अंग्रेजी शब्द Liberty का हिंदी रूपांतरण
Liberty शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के Liber से
Liber का अर्थ है- बंधनों का अभाव या स्वाधीनता या बंधन रहित अवस्था|
राजनीतिक रूप में स्वतंत्रता के दो अर्थ-
स्वतंत्रता, मानवीय अस्तित्व का गुण है-
ताकि एक स्वतंत्र मनुष्य प्रकृति के नियमों का ज्ञान प्राप्त करके उन्हें अपने उद्देश्य की पूर्ति का साधन बना सकता है
स्वतंत्रता के गुण का संकेत देने के लिए- केवल Freedom शब्द का प्रयोग
स्वतंत्रता मनुष्य की एक दशा है-
स्वतंत्र मनुष्य स्वयं निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ति में समर्थ होता है|
स्वतंत्रता की दशा का संकेत देने के लिए- Freedom और Liberty दोनों शब्दों का प्रयोग
राजनीतिक सिद्धांत का मुख्य सरोकार स्वतंत्रता की दशा से है|
Liberty राजनीतिक संकल्पना है अर्थात राज्य द्वारा प्रतिबंधों का अभाव
तथा Freedom व्यक्तिगत स्वतंत्रता से संबंधित है|
स्वतंत्रता की परिभाषाएं-
D D मैकेंजी “स्वतंत्रता सभी प्रकार के प्रतिबंधों का अभाव नहीं है, अपितु अनुचित प्रतिबंधों के स्थान पर उचित प्रतिबंधों की व्यवस्था है| अर्थात अतार्किक प्रतिबंधों का अभाव है|”
L T हॉबहाउस “सबको स्वतंत्रता तभी प्राप्त हो सकती है, जब सब पर कुछ न कुछ प्रतिबंध लगा दिया जाए|”
सिले “स्वतंत्रता अतिशासन का विलोम है|”
ग्रीन “स्वतंत्रता उन कार्यों को करने या उन वस्तुओं का उपभोग करने की शक्ति है, जो करने या उपभोग करने योग्य हैं
थॉमस हॉब्स “स्वतंत्रता से तात्पर्य नियंत्रणो का अभाव, बाधाओं का अभाव, कानूनों की चुप्पी, विरोध की अनुपस्थिति”
जे एस मिल “स्वतंत्रता प्रतिबंधों का अभाव है| प्रतिबंधों के रूप में हर प्रतिबंध दोषयुक्त है और लोगों को नियंत्रित करने से बेहतर उन्हें अपनी इच्छा पर छोड़ दिया जाए, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने शरीर व मन का स्वामी है|”
बार्कर “जिस तरह बदसूरती का न होना सुंदरता नहीं, उसी तरह बंधनों का न होना स्वतंत्रता नहीं है|”
ज्यां पॉल सार्त्र “प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए बाध्य है|”
स्वतंत्रता के आयाम या पक्ष-
स्वतंत्रता के मुख्यतः दो आयाम या पक्ष हैं-
नकारात्मक स्वतंत्रता-
नागरिक, राजनीतिक व कानूनी स्वतंत्रता पर बल
स्वतंत्रता पर सभी प्रकार के बंधनों का अभाव या निर्बाध स्वतंत्रता
उदारवादी पूंजीवादी राज्यों में
सकारात्मक स्वतंत्रता-
सामाजिक व आर्थिक स्वतंत्रता पर बल
स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त प्रतिबंध
समाजवादी, लोककल्याणकारी, आदर्शवादी व्यवस्थाओं में
नकारात्मक स्वतंत्रता/ औपचारिक स्वतंत्रता/ प्रक्रियात्मक स्वतंत्रता-
अर्थ-
सभी प्रकार के प्रतिबंधों के अभाव
योग्यता पर बल
राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप का समर्थन
निजी क्षेत्र में तो राज्य या समाज के सभी प्रकार के प्रतिबंधों के अभाव
नकारात्मक स्वतंत्रता दो प्रकार की स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण मानती है-
कानूनी स्वतंत्रता-
विधि के समक्ष सब समान
राजनीतिक स्वतंत्रता-
सभी को व्यस्क मताधिकार, निर्वाचित होने का अधिकार|
प्रमुख समर्थक-
परंपरागत उदारवादी विचारक
स्वेच्छातंत्रवादी विचार
परंपरागत या नकारात्मक उदारवादी विचारक-
जॉन लॉक-
स्वतंत्रता संबंधी विचारों का उल्लेख- Two Treatises on government 1690
जॉन लॉक “जहां विधि नहीं, वहां स्वतंत्रता नहीं|”
जॉन लॉक 3 प्राकृतिक अधिकार-
जीवन
स्वतंत्रता
संपत्ति
अर्थात जॉन लॉक ने स्वतंत्रता को प्राकृतिक अधिकार माना है|
प्राकृतिक अधिकार में स्वतंत्रता के अधिकार को सार्वभौमिक अधिकार माना है|
स्वतंत्रता प्रकृति की देन है- जो व्यक्ति को जन्म से प्राप्त होती है, इसलिए राज्य द्वारा इस पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए|
प्रोफेसर वाहन “जॉन लॉक के दर्शन में प्रत्येक वस्तु व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है| प्रत्येक नियम का उद्देश्य व्यक्ति की सर्वोच्चता की रक्षा करना है|”
Note- जॉन लॉक, एडम स्मिथ, हरबर्ट स्पेंसर, जे एस मिल के दर्शन का केंद्र बिंदु व्यक्ति है|
हरबर्ट स्पेंसर-
पुस्तक- The Man Versus The State 1884
मूलतः जीवशास्त्री
हरबर्ट स्पेंसर ने डार्विन के सिद्धांत प्राकृतिक चयन व योग्यतम की उत्तरजीविता को सामाजिक क्षेत्र में लागू किया|
हरबर्ट स्पेंसर व्यक्ति के दो अधिकार बताता है-
निजी अधिकार
सार्वजनिक अधिकार
स्वतंत्रता- व्यक्ति का निजी अधिकार- राज्य के स्वतंत्रता पर प्रतिबंध के अभाव का समर्थन
स्पेंसर “राज्य इसलिए विद्यमान है, क्योंकि समाज में अपराध विद्यमान है| यदि समाज में अपराध नहीं होगा तो राज्य की आवश्यकता नहीं होगी|”
Note-लॉक व स्पेंसर प्रहरी राज्य का समर्थन करते हैं
एडम स्मिथ-
रचना- The Wealth of Nation 1776
मूलतः अर्थशास्त्री
अदृश्य हाथ (Invisible Hand) का विचार
राज्य को आर्थिक क्रियाओं के परिचालन में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए|
ये श्रम, भूमि, पूंजी पर निजी स्वामित्व पर बल
कर लगाने की नीति का विरोध
एडम स्मिथ के अनुसार यदि राष्ट्र की संपत्ति में वृद्धि करनी है, तो व्यक्तियों की निजी आर्थिक गतिविधियों में सरकार का न्यूनतम हस्तक्षेप होना चाहिए| इसे अहस्तक्षेप नीति कहा जाता है|
Note- एडम स्मिथ, रिकार्डो, माल्थस आर्थिक क्षेत्र में अहस्तक्षेपवादी नीति (Laissez Faire) के समर्थक है|
बेंथम-
पुस्तक- A Fragment on Government 1776
बेंथम “व्यक्ति सुरक्षा चाहते है, न कि स्वतंत्रता|”
बेंथम “मनुष्य बिना एक भी अपवाद के दासता की स्थिति में जन्म लेते हैं|”
जे एस मिल-
उपयोगितावाद का अंतिम व व्यक्तिवाद का प्रथम विचारक
स्वतंत्रता संबंधी विचारों का उल्लेख- पुस्तक A treatise On Liberty या On LIberty 1859
स्वतंत्रता को प्राथमिक महत्व की वस्तु माना है|
मिल “स्वतंत्रता व्यक्ति व सभ्यता के विकास के लिए आवश्यक है|”
मिल स्वतंत्रता के दो प्रकार बताता है-
विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
कार्यों की स्वतंत्रता
विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता-
मिल विचार व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध न लगाने के पक्ष में है, चाहे वह विचार समाज के अनुकूल हो या प्रतिकूल|
मिल के अनुसार यदि संपूर्ण समाज एक ओर हो और अकेला व्यक्ति दूसरी ओर तो भी उस व्यक्ति को विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए|
चेतना का अंतस्थ: ज्ञान क्षेत्र (Inward Domain Of Consciousness)-
किसी भी बिंदु या विषय पर आस्था, अभिमत, विचार और अभिव्यक्ति की असीम स्वतंत्रता|
अहस्तक्षेप का लघुत्तम क्षेत्र-
विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सिद्धांत अहस्तक्षेप का लघुत्तम क्षेत्र है, जिसमें राज्य का किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए
कार्यों की स्वतंत्रता-
विचारों की स्वतंत्रता का पूरक
मिल के अनुसार सोचने, समझने, बोलने, कार्य करने की स्वतंत्रता एक ही प्रधान तत्व के सोपान है, इसमें किसी की उपेक्षा नहीं की जा सकती|
मिल व्यक्ति के कार्य को दो भागों में बांटता है-
स्व विषयक कार्य
पर विषयक कार्य
स्व विषयक कार्य-
ऐसे कार्य जिनका प्रभाव केवल स्वयं व्यक्ति पर पड़ता है| जैसे- कपड़े पहनना, शिक्षा प्राप्त करना, सिगरेट पीना, धार्मिक कार्य आदि|
स्व विषयक कार्यों में राज्य का किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं अर्थात सभी प्रकार के बंधनों का अभाव|
वैयक्तिकता का सिद्धांत-
स्व विषयक कार्यों के संदर्भ में
स्वतंत्रता का अंतिम उद्देश्य वैयक्तिकता की प्राप्ति
बौद्धिक और नैतिक व्यक्तित्व का निर्माण ही स्वतंत्रता का परम लक्ष्य
पर विषयक या पर संबंधी कार्य (हानि का सिद्धांत)-
हानि का सिद्धांत-
वे कार्य जिनसे समाज व अन्य व्यक्ति प्रभावित होते हैं|
अर्थात अन्य व्यक्तियों को हानि पहुंचती हो, इसे हानि का सिद्धांत भी कहा जाता है|
प्राधिकार (Authority) की सीमा
पर संबंधी कार्यों में राज्य हस्तक्षेप कर सकता है|
युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते है|
अर्थात व्यक्ति के पर विषयक कार्यों पर प्राधिकार (Authority) की सीमा होनी चाहिए|
स्वतंत्रता का पूर्व सत्यापित सिद्धांत (Presumption of Liberty)-
मिल ने स्वतंत्रता की संकल्पना को अभीष्ट सत्य के रूप में स्वीकार किया है,
जिसे सत्य सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है,
बल्कि पूर्व सत्यापित है|
Note- C B मेकफरसन ने मिल की स्वतंत्रता को विकासजनक स्वतंत्रता की संज्ञा दी है, जो बौद्धिकता के निर्माण और संवर्धन के लिए आवश्यक है|
लार्ड एक्टन-
पुस्तक- History of freedom and other Essay 1907 में नकारात्मक स्वतंत्रता का समर्थन
एक्टन “समानता गेट से आती है, तो स्वतंत्रता खिड़की से चली जाती है|”
टॉकवीले-
पुस्तक- Democracy in America 1835
टॉकवीले “स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, लेकिन समानता की अवधारणा स्वतंत्रता और लोकतंत्र दोनों को नष्ट कर देती है|”
जेम्स ब्राइस-
पुस्तक- Modern democracy 1921
जेम्स ब्राइस “समानता की अवधारणा को दूर तक लागू नहीं किया जा सकता, इसलिए हमें स्वतंत्रता पर जोर देना चाहिए| पूर्ण आर्थिक समानता असंभव है|”
जेम्स ब्राइस “निरंतर जागरूकता स्वतंत्रता का मूल्य है|”
स्वेच्छातंत्रवादी विचारक/ नव उदारवादी विचारक/ विमुक्तिवादी विचारक-
नकारात्मक स्वतंत्रता के समकालीन समर्थक विचारक
व्यक्ति की पूर्ण स्वायत्तता पर बल
नव उदारवाद को नव दक्षिणपंथी भी कहा जाता है|
राज्य के कल्याणकारी स्वरूप का विरोध
ये राज्य की तुलना में व्यक्ति पर बल
पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था के पक्षधर
F A हेयक-
पुस्तक- The Constitution of liberty 1960
हेयक के अनुसार स्वतंत्रता का तात्पर्य है विकल्पों की उपस्थिति|
गुलामी का मार्ग (Road to serfdom)-
अर्थात विकास के जितने ज्यादा विकल्प होंगे, उतनी ज्यादा स्वतंत्रता होगी, यदि विकल्पों को बंद कर दिया जाए तो उसी को गुलामी का मार्ग (Road to serfdom) कहते हैं|
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समर्थक-
हेयक व्यक्तिगत स्वतंत्रता के समर्थक थे| हेयक ने अपनी पुस्तक The Constitution of liberty में लिखा है कि “मनुष्य को स्वतंत्रता तब प्राप्त होती है, जब वह किसी दूसरे की निरंकुश इच्छा के द्वारा विवश या बाध्य न हो|”
हेयक- नव उदार पूंजीवाद का बौद्धिक जनक कहा जाता है|
कल्याणकारी राज्य की संकल्पना का विरोध
सर्वाधिकारवादी और कल्याणकारी राज्य एक ही सिक्के के दो पहलू
नियोजन की संकल्पना प्रगति में अवरोध-
हेयक अपनी पुस्तक Road to serfdom 1944 में नियोजन की संकल्पना को प्रगति में अवरोध मानता है, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता को समाप्त कर देती है तथा दासता की ओर ले जाता है|
सामाजिक न्याय और सामाजिक स्वतंत्रता को निरर्थक-
Law, Legislation and liberty:The Mirage of Social Justice (दो भाग- 1973 व 1976) में सामाजिक न्याय और सामाजिक स्वतंत्रता को निरर्थक बताता है, क्योंकि इनके नाम पर स्वतंत्रता का गला घोंट दिया जाता हैं|
स्वतंत्रता के चार प्रकार-
हेयक स्वतंत्रता के चार प्रकार मानता है-
राजनीतिक स्वतंत्रता
आंतरिक स्वतंत्रता
शक्ति रुपी स्वतंत्रता
व्यक्तिगत स्वतंत्रता (व्यक्तिगत स्वतंत्रता ज्यादा आवश्यक)
आलोचना-
क्रिश्चियन बे “हेयक विशेष वर्गहित का विशेष अधिवक्ता है, जो निर्बल की आवश्यकता की तुलना में बलशाली की मांगों को स्वभाव से वरीयता देता है|”
क्रिश्चियन बे ने हेयक की कृति The Constitution of liberty में प्रस्तुत किए गए विचारों को रूढ़िवादी समाज दर्शन, चिंतन की बंद प्रणाली व स्थायी विशेषाधिकार का संविधान बताया है|
आइजिया बर्लिन
आंशिक स्वेच्छातंत्रवादी-
क्योंकि यह पहले सकारात्मक उदारवादी था अपने अंतिम जीवन में स्वेच्छातंत्रवादी बना था|
नकारात्मक स्वतंत्रता के विचार दिए- Two Concept of Liberty 1958
