और उसकी वैधता का विश्लेषण किया है|
कोई भी ज्ञान सार्वभौमिक नहीं होता है|
ज्ञान को केवल सत्य की खोज के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता, कार्यक्षमता तथा संस्थागत स्वीकृति के आधार पर भी आँका जाये|
ल्योतार्द के अनुसार, उत्तर-आधुनिक समाज में ज्ञान की स्थिति बदलती रहती है, सूचना-प्रौद्योगिकी और कंप्यूटर आधारित प्रणालियों के विकास से ज्ञान का उत्पादन, संग्रहण, प्रसार और उपयोग बदल जाता है|
ज्ञान का वस्तुकरण (Commodification of Knowledge)-
ल्योतार्द के अनुसार, उत्तर-आधुनिक समाज में ज्ञान का आर्थिक महत्त्व बढ़ जाता है| ज्ञान सूचना के रूप में संग्रहित, प्रसारित और बाजार में उपयोग की जाने वाली वस्तु बन सकता है|
उदाहरण के लिए- डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन पाठ्यक्रम, तकनीकी अनुसंधान तथा पेटेंट-आधारित ज्ञान
कार्यनिष्पादन (Performativity)-
ल्योतार्द के ज्ञान संबंधी विश्लेषण में Performativity का विशेष महत्त्व है|
इसका आशय ऐसी व्यवस्था से है जिसमें ज्ञान, संस्थाओं या नीतियों का मूल्यांकन मुख्यतः उनकी कार्यक्षमता, उत्पादकता और मापे जा सकने वाले परिणामों के आधार पर किया जाता है|
उदाहरण के लिए- किसी विश्वविद्यालय में शोध की गुणवत्ता का आकलन केवल ज्ञान की मौलिकता से नहीं, बल्कि प्रकाशित शोधपत्रों की संख्या, उद्धरणों तथा मापनीय प्रदर्शन-सूचकों से भी किया जा सकता है|
जैक्स डेरिडा (Jacques Derrida)-
प्रमुख पुस्तक-
Of Grammatology (1967)
Writing and Difference 1967
जैक्स डेरिडा की उत्तर-आधुनिकतावाद की प्रमुख अवधारणाएँ-
विखंडनवाद (Deconstruction)-
डेरिडा की सबसे प्रसिद्ध अवधारणा
विखंडन का अर्थ है किसी पाठ या विचार की संरचना का आलोचनात्मक विश्लेषण करना, उसके अंतर्विरोधों को उजागर करना तथा यह दिखाना कि उसका अर्थ उतना स्थिर या एकरूप नहीं है, जितना वह पहली दृष्टि में दिखाई देता है|
Differanc-
डेरिडा ने Differance शब्द का प्रयोग किसी शब्द के अर्थ के निर्माण की प्रक्रिया को समझाने के लिए किया है|
जिसका मतलब है अर्थ हमेशा चलता रहता है और पूरी तरह पकड़ में नहीं आता|
इस अवधारणा के दो प्रमुख पक्ष हैं-
भिन्नता (Difference)- किसी शब्द का अर्थ दूसरे शब्दों से उसके अंतर के माध्यम से निर्धारित होता है|
स्थगन (Deferral)- किसी शब्द का अर्थ समझने के लिए हम दूसरे शब्दों और संदर्भों की ओर जाते हैं, इस प्रकार अर्थ किसी एक अंतिम संकेत पर पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता|
उदाहरण के लिए- ‘स्वतंत्रता’ का अर्थ समझने के लिए हमें बंधन, अधिकार, समानता, सत्ता और कानून जैसी अन्य अवधारणाओं की सहायता लेनी पड़ती है|
पाठ केंद्रिता (Textuality)-
डेरिडा के अनुसार हर चीज को पाठ की तरह पढ़ा जा सकता है और उसका अर्थ हमेशा संदर्भ के अनुसार बदलता है|
पूरक (Supplement)-
डेरिडा की एक अन्य महत्त्वपूर्ण अवधारणा- Supplement
यह अवधारणा उनकी पुस्तक Of Grammatology में है, जो रूसो के लेखन के विश्लेषण के संदर्भ में विशेष महत्त्व रखती है|
डेरिडा के अनुसार पूरक किसी वस्तु की कमी या अपूर्णता को उजागर करता है|
डेरिडा “कई बार पूरक जिस मूल वस्तु को केवल अतिरिक्त बताता हुआ दिखाई देता है, उसी की अपूर्णता भी उजागर करता है|”
फ्रेडरिक जेमसन (Fredric Jameson)-
पुस्तक-
Postmodernism, or, The Cultural Logic of Late Capitalism 1991
The Political Unconscious 1981
