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प्लेटो,अरस्तु || 360° Rapid Revision || राजनीती विज्ञान || Political Science || नागरिक शास्त्र || TGT PGT || UGC Net DEC 2026

     

    प्लेटो (PLATO) 428 ई-पू- 347 ई.पू


    जीवन परिचय-

    • जन्म-

    • 428/27 ई.पू.

    • एथेंस के एक प्राचीन विशिष्ट कुलीन, किंतु गैर खुशहाल परिवार में|


    • पिता का नाम- 

    • एरिस्टोन/अरिस्तोन (Ariston) 

    • प्लेटो के पिता एथेंस के अंतिम राजा कार्ड्स के वंशज थे|


    • माता का नाम- 

    • परिक्टियनी

    • इसकी माता सुप्रसिद्ध कानूनवेता या स्मृतिकार सोलान के वंश में उत्पन्न हुई थी| 


    • वास्तविक नाम- 

    • अरिस्तोक्लीज 

    • अरिस्तोक्लीज का अर्थ था- सबसे अच्छा और प्रसिद्ध

    • लेकिन उनके सुंदर, सुडोल, पुष्ट शरीर व चौड़े कंधों के कारण इनके व्यायाम शिक्षक ने उनको प्लेटो (अफलातून) नाम दिया|


    • गुरु- 

    • सुकरात

    • प्लेटो प्रारंभिक शिक्षा के बाद 20 वर्ष की अवस्था में सुकरात के पास गया तथा 8 वर्ष तक सुकरात से शिक्षा ग्रहण की|



    • प्लेटो की पोटोने नामक बहन थी तथा एंडीमेंटस और ग्लूकोन दो भाई थे|


    • कुलीन परिवार में उत्पन्न होने के बारे में प्लेटो ने स्वयं कहा है कि “मैं ईश्वर का धन्यवाद करना चाहता हूं कि मैं असभ्य, असंस्कृत गैर यूनान की बजाय यूनान में जन्मा, दास की बजाय नागरिक के रूप में, स्त्री के बजाय पुरुष के रूप में जन्मा, किंतु सबसे अच्छी बात कि मैं सुकरात के युग में जन्मा|”



    पेलोपोनेसियन युद्ध - 

    • प्लेटो का जब जन्म हुआ था उस समय लोकतांत्रिक एथेंस व स्पार्टा के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था| यह युद्ध 28 वर्ष (431-404ई पू) चला था, जिसने एथेंस का पतन कर दिया|

    • Note- पेलोपोनेशियन वार पुस्तक थ्यूसिडाइस द्वारा लिखी गयी है|



    राजनीति से मोह भंग-

    • कुलीन वर्ग में उत्पन्न होने के कारण प्लेटो की स्वाभाविक इच्छा राजनीति में जाने की थी, लेकिन युवावस्था की दो घटनाओं के कारण इनका राजनीति से मोह भंग हो गया|


    • ये दो घटनाएं निम्न है-

    1. प्रथम घटना- तीस लोगों का शासन -

    • पेलोपोनेशियन युद्ध में पराजित एथेंस में लोकतंत्र की जगह 30 व्यक्तियों के कुलीनतंत्र की स्थापना हुई| यह कुलीनतंत्र स्पार्टा की कटपुतली था| 

    • इस सरकार में प्लेटो के दो रिश्तेदार परिक्टियनी का चाचा क्रिशियस (क्रिटियास) तथा भाई चार्मीडीस भी शामिल थे|

    • इस 30 लोगों के शासन ने प्लेटो के गुरु सुकरात पर युवकों को पथभ्रष्ट करने का आरोप लगाया|


    1. दूसरी घटना-

    • 30 लोगों के शासन के बाद एथेंस में वापस लोकतंत्र की स्थापना हुई| 

    • एथेंस की लोकतांत्रिक सरकार ने युवकों को राज्य के विरुद्ध भड़काने तथा कानूनों के उल्लंघन का सुकरात पर आरोप लगाकर जहर का प्याला देखकर मृत्युदंड दे दिया|


    • इन घटनाओं पर प्लेटो ने कहा है कि “राजनीति भले किसी भी रूप में क्यों न हो, बुरी होती है और स्वच्छ शासन के लिए उसका सही निर्देश अति आवश्यक है|” 



    • सुकरात की मृत्यु (399 ई.पू) के बाद प्लेटो ने एथेंस छोड़ दिया तथा विश्व भ्रमण पर निकल गये| 

    • एथेंस से भागकर प्लेटो निगारा चले गए, जहां प्रसिद्ध रेखागणितज्ञ यूक्लिड की शरण ली|

    • प्लेटो पर सुकरात का सबसे अधिक प्रभाव था| इस संबंध में मैक्सी ने लिखा है कि “प्लेटो में सुकरात पुन: जीवित हो गया है|”


    Note- विल दुरांत (Will Durant) ने अपनी पुस्तक ‘Story of philosophy 1926’ में लिखा है की प्लेटो ज्ञान की तलाश में गंगा नदी के तट तक (मगध) भारत की यात्रा की और यहां पर वेदांत दर्शन का अध्ययन किया|


    • मगध की वर्ण व्यवस्था से पलेटो प्रभावित था, इसी के आधार पर उन्होंने न्याय का आधार कर्तव्य बताया है|

    • 387 ई.पू. में प्लेटो वापस एथेंस आ गये तथा प्रसिद्ध शिक्षणालय अकादमी की स्थापना की|



    अकादमी (Academy)-

    • इसको यूरोप का प्रथम विश्वविद्यालय कहा जाता है|

    • पाइथागोरियन स्कूल के समान एकेडमी में भी महिलाओं के प्रवेश की इजाजत थी|

    • अकादमी के प्रवेश द्वार पर लिखा था कि “गणित, रेखागणित के ज्ञान के बिना यहा कोई भी प्रवेश का अधिकारी नहीं है|” (मेडिस रगजिओमेट्रोस आइसीटो)

    • प्लेटो ने ‘अकादमी’ में गणित और ज्यामिति के अध्ययन पर अत्याधिक जोर दिया|

    • प्लेटो ने एकेडमी को भावी दार्शनिक शासकों के ट्रेनिंग स्कूल के रूप में देखा|

    • एकेडमी में लेक्चरो, सुकरातवादी डायलेक्टिक्स और समस्या हल करने वाली परिस्थिति निर्माण के जरिए शिक्षा दी जाती थी|

    • Note- प्लेटो का विख्यात शिष्य अरस्तु इसी अकादमी की देन है|



    सिराक्यूज की यात्रा-

    • प्लेटो पाइथागोरस के सिद्धांतों का ज्ञान पाने तथा दार्शनिकों का शासन देखने के लिए 387 ई.पू. इटली और सिसली गया| 

    • सिसली के सिराक्यूज राज्य में प्लेटो की भेंट दियोन (Dion) नामक अत्यंत सुसंस्कृत व्यक्ति तथा वहां के राजा डायनोसियस प्रथम से हुई|

    • डायनोसियस प्रथम दियोन की प्रेरणा से दार्शनिक शासक बनने को तैयार हो गया, लेकिन बाद में प्लेटो द्वारा उसके अन्याय और निरकुंश शासन की कड़ी आलोचना करने पर वह मुकर गया| 

    • डायनोसियस प्रथम ने दियोन को निर्वासित कर दिया तथा प्लेटो को दास के रूप में एजाइना के टापू पर बेच दिया| यहा से प्लेटो के पुराने मित्र अनीकैरिस ने प्लेटों को खरीदकर मुक्त कराया|

    • 367 ई.पू. में एक बार फिर दियोन के निमंत्रण पर प्लेटो सिराक्यूज गया| उनका उद्देश्य था कि स्वर्गीय राजा डायनोसियस प्रथम के भतीजे और उत्तराधिकारी डायनोसियस द्वितीय को दार्शनिक राजा बनाना| लेकिन डायनोसियस ने प्लेटो के इस विचार का विरोध किया कि रेखागणित राज्य चलाने के शिल्प की कुंजी है, और फलस्वरुप प्लेटो को वापस लौटना पड़ा|


    • 347 ई.पू 81 वर्ष की आयु में प्लेटो की मृत्यु हो गयी तथा दार्शनिकों को राजा और राजाओं को दार्शनिक बनाने वाला प्लेटो मृत्यु लोक में गमन कर गये|



    प्रमुख तथ्य-

    • प्लेटो को सबसे पहला व्यवस्थित राजनीतिक सिद्धांतकार माना जाता है|

    • प्लेटो राजनीतिक दर्शन, मानकीय राजनीतिक सिद्धांत के प्रणेता माने जाते हैं|

    • प्लेटो दार्शनिक या नैतिक आदर्शवाद के प्रणेता माने जाते हैं, क्योंकि उन्होंने इंद्रिय जनित भौतिक जगत से परे एक शाश्वत, सार्वभौमिक विश्व के विचार को ज्यादा वरीयता दी थी|


    • राजनीतिक दर्शन के प्रणेता- प्लेटो

    • राजनीतिक विज्ञान के प्रणेता या पिता- अरस्तु 

    • आधुनिक राजनीतिक चिंतन का जनक- मैक्यावली

    • वैज्ञानिक राजनीति के पिता- थॉमस हॉब्स

    • उपभोक्तावाद के जनक- थॉमस हॉब्स

    • वैज्ञानिक व्यक्तिवाद के पिता- हर्बट स्पेंसर 

    • वैज्ञानिक समाजवाद के पिता- कार्ल मार्क्स

    • राजनीतिक सिद्धांतों के पुनरुत्थान के प्रणेता- जॉन रॉल्स 

    • समकालीन राजनीतिक सिद्धांतों के प्रणेता- जॉन रॉल्स 



    प्लेटो की रचनाएं-

    • प्लेटो के ग्रंथों की संख्या 36 या 38 के आसपास मानी जाती, लेकिन इसमें प्रमाणिक ग्रंथ केवल 28 हैं|

    • प्लेटो के सभी ग्रंथ संवाद या वार्तालाप शैली में लिखे गये हैं|

    • प्लेटो ने संवाद शैली को ‘The Science Of Super Reality’ कहा है|

    • संवाद शैली में होने के कारण प्लेटो की रचनाओं को संवाद भी कहा गया है| 


    Note- स्टेट्समैन व लॉज सुकरात के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त है|


    • अपोलोजी व क्रीटो- ये सुकरात के जीवन-मृत्यु, सुकरात के विचारों से संबंधित है तथा इसमें व्यक्ति तथा राज्य के बीच संबंधों विचार-विमर्श किया गया है|


    Note- 

    • अपोलोजी का हिंदी अर्थ क्षमा प्रार्थना है| अपोलोजी का गांधीजी द्वारा गुजराती भाषा में एक सत्यवीर की कथा अथवा सुकरात का बचाव (गुजराती में शीर्षक- एक सत्य विरानी कथा अथवा सोक्रेटिसानो बचाव) नाम से अनुवाद किया है| 

    • अपोलोजी सुकरात के मुकदमे का काल्पनिक और व्यंग्यात्मक वर्णन है|


    • क्रीटो- इसमें राजनीतिक जिम्मेदारी और अधिकार के प्रश्न पर विचार किया गया है| 

    • एंथेफ्रो- इसमें देवी पवित्रता की सेवा को पवित्र कार्य माना गया है, जो आत्मा को ऊपर ले जाती है|

    • प्रोटोगोरस- इसमें सुकरात के विपरीत सोफिस्ट प्रोटोगोरस के विचार प्रस्तुत किए हैं| लेसर तथा ग्रेटर हिप्याज में भी यही विषय जारी रखा गया|

    • सैवंथ लेटर (Seventh letter)- यह प्लेटो की आत्मकथा है|

    • चार्मीडीस तथा लैचिस- इन पुस्तकों का संबंध आत्म-नियंत्रण एवं साहस जैसे गुणों से है|

    • मीनो (Meno)- इसमें मुख्य रूप से सद्गुण (Virtue) की प्रकृति, उसके ज्ञान से संबंध तथा यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या सद्गुण को सिखाया जा सकता है| 

    • प्रोटागोरस (Protagoras)-  इसमें सद्गुण की शिक्षा, सद्गुण और ज्ञान के संबंध तथा सद्गुण की एकता पर चर्चा की गई है|

    • मिनिएक्शनस- इसमें क्रेटिलस के स्वर्ण युग की आलोचना की गई है|

    • फ़ैलेबस- इसमें नैतिकता तथा स्वच्छ जीवन की विशेषताओं पर बल दिया गया है|

    • सिंपोजियम- यह प्रेम (इरोस) व सौंदर्य पर आधारित है| टेनियस अटलांटिक नामक काल्पनिक महादेश में जीवन की उत्पत्ति पर विचार किया गया| यहां ईश्वर को एक ऐसी बुद्धिमतापूर्ण और प्रभावशाली शक्ति माना गया, जो विश्व में व्यवस्था कायम करती है| 

    • जार्जियास- इसमें प्लेटो ने अपनी ही अंतरात्मा पर विश्वास करने पर बल दिया है|

    • फाइदो- इसमें सुकरात की मृत्यु का मार्मिक दृश्य है, साथ ही प्रत्यय का सिद्धांत, आत्मा व उसकी अनश्वरता की चर्चा है|

    • चारमीडीस/ चरमाइड्स- इसमें आत्मज्ञान का विचार है, अर्थात सुकरात के कथन- ‘अपने आप को जानो’ पर विचार किया गया है|

    • परमिनीडेस/ परामिनाइडिस- इनमें प्लेटो ने अपने सिद्धांत ‘Theory of idea’ का पुनर्मूल्यांकन किया है|


    Note- प्लेटो के राजशास्त्र से संबंधित विचारों का विवरण उनकी तीन कृतियों रिपब्लिक, स्टेट्समैन और लॉज में मिलता है| इनके अलावा क्रीटो में भी राजनीतिक सिद्धांतो का वर्णन मिलता है|



    राज्यशास्त्र से संबंधित पुस्तकें- 

    1. रिपब्लिक-

    1. तीन आत्माएं व तीन वर्गों का सिद्धांत

    2. दार्शनिक राजा का शासन

    3. आदर्श राज्य

    4. परिवार व संपत्ति का साम्यवाद

    5. शिक्षा का सिद्धांत

    6. न्याय सिद्धांत 


    1. द स्टेट्समैन-

    • राज्यों का वर्गीकरण

    • स्टेट्समैन (राजमर्मज्ञ) की परिभाषा- प्लेटो ने स्टेट्समैन (राजमर्मज्ञ) की परिभाषा एक ऐसे व्यक्ति के रूप में की, जो बिना कानून के और बिना अपनी प्रजा की सहमति के शासन कर सकता था, क्योंकि वह जानता था कि उनके लिए सबसे अच्छा क्या है|


    1. द लॉज-

    • इसमें मुख्य प्रवक्ता सुकरात नहीं है|

    • विधि के शासन का वर्णन 

    • नैश परिषद (नोक्टरल काउंसिल) का उल्लेख है|

    • यह प्लेटो की सबसे बड़ी रचना व अंतिम रचना थी|

    • इसके अनुसार मिश्रित सविधान सबसे अच्छा था, क्योंकि वह निरंकुशता और आजादी के चरम बिन्दुओ के बीच समन्वय स्थापित करता था| 


    Note- 

    • प्लेटो ने रिपब्लिक में शासक को गडरिये, जबकि स्टेट्समैन में शासक को चिकित्सक, नाविक, बुनकर की संज्ञा दी है|

    • रिपब्लिक में राज्य का शासन दार्शनिक राजा करता है, स्टेट्समैन में एक मिश्रित राज्य है जो राजमर्मज्ञों द्वारा चलाया जाता है, लाज में एक वास्तविक राज्य है जो नियमों और कानूनों द्वारा चलाया जाता है| 

    • रिपब्लिक के अनुसार दार्शनिक शासन में बुद्धि, साहस, संयम व न्याय के सदगुण है, स्टेट्समैन के अनुसार शासक को प्रथाओं, परंपराओं, रीति-रिवाजो तथा अलिखित दैवी नियमों का ज्ञान है, लॉज़ के अनुसार शासक को लिखित नियमों व कानुनों का ज्ञान है|


    Note- Republic को सामान्यतः यूटोपियन (काल्पनिक) पुस्तक कहा जाता है| 


    ये तीनों पुस्तक रिपब्लिक पुस्तक से प्रभावित हैं-

    1. Utopia- थामस मुर 

    2. The city of son- फ्रातोमारसो कंपनेला 

    3. The New Atlantis- फ्रांसिस बेकन 


    • भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन ने रिपब्लिक का रियासत के नाम से उर्दू में अनुवाद किया है|



    प्लेटो की पुस्तकों के पात्र-

    1. न्याय पर चर्चा करने वाले पात्र- सिफालस, पोलिमार्कस, थ्रेसिमेक्स, ग्लुकोन व एंडीमैटस

    2. आत्म ज्ञान को परिभाषित करने वाला पात्र- चारमाइड्स

    3. मित्रता के संबंध में चर्चा करने वाला पात्र- लाइसिस

    4. साहस का अर्थ बताने वाला पात्र - लिच्ज



    प्लेटो की अध्ययन पद्धति या अध्ययन शैली


    1. संवाद/ वार्तालाप/ द्वंदात्मक पद्धति (Dialectical method)-

    • इस पद्धति में प्रश्नोत्तर, आपसी तर्क-वितर्क, द्वंद, संवाद के माध्यम से सत्य की खोज की जाती है| 

    • प्लेटो ने सुकरात के माध्यम से प्रश्नोत्तर करके सत्य की खोज की है|

    • इसी द्वंदात्मक पद्धति का बाद में हीगल तथा कार्ल मार्क्स ने भी प्रयोग किया था|

    • प्लेटो ने इस शैली को अपने गुरु सुकरात से ग्रहण किया था|


    • प्लेटो ने द्वंदात्मक पद्धति का प्रयोग तीन उद्देश्यों से किया है- 

    1. सत्य की खोज हेतु 

    2. सत्य की अभिव्यक्ति व प्रचार हेतु

    3. सत्य की परिभाषा हेतु


    1. निगमनात्मक पद्धति (Deductive method)-

    • इस पद्धति को दार्शनिक पद्धति कहा जाता है| इस पद्धति में निष्कर्ष पहले ही निश्चित कर लिए जाते हैं और फिर उन्हें विशिष्ट तथ्यों से जोड़ा जाता है|

    • इस पद्धति में सामान्य से विशिष्ट की ओर बढ़ा जाता है|

    • इसको रचनात्मक पद्धति भी कहते है, जिसमें नये विचारों की रचना होती है, जो बौद्धिक दृष्टि से सृजनात्मक है|

    • इसको मानकपरकवादी (Normative) पद्धति भी कहते हैं|


    1. सादृश्यात्मक (Analogy method) व ऐतिहासिक पद्धति-

    • अन्य नाम- साम्यानुमान, अनुरूपता पद्धति

    • ऐतिहासिक पद्धति में अपने सिद्धांतों की पुष्टि ऐतिहासिक दृष्टांतो तथा पौराणिक कथाओं से की जाती है|

    • प्लेटो ने अपने सिद्धांतों की पुष्टि प्रकृति या कलाओं के दृष्टांतो से की है|

    • प्लेटो ने राजनीति को कला माना है|


    • इसमें प्लेटो एक तत्व की दूसरे तत्व से समानता बताकर तर्क करता है|

    • जैसे-

    1. रखवाली कार्य में कुत्ता-कुत्तिया में भेद नहीं होता तो शासन कार्य में स्त्री पुरुष भेद क्यों?

    2. रिपब्लिक में वर्णित तीन वर्गों की साम्यता या तुलना निम्न प्रकार से की है-

    1. उत्पादक वर्ग की साम्यता मानव पशु व तांबा से की है|

    2. सैन्य वर्ग की साम्यता प्रहरी कुत्ता (Watchdog) व चांदी से की है|

    3. दार्शनिक शासक की साम्यता गडरिया (Shepherd) व स्वर्ण से की है| 


    • Note- जहां रिपब्लिक में निगमनात्मक पद्धति व साम्यानुमान पद्धति का ज्यादा प्रयोग है, वही स्टेट्समैन व लॉज में ऐतिहासिक पद्धति का|


    1. कल्पनावादी दार्शनिक पद्धति-

    • पाश्चात्य दार्शनिकों के कल्पनावादियों में प्लेटो का स्थान प्रथम व सर्वोच्च है|


    1. सोद्देश्यात्मक व विश्लेषणात्मक पद्धति (Teleology method)-

    • इसको कार्यकारण पद्धति भी कहते हैं|

    • प्लेटो का Theory of ideas या Theory of forms (विचारों/ आकार/ प्रत्ययों का सिद्धांत) सोद्देश्यात्मक पद्धति पर आधारित है|



    प्लेटो पर प्रभाव

    • प्लेटो पर सुकरात, पाइथागोरस, हेराक्लिट्स, पैरामिनाइडस का प्रभाव पड़ा है|

    • सुकरात का प्रभाव प्लेटों पर सर्वाधिक पड़ा है| प्लेटो के सभी संवादों में सुकरात नायक है (केवल लॉज को छोड़कर)

    • इसलिए मैक्सी ने लिखा है कि “प्लेटो के दिल और दिमाग ने अपने शिक्षक के विचारों और भावों को पूर्ण रूप से आत्मसात किया है|”


    • सुकरात का प्रभाव- 

    • सुकरात के प्रभाव से ही प्लेटो ने विश्व की आर्थिक व्याख्या के बजाय टेलियोलॉजिकल (सोद्देश्यात्मक) व्याख्या की है, और राजनीतिक प्रक्रियाओं को नैतिक सीमाओं के अंदर रखा है|


    • सुकरात का निम्न प्रभाव है-

    1. सद्गुण ही ज्ञान है (Virtue is Knowledge)

    2. सद्गुण का स्वरूप- 

    • सद्गुण के लिए यूनानी शब्द अरैती (Arete) है, जिसका हिंदी में अर्थ है- ‘उत्कृष्टता’


    • प्लेटो ने 4 सद्गुण बताये है-

    1. विवेक  (2) साहस (3) संयम (4) न्याय

    • यह चारों सद्गुण संयुक्त रूप से मानवीय सदगुण अथवा उत्कृष्टता (Goodness) का निर्माण करते हैं|


    1. शासन (राजनीति) एक कला है-

    • सुकरात से प्रभावित होकर प्लेटो ने शासन संचालन को डॉक्टरी, नौ-चालन की भांति एक कला माना है|


    1. सुकरात के दर्शन के आधार पर बिंदु-

    • सद्गुण ही ज्ञान है, अच्छाई का अर्थ विवेक है, शासन एक कला है, सभी राजनीतिज्ञों में शासन करने की क्षमता नहीं होती, पूर्ण शिक्षित ज्ञानी और गुणी व्यक्ति ही शासन तंत्र का सफल संचालन कर सकता है| 

    • प्लेटो ने सुकरात के इन सभी दार्शनिक सिद्धांतों को अपने चिंतन का आधार बनाया|


    1. प्लेटो की दार्शनिक पद्धति का आधार सुकरात का सत्ता सिद्धांत-

    • सुकरात के सत्ता सिद्धांत का अर्थ है कि यथार्थता (Reality) वस्तुओं के विचारों में निहित होती है, यथार्थाता पूर्ण स्थायी एवं अपरिवर्तनशील सत्ता है| 