बर्लिन ने Two Concept of Liberty में दो प्रकार की स्वतंत्रता का उल्लेख किया है-
सकारात्मक स्वतंत्रता- आत्म नियंत्रित/ आत्म साक्षात्कार
नकारात्मक स्वतंत्रता- राजनीतिक स्वतंत्रता, नागरिक स्वतंत्रता, प्रतिबंधों का अभाव, चयन की स्वतंत्रता, अधीनता से मुक्ति आदि|
बर्लिन के अनुसार-
नकारात्मक स्वतंत्रता या चयन की स्वतंत्रता- व्यक्ति को अपने विवेक के अनुसार अपने कार्यों का चयन करने से रोका नहीं जाए|
सकारात्मक स्वतंत्रता- व्यक्ति का अपने उपर पूरा नियंत्रण होना चाहिए|
बर्लिन “राज्य केवल नकारात्मक स्वतंत्रता दे सकता है, इसके बावजूद कोई व्यक्ति गरुड़ पक्षी की तरह उड़ नहीं पाता, व्हेल की तरह तैर नहीं सकता तो उसकी अपनी कमी है|”
इस प्रकार बर्लिन नकारात्मक स्वतंत्रता की रक्षा का भार राज्य को सौंपा है तथा सकारात्मक स्वतंत्रता को व्यक्ति की इच्छा पर छोड़ता है|
बर्लिन की अन्य पुस्तक- Four Essay on liberty 1969
मिल्टन फ्रीडमैन-
पुस्तक- Capitalism and freedom 1962
हरबर्ट स्पेंसर से प्रभावित
मिल्टन फ्रीडमैन “कमजोर लोगों को कोई राहत नहीं देनी चाहिए|” अर्थात सरकार सामाजिक कल्याण का कार्य न करें|
इन्होंने प्रतिस्पर्धात्मक पूंजीवाद, स्वतंत्र बाजार व सीमित सरकार का समर्थन किया है|
फ्रीडमैन के अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ “किसी व्यक्ति के साथ रहने वाले उसे किसी बात के लिए विवश न कर सके|”
रॉबर्ट नॉजिक-
पुस्तक- Anarchy, State and Utopia 1974
स्वेच्छातंत्रवाद का श्रेष्ठतम आधुनिक समर्थक
स्वतंत्रता केवल पूंजीवादी व्यवस्था की विशेषता-
रॉबर्ट नॉजिक का मत
क्योंकि व्यक्तियों की स्वतंत्रता उनके स्वैच्छिक सहयोग और विनिमय की गतिविधियों में निहित है| केवल पूंजीवादी व्यवस्था ही व्यक्तियों की स्वैच्छिक गतिविधियों में तालमेल स्थापित करके राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए उपयुक्त अवसर और वातावरण प्रदान करती है|
रॉबर्ट नॉजिक संरक्षण, न्याय एवं प्रतिरक्षा को ही राज्य के कार्य मानता है|
ये प्राकृतिक कानून के आलोचक थे तथा प्राकृतिक कानून को पितृवंशीय कहते थे
Note- परंपरागत उदारवादी व स्वेच्छातंत्रवादी स्वतंत्रता और समानता को एक दूसरे का विरोधी मानते हैं|
सकारात्मक/ अनौपचारिक/ तात्विक स्वतंत्रता-
स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त प्रतिबंध का समर्थन
समाजवादी व लोक कल्याणकारी राज्य का समर्थन
सकारात्मक स्वतंत्रता के प्रमुख समर्थक-
सकारात्मक उदारवादी या आधुनिक उदारवादी विचारक
समतावादी विचारक
समाजवादी या मार्क्सवादी व नव मार्क्सवादी विचारक
समुदायवादी विचारक
आदर्शवादी विचारक
सकारात्मक/ आधुनिक उदारवादी विचारक-
जे एस मिल-
सकारात्मक उदारवाद का जनक
मिल पहले नकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थक थे, लेकिन जीवन के अंतिम दिनों में सकारात्मक उदारवाद का समर्थन करते हैं|
मिल ने अपनी पुस्तक Principles of Political Economy 1848 में भूमि सुधार का समर्थन किया था|
लॉस्की-
पुस्तक- A Grammar of Politics 1925
लॉस्की “आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में राजनीतिक स्वतंत्रता बेकार है|”
यह स्वतंत्रता और समानता को पूरक मानता है|
हॉब हाउस-
पुस्तक- Liberalism 1911
यह राज्य को कर लगाने का अधिकार देता है| कहता है कि राज्य कर लगाए तथा उस कर का उपयोग गरीबों के कल्याण के लिए करें|
अर्थात यह समानता व स्वतंत्रता को पूरक मानता है|
प्रभावी स्वतंत्रता-
हॉब हाउस “सकारात्मक स्वतंत्रता के लिए प्रभावी स्वतंत्रता शब्द का प्रयोग करता है|”
R H टोनी-
पुस्तक- Equality 1931
टोनी कहता है कि जब तक व्यक्ति को समानता या सकारात्मक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती, तब तक वह नकारात्मक स्वतंत्रता का प्रयोग भी नहीं कर सकता है|
टोनी “एक भूखे पेट व्यक्ति भाषण नहीं दे सकता|”
G D रिची-
पुस्तक- Natural Rights (1895)
रिची सकारात्मक उदारवाद व सकारात्मक स्वतंत्रता पर विशेष जोर देता है|
General interest and state
इनका कहना है कि राज्य को संपूर्ण समाज के सामान्य हित पर बल देना चाहिए|
आदर्शवादी विचारक-
ग्रीन-
पुस्तक- Lectures on the Principle of Political Obligation 1895
ग्रीन चेतना की सर्वोच्च संस्था मानव को मानता है|
ग्रीन ने स्वतंत्रता के दो प्रकार बताए हैं-
आंतरिक स्वतंत्रता-
नैतिकता पर आधारित
इसको व्यक्ति स्वयं प्राप्त कर सकता है इसमें राज्य का कोई योगदान नहीं होता है|
बाह्य स्वतंत्रता-
इसमें राज्य योगदान दें तथा व्यक्ति को उचित वातावरण या उचित परिस्थितियां प्रदान करें
अर्थात उचित वातावरण या उचित परिस्थितियां ही स्वतंत्रता है|
ग्रीन “स्वतंत्रता उन कार्यों को करने तथा उन वस्तुओं के उपभोग करने की शक्ति है, जो कार्य करने तथा वस्तु उपभोग करने योग्य है|”
ग्रीन “मानव चेतना स्वतंत्रता चाहती है, स्वतंत्रता में अधिकार निहित हैं तथा अधिकार राज्य की मांग करते हैं|”
हेगेल-
हेगेल “राज्य की आज्ञा का पालन करना ही स्वतंत्रता है|”
ब्रह्मांडीय आत्मा की आज्ञा पालन-
हेगेल स्वतंत्रता को ब्रह्मांडीय आत्मा की आज्ञा पालन मानता है, जो विवेक द्वारा प्रकट होती है|
हेगेल का मानना है कि पूर्व में एक सर्वोच्च सत्ताधारी राज्य ही स्वतंत्र था|
कांट-
पुस्तक- Critique of Pure Reason 1781
‘संकल्प की स्वतंत्रता’ (Freedom of Will)-
कांट- स्वतंत्रता स्पष्ट रूप में स्व निर्धारित कर्तव्य के आदेश की भावना की पूर्ति तथा विवेकसंगत इच्छा की स्वायत्तता (Autonomy of Will) है|
मूल समझौते की अवधारणा-
कांट के अनुसार ‘समझौते द्वारा जंगली, विधि विहीन स्वतंत्रता को त्याग कर परिपूर्ण या उत्तम स्वतंत्रता (Perfect Freedom) हेतु कॉमनवेल्थ की स्थापना की जाती है|’
कांट सकारात्मक स्वतंत्रता के समर्थक हैं| इन्होंने नैतिक स्वतंत्रता पर बल दिया है|
रूसो-
पुस्तक- Social Contract 1762
स्वतंत्रता राज्य प्रदत नागरिक अधिकार मानता है|