प्रमुख अवधारणा- उत्तर-आधुनिकता उत्तर-पूँजीवाद की सांस्कृतिक तर्कप्रणाली है|
जेमसन के अनुसार, उत्तर-आधुनिकतावाद को केवल कला, साहित्य या दर्शन की एक शैली के रूप में नहीं समझा जा सकता| इसे उत्तर-पूँजीवाद के विकास की एक विशिष्ट सांस्कृतिक तर्कप्रणाली (The Cultural Logic of Late Capitalism) के रूप में समझना चाहिए|
फ्रेडरिक जेमसन की उत्तर-आधुनिकतावाद की प्रमुख अवधारणाएँ-
उत्तर-आधुनिकता : उत्तर-पूँजीवाद की सांस्कृतिक तर्कप्रणाली-
फ्रेडरिक जेमसन के अनुसार, पूँजीवाद केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहता| वह संस्कृति, कला, साहित्य, वास्तुकला, विज्ञापन, मनोरंजन और सामाजिक जीवन को भी प्रभावित करता है|
सांस्कृतिक प्रभुत्व (Cultural Dominant)-
जेमसन उत्तर-आधुनिकता को एक Cultural Dominant अर्थात सांस्कृतिक प्रभुत्वशाली प्रवृत्ति के रूप में समझते हैं|
इसका अर्थ समाज में केवल एक ही प्रकार की संस्कृति मौजूद है, नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है- उत्तर-आधुनिक सांस्कृतिक तर्क विभिन्न कलात्मक शैलियों, सामाजिक अनुभवों और सांस्कृतिक गतिविधियों को व्यापक रूप से प्रभावित करता है|
गहराई का अभाव (Depthlessness)-
जेमसन ने उत्तर-आधुनिक संस्कृति की एक प्रमुख विशेषता Depthlessness अर्थात गहराई का अभाव बताई है|
इसका अर्थ है किसी वस्तु या छवि के पीछे छिपे ऐतिहासिक, सामाजिक अथवा वैचारिक अर्थों के बजाय उत्तर-आधुनिक संस्कृति में बाहरी छवि, सतह, दृश्य प्रभाव और तात्कालिक अनुभव को अधिक महत्त्व दिया जाता है|
पैस्टीश (Pastiche)-
पैस्टीश का अर्थ है- विभिन्न पुरानी शैलियों, रूपों और सांस्कृतिक तत्वों की नकल या मिश्रित पुनरावृत्ति
जेमसन के अनुसार, उत्तर-आधुनिक संस्कृति में पैस्टीश का महत्त्व बढ़ता है| कलाकार किसी पुरानी शैली को दोबारा अपनाता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह उसका व्यंग्यात्मक या आलोचनात्मक प्रयोग कर रहा हो|
इतिहास-बोध का क्षय (Waning of Historicity)-
जेमसन के अनुसार, अतीत को उसकी ऐतिहासिक परिस्थितियों, सामाजिक संघर्षों और वास्तविक परिवर्तन प्रक्रियाओं के संदर्भ में समझने के बजाय कई बार उसे पुरानी छवियों, फैशन, फिल्मों और लोकप्रिय सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है|
मिशेल फूको (Michel Foucault)-
फ्रांसीसी दार्शनिक, इतिहासकार और सामाजिक सिद्धांतकार थे
पुस्तके-
History of Madness 1961
The Birth of the Clinic 1963
Discipline and Punish 1975
The History of Sexuality 1976
मिशेल फूको की उत्तर-आधुनिकतावाद की प्रमुख अवधारणाएँ-
ज्ञान-सत्ता संबंध (Power/Knowledge)-
सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणा
फूको के अनुसार, ज्ञान और सत्ता दो पूर्णतः अलग क्षेत्र नहीं हैं| सत्ता-संबंध ज्ञान के निर्माण, वर्गीकरण और प्रसार को प्रभावित करते हैं, जबकि ज्ञान भी सत्ता के संचालन के साधन और आधार बनाता है|
विमर्श (Discourse)-
फूको के अनुसार, विमर्श केवल बोलने या लिखने का सामान्य तरीका नहीं है। यह कथनों, अवधारणाओं, संस्थाओं और नियमों की ऐसी व्यवस्था है, जो किसी विशेष विषय के बारे में ज्ञान के निर्माण तथा स्वीकार्यता की सीमाएँ निर्धारित करती है|
ज्ञान का पुरातत्त्व (Archaeology of Knowledge)-
फूको की पुस्तक The Archaeology of Knowledge (1969) में ज्ञान के पुरातत्त्व की पद्धति का विस्तृत विवेचन मिलता है|