    • प्लेटो ने इस विचार को अपने राजनीतिक चिंतन का केंद्र माना है|


    • बर्नेट “प्लेटो का दर्शन सुकरात के ज्ञान के जीवाणुओं का वह विकल्प है, जो प्लेटोनिक निष्कर्षों के रूप में रिपब्लिक में उद्भूत हुआ है|”

    • बार्कर “प्लेटो की रिपब्लिक सुकरात की मान्यताओं से तो आरंभ होती है, लेकिन उसकी समाप्ति प्लेटो के निष्कर्ष से होती है|”


    • पाइथागोरस का प्रभाव- 

    • प्लेटो ने पाइथागोरस से निम्न ग्रहण किया है-

    1. तीन वर्गों का सिद्धांत प्लेटो ने पाइथागोरस से ग्रहण किया है| पाइथागोरस ने राज्य में 3 वर्ग बताए है- बुद्धि प्रेमी, सम्मान प्रेमी, धन प्रेमी|

    2. दार्शनिक शासक का विचार

    3. पारलौकिक विश्व में विश्वास

    4. आत्मा की अमरता का सिद्धांत

    5. तर्क/ विवेकता का विचार

    6. गणित का महत्व

    7. स्त्री-पुरुष समानता का विचार

    8. आदर्श राज्य का विचार- पाइथागोरस ने एक सभा की स्थापना की थी, जिसके सदस्य विशेष धर्म और व्यवहार के नैतिक मानदंड से संबंधित थे| वास्तव में रिपब्लिक में प्लेटो का आदर्श राज्य इसी समाज के अनुरूप था| 


    • हेराक्लिट्स व पैरामिनाइडस-

    • प्लेटो के ‘Theory of Ideas’ (प्रत्ययो का सिद्धांत) पर इन दोनों का प्रभाव है|

    • हेराक्लिट्स से प्लेटो ने ग्रहण किया कि इंद्रियों को प्रभावित करने वाले इस विश्व में कुछ भी स्थाई नहीं है| वस्तुएं लगातार बदलती रहती हैं और नए रूप तथा आकर-प्रकार ग्रहण करती रहती है|

    • पैरामिनाइडस के अनुसार कुछ भी परिवर्तनशील नहीं था| पैरामिनाइडस ने इंद्रियों को प्रभावित करने वाली वस्तुओं को भ्रम बताया अर्थात इनका अस्तित्व ही नहीं था|



    प्लेटो का प्रत्यय/ आकार का सिद्धांत

    (Theory of ideas/ Form or Doctrine of Idea/ form)

    • प्लेटो के दर्शन का आधार उसका प्रत्यय/ विचार/ आकार का सिद्धांत है|

    • इस सिद्धांत को समझाने के लिए प्लेटो गुफा का रूपक या गुफा का दृष्टांत नामक मनगढ़त कथा का उपयोग करता है|

    • गुफा का रूपक का उल्लेख प्लेटो की रिपब्लिक पुस्तक में मिलता है|

    • इस रूपक कथा में सुकरात, प्लेटो के भाई ग्लॉकान को आत्मज्ञान के बारे में समझाता है|


    इस कथा से निम्न तथ्य स्पष्ट होते हैं-

    1. भीतरी आंखें (Inward Eyes)

    2. आत्मा में परिवर्तन

    3. प्रतिच्छाया-

    • प्लेटो ने जगत के दो प्रकार बताए है- 

    1. विचार/ आकार/ प्रत्यय जगत/ बौद्धिक विश्व (Ideas/Form)

    2. भौतिक/ इंद्रिय जगत

    • टीमियास ग्रंथ में प्लेटो बताते हैं कि संवेदनाओ के विश्व का निर्माण एक रचनाकार डेजी अर्ज करता है, जो विचारों की दुनिया और पदार्थ को साथ लाता है| 


    1. विभाजित रेखा

    2. सद्गुण ही ज्ञान है


    • गुफा के रूपक का सार यह है कि उत्पादक वर्ग गुफा में कैद मानव है, अतः शासन का कार्यभार ज्ञानवान दार्शनिक को संभालना चाहिए| अगर अज्ञानी व असद्गुणी मनुष्यों को सत्ता सौंप दी जाये तो वे सत्ता संघर्ष में पागल हो जाएंगे|

    • प्लेटो ने अपने इस दर्शन द्वारा ग्रीक (यूनानी) दर्शन को चरम पर पहुंचा दिया, अतः उसे पूर्ण ग्रीक (Complete greek) कहा जाता है|


    • Note- प्लेटो ज्ञानार्जन के निम्न तरीके बताता है-

    1. मस्तिष्क या आत्मा के कार्य

    2. केव (गुफा) का उदाहरण

    3. विभाजन रेखा का उदाहरण

    4. रूपों या विचारों का सिद्धांत



    प्लेटो की महानतम रचना- रिपब्लिक

    • रिपब्लिक प्लेटो की सभी रचनाओं में महानतम व सर्वश्रेष्ठ कृति है|

    • आकार की दृष्टि से रिपब्लिक प्लेटो के सभी ग्रंथों में दूसरा सबसे बड़ा ग्रंथ है, जबकि सबसे बड़ा ग्रंथ द लॉज है|

    • मूल नाम- प्लेटो ने Republic को यूनानी भाषा में Politea (मूल नाम) नाम दिया था, जिसका तात्पर्य है राज्य की शासन व्यवस्था एवं सविधान|

    • रिपब्लिक का उपशीर्षक ‘कनसर्निंग ऑफ जस्टिस’ या न्याय प्रबंध है|

    • Republic पुस्तक में प्लेटो के ‘न्याय सिद्धांत’, ‘शिक्षा सिद्धांत’, ‘साम्यवाद सिद्धांत’, ‘आदर्श राज्य’, ‘दार्शनिक शासक’, ‘राज्यों के उत्थान व पतन की चक्रात्मक व्याख्या’, ‘मानव के कर्मानुसार सामाजिक व राजनीतिक स्थिति का’, इतिहास के दर्शन का वर्णन है|

    • रिपब्लिक का केंद्रीय विषय न्याय व अच्छे मनुष्य और अच्छे जीवन की समस्याओं पर विचार करना है|


    • बेंजामिन जावेट “प्लेटो का समस्त चिंतन और रचनाएं रिपब्लिक के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं|” 

    • बार्कर “यह कहना आसान है कि रिपब्लिक काल्पनिक है, बादलों में एक नगर है| परंतु रिपब्लिक कहीं का कोई नगर नहीं है, यह यथार्थ परिस्थितियों पर आधारित है, यह वास्तविक जीवन को मोड़ने या कम से कम उसे प्रभावित करने के लिए है|”

    • रूसो “रिपब्लिक राजनीति शास्त्र का ग्रंथ न होकर शिक्षा शास्त्र पर लिखा गया एक सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है|”


    • रिपब्लिक में कुल 10 अध्याय या 10 बुक हैं, जिनको विषय-वस्तु की दृष्टि से 5 खंडों में विभाजित किया जा सकता है-

    1. Book- 1 - इसमें मानव जीवन, न्याय की प्रकृति, नैतिकता के अर्थ समझाएं गए हैं|

    2. Book- 2 से 4- इसमें ‘राज्य के संगठन, शिक्षा पद्धति, आदर्श मानव समाज की रूपरेखा, मानव स्वभाव के तीन तत्वों तथा मानव समाज के तीनों वर्गों का समाज में स्थान’ का वर्णन है|

    3. Book- 5 से 7- इस भाग का मुख्य विषय दर्शन है|

    4. Book- 8 से 9- इसमें मनुष्यों तथा राज्य के विकृत हो जाने पर जो अव्यवस्था उत्पन्न होती है, उस पर विचार व्यक्त किए गए हैं|

    5. Book- 10- इसके दो भाग हैं

    1. एक में दर्शन से कला का संबंध बताया है|

    2. दूसरे भाग में आत्मा की क्षमता पर विचार-विमर्श मिलता है|


    रिपब्लिक की रचना के उद्देश्य-

    1. सोफिस्ट विचारको द्वारा प्रतिपादित आत्मतृप्ति के सिद्धांत को गलत और झूठा सिद्ध करना-

    • प्लेटो ने इस निरकुंश व्यक्तिवाद का विरोध किया तथा उसके स्थान पर राज्य के जैविक रूप का प्रतिपादन किया| 

    1. हिंसात्मक व्यक्तिवादी प्रवृत्ति तथा अज्ञान से उद्भूत ग्रहवाद का विरोध करना-

    • जिसके द्वारा धनिकतंत्र में अमीर तथा जनतंत्र में गरीब अन्य वर्गों का शोषण कर रहा था|

    1. तत्कालीन ग्रीक (यूनान) में प्रचलित लॉटरी द्वारा नियुक्ति की व्यवस्था का उन्मूलन करना-

    • प्लेटो के अनुसार शासन एक कला है जिसके लिए योग्यता और प्रशिक्षण का होना अनिवार्य है| 

    1. तत्कालीन यूनानी नगर राज्यों में विद्यमान कुशासन का अंत करना-

    • तत्कालीन यूनानी नगर-राज्यों में शासक वर्ग द्वारा शासन शक्ति का प्रयोग अपने स्वार्थ की पूर्ति में करने के कारण शासक व शासितो में निरंतर संघर्ष चलता रहता है, जिसे क्रॉसमैन ने वर्ग संघर्ष कहा है|




    रिपब्लिक में न्याय सिद्धांत

    (Theory of Justice in Republic)


    • रिपब्लिक की पुस्तक  II, III, IV में विश्लेषण

    • Republic का उपशीर्षक- Concerning of Justice (कंसर्निंग जस्टिस) 

    • रिपब्लिक को न्याय मीमांसा ग्रंथ भी कहा जाता है|

    • प्लेटो के अनुसार न्याय माननीय आत्मा का गुण है|

    • प्लेटो के आदर्श राज्य के चार प्रमुख सदगुण हैं- बुद्धि, साहस, सयम और न्याय| न्याय सर्वोच्च सद्गुण है| 

    • ग्रीक (यूनानी) भाषा में न्याय का पर्यायवाची शब्द Dikaiosyne (डिकायोसिनी) है, जिसका अर्थ है ‘न्याय प्रबंध’|

    • प्लेटो की न्याय की अवधारणा आधुनिक न्याय की तरह कानूनी नहीं है, बल्कि नैतिक है| प्लेटो के अनुसार न्याय Righteousness (नैतिकता या धार्मिकता) है|

    • प्लेटो के अनुसार न्याय अच्छाई का विचार (Form of the good) है|

    • न्याय को परिभाषित करते हुए प्लेटो लिखता है कि “प्रत्येक व्यक्ति को वह उपलब्ध होना चाहिए, जो उसको प्राप्य है|” 


    • प्लेटो ने तात्कालिक यूनानी समाज में प्रचलित तीन न्याय सिद्धांतो का खंडन या आलोचना की है-  

    1. परंपरागत न्याय सिद्धांत

    2. न्याय का उग्रवादी/ शक्ति सिद्धांत 

    3. न्याय का व्यवहारवादी/ कारणता सिद्धांत का खंडन 


    1. न्याय का परंपरावादी सिद्धांत-

    • प्रतिपादक- सेफेलस तथा उसका पुत्र पोलीमार्क्स

    • सेफेलस “अपने व्यक्तव्यो और कार्यों में सच्चा होना (सत्य बोलना) तथा देवताओं और मनुष्य के प्रति ऋण चुकाना न्याय है|”

    • पोलीमार्क्स “मित्रों के साथ मित्रता/ भलाई तथा शत्रु के साथ शत्रुता/ बुराई करना ही न्याय है|” 


    1. न्याय का उग्रवादी सिद्धांत-

    • प्रतिपादक- थ्रेसीमैक्स 

    • थ्रेसीमैक्स “न्याय शक्तिशाली का हित/स्वार्थ/लाभ है|


    1. न्याय का व्यवहारवादी/ कारणता सिद्धांत-

    • प्रतिपादक- ग्लाकान 

    • ग्लाकान “न्याय भय शिशु है”

    • न्याय शक्तिशाली का हित न होकर दुर्बल वर्ग का हित है| दुर्बल वर्ग शक्तिशाली वर्ग के भय से समझौता करते हैं कि न अन्याय करेंगे और न करने देंगे|



    प्लेटो के अनुसार न्याय-

    • प्लेटो के अनुसार माननीय आत्मा में तीन तत्व पाए जाते हैं-

    1. ज्ञान/विवेक

    2. साहस

    3. भूख/तृष्णा


    • मानवीय आत्मा में इनमें से किसी एक तत्व की प्रधानता होती है और प्रधान तत्व के अनुसार व्यक्ति द्वारा कार्य करना ही न्याय है|

    • विवेक/ज्ञान- दार्शनिक का गुण है, जो शासन का कार्य करें| 

    • साहस का गुण- सैनिक वर्ग में पाया जाता है, जो समाज व राज्य की रक्षा का कार्य करें|

    • भूख या तृष्णा गुण- उत्पादक वर्ग का है, जो उत्पादन संबंधी कार्य करें|


    प्रधान लक्षण

    सामाजिक वर्ग

    उपयुक्त सद्गुण

    ज्ञान

    दार्शनिक

    विवेक

    संवेग

    सैनिक

    साहस

    तृष्णा

    उत्पादक

    संयम


    • प्लेटो न्याय को दो भागों में विभक्त करता है-

    1. व्यक्तिगत न्याय- मानवीय आत्मा के तीनों गुणों द्वारा अपने कर्तव्यों की पूर्ति करना व्यक्तिगत न्याय है|

    2. सामाजिक न्याय- जब तीनों वर्ग अपना अपना कार्य करें, एक दूसरे के कार्य में हस्तक्षेप ना करें तो वह सामाजिक न्याय होगा|


    • प्लेटो के न्याय सिद्धांत को श्रम विभाजन/ कार्य विशेषीकरण/ अहस्तक्षेप का सिद्धांत कहते हैं|


    • फोस्टर-

    • फोस्टर ने अपनी पुस्तक Masters of Political Thought 1941 में कहा है कि “प्लेटो का सामाजिक न्याय का विचार वस्तुपरक है|” 

    • इन्होंने प्लेटो की न्याय अवधारणा को आर्किटेक्टोनिक जस्टिस या रचना प्रकल्प न्याय की संज्ञा दी है|


    • C.L वेपर-

    • C.L वेपर इसे उपयुक्त प्रावधान (उत्पादक वर्ग), उपयुक्त संरक्षण (सैनिक वर्ग), उपयुक्त नेतृत्व (दार्शनिक वर्ग) का नाम देता है|


    • कार्ल पॉपर-

    • प्लेटो के आलोचक

    • कार्ल पॉपर ने प्लेटो के न्याय दर्शन के संबंध में कहा है कि “जब सर्वज्ञ दार्शनिक राजा ही इस न्याय व्यवस्था को चलाएगा तो उससे सर्वाधिकारवादी नैतिकता व सर्वाधिकारवादी न्याय प्रचलित होगा|”

    • कार्ल पॉपर ने प्लेटो के न्याय सिद्धांत को मिथक के दुरुपयोग की संज्ञा देते हुए आलोचना की है| 

    • पॉपर के अनुसार इससे कठोर वर्ग विभेद के परिणाम सामने आएंगे, इस विभेद को शिक्षा और मूल्यों के आधार पर उचित ठहराने का काम किया गया है| 

    • कार्ल पापर प्लेटो के न्याय सिद्धांत को सर्वासत्ताधिकारवाद का जन्मदाता कहता है तथा परिवर्तन और सुधार का विरोधी कहता है|


    • अरस्तु “प्लेटो का न्याय अत्यधिक एकीकरण एवं अत्याधिक पृथक्करण के बीच समावेश करने के प्रयत्न में पेचीदा सिद्धांत बन गया है|”

    • प्रोफेसर सेबाइन “प्लेटो की न्याय कल्पना जड़, आत्मपरक, निष्क्रिय, अनैतिक, अव्यावहारिक एवं अविश्वसनीय है|”

    • झेनोफोन तथा जॉन बोवले “प्लेटो का न्याय सिद्धांत अप्रजातांत्रिक है|”



    न्याय- आंगिक व रचना प्रकल्पमुलक सिद्धांत

    • M.B फॉस्टर ने अपनी पुस्तक Master of Political Thought- Plato to Machiavelli में प्लेटों के न्याय सिद्धांत को रचनाप्रकल्पमुलक बताया है|

    • आंगिक (Organic)- जिस प्रकार शरीर के सभी अंग आपस में जुड़े रहते हैं, उसी प्रकार सभी सद्गुण भी आपस में जुड़े रहते हैं और न्याय उन्हें जोड़ने का कार्य करता है|


    • रचना प्रकल्पमुलक (Architectonic)- न्याय एक वास्तुकार की तरह होता है जो विवेक, साहस, संयम के मध्य उचित समन्वय व संतुलन बनाए रखता है|

    • इस प्रकार न्याय समन्वयकारी व नियंत्रणकारी है|




     प्लेटो का शिक्षा सिद्धांत-

    (Plato's Theory of Education)


    • प्लेटो की The Republic (रिपब्लिक) में शिक्षा सिद्धांत का वर्णन मुख्यतः पुस्तक II, III और VII में मिलता है 

    • प्लेटो आदर्श राज्य की स्थापना के दो प्रमुख साधन बताता है-

    1. शिक्षा           (2) साम्यवाद


    • प्लेटो ने अपने ग्रंथ रिपब्लिक में शिक्षा पर इतने विस्तार से लिखा है कि रूसो ने इसे शिक्षा पर लिखा गया ग्रंथ तथा शिक्षा की सर्वोत्कृष्ट कृति कहा है| रूसो की पुस्तक एमाइल शिक्षा संबंधी प्लेटों के सुझाव के प्रति एक प्रतिक्रिया थी| 

    • रूसो “रिपब्लिक केवल राजनीतिशास्त्र पर लिखी गई पुस्तक मात्र ही नहीं है, बल्कि शिक्षा पर लिखा गया सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है जो पहले कभी भी नहीं लिखा गया|”

    • जैगर “प्लेटो के लिए शिक्षा कभी न हल होने वाला प्रश्नों का हल था|”

    • प्लेटो के अनुसार शिक्षा “शिक्षा मानसिक व्याधि को दूर करने का मानसिक उपचार है|”


    Note- ‘प्लेटो ने शिक्षा को सामाजिक प्रक्रिया माना है|’


    • प्लेटो ने राज्य नियंत्रित व राज्य द्वारा प्रदत शिक्षा पर बल दिया है|

    • प्लेटो के अनुसार राज्य का सबसे पहला और महत्वपूर्ण कर्तव्य शिक्षा देना है|

    • प्लेटो के अनुसार राज्य पहला और सबसे ऊंचा शिक्षण संस्थान है|


    प्लेटो की शिक्षा योजना-

    • प्लेटो ने अपनी शिक्षा योजना में एथेंस व स्पार्टा दोनों की शिक्षा प्रणालियों के गुणों को समन्वित किया है तथा दोनों के दोषों को समाप्त करने का प्रयत्न किया है|

    • प्लेटो ने एथेंस की बौद्धिक शिक्षा के साथ स्पार्टा की संयमित शारीरिक शिक्षा को जोड़ा है तथा शिक्षा को व्यक्ति तथा राष्ट्र दोनों के विकास का साधन माना है|

    • प्लेटो ने अपनी शिक्षा योजना में एथेंस से शिक्षा का व्यक्तिगत पहलु तथा स्पार्टा से सामाजिक पहलू अपनाया है| 


    • प्लेटो ने दो प्रकार की शिक्षा व्यवस्था की है-

    1. सैद्धांतिक शिक्षा         

    2. व्यवहारिक शिक्षा


    1. सैद्धांतिक शिक्षा को भी दो भागों में बांटा है- 

    (1) प्रारंभिक शिक्षा   (2) उच्च शिक्षा 


    1. प्रारंभिक शिक्षा- (20 वर्ष की आयु तक)

    • प्रारंभिक शिक्षा संरक्षक वर्ग के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य थी|

    • प्रारंभिक शिक्षा का उद्देश्य नागरिकों में सामाजिकता का विकास करना, भावनाओं के परिमार्जन से चरित्र निर्माण करना तथा सैनिक वर्ग के नागरिकों का निर्माण करना|

    • प्रारंभिक शिक्षा में प्लेटो संगीत एवं व्यायाम की शिक्षा को शामिल करता है| जिनको यूनानी भाषा में प्लेटो ने मौशिकी (Mousiki) और जिमनास्टिक कहा है|

    • मौशिकी (Mousiki) में संगीत और साहित्य दोनों शामिल है| 

    • जिमनास्टिक में व्यायाम के साथ आहारशास्त्र और चिकित्साशास्त्र भी शामिल है|  

    • प्लेटो “सर्वश्रेष्ठ शिक्षा आत्मा के लिए संगीत और शरीर के लिए व्यायाम है|”


    • प्लेटो ने प्रारंभिक शिक्षा को तीन भागों में बांटा है-

    1. 6 वर्ष तक शिक्षा- नैतिक व धार्मिक शिक्षा

    2. 6- 18 वर्ष तक की शिक्षा- व्यायाम व संगीत की शिक्षा

    3. 18- 20 वर्ष तक की शिक्षा- कठोर सैनिक शिक्षा


    1. उच्च शिक्षा (20- 35 वर्ष तक)-

    • 20 वर्ष की प्रारंभिक शिक्षा के बाद एक बौद्धिक एवं क्रियात्मक परीक्षा की व्यवस्था की गई, जो विद्यार्थी इस परीक्षा में योग्य व बुद्धिमान प्रमाणित होंगे उनके लिए इस उच्च शिक्षा की व्यवस्था थी|

    • उच्च शिक्षा का आधार वर्ग था, यह शिक्षा दार्शनिक शासक बनने वाले के लिए थी|

                       

    Note- जहां प्रारंभिक शिक्षा का आधार आयु था (अर्थात 20 वर्ष के सभी संरक्षक बच्चे) वहीं उच्च शिक्षा का आधार वर्ग था (केवल दार्शनिक वर्ग के लिए|


    • उच्च शिक्षा का उद्देश्य विज्ञान और ज्ञान द्वारा बुद्धि का परिष्कार करना तथा विवेक की सृष्टि करना तथा दिव्य दृष्टि को जन्म देना|


    • प्लेटो की उच्च शिक्षा को भी दो भागों में बांटा गया है-

    1. 20 -30 वर्ष की आयु की शिक्षा (Quadrivium)

    2. 30 से 35 वर्ष तक की शिक्षा (Trivium)


    1. व्यवहारिक शिक्षा (35 से 50 वर्ष तक)-

    • प्लेटो ने 35 से 50 वर्ष तक की सैद्धांतिक शिक्षा की जगह व्यवहारिक शिक्षा की व्यवस्था की है|

    • प्लेटो के अनुसार जो हर प्रकार से श्रेष्ठ सिद्ध हो वह आगे (50 वर्ष आयु तक) संसार का व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त करें| 