Social contract में रूसो ने लिखा है कि “स्वतंत्रता मानव का परम आंतरिक तत्व है|”
रूसो स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता या मनमाना कार्य करना नहीं है, बल्कि सामान्य हित की दृष्टि से बनाए गए नियम व कानूनों की पालना करने में स्वतंत्रता है|
‘सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ का आरंभ इस प्रसिद्ध वाक्य के साथ होता है “मनुष्य स्वतंत्र उत्पन्न होता है, लेकिन वह सर्वत्र बेड़ियों में जकड़ा हुआ है|”
Paradox of Freedom (स्वतंत्रता का विरोधाभास)-
रूसो की स्वतंत्रता की संकल्पना को विरोधी भाषी संकल्पना कहा जाता है, क्योंकि रूसो का मत है कि जो व्यक्ति सामान्य इच्छा का पालन नहीं करेगा, उस व्यक्ति को स्वतंत्र होने के लिए बाध्य किया जाएगा|
तथा सामान्य इच्छा की पालन करना ही स्वतंत्रता है|
समतावादी विचारक-
जॉन रॉल्स-
पुस्तक- A theory of Justice 1971
स्वतंत्रता की इकहरी संकल्पना-
जॉन रॉल्स ने स्वतंत्रता की इकहरी संकल्पना दी है, अर्थात स्वतंत्रता सकारात्मक या नकारात्मक नहीं होती है|
विभेद का सिद्धांत-
रॉल्स का यह सिद्धांत असमान वितरण की अनुमति देता है, लेकिन यह असमान वितरण हीनतम स्थिति वाले वर्ग को अधिकतम लाभ पहुंचाएं|
प्राकृतिक स्वतंत्रता की व्यवस्था-
जॉन रॉल्स नकारात्मक स्वतंत्रता को प्राकृतिक स्वतंत्रता की व्यवस्था कहता है|
तथा इसकी आलोचना करते हुए कहता है कि ‘इसके परिणाम सर्वथा अनुचित होंगे और ना ही इस व्यवस्था में न्याय की उम्मीद की जा सकती है|’
अमर्त्य सेन-
पुस्तक- Development as freedom 1999
भारतीय मूल के समतावादी विचारक
विकासात्मक स्वतंत्रता-
यह विकासात्मक स्वतंत्रता की संकल्पना प्रस्तुत करते हैं, अर्थात स्वतंत्रता के लिए व्यक्ति की क्षमताओं का विकास करना चाहिए|
अर्थात व्यक्ति को मछली देने के बजाय, मछली का शिकार करना सिखाया जाए|
अमर्त्य सेन ने 5 सहायक स्वतंत्रताएं बताई है-
राजनीतिक स्वतंत्रता
सामाजिक स्वतंत्रता
आर्थिक स्वतंत्रता
पारदर्शिता की गारंटी
शरण में आए की सुरक्षा
रोनाल्ड डवारकिन-
विधिक अहस्तक्षेप ही स्वतंत्रता-
डवारकिन “विधिक अहस्तक्षेप ही स्वतंत्रता है|”
डवारकिन “मेरी समझ से कानूनी बाधाओं से मुक्ति ही स्वतंत्रता है, जिसे आमतौर पर नकारात्मक स्वतंत्रता कहा जाता है|”
स्वतंत्रता समानता का एक आयाम-
डवारकिन “स्वतंत्रता एक स्वतंत्र विचार न होकर समानता का ही एक आयाम है| स्वतंत्रता और तात्विक समानता के बीच प्रतिरोध नहीं है, बल्कि अंतरसंबंध है|”
C B मैकफ़र्सन-
पुस्तक- The real word of democracy 1965
Democratic theory: essay in retrieval 1973
सृजनात्मक स्वतंत्रता-
मैकफ़र्सन सृजनात्मक स्वतंत्रता के विचार का प्रतिपादन करते हैं|
मैकफ़र्सन “मनुष्य की विकासात्मक शक्ति का अधिकतम विस्तार ही उसकी सृजनात्मक स्वतंत्रता की कुंजी है|”
मैकफ़र्सन दो प्रकार की शक्ति बताता है-
दोहन शक्ति-
स्वार्थ पर आधारित
इससे समाज का शोषण होता है तथा स्वतंत्रता का नाश होता है|
विकासात्मक शक्ति-
परार्थ पर आधारित
समाज कल्याण पर बल देती है, जिससे सृजनात्मक स्वतंत्रता का निर्माण होता है|
जगदीश भगवती-
भारतीय समतावादी विचारक व अर्थशास्त्री
पुस्तक- World economy
India in Transition : Freeing the Economy 1993
जगदीश भगवती के अनुसार “वैश्वीकरण अपनाने के बाद भारत में सृजनात्मक स्वतंत्रता का ह्रास हुआ है|”
समाजवादी/ मार्क्सवादी विचारक
कार्ल मार्क्स-
अलगाव से स्वतंत्रता-
कार्ल मार्क्स ने अपनी कृति Economic and Philosophic Manuscripts 1844 में पूंजीवाद की आलोचना की है और कहा है कि ‘पूंजीवाद मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने देता है|’
पूंजीवाद मनुष्य की रचनात्मक शक्ति और कोमल भावनाओं को नष्ट करके उसे अपनी रचना से, प्रकृति से, समाज से, यहां तक कि अपने आप से बेगाना कर देता है|
स्वतंत्रता को वापस लाने का यह तरीका है कि उन परिस्थितियों को बदल दिया जाए जो मनुष्य को अलगाव या पराएपन की ओर ले जाती है|
तर्कसंगत उत्पादन प्रणाली (साम्यवादी प्रणाली) में ही व्यक्ति स्वतंत्र हो सकता है|
फ्रेडरिक एंगेल्स-
पुस्तक- Anti-Duhring 1878
विवशता से स्वतंत्रता की ओर सिद्धांत-
जब तक मनुष्य को प्राकृतिक नियमों का ज्ञान नहीं होता है, तब तक वह विवश होता है|
जैसे ही वह प्राकृतिक नियमों का ज्ञान प्राप्त करके उनका प्रयोग अपने हित में करने लगता है, तो वह स्वतंत्रता की ओर बढ़ता है|
नव मार्क्सवादी विचारक-
एरिक फ्रॉम
पुस्तक- Escape From freedom 1941
Fear of freedom 1942
मनोविदलता (सिजोफ्रेनिया)-
इनके अनुसार व्यक्ति पूंजीवादी व्यवस्था में फसकर परिवार, समाज से कट जाता है तथा भौतिक अकेलापन व नैतिक अकेलापन का शिकार हो जाता है|
जब अकेलापन हद से ज्यादा बढ़ जाता है तो व्यक्ति मनोविदलता (सिजोफ्रेनिया) जैसे मानसिक रोग का शिकार हो जाता है| इस तरह व्यक्ति स्वतंत्रता से पलायन कर जाता है|
इससे बचने का तरीका यह होगा कि व्यक्ति सहज स्नेह तथा रचनात्मक कार्य के द्वारा अपने आप को विश्व के साथ फिर से जोड़ ले|
हरबर्ट मार्क्यूजे-
पुस्तक- One-Dimensional Man: Studies in the Ideology of Advanced Industrial Society (1968)
एक आयामी मानव-
मार्क्यूजे “मनुष्य सोने के पिंजरे में बंद उस पक्षी की तरह है, जो उसके आकर्षण में इतना डूब चुका है, कि वह मुक्त आकाश में उड़ान भरने के आनंद को भूल गया है|”
पूंजीवादी व्यवस्था में मनुष्य का बहुआयामी व्यक्तित्व समाप्त हो गया है तथा उसके व्यक्तित्व का एक आयाम रह गया है वह है- तुच्छ भौतिक इच्छाओं की संतुष्टि|
उपभोक्तावादी संस्कृति ने सृजनात्मक स्वतंत्रता के विचार को पीछे धकेल कर व्यक्ति को एक आयामी बना दिया है|
मिथ्या चेतना-
आधुनिक प्रौद्योगिकी समाज ने मिथ्या चेतना के द्वारा मनुष्य को कब्जे में कर रखा है| यह मिथ्या चेतना भय और उपभोक्तावाद पर आधारित है|
हेबर मास-
पुस्तक- Legitimation Crisis 1975
पूंजीवाद की वैधता का संकट-
इनके अनुसार स्वतंत्रता की समस्या ने पूंजीवाद की वैधता को संकट में डाला है|