इस पद्धति का उद्देश्य किसी विचार का विकास को केवल महान विचारकों की उपलब्धि या निरंतर बौद्धिक प्रगति नहीं है|
बल्कि विचार का विकास हमें ये बताता है कि किसी ऐतिहासिक काल में ज्ञान के निर्माण को कौन-से नियम, अवधारणाएँ और विमर्श संभव बनाते है|
वंशावली (Genealogy)-
वंशावली का उद्देश्य किसी संस्था, विचार या सामाजिक प्रथा के सम्बन्ध में उन ऐतिहासिक परिस्थितियों, संघर्षों, आकस्मिकताओं और सत्ता-संबंधों का विश्लेषण करना है, जिनसे उसका विकास हुआ|
अनुशासनात्मक सत्ता (Disciplinary Power)-
फूको ने अपनी पुस्तक Discipline and Punish (1975) में आधुनिक समाज की अनुशासनात्मक सत्ता का विश्लेषण किया|
उनके अनुसार, आधुनिक सत्ता केवल कानून, दंड या शारीरिक बल के माध्यम से कार्य नहीं करती|
वह निरीक्षण, समय-सारणी, परीक्षा, प्रशिक्षण, वर्गीकरण और व्यवहार के मानकीकरण के माध्यम से भी व्यक्तियों को नियंत्रित करती है|
पैनॉप्टिकॉन (Panopticon)-
पैनॉप्टिकॉन मूलतः जेरेमी बेंथम द्वारा प्रस्तावित कारागार की वास्तु-योजना थी|
फूको ने इसे आधुनिक अनुशासनात्मक सत्ता और निगरानी के सिद्धांत को समझाने के लिए महत्त्वपूर्ण बनाया|
फूको ने पैनॉप्टिकॉन को केवल जेल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे उन सामाजिक व्यवस्थाओं के प्रतीक के रूप में समझा जिनमें निरंतर निरीक्षण की संभावना व्यवहार को नियंत्रित करती है|
सामान्यीकरण (Normalization)-
फूको के अनुसार, आधुनिक संस्थाएँ केवल नियमों का पालन करवाने तक सीमित नहीं रहतीं|
बल्कि वे सामान्य और असामान्य, योग्य और अयोग्य तथा स्वीकार्य और अस्वीकार्य व्यवहार के मानक भी निर्धारित करती हैं|
जैव-राजनीति (Biopolitics)-
जैव-राजनीति फूको की आधुनिक सत्ता संबंधी अवधारणाओं में महत्त्वपूर्ण है|
इसका संबंध जनसंख्या के जीवन, स्वास्थ्य, जन्म-दर, मृत्यु-दर, रोग, जीवन प्रत्याशा और अन्य जनसांख्यिकीय प्रक्रियाओं को शासन तथा प्रशासन के माध्यम से व्यवस्थित करने से है|
अनुशासनात्मक सत्ता- व्यक्तिगत शरीर
जैव-राजनीति- जनसंख्या और जीवन-प्रक्रियाएँ
प्रशासकीयता (Governmentality)-
फूको ने राज्य व शक्ति के सम्बन्ध में इस शब्द का प्रयोग किया|
प्रशासकीयता ‘सरकार की कला’ है, जिसमें यह अध्ययन किया जाता है कि सरकार जनता पर कैसे नियंत्रण स्थापित करती है और उसे अनुशासन में कैसे रखती है|
बायोपावर (Biopower) (जैव-शक्ति)-
फूको ने ‘Biopower’ की नवीन अवधारणा दी| इनका मानना है कि शक्ति हर जगह मौजूद है तथा पूरे समाज में केशिकाओं की तरह फैली हुई है|
सत्ता का विकेंद्रीकृत स्वरूप-
फूको सत्ता को केवल राज्य, सरकार या किसी एक शासक वर्ग के हाथों में केंद्रित नहीं मानते|
सत्ता-संबंध परिवार, विद्यालय, अस्पताल, कारागार, कार्यस्थल और दैनिक सामाजिक व्यवहार में भी कार्य करते हैं
उनके अनुसार, सत्ता केवल निषेधात्मक या दमनकारी नहीं है; वह ज्ञान, सामाजिक पहचान, मानदंड और व्यवहार के निर्माण में भी भूमिका निभाती है|
प्रतिरोध की अवधारणा-
मिशेल फूको “जहाँ शक्ति है, वहाँ प्रतिरोध भी है और फिर भी यह प्रतिरोध शक्ति के सम्बन्ध में बाहरी स्थिति (Position of Exteriority) नहीं है|”
जहाँ सत्ता-संबंध होते हैं, वहाँ उनके विरुद्ध प्रश्न उठाने, नियमों को चुनौती देने और वैकल्पिक व्यवहार विकसित करने की संभावनाएँ भी हो सकती हैं|

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