    • इस प्रकार जो व्यक्ति 50 वर्ष की उम्र तक हर अग्नि परीक्षा में खरे उतरेंगे, वहीं दार्शनिक राजा बनेंगे और राज्य का शासन भार संभालेंगे|


    • प्लेटो ने स्पार्टा की तरह स्त्री व पुरुष दोनों के लिए समान शिक्षा की व्यवस्था की है| प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य में योग्यता व क्षमता के आधार पर स्त्री-पुरुष को समान रूप से प्रत्येक पद का अधिकारी माना है| 


    Note- स्त्री-पुरुष की समान शिक्षा के संबंध में प्लेटो पाइथागोरस से प्रभावित था तथा राजनीति व शासन में महिलाओं की भागीदारी से संबंध में वह एरिस्टोफेन्स से प्रभावित था| एरिस्टोफेन्स ने ‘पार्लियामेंट में स्त्रियां’ पुस्तक में स्त्रियों की शासकीय भागीदारी का समर्थन किया|


    प्लेटो की शिक्षा योजना की आलोचना-

    • प्लेटो की शिक्षा योजना संकीर्ण थी, क्योंकि उत्पादक वर्ग (शिल्पी) की शिक्षा की कोई विशेष व्यवस्था नहीं करता है| जेलर “स्वयं अभिजात वर्ग का व्यक्ति होने के कारण प्लेटो शिल्पियों से घृणा करता था|”|


    • पॉपर “प्लेटो की शिक्षा को मत शिक्षण (Indoctrination) कहा है|

    • अल्फ्रेड हार्नले “प्लेटो के शिक्षा सिद्धांत में अधिनायक तंत्र के बीज निहित है|”



    प्लेटो का साम्यवाद का सिद्धांत 

    (Plato Theory of Communism)


    • प्लेटो के साम्यवाद के सिद्धांत (Theory of Communism) का वर्णन The Republic (रिपब्लिक) की मुख्यतः पुस्तक III और पुस्तक V में मिलता है| 

    • पुस्तक III- संरक्षक वर्ग के लिए संपत्ति और निजी जीवन से संबंधित प्रतिबंधों की आधारभूमि 

    • पुस्तक V- संरक्षक वर्ग के लिए स्त्रियों एवं बच्चों का साम्यवाद तथा निजी संपत्ति का निषेध 

    • शिक्षा मानसिक रोग का मानसिक इलाज है, जबकि साम्यवाद मानसिक रोग का भौतिक इलाज है|

    • शिक्षा योजना जहां सकारात्मक साधन है वही साम्यवाद नकारात्मक साधन है|

    • प्लेटो का साम्यवाद केवल संरक्षक वर्ग (सैनिक वर्ग व दार्शनिक वर्ग) के लिए ही है| यह उत्पादक वर्ग के लिए नहीं है| अर्थात यह अल्पसंख्यक वर्ग के लिए है|

    • साम्यवाद का उद्देश्य- संरक्षक वर्ग (सैनिक वर्ग व शासक वर्ग) को बाह्य आकर्षण कंचन व कामिनी (संपत्ति व परिवार) से दूर रखना है, ताकि ये उनके मार्ग में बाधा न बन सके|


    प्लेटो के साम्यवाद के रूप-

    • प्लेटो ने साम्यवादी योजना को दो भागों में बांटा है-

    1. संपत्ति का साम्यवाद       

    2. परिवार अथवा स्त्रियों का साम्यवाद


    1. संपत्ति का साम्यवाद-

    • प्लेटो अभिभावक/ संरक्षक वर्ग (शासक और सैनिक) के लिए संपत्ति का निषेध करता है, क्योंकि निजी संपत्ति इनको पथभ्रष्ट कर सकती है|


    1. परिवार अथवा स्त्रियों का साम्यवाद- 

    • प्लेटो ने अभिभावक वर्ग के लिए निजी संपत्ति के निषेध के साथ-साथ निजी परिवार का भी निषेध किया है|

    • प्लेटो का मत है कि परिवार का मोह, धन के मोह से अधिक प्रबल होता है| 



    प्लेटो के परिवार साम्यवाद योजना के उद्देश्य-

    1. संरक्षक वर्ग को परिवारिक मोह से मुक्त रखना|

    2. राज्य में एकता स्थापित करने हेतु

    3. नारियों की मुक्ति तथा समानाधिकार

    4. श्रेष्ठ संतान की प्राप्ति-

    • उत्तम संतान पाने के लिए प्लेटो ने संतानोत्पत्ति की आयु निश्चित की है- स्त्रियां 20 से 40 वर्ष की आयु में तथा पुरुष 25 से 55 वर्ष की आयु में राष्ट्र के लिए संतान पैदा करेंगे| 

    1. विवाह संस्था में सुधार

    • फिटे ने विवाह संस्था की समाप्ति का उद्देश्य कुछ खास नस्ल (Stock Breeder) पैदा करना है| तथा इन्होने सामाजिक अच्छाई की प्लेटों की योजना को कम्युनिस्ट रूप में ‘लोहे के घेरे में बंद व्यवस्था’ (Ironclad System) कहा है| 


    प्लेटो के शब्दों में साम्यवादी योजना-

    • “संरक्षक स्त्री-पुरुष में कोई भी अपना निजी घर (परिवार) नहीं बनाएगा| कोई भी किसी के साथ व्यक्तिगत रूप से सहवास नहीं करेगा| शासक स्त्रियां सब शासक पुरुषों की समान रूप से पत्नियां होंगी, इनकी संताने भी समान रूप से सबकी होंगी और दार्शनिक शासक को छोड़ न तो माता-पिता अपनी संतान को जान सकेगा और न संतान माता-पिता को|” 

    • प्लेटो के अनुसार स्थायी विवाह न करके केवल सुंदर स्वस्थ और बलशाली व्यक्ति ही राज्य की आवश्यकतानुसार संतान उत्पादन के लिए सहवास कर सकेंगे तथा इनसे उत्पन्न संतान राज्य द्वारा पाली जाएगी|

    • बच्चों की देखभाल राज्य द्वारा निर्मित शहर के एक अलग हिस्से में प्रशिक्षित नर्सों द्वारा की जाती थी| जिसे प्लेटो यूजेनिक्स कहता है| यहां निम्नतर गुण वाले व अपंग बच्चों को चुपचाप गुप्त रूप से समाप्त कर दिया जाएगा|


    • प्रो. बार्कर तथा प्रो.नैटलशिप “प्लेटो का संपत्ति का साम्यवाद अर्द्ध साम्यवाद है| क्योंकि समाज के सभी वर्गों पर लागू नहीं होता है|”

    • प्रो जॉयली “आभासी रूप से सभी समाजवादियों और साम्यावादियों की जड़ प्लेटो है|”



    प्लेटो का आदर्श राज्य (Plato’s Ideal State)-

    • प्लेटो के समय यूनान में जो राजनीतिक अराजकता व्याप्त थी, उसी की प्रतिक्रिया स्वरूप प्लेटो ने एक ‘आदर्श राज्य की कल्पना’ रिपब्लिक में प्रस्तुत की है|

    • आदर्श राज्य को प्लेटो ने कैलिपोलिस (kallipolis) कहा है, जिसका तात्पर्य है- सुंदर नगर या सुखी लोगों का समुदाय|

    • आदर्श राज्य एक कल्पना थी न कि ऐसा राज्य कहीं था| प्लेटो के शब्दों में “जिस राज्य की कल्पना कर रहे हैं, वह शब्दों में निहित है और उसे पृथ्वी पर कहीं भी नहीं देखा जा सकता|”

    • प्लेटो के अनुसार “राज्य एक स्वाभाविक, प्राकृतिक व नैतिक संस्था है|” 

    • प्लेटो के अनुसार राज्य व्यक्ति का वृहद रूप है तथा व्यक्ति व राज्य में जीवाणु और जीव का संबंध होता है| जो गुण या विशेषताएं अल्पमात्रा में व्यक्ति में पायी जाती है, वे ही विशेषताएं विशाल रूप में राज्य में पायी जाती है| राज्य मूलतः मनुष्य का बाह्य रूप होता है|

    • प्लेटो “राज्य मानव मस्तिष्क का ही व्यापक रूप है| राज्य बलूत के वृक्ष (Oaks/ ऑक के वृक्ष) अथवा चट्टानों से नहीं निकलते, वरन राज्य उन लोगों के मस्तिष्क व चरित्र का परिणाम होते है, जो उसमें निवास करते हैं|”


    प्लेटो के आदर्श राज्य की उत्पत्ति व विकास के चरण-

    • प्लेटो के आदर्श राज्य का निर्माण 3 चरणों में संपन्न हुआ है, जो निम्न है- 


    1. स्वस्थ राज्य/ आदिम राज्य/ मूल राज्य-

    • प्लेटो ने सामाजिक आवश्यकताओं को राज्य की उत्पत्ति का आधार माना है|

    • प्लेटो “राज्य मानव समाज की आवश्यकताओं से उत्पन्न होता है, जिसमें कोई भी आत्मनिर्भर नहीं है|”

    • राज्य की उत्पत्ति के प्रथम चरण में ‘उत्पादक वर्ग’ का विकास होता है|

    • प्लेटो राज्य निर्माण का प्रथम तत्व ‘आर्थिक तत्व’ मानता है |

    • आर्थिक तत्व/ वासना से मनुष्य की आवश्यकताओं का जन्म होता है|

    • आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य आपस में वस्तुओं का आदान प्रदान करते हैं तथा समाज में श्रम विभाजन तथा कार्य विशेषीकरण उत्पन्न होता है| और इसमें समाज में बढ़ई, सुनार, लोहार, व्यापारी, चिकित्सक वर्ग का निर्माण होता है तथा राज्य का निर्माण होता है|

    • कार्य विशेषीकरण के संबंध में प्लेटो कहता है कि “प्रत्येक व्यक्ति सदैव अपनी प्रकृति के अनुकूल एक ही कार्य करें, एक ही व्यवसाय करें, अनेक कार्य न करें, तभी नगर-राज्य एक होगा|”


    Note- ग्लॉकोन आदिम राज्य को ‘सूअरों का नगर’ कहता है|


    1. विलासिता पूर्ण राज्य-

    • राज्य उत्पत्ति के दूसरे चरण में ‘सैनिक वर्ग’ की उत्पत्ति होती है|

    • आवश्यकताओं में वृद्धि होने से अधिक भू-भाग की आवश्यकता होती है| अपने भू-भाग की रक्षा तथा वृद्धि के लिए सैनिक वर्ग की उत्पत्ति होती है|


    1. न्यायपूर्ण राज्य/ श्रेणीमूलक राज्य-

    • राज्य की उत्पत्ति के तीसरे चरण में ‘दार्शनिक वर्ग’ की उत्पत्ति होती है|

    • प्लेटो के अनुसार सैनिक वर्ग के लोगों में सामान्तया उत्साह तथा विवेक पाया जाता है, किंतु कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनमें उत्साह की अपेक्षा विवेक का अत्यधिक बाहुल्य होता है| ऐसे लोगों से दार्शनिक वर्ग का जन्म होता है|

    • इस राज्य में तीन श्रेणियां होती है- शासक, सैनिक, उत्पादक वर्ग

    • अतः यही वास्तविक राजनीतिज्ञ समाज है, यही पूर्ण राज्य है|


    Note- आदिम राज्य में जहां सभी व्यक्ति समान है, वहीं न्यायपूर्ण/ श्रेणीमूलक राज्य में विषमता पायी जाती है|


    Note- प्लेटो के अनुसार संरक्षक वर्ग में 2 वर्ग शामिल हैं    

    (1) सहायक संरक्षक या सैनिक वर्ग  

    (2) दार्शनिक वर्ग या पूर्ण संरक्षक वर्ग



    आदर्श राज्य में तीन वर्ग-

    • राज्य निर्माण के तीन तत्वों के आधार पर अथवा कार्य विविशेषीकरण तथा श्रम विभाजन के आधार पर प्लेटो ने आदर्श राज्य में तीन वर्ग बताए हैं-

    1. शासक/ दार्शनिक वर्ग/ संरक्षक वर्ग-

    • विवेक गुण की प्रधानता

    • कार्य- शासन करना, सहायक संरक्षक वर्ग (सैनिक वर्ग) तथा उत्पादक वर्ग के बीच संतुलन बनाना|

    • दार्शनिक शासक को प्लेटों नोएटिक मैन (Noetic Man) कहता है, जिसका अर्थ है- विवेकशील या बुद्धिमान या तर्कवान व्यक्ति|


    1. सैनिक वर्ग/ सहायक संरक्षक वर्ग-

    • साहस गुण की प्रधानता

    • कार्य- उत्पादक वर्ग व राज्य की भूमि की सुरक्षा करना|


    1. उत्पादक वर्ग-

    • वासना या क्षुधा तत्व की प्रधानता

    • कार्य- राज्य की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना|

    • उत्पादक वर्ग के लिए प्लेटो अपिटेटिव मैन (Appetitive Man) शब्द का प्रयोग करता है, जिसका अर्थ है- ऐसा व्यक्ति जिसका अपनी इच्छाओं, इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं होता है| 


    आदर्श राज्य की विशेषताएं-

    1. यह न्याय पर आधारित है|

    2. शिक्षा व साम्यवाद इसके दो आधार स्तंभ या साधन हैं|

    3. राज्य व्यक्ति का विराट रूप है|

    4. यह कार्य विशेषीकरण व अहस्तक्षेप पर आधारित है|

    5. नागरिकों के तीन वर्ग

    6. आदर्श राज्य में दार्शनिक राजा का शासन होगा|

    7. यह मानवीय स्वभाव के अनुकूल है|

    8. आदर्श राज्य का लक्ष्य विशुद्ध आध्यात्मिक और नैतिक है|

    9. राज्य का हित प्रधान व सर्वोपरि है, व्यक्ति उसका अंग मात्र है|

    10. स्त्री-पुरुष को समान अधिकार अर्थात शासन कार्य, शिक्षा आदि क्षेत्रों में स्त्री को भी पुरुष के समान अधिकार प्राप्त है|


    तीन वर्ग व तीन आत्माओं के सिद्धांतों की आलोचना-

    • अंबेडकर “प्लेटो के तीन वर्गों का वर्गीकरण भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था व जाति व्यवस्था की तरह श्रेणीकरण, ऊंच-नीच, शोषण को बढ़ावा देता है|”

    • सेबाइन “प्लेटो का वर्गीकरण प्राचीन भारत के कठोर जातीय वर्गीकरण से मिलता जुलता था, लेकिन प्लेटों के वर्ग, जातियां नहीं थी क्योंकि उनकी सदस्यता उत्तराधिकार में नहीं मिलती थी|”



    प्लेटो का दार्शनिक शासक-

    • दार्शनिक शासक का विचार प्लेटो ने अपनी पुस्तक रिपब्लिक की पुस्तक VI में दिया है|

    • पुस्तक VI- दार्शनिक शासक तथा शुभ के प्रत्यय (Form of the Good) 


    • प्लेटो आदर्श राज्य में शासन दार्शनिक के हाथ में देता है, जैसा कि प्लेटो के शब्दों में “जब तक दार्शनिक राजा नहीं होते अथवा इस संसार में राजाओं में दर्शनशास्त्र के प्रति भावपूर्ण भक्ति नहीं जागती तब तक नगर-राज्यों से बुराई नहीं हट सकती है|”

    • प्लेटो की शिक्षा व्यवस्था तथा साम्यवादी योजना के फलस्वरुप दार्शनिक राजा का निर्माण होता है|

    • प्लेटो दार्शनिक शासक को ‘विवेक का प्रेमी’ तथा नगर का सच्चा व अच्छा संरक्षक मानता है|

    • प्लेटो के मत में इस श्रेष्ठ मल्लाह के नेतृत्व में आदर्श राज्य की नौका आंधी और तूफान के झंझावतो से बचती हुई अपनी मंजिल तक अवश्य ही पहुंच जाएगी|

    • आदर्श राज्य में सरकार का संचालन नियम व कानूनों से न होकर दार्शनिक शासक के द्वारा होगा|

    • प्लेटो कानून को आदर्श राज्य के लिए अनावश्यक व हानिकारक मानता है|

    • दार्शनिक राजा पर कानून, नियमों का बंधन नहीं होता है, वह उन सबसे ऊपर होता है| इसके आदेश ही कानून  |

    • दार्शनिक राजा ‘सद्गुण ही ज्ञान है’ की आत्मप्रेरणा से कार्य करता है|


    • बुद्धिमान दार्शनिक शासक को संपूर्ण सत्ता सौंपने के पीछे प्लेटों के दो उद्देश्य थे-

    1. अत्याचार और धूर्तता से बचना

    2. समुदाय की भलाई


    • फॉस्टर ने आदर्श राज्य में दार्शनिक शासक की प्रभुसत्ता को ‘तर्कबुद्धि की प्रभुसत्ता सिद्धांत’ कहा है|

    • दार्शनिक राजा में विवेक की बाहुल्यता है, अतः उसके द्वारा भूल होने की संभावना कम है|



    दार्शनिक शासक की आज्ञापालन क्यों?

    • सैनिक वर्ग व उत्पादक वर्ग, दार्शनिक वर्ग की आज्ञाओं का पालन क्यों करेंगे, जिसके पास न तो सैनिक शक्ति है और न ही आर्थिक शक्ति| प्लेटो ने इस कठिनाई के निदान व विरोधी स्वरों को दबाने के लिए दार्शनिक वर्ग को दो सुझाव दिए हैं-

    1. कला व साहित्य पर राज्य का नियंत्रण

    2. उदात्त (महान) या शाही झूठ ( Noble or Royal lie) का सहारा लेना|


    उदात्त झूठ या शाही झूठ- 

    • इससे संबंधित ‘धातुओं और धरती से जन्म हुए लोगों का मिथक’ है|

    • प्लेटो का मत है कि दार्शनिक शासक को आमजन में इस महान/ उदात्त/ शाही झूठ का प्रचार करना चाहिए कि सभी मानव धरती से पैदा हुए हैं और उनके शरीर का निर्माण विभिन्न प्रकार की धातुओं से हुआ है|

    • दार्शनिक वर्ग के लोग सोने से, साहस तत्व वाला सैनिक चांदी से तथा तृष्णा वाला उत्पादक पीतल या कांसा से बना है|

    • यह तर्क समानता के साथ-साथ विभिन्नता व श्रेणीकरण भी पैदा करता है, क्योंकि सभी धातुएं जमीन से मिलती हैं, लेकिन उनके गुण अलग-अलग होते हैं|

    • प्लेटो के मत राज्य की भलाई के लिए उदात्त झूठ आवश्यक है, ताकि प्रत्येक वर्ग अपने कार्य तक सीमित रहे, किसी भी प्रकार का विरोधाभास पैदा ना हो| 


    • जर्मन दार्शनिक नीत्शे इस शाही झूठ की आलोचना करते है कि झूठ से अन्यायी समाज बनाता है न कि सही समाज| 

    • नीत्शे “प्लेटो ने इस मिथक का निर्माण मात्र राजनीतिक दमन से दर्शन की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि दर्शन को राजनीतिक प्रभाव प्रदान करने के लिए किया था|”

    • पॉपर “मिथक का दुरुपयोग इसके उपयोग से कहीं अधिक होता है|”


    आदर्श राज्य और दार्शनिक शासक की आलोचना- 

    • बार्कर ने प्लेटो के आदर्श राज्य को प्रबुद्ध निरंकुशवाद या विवेकशील निरंकुशवाद (Enlightened tyranny) की संज्ञा देता है|

    • कार्ल पॉपर प्लेटो को फासीवादी व लोकतंत्र विरोधी कहते हैं|


    Note- फॉस्टर “प्लेटो के संपूर्ण राजनीतिक विचार में दार्शनिक राजा की अवधारणा मौलिक है|”



    आदर्श राज्य का औचित्य-

    • रेंडल के अनुसार रिपब्लिक एक ऐतिहासिक व्यंग था, जिसका उद्देश्य यह दिखाना था कि स्पार्टन मॉडल  अवास्तविक और अजीबोगरीब था और यह काम नहीं कर सकता था|” 

    • ब्लूम कहते हैं कि “राजनीतिक आदर्शवाद सबसे विनाशकारी मानवीय भावना है और द रिपब्लिक आदर्शवाद की अब तक की सबसे बड़ी आलोचना है|”



    आदर्श राज्य का पतन और शासन प्रणालियों का वर्गीकरण- 

    • प्लेटो का आदर्श राज्य स्थायी नहीं है| प्लेटो भी आदर्श राज्य को स्थायी व व्यवहारिक नहीं मानता है|  

    • रिपब्लिक की 8वीं व 9वी पुस्तक में प्लेटो आदर्श राज्य के पतन व अन्य शासन प्रणालियों के बारे में वर्णन करता है|

    • आदर्श राज्य का पतन दार्शनिक शासक के पतन तथा आदर्श राज्य के सिद्धांतों में कमी के कारण होता हैं|  


    • आदर्श राज्य के पतन के साथ क्रमश 5 प्रकार की शासन प्रणालियों का उदय होता है-

    1. राजतंत्र (Monarchy)

    2. कीर्तितंत्र (Timocracy)

    3. अल्पतंत्र (Oligarchy)

    4. लोकतंत्र (Democracy)

    5. निरंकुश तंत्र (Tyranny)


    1. राजतंत्र- आदर्श राज्य के बाद सबसे पहले राजतंत्र का उदय होता है| प्लेटो के अनुसार राजतंत्र में जनता को सर्वाधिक सुख प्राप्त होता है, क्योंकि इसमें न्याय भावना से अनुप्रमाणित विवेक संपन्न दार्शनिक राजा शासन करता है|


    1. कीर्तितंत्र- इसके बाद साम्यवाद के त्याग तथा व्यक्तिगत संपत्ति के उदय से राजतंत्र का पतन तथा कीर्तितंत्र का उदय होता है| इसमें संरक्षक वर्ग सारी संपत्ति को हथिया लेता है तथा सारी शक्ति जमीदार योद्धाओं के हाथ में आ जाती है| विवेक की जगह उत्साह, साहस की प्रधानता बढ़ जाती है| इसमें योद्धा अपनी कीर्ति और महत्वाकांक्षा बढ़ाने की दृष्टि से राज्य का संचालन करते है|


    1. अल्पतंत्र- कीर्तितंत्र धीरे-धीरे अल्पतंत्र में बदल जाता है| उत्साह की जगह काम की प्रधानता बढ़ जाती है| इसमें संपूर्ण शक्ति कुछ व्यक्तियों और कुलो के हाथ में आ जाती है| आर्थिक बल पर व्यक्तिगत लाभ की दृष्टि से शासन किया जाता है| इस शासन तंत्र में धनीको तथा निर्धनों में खाई गहरी हो जाती है|


    1. लोकतंत्र- अल्पतंत्र में दरिद्र जनता में तीव्र असंतोष एवं विद्रोह की भावना उत्पन्न होती है| इसलिए दरिद्र जनता शासन पर कब्जा करके लोकतंत्र की स्थापना करती है| लोकतंत्र में सभी को स्वतंत्रता व समानता प्राप्त होती है, लेकिन अनुशासन व आज्ञापालन का भाव लुप्त हो जाता है|