समकालीन विश्व में विज्ञान, प्रौद्योगिकी और संगठन की वजह से मनुष्य की तर्कबुद्धि मनुष्य के उद्धार दायित्व से मुक्त हो गई है और मनुष्य की तर्कशक्ति की भूमिका, तकनीकी कुशलता बढ़ाने तक सीमित रह गई है, जो मनुष्य को पराधीनता की ओर धकेलती है|
समुदायवादी विचारक-
ये सामान्यतः बंधुता (भाई चारे) पर जोर देते हैं तथा स्वतंत्रता व समानता दोनों महत्वपूर्ण मानते हैं|
माइकल वाल्जर जटिल समानता का समर्थन किया है|
हन्ना आरेण्ट ने सृजनात्मक स्वतंत्रता का समर्थन किया है|
नोट- सकारात्मक उदारवादी, समतावादी, समाजवादी विचारक स्वतंत्रता और समानता को एक दूसरे का पूरक मानते हैं|
स्वतंत्रता के तीन तत्व-
विकल्पों की उपस्थिति
विकल्पों को चुनने व उनका प्रयोग करने में बाधाओं का अभाव
विकल्पों को वास्तविक एवं व्यवहारिक रूप देने के लिए आवश्यक परिस्थितियां
फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट-
U S A राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ने अटलांटिक चार्टर में चार प्रकार की स्वतंत्रताओं का वर्णन किया है, जिन्हें चार मुक्तियां भी कहा जाता है-
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
उपासना की स्वतंत्रता
भय से स्वतंत्रता
अभाव से स्वतंत्रता
डेविड मिलर-
पुस्तक- The Liberty Reader 2006
मिलर ने स्वतंत्रता के तीन प्रकार या तीन परंपराएं बतायी है-
गणतंत्रवादी
उदारवादी
आदर्शवादी
विम किमलिका-
प्रयोजनमूलक स्वतंत्रता- उपयोगितावादियों की स्वतंत्रता
तटस्थ स्वतंत्रता- किसी व्यक्ति को उतनी ही स्वतंत्रता मिल सकती है, जितनी कि वह दूसरे को देना चाहता है| विमलिका इससे अधिकतम समान स्वतंत्रता कहते हैं|
उद्देश्य पूर्ण स्वतंत्रता
क्विंटन स्कीनर-
स्वतंत्रता का नव रोमन सिद्धांत- स्वतंत्रता केवल स्वतंत्र व स्वशासित राज्य में ही संभव है|
गणतंत्रवादी स्वतंत्रता
सकारात्मक स्वतंत्रता
फिलिप पैटिट-
पुस्तक- Republicanism: A Theory of freedom and government 1997
रिपब्लिकन स्वतंत्रता-
फिलिप पैटिट और क्विंटन स्कीनर नकारात्मक स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए यह मानते हैं कि स्वतंत्रता ऐसी स्थितियों का आनंद है, जिसमें अहस्तक्षेप की गारंटी हो, और यह गारंटी तभी मिल सकती है, जब राजनीतिक संस्थाएं प्रजातांत्रिक एवं उदारवादी हो, पैटिट इसे रिपब्लिकन स्वतंत्रता कहता है|
गैर प्रभुत्व स्वतंत्रता-
स्वतंत्रता केवल हस्तक्षेप का अभाव नहीं है, बल्कि प्रभुत्व का अभाव भी है|
एक दास के काम में मालिक चाहे हस्तक्षेप नहीं करें, फिर भी दास स्वतंत्र नहीं है क्योंकि मालिक के प्रभुत्व के अधीन है|
प्लेटो-
अभिजात वर्ग की स्वतंत्रता
प्लेटो ने स्वतंत्रता के लिए ग्रीक शब्द ऐलूथेरिया का प्रयोग किया है|
ऐलूथेरिया का तात्पर्य है- अभिजात वर्ग स्वतंत्रता, जिसमें विवेक का शासन हो
अरस्तु-
गणतंत्रवादी स्वतंत्रता-
अरस्तु की स्वतंत्रता कर्तव्य के रूप में है|
स्वतंत्र व्यक्ति वही है, जो नागरिक है तथा शासन कार्यो में भाग लेता है|
अरस्तु ने केवल नागरिकों को स्वतंत्र कहा है तथा दासो, महिलाओं, विदेशियों को स्वतंत्रता विहीन कहा है|
सिसरो-
कृति- De Re Publica (डी रिपब्लिका) 54–51 ई.पू
सिसरो ने अपनी कृति डी रिपब्लिका में कहा है कि “हम कानून के बंधन में है, ताकि हम स्वतंत्र हो सके|”
सिसरो की स्वतंत्रता का सार “जैसा आप चुनते हैं, वैसे ही जीना|”
एडवर्ड गिब्बन ने सिसरो के लेखन को स्वतंत्रता की साँस कहा है|
जीन पॉल सार्त्र-
पुस्तक- Being and Nothingness 1943
जीन पॉल सार्त्र “हमारे मस्तिष्क और विचारों में हम सभी पूर्णत: स्वतंत्र हैं| स्वतंत्रता मनुष्य के लिए अत्यधिक कष्ट देने वाली वस्तु है, परंतु फिर भी मनुष्य स्वतंत्र रहना चाहता है|”
जीन पॉल सार्त्र “प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है|”
हन्ना आरेण्ट-
पुस्तक- On human condition 1958
On Violence 1970
The Origins of Totalitarianism 1951
हन्ना आरेण्ट ने मनुष्य की गतिविधियों के तीन स्तर बताएं है-
श्रम (Labour)
कार्य (Work)
कार्यवाही (Action)
हन्ना आरेण्ट स्वतंत्रता को सामुदायिक कौशल मानती है|
इनके अनुसार स्वतंत्रता राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार है|
अर्थात स्वतंत्रता का संबंध कार्यवाही से है|
हन्ना आरेण्ट “आधुनिक समाज में लोग श्रम व कार्य के स्तर पर जी रहे हैं और यह उपभोक्तावादी समाज को जन्म देता है, जबकि सबसे श्रेष्ठ गतिविधि कार्यवाही है|
हैरी फ्रैंकफर्ट-
पुस्तक- Freedom of will and the concept of a person 1971
व्यक्तिगत स्वायत्तता का सिद्धांत-
हैरी फ्रैंकफर्ट “व्यक्ति स्वायत्त तब कहलाता है, जब वह अपनी विचार शैली, जीवन चरित्र और अभिलाषाओं के ऊपर तार्किक आत्म नियंत्रण कर लेता है|
जोसेफ राज-
पुस्तक- The Morality of freedom 1986
ये पूर्णतावादी उदारवाद के समर्थक हैं| अर्थात व्यक्ति के पूर्ण आत्मविकास के लिए राज्य की सकारात्मक भूमिका को आवश्यक मानते हैं|
सकारात्मक स्वतंत्रता के पक्षधर
उदारवादी सर्वोत्कृष्टवाद का सिद्धांत-
नैतिक मूल्य समुदाय उन्मुख मानता है अर्थात समुदाय ही नैतिक मूल्यों का जनक है|
फ्रांज फेनन-
पुस्तक- Black Skin and White Mask 1952
The Wretched of the Earth 1961
फ्रांज फेनन अश्वेत मनोचिकित्सक व मूलतः नव मार्क्सवादी विचारक है|
फ्रांज फेनन अश्वेत अस्तित्ववाद व आलोचात्मक सिद्धांत का समर्थक था|
ये संपूर्ण मानव जाति की स्वतंत्रता के पक्षधर है|
The Wretched of the Earth 1961-
धरती के अभिशप्त या अभागे
इस पुस्तक की प्रस्तावना पॉल सार्त्र ने लिखी थी| इसमें फेनन ने लिखा है कि “अलगाव रोग है, उपनिवेशवाद उसका कारण है, क्रांति उसका निदान है और स्वतंत्रता नियति है|”
सैमुअल पी हंटिंगटन-
पुस्तक- Political Development and Political Decay 1965
Political Order in Changing Society 1968
The Clash of Civilization 1996
The Third Wave of Democratization 1991
व्यवस्था स्वतंत्रता से पहले-