    1. निरंकुश तंत्र- लोकतंत्र का अंत करने के लिए जनता में एक नेता खड़ा हो जाता है, वह जनता को बड़े मोहक आश्वासन देकर निरंकुशतंत्र की स्थापना करता है| जनता उस पर विश्वास करके उसे सत्ता व सैनिक शक्ति देती है, लेकिन वह जनता का दमन करता है तथा स्वेच्छाचारी शासन की स्थापना कर लेता है| ‘काम’ तत्व का सर्वाधिक पाशविक रूप निरंकुश तंत्र या तानाशाही शासन में देखने को मिलता है| यह  सबसे निकृष्ट शासन प्रणाली है| 



    Note- प्लेटो के अनुसार- 

    • सबसे उत्कृष्ट शासन प्रणाली- राजतंत्र

    • सबसे निकृष्ट शासन प्रणाली- निरंकुश तंत्र




    रिपब्लिक में लोकतंत्र की आलोचना-

    • प्लेटो के दिमाग पर सुकरात को विषपान कराने वाले एथेंस के लोकतंत्र का बड़ा बुरा प्रभाव पड़ा था|


    प्लेटो रिपब्लिक में लोकतंत्र के निम्न दोष बताता है- 

    1. लोकतंत्र में सत्ताधारी राजनीतिज्ञ व अधिकारी अज्ञानी व असक्षम होते है|

    2. शासन की शक्ति वोट बटोरने वाले स्वार्थी व असक्षम लोगों के हाथ में आ जाती है|

    3. लोकतंत्र को प्लेटो भीड़तंत्र कहता है| भीड़ अपनी इच्छा अनुसार शासकों से कानून बनवा लेती है|

    4. लोकतंत्र के स्वतंत्रता व समानता के दोनों आधार गलत हैं| प्लेटो के मत में इससे समाज में अव्यवस्था, अनुशासनहीनता और उच्छृखलता का प्रसार होता है|

    • प्लेटो- लोकतंत्र में पुत्र, पिता के तुल्य बन जाता है और वह माता-पिता के प्रति आदर और भय की भावना नहीं रखता है| अध्यापक अपने शिष्यों से डरता है| ऐसे राष्ट्र में सार्वजनिक स्वतंत्रता की पराकाष्ठा तब होती है जब दास-दासिया भी उनको मोल लेने वाले स्वामियों के बराबर स्वतंत्र हो जाते है|”


    1. लोकतंत्र प्लेटों के न्याय सिद्धांत के अनुकूल नहीं है, क्योंकि तत्कालीन एथेंस की जनतंत्रीय व्यवस्था में ‘लॉटरी’ प्रणाली द्वारा कोई व्यक्ति किसी भी पद के लिए चुना जा सकता था| लोकतंत्र में एक व्यक्ति अनेक कार्य कर सकता है| जबकि प्लेटो की न्याय व्यवस्था कार्य विशेषीकरण तथा श्रम विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है|

    2. प्लेटो की दृष्टि में लोकतंत्र अराजकता तथा बहुतंत्र है| अर्थात यहां अनेक तत्वों और अनेक व्यक्तियों का शासन रहता है| इस शासन में अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग होता है|

    3. लोकतंत्र भ्रष्ट, अकुशल व अनाड़ियों का शासन है|


    Note- प्लेटो अपनी बाद की अवस्था में लोकतंत्र का इतना कठोर आलोचक नहीं रहा था| जहां रिपब्लिक में प्लेटो लोकतंत्र को अल्पतंत्र से नीचे स्थान देता है, वही स्टेट्समैन में वह लोकतंत्र को अल्पतंत्र से श्रेष्ठ मानता है| 


    Note- प्लेटो तत्कालीन यूनानी राज्यों को ‘शुकरो की नगरी’ कहता है| क्योंकि वहां दार्शनिकों का शासन न होकर अनाड़ियों का शासन था|



    प्लेटो और फासीवाद-

    • प्लेटो को फासिस्टो का ‘अग्रगामी विचारक’ व प्रथम फासीवादी कहा जाता है|

    • कार्ल पॉपर, क्रोसमैन, रसेल, अल्फ्रेड हार्नले आदि ने प्लेटो को विश्व का प्रथम फासिस्ट और सर्वसत्ताधिकारवादी माना है|

    • क्रॉसमैन “प्लेटो का समाधान है, प्रबुद्ध निरंकुशता| प्लेटो को इतिहास में प्रथम फासिस्ट कहा गया है|”


    प्लेटो को निम्न कारण से फासिस्ट कहा जाता है-

    1. प्लेटो और फासीवाद दोनों अपने राष्ट्र को सर्वोपरि बताते हैं|

    2. प्लेटो और फासीवाद दोनों लोकतंत्र के विरोधी हैं|

    3. दोनों ने व्यक्ति की स्वतंत्रता को कोई स्थान नहीं दिया है|

    4. दोनों का रूप अधिनायकवादी है- 

    • प्लेटो- दार्शनिक राजा का अधिनायकवाद

    • फासीवाद- एक नेता या एक दल की निरंकुशता

    1. दोनों ने शासक को सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान व सबसे अधिक बुद्धिमान माना है|

    • प्लेटो- दार्शनिक शासक

    • फासीवाद- निरंकुश नेता शासक

    1. दोनों का कुलीनतंत्र में विश्वास है|

    • प्लेटो का कुलीनतंत्र- विवेकशील वर्ग/ दार्शनिक वर्ग

    • फासीवाद का कुलीनतंत्र- एक दल 

    1. दोनों व्यक्ति के केवल कर्तव्यों पर बल देते हैं|

    2. दोनों राज्य द्वारा नियंत्रित, विशेष पाठ्यक्रम की शिक्षा व्यवस्था करते हैं|

    3. दोनों का मनुष्यो की असमानता में विश्वास है| दोनों शासन करने की क्षमता कुछ ही व्यक्तियों में  मानते हैं|

    4. दोनों का दृष्टिकोण संकुचित है, क्योंकि जहां प्लेटो नगर राज्य को मानव विकास का चरम बिंदु मानता है, वही फासीवाद भी राष्ट्रीय राज्य को सभ्यता का सर्वोच्च सोपान कहता है|


    प्लेटो तथा फासीवाद में अंतर- 

    • G.C फील्ड, जॉन वायल्ड, जॉन एच हेलोवल विद्वानों का विचार है कि प्लेटो को फासिस्ट मानना एक मिथ्या धारणा है|



    प्लेटो: स्टेट्समैन (Plato: The Statesman)

    • प्लेटो की यह रचना 367- 361 ईसा पूर्व के मध्य लिखी गई| जब वह सेराक्यूज में डायनोसियस (द्वितीय) के सुधार में लगा हुआ था या इसके तुरंत बाद| 

    • स्टेट्समैन को ग्रीक भाषा में पॉलिटिक्स (Politicus) कहा जाता है|

    • ग्रीक भाषा के पॉलिटिक्स (Politicus) का शाब्दिक अर्थ है- ‘राजपुरुष या राजनीतिज्ञ या राजमर्मज्ञ|’

    • स्टेट्समैन में थियोडोरस, सुकरात तथा एक विदेशी के मध्य आदर्श राजनीतिज्ञ के स्वरूप एवं कर्तव्य के विषय में वार्तालाप या संवाद का वर्णन है |

    • इस संवाद या वार्तालाप में रिपब्लिक में प्रतिपादित आदर्शों पर पुन: विचार किया जाता है और विभिन्न प्रकार की शासन पद्धतियों के चक्र तथा उनके गुण-अवगुण का विवेचन किया जाता है |

    • स्टेट्समैन का मुख्य विषय- एक राजपुरुष या राजनेता है| प्लेटो ने राजनेता को सर्वोच्च सत्ता का अधिकारी माना है और राजनीतिक नेतृत्व को सभी विज्ञानों में प्रधान बतलाया है|


    • संवाद की पहली कड़ी में राजनीतिज्ञता अथवा राजमर्मज्ञता का संबंध ज्ञान से बताया है तथा संवाद श्रंखला की दूसरी कड़ी में ज्ञान के दो भाग बताए गए हैं-

    1. आलोचनात्मक ज्ञान

    2. आदेशात्मक ज्ञान


    1. आलोचनात्मक ज्ञान- इसमें निर्णय लिए जाते हैं तथा निर्णयो को कार्यान्वित करने के आदेश दिए जाते हैं|

    2. आदेशात्मक ज्ञान- राजनीतिज्ञता आदेशात्मक ज्ञान के अंतर्गत आती है| प्लेटो ने आदेशात्मक ज्ञान को भी दो भागों में बांटा है -

    1. प्रधान या सर्वोपरि भाग

    2. गौण या अधीन भाग


    1. प्रधान या सर्वोपरि भाग- राजनेता व प्रशासक इस श्रेणी में आते हैं| ये आदेश दे सकते हैं, ये प्रभुता संपन्न होते हैं इनके आदेश का स्रोत स्वयं ही होते हैं |

    2. गौण या अधीनस्थ भाग- इसमें अधीनस्थ लोग होते हैं, जो उन्हीं आदेशों को जारी कर देते हैं जो उन्हें दिए जाते हैं| इसमें सेनापति, न्यायाधीश व अन्य अधीनस्थ अधिकारी होते हैं|


    • प्लेटो की दृष्टि में जिन विज्ञानों का संबंध कर्म से है, उनमें राजनीतिज्ञता अथवा राजमर्मज्ञता (Statesment) सबकी सिरमौर है| 


     

    स्टेट्समैन में प्लेटो का राज्य- वर्गीकरण-

    • स्टेट्समैन में प्लेटो ने राज्य के 6 प्रकार बताए है, जो निम्न है-

    • प्लेटो ने दो आधारों पर 6 प्रकार के राज्यों का वर्गीकरण किया है-

    1. कानून

    2. शासकों की संख्या


    राज्यों के प्रकार


    शासकों की संख्या

      शासन के रूप

    A.  कानून प्रिय या कानून से संचालित होने वाले राज्य

    1  एक व्यक्ति का शासन

    1  राजतंत्र (Monarchy)


    2  कुछ व्यक्तियों का शासन

    2 कुलीन तंत्र (aristocracy)


    3  बहुत से व्यक्तियों का शासन

    3 प्रजातंत्र (democracy)

    B.  कानून द्वारा संचालित न होने वाले राज्य

    1  एक व्यक्ति का शासन

    4 निरंकुश तंत्र (Tyranny)


    2  कुछ व्यक्तियों का शासन

    5 अल्पतंत्र (Oligarchy)


    3  बहुत से व्यक्तियों का शासन

    6 अतिवादी प्रजातंत्र (Extren democracy)

     

    • Note- प्लेटो रिपब्लिक में राज्यों का वर्गीकरण आदर्श राज्य की विकृति तथा एक दूसरे राज्य की विकृति के रूप में करता है, जबकि स्टेट्समैन में राज्यों का वर्गीकरण विस्तृत रूप कानून के आधार पर किया है|


    • स्टेट्समैन के अनुसार-

    1. सर्वश्रेष्ठ शासन पद्धति- राजतंत्र

    2. सबसे निकृष्ट शासन पद्धति- निरंकुश तंत्र


    • प्रजातंत्र प्लेटो के अनुसार कानून आधारित शासनो में सबसे बुरा तथा कानून रहित शासनो में सबसे अच्छा है|


                    

    रिपब्लिक व स्टेट्समैन के राजनीतिक विचारों में अंतर-

    1. रिपब्लिक आदर्शवादी है, जबकि स्टेट्समैन यथार्थवादी है |

    2. स्टेट्समैन में प्लेटो प्रजातंत्र को हेय नहीं समझता है, जबकि रिपब्लिक में इसकी कटु आलोचना की है |

    3. रिपब्लिक में उत्पादक वर्ग को उपेक्षित रखा है, जबकि स्टेट्समैन में उन्हें ग्रीक नगर राज्य का नागरिक स्वीकार किया है|

    4. स्टेट्समैन में राजनेता का कार्य शासकों को प्रशिक्षित करना है, जबकि रिपब्लिक में ऐसी व्यवस्था नहीं है|

    5. रिपब्लिक में दार्शनिक शासकों को संप्रभुता दी गई है जबकि स्टेट्समैन में सर्वज्ञ राजपुरुष या राजनेता का महत्व प्रतिपादित है|

    6. रिपब्लिक में कानून को महत्व नहीं दिया गया है, जबकि स्टेट्समैन में कानून को महत्व दिया जाता है|




    प्लेटो : लॉज  (Plato : The Laws)

    • लॉज प्लेटो का अंतिम ग्रंथ था, जिसका प्रकाशन उसकी मृत्यु के 1 वर्ष बाद 346 ईसा पूर्व में हुआ| 

    • इसका प्रकाशन प्लेटो के शिष्य कोपस के फिलिप (Philip of copas) के द्वारा करवाया गया| 

    • लॉज प्लेटो का एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, जिसका प्रमुख प्रवक्ता या नायक सुकरात नहीं है|


    • इसमें संवाद के 3 पात्र हैं--

    1. बिना नाम का एथेंस वासी मुख्य वक्ता है, जो प्लेटो का प्रतिनिधित्व करता है|

    2. दूसरा मेगिलस है, जो स्पार्टा निवासी है|

    3. तीसरा कलिनियस है, जो क्रीट निवासी है|



    • लॉज में प्लेटो ने उप आदर्श राज्य अथवा द्वितीय सर्वश्रेष्ठ राज्य का खाका खींचा है| जिसमें कानून की प्रभुता होगी, किंतु शासन का संचालन ज्ञान और दर्शन ही करेंगे|

    • प्लेटो ने उप आदर्श राज्य अथवा द्वितीय सर्वश्रेष्ठ को यूनानी भाषा में मैग्नीशिया (Magnesia) कहा है|

    • लॉज में प्लेटो कानून को मन की उपज कहता है एवं उसे एक सभ्यता मानता है|


    लॉज में प्रतिपादित उप-आदर्श राज्य के प्रमुख सिद्धांत-

    1. आत्म संयम का सिद्धांत-

    • प्लेटो लॉज में न्याय की स्थापना के लिए आत्म संयम को आवश्यक मानता है| आत्म संयम से समाज में न्याय, विवेक, उत्साह की प्रतिष्ठा होती है तथा राज्य में एकता व स्वतंत्रता प्राप्त होती है| आत्म संयम राज्य को पूर्ण व दोष रहित बनाता है| आत्म संयम से ही उत्पादक वर्ग दार्शनिकों का नियंत्रण स्वीकार करता है|


    1. कानून विषयक सिद्धांत-

    • प्लेटो ने लॉज में कानून की प्रभुता स्थापित की है| शासक और शासित दोनों ही कानून के अधीन रहते हैं| 

    • प्लेटो के अनुसार कानून का निर्माण एक कानून निर्माणक अथवा संहिताकार द्वारा होना चाहिए| 

    • कानूनों को कार्यान्वित करने का भार किसी नवयुवक शासक को दिया जाना चाहिए|  


    1. इतिहास की शिक्षाएं-

    • लॉज में प्लेटो बताता है कि हमें भूतकालीन अनुभवों से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए|  

    • इतिहास के आधार पर प्लेटो ने कानून के नियम, मिश्रित संविधान, आत्म संयम जैसे तत्वों की पुष्टि की है| 


    1. मिश्रित राज्य या मिश्रित संविधान-

    • लॉज के उप-आदर्श राज्य की महत्वपूर्ण विशेषता मिश्रित संविधान अथवा मिश्रित राज्य है|  

    • इस सिद्धांत के अनुसार उप-आदर्श राज्य के निर्माण के लिए राजा और प्रजा, धनी और निर्धन, बुद्धिमान और शक्तिशाली सभी व्यक्तियों और वर्गों का सहयोग आवश्यक है| 

    • लॉज में वर्णित उप-आदर्श राज्य राजतंत्र, कुलीनतंत्र और जनतंत्र का समन्वय है, अर्थात प्लेटो शक्ति संतुलन के लिए मध्यम मार्ग अपनाता है|


    1. राज्य की भौगोलिक स्थिति व जनसंख्या-

    • प्लेटो के अनुसार उप-आदर्श राज्य समुद्र तट से दूर होना चाहिए, क्योंकि समुद्र तट के निकट होने पर विदेशी व्यापारी भ्रष्टाचार फैला सकते हैं|  

    • राज्य में जहाज बनाने वाले लकड़ी नहीं होनी चाहिए ताकि समुद्री व्यापार न हो, क्योंकि समुद्री व्यापार लोगों को व्यापारिक वृत्ति का बना देता है| जो राज्य को बेवफा व मित्र रहित बना देता है| 

    • प्लेटो नौसेना को स्थल सेना से खराब मानता है, जबकि अरस्तु सामुद्रिक राज्य के पक्ष में था|

    • राज्य कृषि प्रधान होना चाहिए|  

    • राज्य की जनसंख्या 5040 या 5040 परिवार होने चाहिए, यह जनसंख्या युद्ध व शांति के लिए उपयोगी है| 

    • 5040 का मुख्य भाजक 12 है| प्लेटो अपने आदर्श राज्य को 12 जातियों में बांटता है| उसके राज्य में मुद्रा, नापतोल की व्यवस्था द्वादशात्मक थी|


    1. संपत्ति एवं आर्थिक व्यवस्था- 

    • लॉज के उप-आदर्श राज्य में मानवीय दुर्बलताओं को ध्यान में रखते हुए प्लेटो निजी संपत्ति एवं परिवार की अनुमति दे देता है| 

    • प्लेटो संपत्ति में भूमि व मकान को शामिल करता है|  

    • प्लेटो अत्यधिक आर्थिक विषमता को समाप्त करना चाहता है| प्लेटो स्वामित्व तो निजी कर देता है लेकिन उपभोग सामूहिक रखता है|

    • राज्य के पास केवल प्रतीक मुद्रा होगी| ऋणों पर ब्याज नहीं लिया जा सकता| सोना चांदी अपने पास नहीं रखा जा सकता| 

    • उच्चतम और निम्नतम संपत्ति के बीच अनुपात 4:1 होना चाहिए|


    1. श्रम विभाजन-

    • प्लेटो उप-आदर्श राज्य में आर्थिक संरचना के आधार पर कार्यों का वर्गीकरण तीन भागों में करता है-

    1. विदेशियों और स्वतंत्र व्यक्ति (freeman) के लिए व्यापार व उद्योग

    2. दास और गुलामों के लिए खेती

    3. नागरिकों के लिए शासन प्रबंध अर्थात राजनीतिक कार्य 


    1. न्याय का प्रशासन- 

    • प्लेटो उप-आदर्श राज्य में 4 तरह के न्यायालयों का वर्णन करता है-

    1. स्थायी पंचायती न्यायालय

    2. क्षेत्रीय न्यायालय

    3. विशेष चुने न्यायाधीशों का न्यायालय

    4. संपूर्ण जनता का न्यायालय


    1. स्थानीय शासन- 

    • प्लेटो स्थानीय शासन की भी व्यवस्था करता है| नगरों में दो प्रकार के अधिकारी होंगे-

    1. नगर निरीक्षक

    2. बाजार निरीक्षक| 


    • ग्रामों में अधिकारी ग्रामीण निरीक्षक होंगे|


    1. विवाह तथा परिवार विषयक विचार- 

    • लॉज में प्लेटो स्त्रियों के साम्यवाद को समाप्त कर देता है| स्त्री शिक्षा, स्त्री- पुरुष समानता पर बल देता है|

    • विवाह विरोधी चरित्र के मध्य होना चाहिए| प्रति मास धार्मिक सभाओं का आयोजन हो, जिसमें युवक अपनी भावी पत्नी प्राप्त करें| 

    • विवाह का उद्देश्य व्यक्तिगत आनंद न होकर राज्य का हित होना चाहिए|


    1. शैक्षणिक व धार्मिक संस्थाएं-

    • प्लेटो राज्य नियंत्रित शिक्षा का पक्षधर है| 

    • प्लेटो धर्म को भी संस्थागत रूप देना चाहता है| धर्म को भी राज्य के नियंत्रण में रखना चाहते हैं| 

    • प्लेटो ने किसी भी प्रकार की निजी धार्मिक शिक्षा पर पाबंदी लगाई एवं पूजा-पाठ राज्य द्वारा अधिकृत पादरी ही कर सकते थे|

    • प्लेटो नास्तिकता का विरोध करता है| धर्म के प्रति श्रद्धा हीन व्यक्तियों के लिए मृत्युदंड की व्यवस्था करता है|


    1. नैश परिषद या निशाचर परिषद- 

    • इसमें 37 सदस्य होंगे, जिसमें 10 वरिष्ठ होंगे| 

    • शिक्षा संचालक, पुरोहित (पादरी) इसके सदस्य होंगे| 

    • यह काउंसिल कानून से ऊपर थी|

    • यह कानून की संरक्षक होगी|

    • इसे राज्य की वैधानिक संस्थाओं का नियमन और नियंत्रण की शक्ति भी प्राप्त होगी|



    स्वर्णिम सूत्र का नियम या कानून का स्वर्ण सूत्र या कठपुतली का रूपक-

    • कठपुतली का रूपक व स्वर्णिम सूत्र के नियम का वर्णन प्लेटो की अंतिम पुस्तक द लॉज में है| 

    • स्वर्णिम सूत्र के नियम में निम्न मुद्दे है-

    1. कठपुतली का रूपक (The Puppet metaphor)

    2. बुद्धि या तर्क का महत्व

    3. इच्छा शक्ति की ताकत (Enkrateia- एनक्रेटिया)

    4. इच्छा शक्ति की कमजोरी (Akrasia- अक्रासिया)


    • लॉज में संवाद के 3 पात्र हैं

    1. बिना नाम का एथेंस वासी मुख्य वक्ता है, जो प्लेटो का प्रतिनिधित्व करता है|

    2. दूसरा मेगिलस है, जो स्पार्टा निवासी है|

    3. तीसरा कलिनियस है, जो क्रीट निवासी है|


    • मेगिलस शराब सेवन को श्रेष्ठ सुख बताता है तथा शारीरिक व भौतिक सुखों को महत्वपूर्ण मानता हुआ प्रश्न पूछता है|

    • जवाब में एथेनियन कठपुतली के उदाहरण द्वारा नैतिक व बौद्धिक सुखों का महत्व बताता है| 


    1. कठपुतली का रूपक (The Puppet metaphor)- 

    • एथेनियन कहता है कि जिस तरह एक कठपुतली के खेल में कठपुतली को नचाने के लिए बहुत सारे सूत्र (डोरिया या धागे) होते हैं| 

    • ये सभी डोरिया कठपुतली को विभिन्न दिशाओं में खींचती है| 

    • इन डोरियों में एक डोरी पवित्र व सुनहरी होती है| यह डोरी कठपुतली को गलत दिशा में नहीं जाने देती है|

    1. बुद्धि या तर्क का महत्व- 

    • उसी प्रकार मानव को भांति भांति के भौतिक व शारीरिक सुख, भाव, लोभ, लालच अपनी ओर खींचते हैं 

    • पर तर्क व बुद्धि रूपी स्वर्णिम डोरी उसे भौतिक व शारीरिक सुखों का दास नहीं बनने देती है, बल्कि उसे नैतिकता व सद्गुण के मार्ग पर रखती है| 


    1. इच्छा शक्ति की ताकत (Enkrateia- एनक्रेटिया)- 

    • मजबूत इच्छा शक्ति वाला व्यक्ति अपने तर्क व बुद्धि के माध्यम से शारीरिक इच्छाओं पर नियंत्रण स्थापित कर नैतिक व आध्यात्मिक सुखों को श्रेष्ठत्तर मानता है| 


    1. इच्छा शक्ति की कमजोरी (Akrasia- अक्रासिया)-

    • वही कमजोर इच्छा शक्ति वाले मनुष्य को शारीरिक व भौतिक सुखों के सूत्र अपनी ओर खींच लेते हैं, जिसके कारण वह अंतत दुख की ओर अग्रसर होता है, क्योंकि भौतिक जगत नाशवान होता है| 




    प्लेटो के दर्शन का आलोचनात्मक मूल्यांकन-

    • प्लेटो साम्राज्य विस्तार का विरोधी, प्रजातंत्र का आलोचक, दास प्रथा की उपेक्षा करने वाला, व्यापारवाद का शत्रु तथा स्पार्टा के सैनिकवाद का समर्थक था|

    • नेटलशिप “राजनीतिक चिंतन के संपूर्ण इतिहास में और किसी विचारक की इतनी प्रशंसा, पूजा और आलोचना नहीं हुई जितनी की प्लेटों की|”


    • शिक्षा या यूजेनिम्स- 

    • प्लेटो के मत में शिक्षा या यूजेनिम्स व्यक्ति की क्षमता को प्रदर्शित करती है और अच्छे व्यक्तियों के गुणों को बाद की पीढ़ी में पहुंचाती है| 

    • लेकिन कार्ल पॉपर आलोचना करते हुए कहते हैं कि “यूजेनिम्स का उद्देश्य यह दर्शाना था कि कम लोग ज्यादा लोगों से बेहतर है| इस प्रकार इसमें जातीयता की झलक मिलती है|”


    • प्लेटो प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने स्त्रियों को शासक बनने की इजाजत दी थी तथा प्लेटो ने पहली बार स्त्रियों की शक्ति को समाज के विकास में लगाकर यौन भेदभाव का विरोध किया|



    • प्लेटो के दर्शन की आलोचनाएं-

    1. अरस्तु- प्लेटो का शिष्य अरस्तु प्लेटो के दर्शन का सबसे पहला और महत्वपूर्ण आलोचक था| अरस्तु ने प्लेटो के राज्य की अत्यधिक एकता, संपत्ति व परिवार के साम्यवाद की, प्लेटों के राज्य सिद्धांत की आलोचना की है|

    2. कार्ल पॉपर- कार्ल पॉपर ने अपनी पुस्तक ‘Open society and its enemies’ में प्लेटों को खुले समाज का शत्रु और बंद समाज का समर्थक कहा है| तथा प्लेटों को सर्वाधिकारवाद का दार्शनिक प्रणेता कहा है|

    3. क्रॉसमैन भी प्लेटो का आलोचक रहा है, इनकी पुस्तक प्लेटो टुडे (Plato today) है| क्रॉसमैंन ने कहा है कि “प्लेटो हमारे व अपने दोनों ही समय के लिए गलत था|”  

    4. क्रॉसमैन “प्लेटो का आदर्श राज्य तर्कपूर्ण रूप से सामान्य व्यक्तियों का लोकतंत्र नहीं है, बल्कि सुसंस्कृत लोगों के अनुवांशिक वर्ग का कुलीनतंत्र है, जो पितृसम्मत उदारता से मेहनतकश लोगों के प्रति चिंता प्रकट करते हैं|”

    5. जे जे  चैपमैन “प्लेटो एंद्रजालिको का राजकुमार है|”

    6. मैक्सी “प्लेटो पहला काल्पनिक (Utopian) विचारक था|”

    7. बार्कर “प्लेटो का दार्शनिक शासक प्रबुद्ध निरंकुशतावादी या विवेकशील अधिनायकवादी है|”

    8. फ्रांसीसी विचारक वाल्टेयर और जर्मन विचारक फ्रेडरिक विल्हेम नीत्शे ने प्लेटोवाद को ईसाईवाद का बौद्धिक पहलू बताया है|

    9. इसाह बर्लिन ने अपनी रचना Historical Inevitability(1954) मे प्लेटो के इतिहासवाद की आलोचना की है तथा प्लेटो को इच्छा की स्वतंत्रता, बहुलवाद व व्यक्तिवाद का विरोधी बताया है| 

    10. हन्ना आरेण्ट “प्लेटो फासीवाद का दार्शनिक प्रेरक है|”


                                            कार्ल पॉपर

    • कार्ल पॉपर प्रसिद्ध ऑस्ट्रीयाई-ब्रिटिश दार्शनिक व प्रोफेसर हैं| कार्ल पॉपर ने अपनी पुस्तक ‘Open society and its enemies’ 1945 में प्लेटो, हेगेल, कार्ल मार्क्स को खुले समाज का शत्रु बताया है|

    • कार्ल पॉपर ने संपूर्ण क्रांतिकारी परिवर्तनों (Radical changes) की बजाय धीमे खंडश: विकासवादी परिवर्तनों (Piecemeal social engineering) की सलाह दी है|

    • कार्ल पॉपर “पश्चिमी चिंतन या तो प्लेटोवादी रहा है या प्लेटो विरोधी लेकिन शायद ही कभी गैर प्लेटोवादी रहा हो|”



    प्लेटो से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य/ कथन-

    • बेंजामिन जावेट प्लेटो को दर्शनशास्त्र, राजनीति शास्त्र और आदर्शवाद का जनक कहते हैं|

    • एलेनचोस (Elenchos)- 

    • द्वंद्वात्मक पद्धति में प्रश्नोत्तरी के माध्यम से अवधारणाओं का जो स्पष्टीकरण किया जाता था, उसे एलेनचोस कहा जाता था|


    • Ideal Typology State (नैतिक दृष्टि से उत्कृष्ट राज्य)- 

    • प्लेटो आदर्श राज्य के लिए इस शब्द का प्रयोग करता है| 


    • प्रोफेसर डनिंग ने प्लेटो के आदर्श राज्य को कोरी कल्पना कहा है तथा आदर्श राज्य को ‘Romance’ नाम दिया है|

    • लियो स्ट्रास “आदर्शवाद रिपब्लिक की सबसे बड़ी आलोचना है|”

    • डब्लू फिट्स “प्लेटो की किसी किशोर जैसी अनिश्चय की स्थिति थी|”











    अरस्तु (The Aristotle) (384 ईसा पूर्व- 322 ईसा पूर्व)                  

     

    जीवन परिचय-

    • जन्म- 

    • 384 ईसा पूर्व 

    • मेसिडोनिया/ मकदूनिया की सीमा पर स्थित स्टेगिरा नामक यूनानी शहर में|


    • पिता- 

    • निकोमैक्स

    • निकोमैक मकदूनिया के राजा एमंट्स तृतीय या फिलिप के राजदरबार में वैद्य थे|


    • अरस्तु प्लेटो का शिष्य था| अरस्तु 367 ईसा पूर्व में 17 वर्ष की अवस्था में एथेंस चला गया तथा प्लेटो की अकादमी में सम्मिलित हो गया|

    • अरस्तु ने जीवन के अगले 20 वर्ष तक (प्लेटो की मृत्यु 347 ईसा पूर्व तक) अकादमी में अध्ययन, अध्यापन किया|

    • प्लेटो अपने शिष्य अरस्तु की योग्यता से प्रभावित था, इसलिए प्लेटो ने अरस्तु को अकादमी का मस्तिष्क या शरीरधारी बुद्धिमता या अकादमी का नोस (Naus) या बुद्धि का साक्षात अवतार कहा|

    • अरस्तु ने पुस्तकों का संग्रह कर पुस्तकालय बनाया था, इस कारण प्लेटो अरस्तु के निवास स्थान को विद्यार्थी का घर/ पाठक का घर कहता है|

    • अरस्तु को राजनीति विज्ञान का जनक कहा जाता है| 

    • अरस्तु ने कई विषयों पर लिखा है, इस कारण अरस्तु को सभी जानकारियों या ज्ञानो का गुरु (Master of them know) कहा जाता है|

    • मैक्सी ने अरस्तु को प्रथम राजनीतिक वैज्ञानिक कहा है|

    • कैटलिन ने अरस्तु को मध्यम वर्ग का दार्शनिक कहा है|

    • अरस्तु को तुलनात्मक राजनीति का पिता कहा जाता है, क्योंकि अरस्तु ने 158 संविधानो का तुलनात्मक अध्ययन किया था|

    • अरस्तु को संविधानवाद का पिता भी कहा जाता है| 

    • अरस्तु ने राजनीति विज्ञान को सर्वोच्च विज्ञान (Master of science) या परम विद्या (Master Art) या Architectonic science (वास्तुकारी विज्ञान) कहा है|

    • अरस्तु “मनुष्य का शुभ राजनीति शास्त्र का ध्येय होना चाहिए|”

    • प्लेटो की मृत्यु के बाद (347 ईसा पूर्व) अकादमी में उचित स्थान नहीं मिलने के कारण अरस्तु ने अकादमी छोड़ दी थी तथा एशिया माइनर चले गए, क्योंकि अकादमी का निर्देशन प्लेटो के भतीजे स्यूसिप्पस के हाथ में आ गया था|

    • एशिया माइनर के नगर एटारनोस (Atarneus) के निरंकुश शासक हर्मियस के पास अरस्तु रहने लगा,  हर्मियस अरस्तु का पहले शिष्य रहा था| 

    • हर्मियस ने ही अरस्तु का परिचय सिकंदर से कराया था|

    • 346 ईसा पूर्व में अरस्तु मकदूनिया/ मेसिडोनिया के राजकुमार  अलेक्जेंडर या सिकंदर का शिक्षक बना तथा सिकंदर के परामर्शदाता तथा चिकित्सक के रूप में कार्य करता रहा|

    • हर्मियस ने अरस्तु से सीखा था कि ‘एक व्यक्ति में शासक के क्या गुण होते है, नगर राज्य में अर्थव्यवस्था का क्या महत्व होता है, अन्य देशों के साथ संबंध कैसे बनाए जाते हैं आदि|

    • 342 ईसा पूर्व अरस्तु के मित्र हर्मियस को एक ईरानी ने धोखे से पकड़ लिया और सुसा ले जा कर हत्या कर दी| इस घटना से अरस्तु की यह धारणा बनी कि ‘विदेशी बर्बर जातियां यूनानीयों के शासन के अधीन ही रहनी चाहिए’ तथा इस सिद्धांत का प्रतिपादन अरस्तु ने अपने ग्रंथ पॉलिटिक्स में किया|

    • सिकंदर अरस्तू को पिता तुल्य आदर देता था| सिकंदर का कहना था कि यदि उसने अपने पिता से जीवन पाया है, तो गुरु ने उसे जीवन की कला दी है|”

    • विश्व विजय के लिए निकले सिकंदर के साथ अरस्तु भी घूमता रहा और इस बीच अरस्तु ने भारत के भी दर्शन किए थे|

    • 12 वर्षों तक विभिन्न स्थानों के भ्रमण के बाद 335 ईसा पूर्व में अरस्तु वापस एथेंस आ गया तथा एथेंस में अपनी शिक्षण संस्थान लिसियम/ लाइसियम की स्थापना की|



    अरस्तु की शिक्षण संस्थान-

    • नाम- लिसियम/ लाइसियम(Lyceum)

    • लिसियम में विशेष रुप से दर्शनशास्त्र को पढ़ाया जाता था| दर्शनशास्त्र के अलावा जीव विज्ञान तथा प्राकृतिक विज्ञान को भी पढ़ाया जाता था|



    • 323 ईसा पूर्व में सिकंदर की मृत्यु हो गई| सिकंदर ने चिरोनिया के युद्ध (338 ईसा पूर्व) में विजय के बाद एथेंस पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था, इसलिए एथेंसवासी सिकंदर से नाराज थे|

    • सिकंदर की मृत्यु के बाद अरस्तु को एथेंसवासी विरोधियों के षड्यंत्र (विरोधी एथेंसवासी अरस्तु पर देवों का अपमान अभियोग लगाने की तैयारी में थे) का सामना करना पड़ा, इसलिए वह एथेंस से भागकर कैलियस (chelies) चला गया|

    • 323 ईसा पूर्व में लिसियम या एथेंस से भागते हुए अरस्तु ने कहा कि “मैं एथेंस वासियों को दर्शन के विरुद्ध दूसरी बार अपराध करने का अवसर नहीं दूंगा|”


    • जहां प्लेटो आदर्शवादी और मूलगामी थे, जबकि अरस्तु वास्तविकतावादी और उदार थे|


    • विवाह- अरस्तु का विवाह 344 ईसा पूर्व हर्मियस या हिप्पीयस की बहन या भतीजी पिथियास से हुआ| 


    • अरस्तु ने राजनीति शास्त्र को नीति शास्त्र से पृथक कर उसे स्वतंत्र रूप प्रदान किया|

    • डनिंग “पश्चिमी जगत में राजनीति विज्ञान अरस्तु से ही प्रारंभ होता है|

    • दांते ने अरस्तु को बुद्धिमान वैज्ञानिकों का गुरु कहा है|

    • कैटलिन “कन्फ्यूशियस के बाद अरस्तु सामान्य ज्ञान और मध्यम मार्ग का सबसे बड़ा प्रतिपादक है|”

    • कैटलिन ने अरस्तु को विद्या का महानतम और प्रथम सर्वज्ञानी कहा है|

    • हैकर “यदि प्लेटो प्रथम राजनीतिक दार्शनिक होने का दावा कर सकते हैं, तो बिना शक के अरस्तु प्रथम राजनीतिक वैज्ञानिक है|”


    • मृत्यु- 322 ईसा पूर्व में कैलियस (chelies) में अरस्तु की मृत्यु हो गई|



    अरस्तु द्वारा राजनीतिशास्त्र को सर्वोच्च विज्ञान या परम विद्या कहने का कारण-


    • अरस्तु के अनुसार राजनीति शास्त्र का सरोकार मानव जीवन के साध्य से है, जबकि अन्य विज्ञान इसके लिए केवल उपयुक्त साधन प्रदान करते हैं| 

    • मनुष्य सदजीवन की प्राप्ति के लिए राजनीतिक समुदाय के रूप में रहते हैं वे सदजीवन की प्राप्ति के लिए जो-जो करते हैं, जो-जो नियम, संस्थाएं और संगठन बनाते हैं, उन सब का अध्ययन राजनीति शास्त्र के विचार क्षेत्र में आता है|

    • अरस्तु ने साध्यो के श्रेणी तंत्र का विचार दिया है| इस विचार के अनुसार अन्य विधाओं के साध्य अंततोगत्वा राजनीति शास्त्र के साथ में विलीन हो जाते हैं तथा राजनीति शास्त्र साध्यो की श्रेणी तंत्र में सबसे ऊपर होता है|



    अरस्तु की रचनाएं-

    1. The Politics- 

    • इसका मुख्य विषय नगर- राज्य (पोलिस) है|

    • इसमें राज्य के उदय और स्वभाव, आदर्श राज्य और उसके संविधान और नागरिकता इत्यादि पर विचार किया गया है|


    1. The Constitution- 

    • इसमें 158 संविधानो का तुलनात्मक अध्ययन है| संविधानो में प्रमुखत: एथेंस का संविधान है| वर्तमान में एकमात्र एथेंस का संविधान ही उपलब्ध है|


    1. Nicomachus Ethics व उडेनियन एथिक्स- 

    • Nicomachus Ethics में मानव आत्मा के अध्ययन पर जोर दिया गया है| आत्मा की अमरता उडेनियन एथिक्स का केंद्र है| 

    • अरस्तु ने आत्मा को प्राकृतिक और शरीर से अलग बताया है और यह विश्वास प्रकट किया है कि मृतकों का अस्तित्व जीवितो से बेहतर होता है| 

    • इन दोनों कृतियों में व्यक्तिगत खुशी पर विचार किया है, जबकि द पॉलिटिक्स में राज्य को खुशी का स्त्रोत बताया है|



    अरस्तु की अध्ययन पद्धति-

    1. आगमनात्मक अध्ययन पद्धति- 

    • यह विशिष्ट से सामान्य की ओर चलने वाली अध्यन पद्धति है| इसको उदगमनात्मक अध्ययन पद्धति भी कहते हैं| यह वैज्ञानिक अध्ययन पद्धति है|


    1. ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति- 

    • किसी भी क्रांति के कारणों की जांच हेतु अरस्तु ने इतिहास का सहारा लिया है| 

    • राजनीतिक चिंतन में ऐतिहासिकता का सहारा संभवत सर्वप्रथम अरस्तु ने लिया है, इस कारण अरस्तु को ऐतिहासिक विधि का जनक भी कहा जाता है|


    1. तुलनात्मक अध्ययन पद्धति- 

    • अरस्तु ने 158 संविधानो का तुलनात्मक अध्ययन किया है|


    1. सौद्देश्यात्मक व सादृश्यात्मक अध्ययन पद्धति-

    • सौद्देश्यात्मक अध्ययन पद्धति में यह माना जाता है कि प्रत्येक वस्तु अथवा विषय का अपना उद्देश्य होता है|   

    • सादृश्यात्मक अध्ययन पद्धति के अंतर्गत अरस्तु ने अपने विचारों के समर्थन में प्राणी जगत तथा चिकित्सा शास्त्र से सादृश्य प्रस्तुत किए हैं|


    1. वैज्ञानिक अध्ययन पद्धति-   

    • मैक्सी के शब्दों में “अरस्तु के पॉलिटिक्स ग्रंथ का एक महानतम गुण यह है, कि इसकी रचना में वैज्ञानिक पद्धति को अपनाया है|”


    1. विश्लेषणात्मक अध्ययन पद्धति- 

    • इस पद्धति के अंतर्गत वस्तु के निर्माणकारी तत्वों का अध्ययन करके उस वस्तु का अध्ययन किया जाता है|  

    • अरस्तु राज्य को एक पूर्ण वस्तु मानकर उसके निर्माणकारी तत्वों जैसे- ग्रामों, परिवारों, नागरिकों का अध्ययन करता है|


    1. अनुभवमुलक अध्ययन पद्धति- 

    • ज्ञान प्राप्त करने का वह तरीका जिसमें ज्ञानेंद्रियों के अनुभव के आधार पर कोई निष्कर्ष निकाला जाता है|



    अरस्तु की रचना पॉलिटिक्स (The Politics)-

    • अरस्तु की सभी रचनाओं में पॉलिटिक्स उसकी सर्वश्रेष्ठ एवं महत्वपूर्ण रचना है| इसमें पहली बार राजनीति को एक वैज्ञानिक रूप दिया गया है|

    • पॉलिटिक्स का मुख्य विषय नगर राज्य (Polis) है|

    • जहां प्लेटों राजनीति और नैतिकता में कोई भेद नहीं समझता था, वहीं इस ग्रंथ में अरस्तु ने राजनीति को नैतिकता से व दर्शनशास्त्र से पृथक किया है|

    • जेलर “अरस्तु की पॉलिटिक्स प्राचीन काल में विरासत में प्राप्त होने वाली एक सर्वाधिक मूल्यवान निधि है और राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में प्राप्त होने वाला महानतम योगदान है|” 

    • मेकलवेन ने पॉलिटिक्स को भ्रमपूर्ण कृति कहा है| 


    • पॉलिटिक्स में कुल 8 पुस्तकें है, जिन्हें विषय की दृष्टि से बार्कर के अनुसार तीन वर्गों में बांटा जा सकता है-

    1. प्रथम वर्ग- पहली, दूसरी और तीसरी पुस्तके प्रथम वर्ग में आती है|

    1. प्रथम पुस्तक- राज्य की प्रकृति, राज्य के उद्गम और आंतरिक संगठन तथा दास प्रथा का वर्णन|

    2. दूसरी पुस्तक- प्लेटो द्वारा प्रतिपादित आदर्श राज्य एवं स्पार्टा, क्रिट, कार्थेज आदि तत्कालीन राज्यों की समीक्षा|

    3. तीसरी पुस्तक- राज्यों का वर्गीकरण, नागरिकता व न्याय के स्वरूप का विवेचन|


    1. दूसरा वर्ग- चौथी, पांचवी, छठी पुस्तकें

    1. चौथी पुस्तक- विभिन्न प्रकार की वास्तविक शासन प्रणालियों का वर्णन|

    2. पांचवी पुस्तक- विभिन्न शासन प्रणाली में होने वाले वैधानिक परिवर्तनों और क्रांति के कारणों का प्रतिपादन

    3. छठी पुस्तक- लोकतंत्र और अल्पतंत्रों को सुस्थिर बनाए जाने वाले उपायों का वर्णन (क्रांति रोकने के उपाय)|


    1. तीसरा वर्ग- सातवीं और आठवीं पुस्तकें

    1. सातवीं व आठवीं पुस्तक- इन पुस्तकों में आदर्श राज्य (Polity) और उसके सिद्धांतों का विवेचन है|



    सामूहिक निर्णय बुद्धि का सिद्धांत-

    • पॉलिटिक्स में अरस्तु ने सर्वोच्च सत्ता को जनता के हाथों में मानकर सामूहिक निर्णय बुद्धि का सिद्धांत दिया है| 

    • अरस्तु “समिति अपने सबसे बुद्धिमान सदस्य से भी बुद्धिमान होती है|”

    • अरस्तु कहता है कि जनता की सामूहिक बुद्धि सबसे बुद्धिमान शासक से भी बेहतर होती है| 


    • Note- लेकिन अरस्तू ने निकोमैक्स एथिक्स पुस्तक में बुजुर्गों व बुद्धिमानों के विचारों को ज्यादा महत्वपूर्ण माना है|



                   अरस्तु के राज्य संबंधी विचार

    • पॉलिटिक्स की प्रथम पुस्तक में अरस्तु ने राज्य संबंधी सिद्धांतों का वर्णन किया है|

    • अरस्तु के अनुसार राज्य का जन्म विकास के कारण हुआ है| राज्य एक स्वाभाविक एवं प्राकृतिक संस्था है|

    • राज्य के उद्देश्य व कार्य नैतिक हैं तथा राज्य सभी संस्थाओं में श्रेष्ठ और उच्च है|

    • अपने गुरु प्लेटो के समान अरस्तु का लक्ष्य भी सोफिस्टो के इस मत का खंडन करना है कि राज्य एक परंपराजनित व कृत्रिम संस्था है|

    • अरस्तु के अनुसार राज्य राजनीतिक संगठन का उच्चतम स्वरूप है और सामाजिक विकास का चरम बिंदु|


    राज्य की उत्पत्ति व विकास

    • अपने गुरु प्लेटो की भांति अरस्तु भी सोफिस्टो के इस मत का खंडन करता है कि राज्य समझौते का परिणाम है|

    • अरस्तु के अनुसार व्यक्ति अपनी प्रकृति से ही एक राजनीतिक प्राणी है और राज्य व्यक्ति की इसी प्रवृत्ति का ही परिणाम है| 