सैमुअल पी हंटिंगटन ने अपनी कृति Political Order in Changing Society में लिखा है कि “स्वतंत्रता के बगैर व्यवस्था रह सकती है पर व्यवस्था के बिना स्वतंत्रता नहीं रह सकती| इस प्रकार व्यवस्था स्वतंत्रता से पहले है|”
स्वतंत्रता के प्रकार-
प्राकृतिक स्वतंत्रता-
स्वतंत्रता प्रकृति प्रदत
समर्थक- समझौतावादी विचारक इसके समर्थक हैं|
यह राज्य से पूर्व विद्यमान थी| राज्य की स्थापना के साथ ही यह धीरे-धीरे लुप्त हो जाती है|
निजी/ व्यक्तिगत स्वतंत्रता-
व्यक्ति के निजी जीवन से संबंधित है, जिस पर प्रतिबंध केवल समाज हित
ब्लैक स्टोन व्यक्तिगत स्वतंत्रता में स्वास्थ्य, जीवन, प्रतिष्ठा, भ्रमण, निजी संपत्ति, उपभोग व व्यय करने को शामिल करता है|
नागरिक स्वतंत्रता-
नागरिक होने के कारण संबंधित देश में प्राप्त
बार्कर नागरिक स्वतंत्रता में तीन स्वतंत्रताओं को शामिल करता है-
दैहिक,
बौद्धिक
व्यवहारिक स्वतंत्रता
राजनीतिक स्वतंत्रता-
मतदान करने, चुनाव में भाग लेने, सार्वजनिक पदों पर नियुक्ति पाने का अधिकार
गिलक्राइस्ट राजनीतिक स्वतंत्रता को लोकतंत्र का दूसरा नाम बताते हैं|
आर्थिक स्वतंत्रता-
आर्थिक शोषण मुक्ति
लॉस्की “आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में राजनीतिक स्वतंत्रता व्यर्थ है|”
नेहरू “भूखे मनुष्य के लिए वोट का कोई महत्व नहीं है|”
धार्मिक स्वतंत्रता-
यह अंतःकरण से संबंधित है| यह व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने, आस्था व आचरण की स्वतंत्रता देता है|
नैतिक स्वतंत्रता-
इसका संबंध व्यक्ति के चरित्र, नैतिकता, औचित्यपूर्ण व्यवहार से हैं|
समर्थक- प्लेटो, अरस्तु, कांट, ग्रीन
सबसे उत्कृष्ट स्वतंत्रता
सामाजिक स्वतंत्रता-
व्यक्ति के साथ जाति, वर्ग, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करना|
राष्ट्रीय स्वतंत्रता-
अर्थात संप्रभु राष्ट्र (स्वतंत्र देश), औपनिवेशिक या साम्राज्यवादी दासता से मुक्ति, आत्मनिर्णय का सिद्धांत
राष्ट्र की स्वतंत्रता के बिना अन्य स्वतंत्रताए गौण है|
समर्थक- वुड्रो विल्सन
संवैधानिक स्वतंत्रता-
यह स्वतंत्रता नागरिकों को संविधान द्वारा प्रदान की जाती है तथा संविधान इन स्वतंत्रताओं की रक्षा की गारंटी देता है|
जैसे- अनुच्छेद 32 संवैधानिक उपचारों का अधिकार
घरेलू स्वतंत्रता-
यह घरेलू जीवन में स्वतंत्रता प्रदान करने से संबंधित है|
हॉबहाउस (Elements of Social Justice 1928) इस स्वतंत्रता के समर्थक हैं|
समानता का अर्थ-
समानता एक मांग है, जिसकी अधिकार की तरह मांग की जाती है|
समानता का अर्थ है- समान लोगों के साथ समान व्यवहार तथा असमान लोगों के साथ असमान व्यवहार है, सभी के साथ समान व्यवहार नहीं है|
अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा (1776) में कहा गया कि “हम इस सत्य को स्वयं सिद्ध मानते हैं कि प्रकृति ने सभी मनुष्यो को समान उत्पन्न किया है, तथा प्रकृति ने सभी को जीवन, स्वतंत्रता और सुख की साधना का अधिकार दिया है|”
फ्रांसीसी क्रांति 1789 के तीन आदर्श थे-
स्वतंत्रता,
समानता,
बंधुत्व|
समानता की संकल्पना एक सापेक्ष संकल्पना है| लॉस्की “समानता का आशय निरपेक्ष समानता नहीं, बल्कि अनुपातिक समानता है|”
समानता के प्रकार-
समानता के निम्न प्रकार हो सकते हैं-
नागरिक समानता-
राज्य द्वारा प्रदान
राज्य अपने सभी नागरिकों को समान नागरिक अधिकार प्रदान करता है|
विधि के शासन की स्थापना द्वारा नागरिक समानता को स्थापित किया जा सकता है|
राजनीतिक समानता-
सभी नागरिकों को व्यस्क मताधिकार प्राप्त हो, सार्वजनिक पदों को प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो, बिना किसी भेदभाव के राज्यों के कार्यों में भाग लेने की समानता हो|
बेंथम “एक व्यक्ति एक वोट” (सभी का मत मूल्य समान हो)|
सामाजिक समानता-
सामाजिक दृष्टि से सभी समान हो| धर्म, जाति, लिंग, वर्ग, जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव की समाप्ति हो|
प्राकृतिक समानता-
प्रकृति ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है|
जॉन लॉक “प्रकृति ने सभी मनुष्यो को समान व स्वतंत्र पैदा किया है, कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता व संपत्ति को हानि नहीं पहुंचा सकता है|”
आर्थिक समानता-
आर्थिक समानता अन्य सभी समानताओं का आधार है|
समान अवसर उपलब्धता
लॉस्की “राजनीतिक स्वतंत्रता की स्थापना तब तक नहीं हो सकती, जब तक कि उसके साथ आर्थिक समानता न जुडी हो|”
सांस्कृतिक समानता-
बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी भाषा, लिपि, संस्कृति को सुरक्षित रखने का अधिकार
कानूनी समानता/ वैधानिक समानता-
कानून के सामने सभी समान
कानूनी समानता विधि के शासन के अंतर्गत प्राप्त होती है|
डायसी ने विधि के शासन का समर्थन किया है|
रूसो “सभी नागरिकों को कानूनी समानता प्रदान करना नागरिक समाज की प्रमुख विशेषता है|”
अर्नेस्ट बार्कर (बहुलवादी विचारक) ने अपनी पुस्तक Principle of Social and Political Theory 1951 में कानूनी समानता की बात की है|
वैधानिक व्यक्तित्व की समानता- बार्कर “राज्य अपने नागरिकों को वैधानिक समानता देकर एक जैसे मुखोटे पहना देता है|”
अवसर की समानता-
सभी नागरिकों को समान अवसर
समान के साथ समान व्यवहार व असमान के साथ असमान व्यवहार पर बल
भारतीय संविधान में अवसर की समानता को संरक्षणात्मक विभेद कहा गया है| जैसे-
महिलाएं, SC, ST, OBC व सामान्य वर्ग में आर्थिक पिछड़ों को आरक्षण|
गरीब, विकलांग के लिए विशेष सुविधाएं|
R H टोनी ने अवसर की समानता को मेंढक दर्शन कहा है|”
मेंढक दर्शन-
जिस प्रकार हजारों टैडपोल (मेंढक के बच्चे) में से कुछ ही जीवित मेंढक बन पाते हैं|
वैसे ही पूंजीवादी व्यवस्था में अवसर के नाम पर क्रूर प्रतिस्पर्धा होती है|
शिक्षा की समानता-
राज्य द्वारा सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा उपलब्ध करवाना|
अनुच्छेद 21 क ‘शिक्षा का अधिकार’
लैंगिक समानता-
लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना|
लुईस पॉजमैन (Louis Pojman) व समानता के प्रकार-