    • मानव प्रकृति की व्याख्या करने के लिए अरस्तू ने ‘जून पॉलिटिकोन’ (Zoon Politikon) शब्द का प्रयोग किया है|

    • ‘जून पॉलिटिकोन’ (Zoon Politikon) का अर्थ है- राजनीतिक प्राणी

    • अरस्तु के अनुसार राज्य का जन्म विकास का परिणाम है और इस विकास का क्रम परिवार से आरंभ होता है| 

    • अरस्तु के शब्दों में “राज्य प्रकृति की उपज है और व्यक्ति स्वभाव से राजनीतिक प्राणी है|” 

    • अरस्तु के अनुसार राज्य की उत्पत्ति जीवन की आवश्यकताओं से होती है| अरस्तु के शब्दों में “केवल जीवन मात्र की आवश्यकता के लिए राज्य उत्पन्न होता है और अच्छे जीवन की उपलब्धि के लिए कायम रहता है|”

    • भौतिक, सांस्कृतिक, नैतिक, यौन संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वामी तथा दास और स्त्री एवं पुरुष एक दूसरे की तरफ आकृष्ट होते हैं तथा परिवार का जन्म होता है| अर्थात राज्य निर्माण की शुरुआत परिवार से होती है|

    • कई परिवार मिलकर ग्राम का निर्माण करते हैं फिर कई ग्राम मिलकर नगर- राज्य को जन्म देते हैं|

    • अरस्तु के शब्दों में “राज्य एक पूर्ण और आत्मनिर्भर परिवारों और ग्रामों का समूह है, जिसका तात्पर्य एक सुखी और सम्मान पूर्ण जीवन से है|”


    • राज्य के विकास का स्वरूप सावयवी (Organic), जैविक है| व्यक्ति, परिवार और ग्राम इसके अंग हैं|

    • अरस्तु का राज्य उत्पत्ति संबंधी विचार विकासवादी सिद्धांत के अनुरूप है|


     अरस्तु के अनुसार राज्य की विशेषताएं-

    1. राज्य की प्रकृति-   

    • अरस्तु राज्य को प्राकृतिक, स्वाभाविक, जैविक संस्था मानता है|

    • अरस्तु राज्य को एक कायोनोनिया (koinonia) अर्थात ऐसा समुदाय मानता है, जिसके बिना जीवन संभव नहीं है |

    • अरस्तु के शब्दों में “राज्य स्वाभाविक है और इसके बिना मनुष्य का जीवन संभव नहीं है| जो व्यक्ति राज्य के बाहर रहता है वह या तो पशु है या देवता|


    1. राज्य सर्वोच्च समुदाय के रूप में-

    • अरस्तु राज्य को ‘समुदायों का समुदाय’ तथा ‘सर्वोच्च समुदाय’ मानता है |

    • राज्य मनुष्य की बौद्धिक, नैतिक, आध्यात्मिक सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है| 

    • राज्य का उद्देश्य परमसुख और संपूर्ण विकास तथा पूर्ण आत्मनिर्भरता को प्राप्त करना है| 


    1. राज्य व्यक्ति से पूर्व का संगठन है- 

    • अरस्तु मनोवैज्ञानिक, बौद्धिक व तर्क की दृष्टि से राज्य को व्यक्ति का पूर्ववर्ती मानता है|

    • अरस्तु का तर्क है कि राज्य समग्रता है तथा व्यक्ति उसका अंग है|

    • अरस्तु का कहना है कि “समय की दृष्टि से परिवार पहले हैं, परंतु प्रकृति की दृष्टि से राज्य पहले हैं|”


    1. राज्य अंतिम एवं पूर्ण संस्था है-

    • अरस्तु ने नगर- राज्यों को सामाजिक और राजनीतिक विकास की चरम सीमा माना है|

    • अरस्तु के अनुसार परिवार से बने नगर-राज्यों के बाद कोई विकास नहीं होता है|


    1. राज्य का जैविक रूप -

    • अरस्तु राज्य को एक जीव की तरह मानता है तथा उसके अंगों की तरह व्यक्ति को मानता है|

    • Note- अरस्तु हेगेल की तरह राज्य को अति प्राणी भी नहीं मानता है, वह केवल राज्य को व्यक्ति के ऊपर मानता है|


    1. राज्य आत्मनिर्भर है-

    • अरस्तू का राज्य मनुष्य की सभी आवश्यकताओं (आर्थिक, नैतिक, भौतिक, आध्यात्मिक आदि)  की पूर्ति करने में आत्मनिर्भर है|

    • अरस्तु ने आत्मनिर्भरता शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया है| इसके लिए अरस्तू ने यूनानी शब्द ‘Autarkia’ का प्रयोग किया है, जिसका अर्थ है- ‘पूर्ण निर्भरता| 


    1.  राज्य विभिन्नता में एकता है-

    • प्लेटो की तरह अरस्तु एकता की स्थापना की बात नहीं करता है|

    • राज्य विभिन्न तत्वों से मिलकर बना है|

    • इस प्रकार सभी तत्वों का महत्व रहे इसलिए अरस्तु राज्य के विभिन्नता में एकता का सिद्धांत अपनाता है

    • अरस्तु के शब्दों में “राज्य तो स्वभाव से ही बहुआयामी होता है| एकता की ओर अधिकाधिक  बढ़ना तो राज्य का विनाश करना होगा|”


    1. नगर- राज्य सर्वाधिक श्रेष्ठ राजनीति संगठन है

    2. राज्य एक क्रमिक विकास है


    1. संविधान राज्य की पहचान है-

    • अरस्तु के मत में संविधान राज्य की पहचान है और संविधान में परिवर्तन राज्य में परिवर्तन करने के समान है| 


    1. राज्य और शासन में भेद-

    • अरस्तु ने राज्य और शासन में स्पष्ट भेद किया है| जहां राज्य समस्त नागरिकों और गैर नागरिकों का समूह है वहां शासन उन नागरिकों का समूह है जिनके हाथ में सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता है|

     


    राज्य के उद्देश्य एवं कार्य-

    • अरस्तु के अनुसार राज्य का उद्देश्य मानव के श्रेष्ठ जीवन या सद्गुणी जीवन की प्राप्ति है|

    • राज्य सद्गुणी जीवन की प्राप्ति के लिए मनुष्यों का नैतिक संगठन है|

    • अरस्तु के अनुसार “राज्य की सत्ता उत्तम जीवन के लिए है ना कि केवल जीवन व्यतीत करने के लिए|”

    • अरस्तु के अनुसार राज्य एक सकारात्मक अच्छाई है| 

    • अरस्तु ने राज्य का एक प्रमुख कार्य नागरिकों के लिए शिक्षा की व्यवस्था करना माना है|

    • अरस्तु ने राज्य का यह कार्य भी माना है कि वह नागरिक के लिए अवकाश जुटाने का प्रयत्न करें|



    राज्य और व्यक्ति का संबंध-

    • अरस्तु ने राज्य और व्यक्ति में गहरा संबंध बताया है|

    • एक व्यक्ति की तरह राज्य में भी साहस, आत्म नियंत्रण तथा न्याय के गुण होने चाहिए|

    • राजा को भी व्यक्ति के समान आत्मनिर्भर और नैतिक जीवन व्यतीत करना चाहिए|

    • राजा भी व्यक्ति के समान नैतिक नियमों की पालना करता है|


    • अरस्तु ने मानव मस्तिष्क या आत्मा को तीन भागों में बांटा है-

    1. जड़ अवस्था (Vegetative Soul)    

    2. पशु अवस्था (Animal Soul)

    3. बौद्धिक अवस्था (Intellectual Soul)       


    • अरस्तु राज्य के विकास की तुलना मानव मस्तिष्क या आत्मा की तीनों अवस्था से करता है|


    1. जड़ अवस्था- जिस तरह जड़ अवस्था में मानव जाति को आगे बढ़ाता है, उसी तरह परिवार भी जाति को आगे बढ़ाता है

    2. पशु अवस्था- जिस तरह पशु अवस्था में गतिशीलता होती है, उसी तरह ग्राम में भी गतिशीलता पाई जाती है|

    3. बौद्धिक अवस्था- इस अवस्था में बुद्धि का विकास होता है, उसी तरह नगर- राज्य में भी बुद्धि का विकास होता है|


    • Note- Politics के तीसरे खंड में अरस्तू ने राज्य को ‘स्वतंत्र लोगों का समुदाय’ (Association of freeman) कहा है|


     

    अरस्तु के दास प्रथा संबंधी विचार 


    • दासता, परिवार एवं संपत्ति संबंधी विचार अरस्तु ने पॉलिटिक्स की प्रथम पुस्तक में दिए हैं|

    • अरस्तु के दासता संबंधी विचार उनकी रूढ़िवादिता के प्रमाण हैं, क्योंकि उस समय दास प्रथा तत्कालीन यूनानी जीवन का एक विशेष अंग थी|

    • अरस्तु दास प्रथा का कट्टर समर्थक था| 

    • अरस्तु के शब्दों में “जिस प्रकार वीणा आदि वाद्य यंत्रों की सहायता के बिना उत्तम संगीत उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार दासो के बिना स्वामी के उत्तम जीवन का तथा बौद्धिक एवं नैतिक गुणों का विकास संभव नहीं है|” 

    • जहां प्लेटो रिपब्लिक में दासो का कहीं कोई वर्णन नहीं करता, परंतु लॉज में तत्कालीन समाज का एक वर्ग मानता है, वहां अरस्तु खुद दासो का स्वामी था तथा दास प्रथा को उचित मानते हैं| 

    • बार्कर का मत में “प्लेटो ने द रिपब्लिक की पांचवी पुस्तक में यूनानी द्वारा यूनानी को गुलाम बनाए जाने का विरोध किया तथा द लॉज में उन्होंने दासो के संरक्षण के लिए विधान की आवश्यकता को मान्यता दी| प्लेटो ने दासो को अविकसित मस्तिक वाला बताकर बच्चों के साथ वर्गीकृत किया| 

    • अरस्तु दासता को प्राकृतिक मानता था|

    • अरस्तु “दास की स्थिति स्वामी तथा पशु से भिन्न है| विवेक न होने के कारण स्वामी से भिन्न है और विवेक को समझ सकने के कारण पशु से भिन्न है |”


    दास कौन-

    • अरस्तु दास को पारिवारिक संपत्ति मानता है| अरस्तु के अनुसार संपत्ति दो प्रकार की है-

    1.  सजीव संपत्ति- इसमें हाथी, घोड़े, अन्य पशु एवं दास सम्मिलित हैं|

    2. निर्जीव संपत्ति- मकान, खेत और अन्य अचल संपत्ति इसमें आती है|


    इस प्रकार दास-

    • दास मनुष्य तो है, परंतु स्वामी रूपी साध्य का साधन है|

    • दास पूरा का पूरा स्वामी का होता है, वह आंशिक रूप से भी अपना नहीं होता है|

    • दास एक सजीव संपत्ति है|

    • संपत्ति होने के नाते दास को खरीदा-बेचा जा सकता है|


    दास प्रथा के आधार-

    1. दास प्रथा एक स्वाभाविक व्यवस्था है-

    • अरस्तु के अनुसार “दास प्रथा प्राकृतिक है, विषमता प्रकृति का नियम है, कुछ व्यक्ति जन्म से स्वामी तो कुछ अन्य व्यक्ति जन्म से दास होते हैं|”

    • जो व्यक्ति जन्म से अयोग्य, बुद्धिहीन, अकुशल, आज्ञा मानने वाले होते हैं, जिनका शरीर शारीरिक श्रम के लिए बना होता है वह दास होता है तथा जो व्यक्ति जन्म से योग्य, कुशल, बुद्धिमान, आज्ञा देने वाला होता है तथा जिनका शरीर शारीरिक श्रम के लिए बेकार होता है, वे स्वामी होते हैं|


    1. दास प्रथा स्वामी व दास दोनों पक्षों के लिए लाभकारी है

    2. दासता समाज के लिए हितकर व्यवस्था है-

    • दासता के फलस्वरुप कुछ श्रेष्ठ लोगों को घरेलू कार्यों से मुक्ति मिल जाती है और वे अपना समय समाज विकास कार्य में लगा सकते हैं|


    1. विवेक के आधार पर दासता का औचित्य-

    • विवेक के आधार पर बड़े का छोटे पर, आत्मा का शरीर पर अधिकार होता है, उसी तरह स्वामी का दास पर अधिकार होता है|


    दासता के प्रकार-

    • अरस्तु के अनुसार दासता दो प्रकार की होती है-

    1. स्वाभाविक दासता या प्राकृतिक दासता (Natural Slavery)- जो व्यक्ति जन्म से ही मंदबुद्धि, अयोग्य, अकुशल होते हैं, वे स्वभाविक दास होते हैं|

    2. वैधानिक दासता (Legal Slavery)- युद्ध में अन्य राज्य को पराजित कर लाए गए युद्ध बंदी भी दास बनाए जा सकते हैं, जो वैधानिक दास होंगे|


    •  निम्न को दास नहीं बनाया जा सकता- 

    1. यूनानीयों को दास नहीं बनाया जा सकता है, क्योंकि उनका जन्म स्वामी बनने के लिए हुआ है|

    2. नैतिक व बौद्धिकगुणों से युक्त बंदी को दास नहीं बनाया जा सकता|

    3. अन्यायपूर्ण कारणों से हुए युद्ध के बंदियों को दास नहीं बनाया जा सकता|


    दास प्रथा की आलोचना- 

    • मैक्सी- दास प्रथा के बारे में मैक्सी ने कहा है कि “इस पुस्तक को ही अवैध कर देना चाहिए|”

    • प्रोफ़ेसर मेकलवेन “अरस्तु ने स्वामी व दास के विभाजन से श्रम को दंडित कर दिया है|”

    • प्रोफेसर थियोडोर “अरस्तु ने दासता के बचाव के नाम पर जातीय अहंकार की पुष्टि की है|”

    • प्रोफेसर रॉस “अरस्तु में जो स्तुति योग्य नहीं है, वह है उसका मानव जाति को कुल्हाड़ी से दो भागों में काट डालना|”

    • कार्ल पॉपर अरस्तु के दासता संबंधी विचारों को रूढ़िवादी व प्रतिक्रियावादी मानते हैं| 


    Note- एथिक्स पुस्तक में अरस्तु ने कहा है कि दास अपने मालिक का मित्र बन सकता है|

    Note- द पॉलिटिक्स की सातवी पुस्तक में अरस्तु ने सलाह दी है कि अच्छा काम करने पर उन्हें इनाम के रूप में आजाद कर देना चाहिए|



    अरस्तु के संपत्ति संबंधी विचार

    • अरस्तु संपत्ति को सदजीवन का साधन मानता है| 

    • संपत्ति परिवार का आवश्यक अंग है, जिसके बिना दैनिक जीवन संभव नहीं है| 

    • संपत्ति और परिवार मानव को प्रकृति प्रदत है|

    • अरस्तु प्लेटो के संपत्ति साम्यवाद की कटु आलोचना करता है|

    • अरस्तु ने संपत्ति, परिवार तथा संविधान संबंधित सभी क्षेत्रों में मध्यम मार्ग अपनाया है|

    • अरस्तु के अनुसार संपत्ति श्रेष्ठ जीवन यापन का साधन है| 


    • संपत्ति के प्रकार- अरस्तु ने दो प्रकार बताए हैं-

    1. सजीव संपत्ति

    2. निर्जीव संपत्ति


    संपत्ति का उपार्जन-

    • अरस्तु के अनुसार संपत्ति का उपार्जन दो तरीके से किया जा सकता है-

    1. मानवीय अथवा प्राकृतिक तरीके से- इस प्रकार की संपत्ति का उपार्जन मनुष्य प्रकृति की सहायता से अपने परिश्रम के द्वारा करता है| जैसे- कृषि, पशुपालन के द्वारा अर्जित संपत्ति|

    2. दानवीय अथवा अप्राकृतिक तरीके से- इस प्रकार की संपत्ति का उपार्जन बिना प्रकृति की सहायता से दूसरे मनुष्य के शोषण से किया जाता है| जैसे- धन पर ब्याज लेना, व्यापार से धन कमाना|


    •  अरस्तु प्राकृतिक तरीके से संपत्ति के अर्जन का समर्थक है तथा अप्राकृतिक तरीके से संपत्ति के अर्जन की आलोचना करता है|

      

    संपत्ति का विनिमय-

    • अरस्तु के अनुसार संपत्ति विनिमय के दो तरीके हैं-

    1. नैतिक विनिमय- यह विनिमय न्याय सिद्धांतो को ध्यान में रखकर किया जाता है| इस विनिमय से अधिकाधिक लोगों को लाभ होता है|

    2. अनैतिक विनिमय- इसमें बनिया वर्ग आ जाता है, जो वस्तुओं के क्रय-विक्रय से अच्छा लाभ कमा लेता है| अरस्तु के अनुसार राज्यों को अनैतिक विनिमय पर कठोर प्रतिबंध लगा देना चाहिए| 


    संपत्ति का वितरण-

    • अरस्तु ने संपत्ति के विवरण के तीन तरीके बताए हैं-

    1. सार्वजनिक स्वामित्व और सार्वजनिक प्रयोग|

    2. सार्वजनिक स्वामित्व और व्यक्तिगत प्रयोग|

    3. व्यक्तिगत स्वामित्व और सार्वजनिक प्रयोग|


    • अरस्तु ने तीसरे प्रकार के विभाजन अर्थात व्यक्तिगत स्वामित्व और सार्वजनिक प्रयोग का समर्थन किया है| 



    अरस्तु के परिवार संबंधी विचार 

    • अरस्तु ने संपत्ति व परिवार को व्यक्तिगत विशेषता माना है|

    • अरस्तु के अनुसार स्त्री-पुरुष एवं स्वामी-दास के योग जो संस्था बनती है, वह परिवार है|

    • परिवार सामाजिक जीवन या राजनीतिक जीवन का प्रथम सोपान है| 

    • परिवार प्राकृतिक संस्था है|

    • परिवार नागरिकों की प्रथम पाठशाला है अर्थात व्यक्ति नागरिकता की प्रथम शिक्षा परिवार से ही ग्रहण करता है|

    • अरस्तु “पुरुष एवं स्त्री के बीच में नैसर्गिक मित्रता दिखाई पड़ती है|”

     

    • Note- जहां प्लेटो परिवार को प्रगति में बाधक मानता है तथा परिवार साम्यवाद की बात करता है, वही अरस्तु परिवार को उचित, आवश्यक, प्रेरणा स्रोत समझता है|


    • अरस्तु के अनुसार परिवार एक त्रिकोणात्मक संबंधों का स्वरूप है-

    1.    पति और पत्नी|

    2.    स्वामी और दास|

    3.    माता-पिता और संतान


    • परिवार असमानता वाला समूह है जहां लिंग, आयु व क्षमता की वजह से अंतर पाया जाता है| 

    • अरस्तु के अनुसार “परिवार असमानता का क्षेत्र था, जिससे अधिक महत्वपूर्ण समानता का क्षेत्र राज्य (पोलीस) विकसित होता है|”

    • परिवार की सदस्यता नैसर्गिक है, अर्थात जन्म से व्यक्ति परिवार का सदस्य बन जाता है|

    • अरस्तु के अनुसार परिवार पितृसत्तात्मक है तथा परिवार का वयोवृद्ध पुरुष परिवार का मुखिया होता है| क्योंकि पुरुष, स्त्री की अपेक्षा अधिक गुणवान और समर्थ होता है, दास बुद्धिहीन होता है, बच्चे अनुभवहीन होते हैं|

    • अरस्तु के अनुसार परिवार के सदस्यों में पूर्णतया मित्रता का वातावरण होना चाहिए तथा मुखिया का पूर्ण अनुशासन और नियंत्रण होना चाहिए|

    • मुखिया की भूमिका अलग-अलग होती है जैसे डेनिंग के अनुसार “जब पति, पत्नी को निर्देशित करता है तो उसकी भूमिका संवैधानिक सलाहकार की होती है, जब पुत्र को निर्देशित करता है तो उसकी भूमिका अधिनायकवादी की होती है, जब दास को निर्देशित करता है तो उसकी भूमिका निरंकुश की होती है|”

    • अरस्तु स्त्री-पुरुष असमानता का पक्षधर है| 

    • अरस्तु ने स्त्री को अनुत्पादक पुरुष कहा है| उसके अनुसार पुरुष सक्रिय होता है तथा स्त्री निष्क्रिय होती है स्त्री का प्रमुख कार्य लैंगिक प्रजनन है|

    • स्त्रियों के नैतिक गुण पुरुषों के बराबर नहीं होते हैं| अरस्तु ने सोफॉकल्स का यह वक्तव्य दोहराया है कि “नम्र-चुप्पी स्त्री का आभूषण है|” 

    • अरस्तु के अनुसार परिवार नैसर्गिक कुलीनतंत्र था, जहां पुरुषों को महत्वपूर्ण बातें बोलने का अधिकार था और बाकि काम स्त्रियों का था|

    • अरस्तु राज्य नियंत्रित परिवार की बात करता है, परिवार की सदस्य संख्या तथा विवाह की आयु के संबंध में राज्य को नियम बनाना चाहिए| विवाह के लिए पुरुष व स्त्री में 20 वर्ष का अंतर होना चाहिए| विवाह के समय स्त्री की आयु 17 वर्ष तथा पुरुष की आयु 37 वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए|

    • प्लेटो के समान अरस्तु ने भी विवाह को राज्य के लिए श्रेष्ठ संतान पैदा करने का स्रोत माना है|

    • अरस्तु के अनुसार स्त्री-पुरुष में वही संबंध होता है, जो स्वामी और दास में, शारीरिक श्रम करने वाले और मानसिक कार्य करने वाले में| स्त्री की संकल्प शक्ति क्षीण होती है अतः वह स्वतंत्र रहने के योग्य नहीं है|

    • अरस्तु बौद्धिक कार्य को, शारीरिक कार्य से श्रेष्ठ मानता है|

     


    अरस्तु के नागरिकता (ग्रीक शब्द Politai) संबंधी विचार-

    • अरस्तु ने अपने ग्रंथ पॉलिटिक्स की तीसरी पुस्तक में नागरिकता संबंधी विचार दिए हैं| 

    • अरस्तु के अनुसार राज्य बाह्य दृष्टि से नागरिकों का एक समुदाय (koinonia) है| 


    • अरस्तु के अनुसार निम्न नागरिक हैं- 

    • अरस्तु के अनुसार “नागरिक वही है जो न्याय व्यवस्था एवं व्यवस्थापिका के एक सदस्य के रूप में भाग लेता है- दोनों में या एक में, क्योंकि दोनों ही प्रभुता के कार्य है| अर्थात-

    1. नागरिक राज्य का क्रियाशील सदस्य होते हुए न्यायिक, प्रशासनिक और सार्वजनिक कार्यों में भाग लेता है|