औपचारिक समानता (Formal Equality)
तात्विक समानता (Substantive Equality)
आध्यात्मिक समानता (Metaphysical Equality)
समानता के संबंध में विभिन्न विचारधाराएं
विभिन्न विचारकों ने दो तरह की समानता की चर्चा की है-
नकारात्मक/ औपचारिक/ प्रक्रियात्मक समानता
सकारात्मक/ अनौपचारिक/ तात्विक समानता
नकारात्मक/ औपचारिक/ प्रक्रियात्मक समानता-
योग्यता पर बल
आरक्षण व्यवस्था का विरोध
राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप या अहस्तक्षेप नीति का समर्थन
कानूनी समानता व राजनीतिक समानता
इस समानता के समर्थक विचारक-
परंपरावादी विचारक
स्वेच्छातंत्रवादी विचारक
परंपरावादी विचारक-
जॉन लॉक-
प्राकृतिक समानता का समर्थन
लॉक प्राकृतिक अवस्था में सभी व्यक्तियों के पास जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति का अधिकार समान रूप से होने की बात करता है|
थॉमस हॉब्स-
प्राकृतिक समानता की संकल्पना
इन्होंने अपनी पुस्तक लेवियाथन में प्राकृतिक समानता का विस्तार से वर्णन किया है|
हॉब्स “प्रकृति ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है| एक व्यक्ति जो मांग करता है, उसकी मांग दूसरा व्यक्ति भी करता है| शारीरिक रूप से एक व्यक्ति शक्तिशाली हो सकता है, किंतु अन्य लोग छल से उसे कमजोर कर देते हैं|”
जे.आर. लुकास (J.R. Lucas)
सार्वभौमिकता का सिद्धांत-
औपचारिक समानता सार्वभौमिकता के सिद्धांत पर आधारित है|
अर्थात दो लोगों के साथ तब तक बिल्कुल समान व्यवहार किया जाना चाहिए, जब तक कि उनके बीच कोई स्पष्ट और वैध अंतर न हो|
अलेक्सी डी ताकविले/ टाकविले-
अति समानता का खतरा-
टाकविले अति समानता के खतरे से सचेत करते हैं और कहते हैं कि बहुत बार समानता का उत्साह या आवेश, उन्माद और अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न कर सकता है|
टाकविले “आधुनिक युग की सबसे प्रमुख समस्या स्वतंत्रता और समानता में सामंजस्य स्थापित करने की है| लोकतंत्र का विस्तार समानता को जितना बढ़ावा देता है, स्वतंत्रता के लिए उतना ही खतरा बन जाता है|”
सकारात्मक/ अनौपचारिक/ तात्विक समानता-
इसे वास्तविक समानता कहते हैं|
कल्याणकारी राज्य का समर्थन
सकारात्मक कार्यवाही पर बल-
इस समानता में पिछड़े व कमजोर वर्गो तथा महिलाओं, बच्चों, निशक्तजनों के लिए विशेष या सकारात्मक कार्यवाही पर बल दिया जाता है|
प्रमुख समर्थक विचारक
आधुनिक सकारात्मक उदारवादी विचारक
समतावादी विचारक
समाजवादी या मार्क्सवादी विचारक
नारीवादी विचारक
बहुसंस्कृतिवादी विचारक
समुदायवादी विचारक
आधुनिक सकारात्मक उदारवादी विचारक-
अवसर की समानता पर बल
इनके अनुसार समानता का तात्पर्य राजनीतिक, वैधानिक, आर्थिक समानता से है|
लॉस्की- इन्होंने अपनी पुस्तक ‘The State in Theory and Practice’ 1935 में लिखा है कि “संपत्ति, जाति, धर्म या दल के आधार पर किसी को समान अधिकार से वंचित करना तर्कबुद्धि के आधार पर सही नहीं है|”
समतावादी विचारक-
जॉन रॉल्स-
अवसर की समानता का समर्थन
रॉल्स “अवसर की समानता का तात्पर्य मूलभूत प्राथमिक वस्तुओं का समान वितरण करने से है|”
रॉल्स के अनुसार प्राथमिक वस्तु-
प्राकृतिक प्राथमिक वस्तुएं- बुद्धि, स्वास्थ्य
सामाजिक प्राथमिक वस्तुएं- अधिकार, स्वतंत्रता, संपत्ति, गरिमा
रॉल्स “कोई भी सामाजिक नीति तभी न्यायपूर्ण हो सकती है, जब सुविधा वंचित वर्गों को विशेष प्राथमिकता दी जाए|”
ड्वॉर्किन-
पुस्तक- Taking rights seriously 1977
संसाधनों की समानता-
अर्थात संसाधनों की समानता का अर्थ है कि आरंभिक स्थिति में सबको समान संसाधन दिए जाएं|
भाग्य समतावाद-
राज्य को मुख्य रूप से उस ‘बुरे भाग्य’ (Brute Luck) (जैसे विकलांगता या गरीबी में जन्म) से हुए नुकसान की भरपाई करना है, न कि उसके द्वारा जानबूझकर किए गए गलत निर्णयों (विकल्प भाग्य) की|
ड्वॉर्किन “सभी राजनीतिक सिद्धांतों का अंतिम सामाजिक मूल्य एक ही है और वह समानता|”
कल्याण के लिए समान अवसर-
रिचर्ड अर्नेसन ड्वॉर्किन की ‘संसाधनों की समानता’ से सहमत नहीं हैं|
रिचर्ड अर्नेसन “राज्य का लक्ष्य संसाधनों को समान करना नहीं है, बल्कि व्यक्तियों को ऐसे अवसर प्रदान करना है, जहाँ वे अपने अनुसार अधिकतम कल्याण या खुशी प्राप्त कर सकें|”
समाजवादी या मार्क्सवादी विचारक-
ये आर्थिक समानता को महत्वपूर्ण मानते हैं|
कार्ल मार्क्स-
इनके अनुसार आर्थिक समानता के अभाव में समानता की स्थापना संभव नहीं है तथा समानता का आदर्श वर्ग विहीन समाज में ही संभव है|
राम मनोहर लोहिया (समाजवादी विचारक)-
इन्होंने भारत में असमानता की पहचान की थी
तथा कहा था कि इसके विरुद्ध एक साथ लड़ना होगा| जैसे- स्त्री-पुरुष असमानता, चमड़ी के रंग पर आधारित असमानता, जातिगत असमानता, आर्थिक असमानता आदि|
G D H कॉल “आर्थिक समानता के अभाव में राजनीतिक समानता कोरा दिखावा है|”
नारीवादी विचारक-
नारीवादी विचारक आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा घरेलू क्षेत्रों में स्त्री-पुरुष समानता पर बल देते हैं|
नारीवादियों के अनुसार यौन भेद तो प्राकृतिक है, जबकि लिंग भेद सामाजिक है, अतः लिंग भेद को समाप्त करने की आवश्यकता है|
ये पितृसत्तात्मकता का विरोध करते हैं|
नारीवाद की प्रमुख शाखाएं निम्न है-
उदारवादी नारीवादी-
ये महिलाओं के लिए राजनीतिक व नागरिक अधिकारों की मांग करते हैं|
समर्थक- मेरी वॉल्टनक्राफ्ट, H जिगलर
मेरी वॉल्टनक्राफ्ट-
पुस्तक- ‘A Vindication of the Rights of Woman (1792)’ (नारी के अधिकारों का प्रतिपादन/समर्थन) में महिलाओं के नागरिक अधिकारों पर बल दिया है|
समाजवादी नारीवादी-
ये महिलाओं के घरेलू कार्यों को आर्थिक कार्यों का दर्जा देने का समर्थन करते हैं|
समर्थक– शिलोरोबाथम
उग्रनारीवादी-
समर्थक- बेट्टी फ्रीडन, कैट मिलेट
बेट्टी फ्रीडन-
पुस्तक- Feminine Mystique 1963 (स्त्री संबंधी मिथक)
बेट्टी फ्रीडन को महिला मुक्ति आंदोलन का जन्मदाता कहा जाता है|
बेट्टी फ्रीडन “महिलाओं के समक्ष मुख्य समस्या यह है, कि सामाजिक जीवन में उनका कोई अपना ही नहीं होता|”