    2. वह साधारण सभा का सदस्य होने के नाते विधायी कार्यों में भाग लेता है|


    • अरस्तु की नागरिकता के संबंध में यह धारणा तत्कालीन यूनानी राज्यों की प्रत्यक्ष प्रजातंत्र व्यवस्था के अनुरूप है| एथेंस में शासन संबंधी मामलों पर विचार के लिए एक्स्लेसिआ (Ecclesia) नामक सभा होती थी तथा न्याय के लिए हेलिया (helia) नामक सभा होती थी जिसमें 30 वर्ष या इससे अधिक आयु वाले नागरिक भाग लेते थे|

    • इस प्रकार अरस्तु की नागरिकता कर्तव्य पर आधारित है तथा सीमित है व शासक वर्ग के लिए है|

    • नागरिक के पास उच्च बौद्धिक स्तर, नैतिक शक्ति, व्यवहारिक बुद्धि, अवकाश, दास, संपत्ति होना जरूरी है|

    • अरस्तु का नागरिकता का विचार अत्यंत अनुदार और अभिजात तंत्रीय हैं|


    • फॉस्टर “अरस्तु का नागरिक समुदाय प्लेटो के दोनों संरक्षक वर्गों का प्रतिरूप है, बस अरस्तू ने संरक्षक वर्ग के मध्य दीवार खड़ी नहीं की है|”

     

    • Note- अरस्तु ने पॉलिटिक्स की प्रथम पुस्तक में राज्य को ‘समुदायों का समुदाय’ कहता है, जबकि पॉलिटिक्स की तीसरी पुस्तक में राज्य को ‘स्वतंत्र मनुष्यों का समुदाय या नागरिकों की सामूहिक संस्था’ कहा है|



    अरस्तु के कानून संबंधी विचार 

    • अरस्तु के कानून संबंधी विचार उनकी पुस्तक पॉलिटिक्स, एथिक्स और रिटोरिक (अलंकारशास्त्र) में मिलते हैं| 

    • अरस्तु अपने गुरु प्लेटों के विपरीत कानून के महत्व पर अत्यधिक बल देता है| जहां प्लेटो की रिपब्लिक में कानून का कोई स्थान नहीं है तथा लॉज में कानून की महत्ता नजर आती है, वहीं अरस्तु ने पॉलिटिक्स में कानून की संप्रभुता स्थापित की है|

    • अरस्तु कानून संबंधी विचारों में प्लेटो की लॉज से अत्यधिक प्रभावित था| 

    • अरस्तु ने कानून की सर्वोच्चता को श्रेष्ठ शासन का चिन्ह माना है|

    • अरस्तु के अनुसार शासन एक व्यक्ति के हाथ में हो या कुछ व्यक्ति के हाथ में या बहुत लोगों के हाथ में, शासन कानून के अनुसार होना चाहिए|

    • अरस्तु कानून श्रेष्ठ जीवन के लिए अनिवार्य अच्छाई समझता है|

    • सेबाइन “प्लेटो के विपरीत अरस्तु का कहना था कि जनता की सामूहिक बुद्धि सबसे बुद्धिमान शासक से भी बेहतर होती है|”

    • अरस्तु के मत में “जो कानून को शासन करने देता है, वह ईश्वर और तर्क बुद्धि को शासन करने देता है, परंतु जो मनुष्य को शासन करने देता है वह एक तरह से पशुओं को शासन करने देता है|” 


    अरस्तु के अनुसार संवैधानिक शासन के तीन मुख्य तत्व हैं-

    1. यह संपूर्ण जनता की भलाई के लिए होता है, वर्ग विशेष के लिए नहीं|

    2. यह एक विधि सम्मत शासन होता है|

    3. प्रजा दबाव से नहीं, बल्कि इच्छा से शासित होगी|


    • अरस्तु कानून और विवेक-बुद्धि को समान तथा पर्यायवाची मानता है| जिस तरह कानून व्यक्तियों के कार्य के नियमन का भौतिक बंधन है, उसी तरह विवेक बुद्धि मानव कार्यों का अध्यात्मिक बंधन है|


          कानून का मूल स्रोत- 

    • अरस्तु ने कानून का मूल स्रोत संहिताकार (Law Maker) को माना है, न कि शासक को| अरस्तु स्थायी तथा अपरिवर्तनशील कानून के पक्ष में है|


         कानून की प्रकृति- 

    • अरस्तु के अनुसार राज्य एक नैतिक समुदाय है अतः आदर्श कानून भी प्राकृतिक, स्थायी तथा अपरिवर्तनशील होना चाहिए|

    • जबकि वास्तविक राज्यों में कानून प्राकृतिक न होकर, संविदा तथा लोकाचार पर आधारित होते हैं| 

    • वही सर्वोत्तम राज्य के लिए अरस्तु प्राकृतिक तथा लोकाचार पर आधारित कानूनों को महत्वपूर्ण स्थान देता है|

    • अरस्तु सविधान तथा राज्य को एक ही मानता है| वह संविधान या राज्य के लिए कानून आवश्यक मानता है| अरस्तु राज्य या संविधान पर कानून की संप्रभुता स्थापित करता है|

    • इस प्रकार अरस्तु कानून की संप्रभुता स्थापित करता है तथा राज्य की सर्वोच्चता को कानून की मर्यादा रेखा में बांधता है|


    Note- विधि के शासन का सर्वप्रथम वर्णन अरस्तु ने किया था| विधि के शासन के कारण ही अरस्तु को संविधानवाद का पिता कहा जाता है|




    अरस्तु की न्याय संबंधी धारणा-

    • अरस्तु ने अपने ग्रंथ पॉलिटिक्स में न्याय शब्द का उल्लेख किया है, किंतु न्याय की समुचित व्याख्या अपने ग्रंथ एथिक्स में की है |

    • अरस्तु न्याय को ‘सद्गुणों का समूह’ मानता है|

     

    • अरस्तु न्याय को दो भागों में बांटता है- 

    1. सामान्य न्याय (Righteousness)

    2. विशेष न्याय


    1. सामान्य न्याय या पूर्ण न्याय-

    • सामान्य न्याय संपूर्ण अच्छाई का दूसरा नाम है| इसका संबंध नैतिकता या सद्गुण से है|

    • सामान्य न्याय का आशय पड़ोसी के प्रति किए जाने वाले भलाई के सभी कार्यों से है| 

    • अरस्तु अच्छाई के सभी कार्यों, सभी सद्गुणों तथा समग्र साधुता को सामान्य न्याय कहता है|

    • पूर्ण या सामान्य न्याय केवल आदर्श राज्य में ही मिल सकता है|


    1. विशेष न्याय- 

    • यह न्याय वास्तविक राज्य में पाया जाता है|

    • यह न्याय अनुपातिक समानता है, अर्थात व्यक्ति को जो मिलना चाहिए वही उसको मिले तो यह विशिष्ट न्याय है| 


    • विशिष्ट न्याय को अरस्तु पुन: 2 भागो में बांटता है-

    1. वितरणात्मक न्याय

    2. संशोधनात्मक न्याय


    1. वितरणात्मक न्याय या अनुपातिक न्याय-  

    • इस न्याय का संबंध राज्य के पद, सम्मान, पुरस्कार, लाभ के बंटवारे से है|

    • अरस्तु इन सब का अनुपातिक समानता के आधार पर वितरण करना चाहता है, अर्थात प्रत्येक व्यक्ति को पद, पुरस्कार, सम्मान, लाभ उस अनुपात में मिलना चाहिए, जिस अनुपात में उसने अपनी योग्यता और धन से राज्य को लाभ पहुंचाया है|

    • पदों का बंटवारा विधायिका (Ecclesia) के द्वारा किया जाएगा तथा बटवारा रेखागणित के आधार पर होगा| 

    • अरस्तु के अनुसार “एक सद्गुणपूर्ण राज्य न तो प्रजातंत्र और न ही धनिकतंत्र की व्यवस्था को स्वीकार करेगा, अपितु राज्य के अंदर उपाधियों व पदों का वितरण केवल कुशल तथा सद्गुणी व्यक्तियों में ही करेगा|”


    1. संशोधनात्मक न्याय या सुधारात्मक न्याय-

    • न्याय का यह रूप नागरिकों के आपसी संबंधों को नियंत्रित करता है|

    • यह न्याय व्यक्तियों के पारस्परिक संबंधों में उत्पन्न दोषो को दूर करता है|

    • संशोधनात्मक न्याय न्यायपालिका (Helia) के द्वारा प्रदान किया जाएगा तथा अंकगणित के आधार पर न्याय होगा| 


    • संशोधनात्मक न्याय भी दो प्रकार का होता है-  

    1. ऐच्छिक न्याय- इसके अंतर्गत व्यक्तियों में आपस में किए गए संधि समझौते आते हैं, जिसको तोड़ने पर न्यायालय ठीक करता है| ऐच्छिक संशोधनात्मक न्याय का संबंध दीवानी मुकदमो से है|

    2. अनैच्छिक संशोधनात्मक न्याय- जब एक नागरिक अन्य नागरिक के साथ धोखा, मारपीट, चोरी, डकैती, हत्या जैसे अपराध करता है, तो न्यायालय अपराधी को दंड देकर न्याय की स्थापना करता है, अर्थात इस न्याय का संबंध फौजदारी मुकदमों से है|


    • Note- अरस्तु न्याय के संबंध में यथास्थितिवादी व रूढ़िवादी है| वितरणनात्मक न्याय में वह आवश्यकता के बजाय योग्यता पर बल देता है, जबकि संशोधनात्मक न्याय में वर्तमान स्थिति में परिवर्तन आने पर न्यायपालिका वापस से यथास्थिति की स्थापना कर देती है, इसलिए अरस्तु रूढ़िवादी व यथास्थिति का समर्थक है| 

    • Note- अरस्तु के अनुसार न्याय समान के साथ समान व्यवहार तथा असमान के साथ असमान  व्यवहार है|

    • Note- प्लेटो के न्याय में कर्तव्य पर बल दिया गया है, अरस्तु के न्याय में अधिकारों पर बल दिया गया है| 



    अरस्तु के शिक्षा संबंधी विचार- 

    • पॉलिटिक्स की पांचवी पुस्तक में अरस्तु ने शिक्षा संबंधी विचारों का उल्लेख किया है|

    • अरस्तु के अनुसार शिक्षा सर्वोत्तम या आदर्श राज्य के लिए एक अनिवार्य तत्व है तथा नागरिकों के चरित्र के निर्माण के लिए आवश्यक है|


    अरस्तु की शिक्षा योजना-

    • अरस्तु ने राज्य नियंत्रित शिक्षा का समर्थन किया है तथा निशुल्क- अनिवार्य, सार्वभौमिक शिक्षा पर बल दिया है|

    • अरस्तु की शिक्षा बच्चे के जन्म के साथ ही शुरू हो जाती है|

    • अरस्तु की शिक्षा सप्तवर्षीय परिवर्तन के साथ हैं |

    • अरस्तु की शिक्षा योजना को तीन भागों में बांटा गया है-

    1. जन्म से 7 वर्ष तक की शिक्षा

    2. 8 से 14 वर्ष तक की शिक्षा

    3. 15 से 21 वर्ष तक की शिक्षा


    1. जन्म से 7 वर्ष की शिक्षा-

    • 7 वर्ष की शिक्षा परिवार में माता-पिता के पास होनी चाहिए|

    • इसमें बच्चे को भोजन, अंग संचालन, ठंड का अभ्यास कराना चाहिए| 

    • बच्चे को खेल, कहानियों के माध्यम से शिक्षा दी जानी चाहिए|

    • Note- इसी काल में बौद्धिक शिक्षा आरंभ कर देनी चाहिए|


    1. 8 से 14 वर्ष तक की शिक्षा-

    • इस काल में शरीर गठन पर अरस्तु ने बल (शारीरिक शिक्षा) दिया है|

    • तथा किशोरों के नैतिक विकास की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए, साथ ही पढ़ाई, लिखाई चित्रकला, संगीत की शिक्षा भी दी जानी चाहिए|

    • Note- अरस्तु नैतिक जीवन की उन्नति के लिए संगीत को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करता है|


    1. 15 से 21 वर्ष तक की शिक्षा-

    • इस अवस्था में छात्रों को उस सरकार के अनुरूप शिक्षा दी जाए, जिसकी अधीनता में उन्हें रहना है|

    • तथा छात्रों के शारीरिक व मानसिक विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जाए|

    • इस समय पढ़ना, लिखना, चित्रकला, संगीत, अंकगणित, रेखागणित की शिक्षा दी जाए|


    • अरस्तु की शिक्षा का कार्यक्रम 21 वर्ष तक समाप्त हो जाता है, लेकिन अरस्तु के अनुसार शिक्षा जन्म से लेकर अंत तक चलती रहती है|


     अरस्तु की शिक्षा योजना की आलोचना-

    1. अरस्तु ने संगीत पर अत्यधिक और अनावश्यक बल दिया है| जैसे बार्कर ने कहा है कि “संगीत शिक्षा पर महत्व देते हुए अरस्तु अपने गुरु प्लेटो से चार कदम आगे बढ़ गया है|”

    2. साहित्य की उपेक्षा

    3. बौद्धिक शिक्षा की अवधि कम है|

    4. सीमित शिक्षा है, अर्थात केवल नागरिकों के लिए शिक्षा है|

    5. शिक्षा का पूर्ण राज्यकरण अलोकतांत्रिक है|




    अरस्तु: संविधान का अर्थ और संविधानो का वर्गीकरण-


    • अरस्तु ने पॉलिटिक्स की तीसरी पुस्तक के छठे से आठवें अध्याय में संविधान संबंधी अवधारणा दी है|

    • संविधान के लिए अरस्तु के द्वारा प्रयुक्त शब्द यूनानी भाषा का पॉलिटिया (Politeia) है|


    • अरस्तु ने संविधान के दो पहलू बताए हैं- 1 नैतिक पहलू  2 राजनीतिक पहलू

    1. नैतिक पहलू के अनुसार संविधान का अर्थ जीवन पद्धति है, अर्थात जीवन व्यतीत करने का तरीका|

    2. राजनीतिक पहलू से संविधान का अर्थ  है ‘राज्य के पदों का बंटवारा’|


    • अरस्तु का मुख्यतया संबंध राजनीतिक पहलू से है, अरस्तु के अनुसार “संविधान राज्य के पदों की वह व्यवस्था है, जिससे यह निर्धारित किया जाता है कि राज्य का कौनसा पद विशेष कर सर्वोच्च पद, किसे मिले|

     राज्य और सरकार में भेद-

    • अरस्तु ने राज्य और सरकार में भेद किया है, जहां राज्य उसमें निवास करने वाले लोगों का समुदाय हैं जबकि सरकार उन नागरिकों का समूह है जिनके हाथों में राजनीतिक शक्ति और शासन संचालन का कार्य होता है| 

    • उच्च राजनीतिक पदों वाले व्यक्तियों में परिवर्तन आने पर सरकार में परिवर्तन आ जाता है परंतु जब संविधान में परिवर्तन आता है तो राज्य में भी परिवर्तन आ जाता है|

    • इस प्रकार अरस्तु राज्य और संविधान को पर्यायवाची मानता है|


    संविधानों का वर्गीकरण-

    • अरस्तु के संविधानों का वर्गीकरण प्लेटो के स्टेट्समैन में दिए गए वर्गीकरण से प्रभावित था|


    • अरस्तु ने संविधानो का वर्गीकरण दो आधारों पर किया है-

    1. संख्या के आधार पर- अर्थात शासन सत्ता कितने व्यक्तियों में निहित है|

    2. लक्ष्य या उद्देश्य के आधार पर- दो प्रकार

    1. स्वाभाविक रूप- सर्वसाधारण का हित

    2. विकृत रूप- स्वार्थ सिद्धि 

     

                  संख्या  

    स्वाभाविक या विशुद्ध संविधान

    विकृत संविधान

    1 एक व्यक्ति का शासन

    1 राजतंत्र ( Monarchy)

    4.निरंकुश तंत्र (Tyranny)

    2 कुछ व्यक्तियों का शासन

    2  कुलीनतंत्र या अभिजात तंत्र (Aristocracy)

    5 अल्पतंत्र या स्वार्थी तंत्र  (Oligarchy)

    3 अनेक व्यक्तियों का शासन

    3 संयत प्रजातंत्र (Polity)

    6 अतिवादी लोकतंत्र 

    (democracy)


    • इस प्रकार अरस्तू ने संविधानो को 6 भागों में बांटा है|

    • अरस्तु राजतंत्र को सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली मानता है, लेकिन राजतंत्र सुलभ नहीं है, क्योंकि कोई सर्वगुण संपन्न शासक मिल भी जाए तो उसका उत्तराधिकारी भी ऐसा होगा आवश्यक नहीं है|

    • अतः अरस्तु मध्यम मार्ग अपनाता है और संयतप्रजातंत्र (Polity) को सर्वोत्तम संविधान बताता है|

    • अरस्तु पॉलिटी को बचाव राज्य कहता है, जो स्वर्णिम मध्यमान (Golden mean) पर आधारित है, इसमें मिश्रित सविधान है और मध्यम वर्ग का शासन है तथा इसमें कानून की सर्वोच्चता है|

    • कार्ल पॉपर के अनुसार सबसे अच्छी व्यवस्था पॉलिटी में प्लेटोवादी कुलीनतंत्र, संतुलित सामंतवाद व लोकतांत्रिक विचार सम्मिलित हैं, लेकिन जैव व्यक्तिवाद नहीं है|


    • Note-अरस्तु के मिश्रित संविधान के विचारों को बाद में रोमन विचारको पॉलीबियस व सिसरो, मध्ययुगीन विचारक सेंट थॉमस एक्विनास और आधुनिक विचारक मैकियावेली ने भी स्वीकार किया है| 


    संविधानो का परिवर्तन चक्र-

    • अरस्तु के अनुसार कोई भी संविधान या राज्य स्थायी नहीं है, ये एक निश्चित क्रम में बदलते रहते हैं|

    • आरंभ में राजतंत्र स्थापित होगा, उसके बाद क्रमश निरंकुश तंत्र-- कुलीन तंत्र-- अल्प तंत्र-- संयत प्रजातंत्र-- अतिवादी प्रजातंत्र की स्थापना होती है| इसके बाद उन्हें पुन: राजतंत्र स्थापित हो जाता है और यह परिवर्तन चक्कर चलता रहता है|

      


    अरस्तु का सर्वोत्तम आदर्श राज्य (The Best Ideal State)-

    • अरस्तु ने पॉलिटिक्स की सातवीं व आठवीं पुस्तक में आदर्श राज्य का वर्णन किया है|

    • अरस्तु सर्वोत्तम आदर्श राज्य में आदर्श को व्यवहारिकता के साथ मिश्रित (मध्यम मार्ग अपनाता है) कर देता है|

    • अरस्तु के अनुसार सर्वोत्तम सविधान या राज्य तो मध्यम वर्ग को प्रधानता देने वाला संयत प्रजातंत्र (Polity) है, लेकिन इसका विकास सभी जगह संभव नहीं है| अतः अरस्तु सर्वोत्तम आदर्श राज्य की संकल्पना प्रस्तुत करता है|

    • अरस्तु आदर्श राज्य में कुछ विशेष परिस्थितियों का होना आवश्यक मानता है| सेबाइन के शब्दों में “अरस्तु आदर्श राज्य पर ही नहीं, बल्कि राज्य के आदर्शों पर पुस्तक लिखता है|”

    • प्लेटो का लॉज का उपादर्श राज्य तथा अरस्तु का आदर्श राज्य काफी मिलता-जुलता है| जैसे सेबाइन ने  कहा है कि “अरस्तु जिसे आदर्श राज्य मानता है, वह प्लेटो का उपादर्श या द्वितीय सर्वश्रेष्ठ राज्य है|”

    • सिनक्लेयर “राज्य के विषय में प्लेटो जहां (लॉज) छोड़ता है, अरस्तु वहां से प्रारंभ करता है|”


    अरस्तु के सर्वोत्तम राज्य की विशेषताएं-

    1. जनसंख्या- प्लेटो की तरह अरस्तु जनसंख्या निर्धारित तो नहीं करता है, वह जनसंख्या के बारे में कहता है कि जनसंख्या न बहुत अधिक और न ही बहुत कम होनी चाहिए|


    1. प्रदेश/ भूमि- राज्य का क्षेत्र आवश्यकतानुसार होना चाहिए न तो अधिक बड़ा और न अधिक छोटा| भूमि समुद्र के पास होनी चाहिए| भूमि इतनी छोटी हो कि जिसे ऊंचे स्थान से देखी जा सके| भूमि ऐसे स्थान पर हो जहां स्थल और जल दोनों भागों से पहुंचा जा सके| भूमि दो भागों में बटी हुई हो-

    1. सार्वजनिक भूमि- पूजा गृह एवं राज्य उपयोगी भूमि|

    2. व्यक्तिगत भूमि- शेष भूमि


    1. जनता का चरित्र- आदर्श राज्य के नागरिकों का चरित्र यूनानी विशेषताओं के अनुरूप हो, जिसमें उत्तरी जातियों का साहस और एशियन लोगों के विवेक का मिश्रण हो|


    1. राज्य में आवश्यक वर्ग- अरस्तु के आदर्श राज्य में 6 प्रकार की आवश्यकताएं प्रमुख है तथा इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए 6 वर्ग प्रमुख हैं-

     

    आवश्यकता

    वर्ग


    1.भोजन

    कृषक

    नागरिक नहीं है|

    2. कला-कौशल

    शिल्पी

    नागरिक नहीं है|

    3. शस्त्र  

    योद्धा

    नागरिक है|

    4.संपत्ति

    संपत्तिशाली वर्ग

    नागरिक है|

    5. देव-पूजा

    पुरोहित

    नागरिक है|

    6 सार्वजनिक हित

    प्रशासक

    नागरिक है|

     

    • Note- अरस्तु का सामाजिक वर्गीकरण आयु के अनुसार-

    1. युवावस्था- योद्धा

    2. प्रौढ़ावस्था- शासन कार्य

    3. वृद्धावस्था- देव पूजा अर्थात पुरोहित का कार्य 


    • अथार्त एक व्यक्ति ही विभिन्न अवस्था में विभिन्न कार्य करेगा|


    1. शिक्षा- राज्य का उद्देश्य शुभ जीवन की प्राप्ति है, जो शिक्षा के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है| अरस्तु 0- 21 वर्ष की शिक्षा योजना बताता है|


    1. आदर्श राज्य में शासन की 3 संस्थाएं हो-

    1. लोकप्रिय सभा- समस्त नागरिकों की सभा|

    2. मजिस्ट्रेटो की संस्था|

    3. न्यायपालिका|



    अरस्तु के क्रांति संबंधी विचार-

    • अरस्तु ने अपनी रचना पॉलिटिक्स की पांचवी पुस्तक में क्रांति संबंधी विचारों का प्रतिपादन किया है|

    • प्रोफ़ेसर मैक्सी “अरस्तु ने जितने विवेकपूर्ण ढंग से क्रांति के कारणों का विश्लेषण किया है, उतने ही विवेकपूर्ण ढंग से उसने इसके निराकरण के उपायों पर भी प्रकाश डाला है|”

    • क्रांति के प्रति अरस्तु का दृष्टिकोण यथार्थवादी था, इसी कारण से पोलॉक मानता है कि “अरस्तु ही वह प्रथम दार्शनिक है, जिसने राजनीति को नीतिशास्त्र (आचारशास्त्र) से पृथक किया है|“


    क्रांति का अर्थ- 

    • क्रांति संबंधित अरस्तु की धारणा वर्तमान क्रांति संबंधी धारणा से भिन्न है|

    • अरस्तु के अनुसार क्रांति का अर्थ “संविधान में प्रत्येक प्रकार छोटा-बड़ा परिवर्तन है|”


    क्रांति का उद्देश्य- 

    • अरस्तु निम्न उद्देश्य बताता है-

    1. संविधान या राज्य का परिवर्तन करना, जैसे राजतंत्र को निरंकुश तंत्र|

    2. संविधान में परिवर्तन ना करके केवल शासक वर्ग को बदल देना|

    3. तत्कालीन संविधान को और व्यवहारिक व वास्तविक बनाना|

    4. संविधान में छोटे-मोटे परिवर्तन लाना


    क्रांति के प्रकार- 

    • अरस्तु ने क्रांति के निम्न प्रकार बताए हैं-

    1. आंशिक और पूर्ण क्रांति- संविधान पूर्ण बदल दिया जाए तो पूर्ण क्रांति तथा संविधान का महत्वपूर्ण भाग बदल दिया जाए तो आंशिक क्रांति|


    1. रक्तपूर्ण क्रांति और रक्तहीन क्रांति- 

    1. रक्तपूर्ण क्रांति- सशस्त्र विद्रोह एवं रक्तपात द्वारा संविधान में परिवर्तन|

    2. रक्तहीन क्रांति- बिना रक्तपात के शांतिपूर्वक परिवर्तन


    1. व्यक्तिगत और अव्यक्तिगत क्रांति-

    1. व्यक्तिगत क्रांति- जब किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को हटाकर संविधान बदला जाए|

    2. अव्यक्तिगत क्रांति- बिना शासक बदले सविधान में किए जाने वाला परिवर्तन|


    1. वर्ग विशेष के विरुद्ध क्रांति- इसमें संविधान में परिवर्तन वर्ग विशेष को हटाने के लिए किया जाता है| जैसे धनिकतंत्र को हटाकर प्रजातंत्र की स्थापना करना|


    1. वैचारिक या वाग्वीरो की क्रांति- जब कुछ करिश्माती नेता अपने भाषणों से लोगों को प्रभावित कर परिवर्तन करें तो उसे वैचारिक/ वाग्वीरो की क्रांति कहते हैं|


    क्रांति के कारण-

    • अरस्तु ने क्रांति के कारणों को तीन भागों मे विभाजित किया है-

    1. क्रांति के मूल कारण

    2. क्रांति के सामान्य कारण

    3. विशिष्ट शासन प्रणालियों में क्रांति के विशिष्ट कारण

     

    1. क्रांति के मूल कारण-  

    • अरस्तु के अनुसार क्रांति का मूल कारण समानता की भावना या विषमता है|

    • समानता दो प्रकार की होती है

    1. संख्यात्मक समानता

    2. आनुपातिक/ योग्यता संबंधी समानता


    1. संख्यात्मक समानता- इसमें सभी व्यक्तियों को समान माना जाता है तथा अधिकार, धन संपत्ति आदि में समानता होनी चाहिए|

    2. अनुपातिक समानता- इसमें सभी व्यक्तियों को अधिकार, धन, संपदा आदि योग्यता के अनुपात में मिलने चाहिए, न कि सभी को समान| अरस्तु आनुपातिक समानता पर बल देता है|


    • जब एक वर्ग को यह लगता है कि उसके साथ असमानता हो रही है, तो वह समानता की स्थापना के लिए विद्रोह कर देता है|   


    1. क्रांति के सामान्य कारण-  

    • अरस्तु ने क्रांति के सामान्य कारण निम्न बताए हैं-

    1. शासको में भ्रष्टाचार व लाभ की लालसा

    2. सम्मान की लालसा

    3. श्रेष्ठता की भावना

    4. घृणा और परस्पर विरोधी विचारधाराएं

    5. भय- अपराधी को दंड का भय तथा कुछ व्यक्तियों को अन्याय होने का भय

    6. द्वेष भावना

    7. जातियों की विभिन्नता

    8. राज्य के किसी अंग की अनुपात से अधिक वृद्धि

    9. निर्वाचन संबंधी षड्यंत्र

    10. अल्पपरिवर्तनों की उपेक्षा

    11. विदेशियों को आने की खुली छूट

    12. पारिवारिक विवाद

    13. शासक वर्ग की असावधानी

    14. मध्यम वर्ग का अभाव

    15. शक्ति संतुलन- विरोधी वर्ग में शक्ति संतुलन होना भी क्रांति का कारण बन जाता है| 


    1. विशिष्ट शासन प्रणालियों में क्रांति के विशिष्ट कारण-

    1. राजतंत्र में क्रांति के कारण- राजपरिवार के आंतरिक झगड़े, पारिवारिक कलह|

    2. निरकुशतंत्र में क्रांति के कारण- शासक द्वारा शक्तियों का दुरुपयोग करना, जनता पर अत्याचार करना|

    3. कुलीनतंत्र में क्रांति के कारण- विभिन्न वर्गों में सामंजस्य का अभाव, योग्य पुरुषों का अपमान|

    4. अल्पतंत्र में क्रांति का कारण- योग्यता की जगह, जन्म या वंश को अधिक महत्व, निर्धनो का शोषण| 

    5. संयत प्रजातंत्र में क्रांति का कारण- शासक जब अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए शासन करता है, सर्वजन हित के लिए नहीं करता है|

    6. अतिवादी प्रजातंत्र में क्रांति का कारण- जनसाधारण के हितों की अनदेखी करना, नारेबाजी को महत्व देना|


    क्रांतियों को रोकने के उपाय-

    • मैक्सी “आधुनिक राजनीतिक विचारक शायद ही क्रांति रोकने का अरस्तु के उपायो के अतिरिक्त कोई अन्य ठोस उपाय बता सके|”

    • प्रोफेसर डनिंग “अरस्तु क्रांतियों को उत्पन्न करने वाले कारणों की विस्तृत सूची देने के पश्चात उसके समान ही प्रभावोत्पादक उसको रोकने वाले उपायों की सूची भी देता है|” 


    • अरस्तु ने क्रांति रोकने के निम्न उपाय बताए हैं-

    1. शक्ति पर नियंत्रण- शक्तियों का विभाजन होना चाहिए, एक वर्ग के पास अधिक शक्तियां नहीं होनी चाहिए|

    2. जनता में संविधान के प्रति आस्था बनाये रखना- शिक्षा के द्वारा ऐसा किया जा सकता है|

    3. लाभ, सम्मान, पदों का न्यायपूर्ण वितरण|

    4. राज्यों को परिवर्तनों के प्रारंभ से बचाना चाहिए, क्योंकि परिवर्तनों के प्रारंभ से ही क्रांति होती है| 

    5. आर्थिक असमानता को कम करना|

    6. समाज में मध्यम वर्ग को बढ़ावा देना|

    7. दो विरोधात्मक प्रवृत्ति के लोगों के हाथों में सत्ता देना, जैसे- अमीर व गरीब, प्रतिभाशाली व धनिक| 

    8. राज्य अधिकारियों का कार्यकाल कम अवधि का रखना| अरस्तु के अनुसार अधिकारी वर्ग को 6 माह से अधिक शासन करने के लिए न दिया जावे|

    9. विदेशी समस्याओं की तरफ जनता का ध्यान केंद्रित करना| 


    1. अरस्तु राजतंत्र में क्रांति रोकने के दो साधन बताता-

    1. अत्याचार के द्वारा, विदेशी सेना के प्रदर्शन के द्वारा

    2. सद्भावना व प्रेम के द्वारा|

    1. निरंकुश तंत्र में क्रांति रोकने के लिए निरंकुश शासक को शासन की समस्त बागडोर अपने हाथ में रखते हुए भी इस तरह का अभिनय करना चाहिए कि वह राजा है, निरंकुश नहीं|

    2. प्रजातंत्र में क्रांति रोकने के लिए अरस्तु ने सुझाया है कि संपन्न लोगों के साथ दुर्व्यवहार नहीं किया जाए तथा उनकी संपत्ति को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया जाए|

    3. धनिकतंत्र में क्रांति को रोकने के लिए गरीबों का पूरा ध्यान रखना उचित होगा| 



    ज्ञान की तीन श्रेणियां-

    • अरस्तु ने ज्ञान व मानव गतिविधियों की तीन श्रेणियां बताई हैं-

    1. सैद्धांतिक ज्ञान (Theoria/ Thinking)- 

    • इसमें सिद्धांत निर्माण आता है, इसमें साध्य के बारे में सोचा जाता है तथा तर्क के आधार पर अंतिम सत्य का पता किया जाता है| 

    • धर्मशास्त्र (Theology), गणित व भौतिक विज्ञान विषय सैद्धांतिक ज्ञान में सम्मिलित हैं|

    • अरस्तु इसे प्रथम दर्शन (First Philosophy) कहता है| 


    1. उत्पादक ज्ञान (Poiesis/ Making)- 

    • इसमें ज्ञान का निर्माण किया जाता है| अलंकारशास्त्र व साहित्य का ज्ञान इसमें होता है|

    • अलंकार शास्त्र में वाक् कला, भाषण कला व तर्क कला का अध्ययन किया जाता है|

    • एक अच्छा वक्ता में अपने श्रोताओं को प्रभावित करने के लिए तीन अलग-अलग क्षेत्र का ज्ञान होना चाहिए, जो निम्न है-

    1. Logos- श्रोताओं से तार्किक अपील 

    2. Ethos- वक्ता की विश्वसनीयता

    3. Pathos- श्रोताओं से भावनात्मक अपील


    • इन तीनों को अलंकारिक त्रिकोण (Rhetorical Triangle) कहा जाता है| 


    1. व्यवहारिक ज्ञान (Praxis/ Doing)- 

    • इसमें सिद्धांत या साध्य को व्यवहार में ढाला जाता है| इसमें नीति शास्त्र व राजनीति विषय सम्मिलित है |

    • व्यवहारिक ज्ञान ही सर्वोच्च ज्ञान है|  

     


    अरस्तु के अनुसार खुशी या यूडीमोनिया का स्वरूप-

    • अरस्तु ने अच्छाई को खुशहाली के बराबर माना है |

    • एथिक्स और पॉलिटिक्स में अरस्तु ने मानव खुशहाली के व्यवहारिक विज्ञान पर जोर दिया है| 

    • मेंकेटायर के शब्दों में “सुकरात के समान प्लेटो और अरस्तू खुशी हासिल करने के लिए आत्मा की सेवा के पक्ष में थे|” 

    • अरस्तु की दृष्टि में खुशी दो गुणों से हासिल हो सकती है- 1 नैतिक गुण  2 बौद्धिक गुण| बौद्धिक गुण अंतिम कारणों का ज्ञान था, जिसमें व्यावहारिक बुद्धि (फ्रोनेसिस) या गुणकारी नैतिक व्यवहार एवं बुद्धि (सोफिया) या शाश्वत अपरिवर्तनीय वस्तु का ज्ञान शामिल है|



    युद्ध का विरोध-

    • अरस्तु केवल शांति की स्थापना के लिए युद्ध का समर्थन करता है|

    • अरस्तु के शब्दों में “युद्ध होना चाहिए शांति की खातिर व काम होना चाहिए अवकाश की खातिर|” 



    स्वर्णिम मध्यमान का नियम या औसत का तर्क (Rule of Golden mean)-

    • अरस्तु ने अपने राजनीतिक चिंतन में मध्यम मार्ग को अपनाया है|

    • संविधानो में भी मध्यम मार्ग को अपनाते हुए Polity को सर्वश्रेष्ठ सविधान माना है|

    • अरस्तु ने मिश्रित सविधान व मध्यम वर्ग के शासन का समर्थन किया है|



    कार्योत्पादन सिद्धांत या कार्यकारण भाव का सिद्धांत या कारण का चतुष्कोणी सिद्धांत-

    • इस सिद्धांत के माध्यम से अरस्तू अपने Teleological Approach (सौद्देश्यात्मक सिद्धांत) की व्याख्या करता है कि कोई भी कार्य इसलिए होता है कि उसका एक निश्चित अंतिम उद्देश्य होता है जो पदार्थ की Form में निहित होता है|

    • अरस्तु ने प्लेटो के ‘डॉक्ट्रिन ऑफ़ फॉर्म्स’ की कटु आलोचना की है|

    • प्लेटो के संकल्पना सिद्धांत (डॉक्ट्रिन ऑफ़ फॉर्म्स) की आलोचना अरस्तु तीन तर्कों के आधार पर करता है-

    1. जो बात सामान्य है, तो वह महत्वपूर्ण या ठोस कैसे हो सकती है?

    2. प्लेटो उन तत्वों को संकल्पना के बाहर मानता है, जिनसे वस्तु बनती है, जब ये तत्व बाहर थे तो वस्तु के अंदर कैसे चले जाते हैं?

    3. फॉर्म या विचार, जिनमें स्वयं कोई गति तत्व नहीं होता है, किसी संघटना का कारण कैसे हो सकता है|


    • प्लेटो की अस्पष्टता के समाधान के लिए अरस्तू ने Matter और Form अंतर किया है-

    1. Matter (पदार्थ)- यह एक ऐसी कच्ची वस्तु है, जिससे निश्चित वस्तु बनती है अर्थात गति या परिणाम का आधार है|

    2. Form (आत्मा या स्वरूप)- यह आकारहीन व अपरिभाषित है तथा पदार्थ के अंदर रहती है| Form ही पदार्थ को अन्य पदार्थ से भिन्न बनाता है| फॉर्म में ही वस्तु का अंतिम उद्देश्य निहित होता है|


    • Note- आत्मा के लिए प्लेटो ने Idea शब्द प्रयोग किया है तथा अरस्तू ने Form शब्द प्रयोग किया है|


    • अरस्तु के अनुसार Matter Potentiality (संभाव्यता) है और फॉर्म एक्चुअलिटी (वास्तविकता) है|

    • पदार्थ की संभाव्यता फॉर्म द्वारा ही अभिन्न आकार ग्रहण करती है|


    • अरस्तु के कार्योंत्पादन या गति व परिणाम के चार कारण हैं, जो क्रमशः निम्न है-

    • इन कारणों को हम चांदी से प्याला बनने तक की प्रक्रिया के माध्यम से समझ सकते हैं| यहां चांदी मैटर है तथा प्याला फॉर्म है|

    1. भौतिक कारण (Material Cause)-

    • पदार्थ, जिससे वह बना है, भौतिक कारण होता है|

    • अर्थात कच्ची व अनिर्मित चांदी भौतिक कारण है|


    1. निमित्त कारण (Efficient Cause)-

    • यह गति का कारण है|

    • निमित्त कारण ही पदार्थ को अंतिम उद्देश्य की ओर ले जाता है, जो Form में निहित है|

    • स्वर्णकार निमित्त कारण उत्पन्न करता है अर्थात वह चांदी को प्याले का आकार देने का प्रयास करता है|

    • इस तरह मनुष्य कलाकार के रूप में निमित्त कारण को जन्म देता है|


    1. औपचारिक या स्वरूप कारण (Formal Cause)-

    • वस्तु का या पदार्थ का सार औपचारिक कारण होता है|

    • अर्थात सुनार के मस्तिष्क में प्याले का स्वरूप|


    1. अंतिम कारण (Final Cause)-

    • वह उद्देश्य जिसकी और गतिविधि लक्षित है अर्थात प्याला|



    प्लेटो व अरस्तु की तुलना-

    • फ्रेडरिक सेलेगल “हम या तो प्लेटों के अनुयायी हो सकते हैं या अरस्तु के|” 

    • मैक्सी “राजनीतिक चिंतन में जहां प्लेटो आदर्शवादियों, कल्पनावादियों, क्रांतिकारियों तथा स्वप्नलोकवादियों का जनक है, वहां अरस्तु यथार्थवादियों, विज्ञानवादियों, व्यवहारवादियों तथा उपयोगितावादियों का जनक है|”


    प्लेटो तथा अरस्तु के विचारों में समान तत्व-

    • प्लेटो तथा अरस्तु के विचारों में निम्न समान तत्व है-

    1. दोनों यूनानी परिस्थितियों की उपज  हैं|

    2. दोनों के राजनीतिक विचारों का आधार नगर-राज्य है|

    3. दोनों राज्य नियंत्रित शिक्षा पर बल देते हैं तथा शिक्षा के द्वारा नागरिकों के चरित्र को उन्नत करने पर बल देते हैं|

    4. दोनों ही शारीरिक श्रम करने वालों की उपेक्षा करते हैं|

    5. नैतिक जीवन में दोनों की गहरी आस्था है|

    6. दोनों ही विचारको ने लोकतंत्र की कटु आलोचना की है|

    7.  दोनों ही विचारक कुलीनतंत्र के समर्थक हैं|


    प्लेटो और अरस्तू के विचारों में असमान तत्व-

    • मैक्सी ने लिखा है कि “जहां प्लेटो अपनी कल्पना को उड़ान भरने देता है, वहां अरस्तु व्यवहारिक एवं  सुस्त हैं, जहां प्लेटो बहुभाषी हैं, अरस्तु तथ्यगत है|”

    • प्लेटो तथा अरस्तु के विचारों में निम्न असमान तत्व है-

    1. प्लेटो कल्पनावादी है, अरस्तु यथार्थवादी है|

    2. प्लेटो की पद्धति निगमनात्मक है, अरस्तु की पद्धति आगमनात्मक है|

    3. प्लेटो अतिमानव की खोज करता है, अरस्तु अतिविज्ञान का अन्वेषक है|

    4. प्लेटो क्रांतिकारी हैं, अरस्तु रूढ़िवादी हैं|

    5. प्लेटो दार्शनिक राजा की संप्रभुता में आस्था रखता है, अरस्तु कानून की प्रभुता का समर्थक है| 

    6. प्लेटो एक तत्ववादी है राज्य की एकता का समर्थक है, अरस्तु विविधता का समर्थक है|

    7. प्लेटो राजनीति को नीतिशास्त्र का अंग मानता है, लेकिन अरस्तू ने राजनीतिक विचारों को नैतिक विचारों से पृथक करने का प्रयास किया है|

    8. प्लेटो राज्य को व्यक्ति का वृहद रूप मानता है, जबकि अरस्तु इसे परिवार का वृहद रूप मानता है|



    अरस्तु का मूल्यांकन-

    1. अरस्तु प्रथम राजनीतिक वैज्ञानिक के रूप में- 

    • एंड्रयू हैकर “यदि प्लेटो प्रथम दार्शनिक होने का दावा कर सकता है तो अरस्तु के प्रथम राजनीतिक वैज्ञानिक होने में बहुत ही कम संदेह है| पश्चिमी जगत में राजनीति विज्ञान अरस्तु से ही प्रारंभ हुआ है|”

    • डेनिंग “राजनीतिक अवधारणाओं के इतिहास में अरस्तु का विशेष महत्व इस तथ्य में निहित है कि उसने राजनीति को एक स्वतंत्र विज्ञान का चरित्र प्रदान किया है|” 

    • मैक्सी ने अरस्तु को पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन के इतिहास का पहला राजनीतिक वैज्ञानिक कहा है|” 


    1. राजनीति विज्ञान को अरस्तु की देन-

    1. मनुष्य को राजनीतिक प्राणी बताने वाला प्रथम विचारक अरस्तु है|   

    2. अरस्तु उपयोगितावादी विचारों का प्रेरक है| अरस्तु को उपयोगितावादियों का अग्रज माना जाता है|


    1. अरस्तु का प्रभाव- 

    निम्न प्रभाव है-  

    1. पॉलीबियस का मिश्रित सरकार का सिद्धांत अरस्तु के ‘पॉलिटिक्स’ पर आधारित है|

    2. दांते की मोनार्की पर अरस्तु के तर्कशास्त्र का प्रभाव है|

    3. मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है, इस मंतव्य का प्रभाव एक्विनास और मार्सिलियो पर पड़ा है |

    4. सेंट टॉमस एक्विनास अरस्तु को दार्शनिक कहता है और उसके संपूर्ण चिंतन पर अरस्तु का इतना अधिक प्रभाव है की टॉमस एक्विनास को ‘मध्य युग का अरस्तु’ अथवा ‘ईसाई अरस्तु’ कहा जाता है| मैक्सी ने अपनी रचना Political Philosophies मे मध्यकाल का अरस्तु कहा है| 

    5. आधुनिक युग के जीन बांदा, लॉक, रूसो, मांटेस्क्यू, बर्क, कार्ल मार्क्स आदि विचारको पर भी अरस्तु का प्रभाव पड़ा है|



        अरस्तु से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य    


    • प्लेटो के अनुसार अकादमी के दो भाग थे- उसका धड विद्यार्थी थे व दिमाग अरस्तु 

    • अरस्तु की शिक्षण संस्थान lyceum को lukeion (ल्यूकीओन) भी कहते हैं| यह विद्यालय भेड़ियों से पशुओं की रक्षा करने वाले देवता लीसीयस के मंदिर के उद्यान में स्थित था|

    • अरस्तु प्राय अपने शिष्यों के साथ उद्यान में घूमते हुए पढ़ाता था, अतः इसे भ्रमणशील दार्शनिक का विद्यालय भी कहा जाता है|

    • अरस्तु ने अपने मित्र एक्सनोक्रीटीज को लीसीयम का अध्यक्ष बनाया था|

    • रिटोरिक्स पुस्तक में अरस्तु ने दो प्रकार के कानून बताएं हैं- 1 विशिष्ट कानून  2 वैश्विक कानून|

    • अरस्तु के अनुसार संपत्ति अपने आप में एक आनंद देने वाली वस्तु है| 

    • अरस्तु के अनुसार व्यक्ति जब कानून व न्याय की अवज्ञा करता है, तो सबसे बुरा पशु बन जाता है| 

    • अरस्तु ने एथिक्स पुस्तक में मनुष्य को एक राजनीतिक प्राणी कहा है|

    • बर्लिन ने अपने लेख ‘Hedgehog and the Fox’ 1953 में प्लेटों को कांटेदार जंगली चूहा (Hedgehog) कहता है जो केवल एक बड़ी चीज जानता है जबकि अरस्तु को लोमड़ी की श्रेणी में रखता है जो बहुत कुछ जानता है|

    • अरस्तु के अनुसार कानून आवेगहीन (Dispassionate Reason) विवेक है|

    • अरस्तु के आदर्श राज्य पर प्लेटो के साथ-साथ अपने पूर्ववर्ती विचारको फेलियास ऑफ चेल्सीडॉम (Phaleas of chalcedon) एवं हिप्पोडेम्स ऑफ मिलटेस (hippodamus of miletus) के विचारों का भी प्रभाव रहा है|

    • पॉलिटिक्स का ग्रीक से हिंदी अनुवाद भोलानाथ शर्मा ने किया है|

    • अरस्तु की पॉलिटिक्स का 11 वीं सदी का फारसी अनुवाद जयपुर शहर संग्रहालय में उपलब्ध है|

     



    Notes available for RPSC School lecturers and UGC-Net Political Science Subject 9660895656

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