कैट मिलेट-
पुस्तक- The Sexual Politics 1969
राजनीतिक शक्ति संरचित-
इनके अनुसार राजनीति शक्ति संरचित होती है, जिसमें मानवो का एक समूह दूसरे समूह द्वारा नियंत्रित किया जाता है|
मिलेट “स्त्री के ऊपर पुरुष की शक्ति कोई व्यक्तिगत घटनाचक्र नहीं है, बल्कि वह तो संरचना का एक भाग है|”
मिलेट “संपूर्ण इतिहास में दोनों लिंगों के बीच आधिपत्य और अधीनस्थ के संबंध रहे है|”
संरचनावादी नारीवादी-
समर्थक- साइमन द बुअर
पुस्तक- The Second Sex 1949
आमूल परिवर्तनवादी विचारक
यह कहते हैं कि “महिलाएं पैदा नहीं होती, बनाई जाती है|”
बहुसंस्कृतिवादी विचारक-
समर्थक- भीखू पारीख, विम किमलिका
सांस्कृतिक क्षेत्र में समानता-
बहुसंस्कृतिवादियों के अनुसार समानता आर्थिक क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक क्षेत्र में भी होनी चाहिए|
मान्यता की समानता-
अर्थात सभी संस्कृतियों को समान रूप से मान्यता प्राप्त होनी चाहिए|
विम किमलिका-
संस्कृति को शक्ति का स्रोत माना है और कहते हैं कि किसी व्यक्ति या समाज को नष्ट करना है तो उसको संस्कृति से अलग कर दो|
विम किमलिका अल्पसंख्यकों की सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने पर विशेष जोर देते हैं|
समुदायवादी विचारक-
मूलभूत वस्तुओं के समान वितरण पर बल
प्रमुख समर्थक- माइकल वाल्ज़र, चार्ल्स टेलर
जटिल समानता-
वाल्ज़र ने अपनी पुस्तक Sphere of justice 1983 में समानता के दो प्रकार बताएं हैं-
सरल समानता
जटिल समानता
माइकल वाल्ज़र ने जटिल समानता का विचार पेश किया है| अर्थात जटिल समानता में किसी वस्तु का वितरण सभी समाजों में एक समान निष्पक्ष रूप से नहीं किया जा सकता| अलग-अलग समाज में सामाजिक वस्तुओं का वितरण भी अलग-अलग तरह से होगा|
वाल्ज़र के अनुसार जॉन रॉल्स का यह मानना गलत है कि हर समाज में प्राथमिक वस्तुओं के एक समूह का, सभी लोगों के बीच निष्पक्ष रूप से वितरण किया जाए|
अरस्तु के समानता संबंधी विचार-
अरस्तु की समानता की संकल्पना सिर्फ नागरिकता के वर्ग तक सीमित थी|
नागरिकों की राजनीतिक समानता शासित होने और बदले में शासन करने के सद्गुण को मान्यता देती थी|
अरस्तु ने समानता के दो प्रकार बताएं है-
संख्यात्मक समानता-
बिना भेदभाव के साथ सभी व्यक्तियों के साथ एक समान व्यवहार है|
अनुपातिक समानता-
व्यक्ति की योग्यता, क्षमता व राज्य की सेवा के अनुपात में संसाधनों का वितरण
औपचारिक समानता व अनुपातिक समानता
अरस्तु ने औपचारिक समानता व अनुपातिक समानता का समर्थन किया है|
अरस्तु के अनुसार व्यक्ति गुण, क्षमता, योग्यता में भिन्न व असमान होते हैं, अतः राज्य सभी व्यक्तियों को समान नहीं कर सकता है|
अरस्तु “प्रकृति स्वतंत्र पुरुष (स्वामी) व दास के शरीर में अंतर करती है| स्वतंत्र पुरुष का शरीर कोमल होता है जो श्रम नहीं कर सकता है वहीं दास का शरीर बलिष्ठ कठोर होता है जो श्रम कर सकता है|”
न्याय और समानता के बीच सीधा संबंध-
अरस्तु न्याय और समानता के बीच सीधा संबंध दिखाते हैं|
अरस्तु “समानता के लिए न्याय को कायम रखा जाता है| न्याय सभी लोगों के लिए नहीं है बल्कि सिर्फ समान लोगों के लिए है| इसी तरह न्याय पूर्ण होने के लिए असमानता को कायम रखा जाता है| असमानता सभी लोगों के लिए नहीं है, बल्कि यह सिर्फ असमान लोगों के लिए है|”
एथेनियन कॉन्स्टिट्यूशन-
अरस्तु ने अपनी पुस्तक एथेनियन कॉन्स्टिट्यूशन में समतावादी संस्थानों का वर्णन किया है|
इस पुस्तक में अरस्तु ने Isonomia (इसोनोमिया) का जिक्र किया है, जो एथेंस की व्यवस्था का मुख्य बिंदु था|
Isonomia व्यवस्था राजनीतिक समानता को परिभाषित करती है, जिसका अर्थ है प्रत्येक नागरिक को राज्य की राजनीति को दिशा देने और राजनीतिक पदों पर चयनित होने के लिए समान अवसर प्राप्त थे|”
रूसो के समानता संबंधी विचार-
रूसो ने अपनी पुस्तक A discourse on the Origin of inequality 1755 में दो प्रकार की विषमता की चर्चा की है-
प्राकृतिक विषमता
प्रकृति की देन है|
परिवर्तन नहीं किया जा सकता
जैसे- आयु, स्वास्थ्य, सौंदर्य, बाहुबल, बुद्धि बल आदि|
परंपरागत विषमता-
सामाजिक व्यवस्था की देन
परिवर्तन किया जा सकता है|
जैसे- धनसंपदा, पद-प्रतिष्ठा, शक्ति की भिन्नता
रूसो “कोई व्यक्ति इतना धनी नहीं होना चाहिए कि वह दूसरों को खरीद ले और कोई इतना गरीब भी न हो कि दूसरों के हाथों बिक जाए|”
कल्याण की समानता (Equality Of welfare)-
समर्थक- उपयोगितावादी विचारक
ये वितरण करते समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि अधिकतम व्यक्तियों को अधिकतम खुशी प्राप्त हो अर्थात अधिकतम व्यक्तियों का कल्याण हो|
सामर्थ्य की समानता (Equality of Capability)-
समर्थक- अमर्त्य सेन व मार्था नेसबॉम
सामर्थ्य या क्षमता को बराबर करने पर बल
जटिल समानता-
समर्थक- माइकल वाल्ज़र
जटिल समानता का अर्थ है कि “किसी नागरिक की एक सामाजिक दायरे में स्थिति या एक सामाजिक वस्तु के संदर्भ में स्थिति, किसी दूसरे सामाजिक दायरे या किसी दूसरे सामाजिक वस्तु के संदर्भ में उसकी स्थिति में कटौती नहीं करेगी|”
जातीय समानता-
समर्थक- मार्टिन लूथर किंग जूनियर
अमेरिका में जातीय समानता आधारित नागरिक अधिकारों के समर्थक
मार्टिन लूथर किंग जूनियर का मत है कि आत्म गौरव और आत्मसम्मान के मामले में विश्व की हर जाति या वर्ण का मनुष्य बराबर है|
मार्टिन लूथर किंग जूनियर का कहना है कि “हमें अपने रचनात्मक प्रतिरोध को कभी भी शारीरिक हिंसा में ढालकर पतन का शिकार नहीं होने देना चाहिए|”
डेरेक परफिट का प्राथमिकता दृष्टिकोण
समान लाभ देने उनको प्राथमिकता देनी चाहिए, जो सबसे खराब स्थिति में हैं|
समतावाद के दो रूप-
कर्तव्यवादी समतावाद- प्रक्रिया और न्याय पर ध्यान
उद्देश्यवादी समतावाद- परिणाम पर पर ध्यान
औपचारिक या प्रक्रियात्मक समानता-
समर्थक- परंपरागत उदारवादी और स्वेच्छातंत्रवादी विचारक
इसमें कानूनी व राजनीतिक समानता पर बल दिया जाता है|
प्रक्रिया की समानता पर बल- वितरण की प्रक्रिया सही हो, चाहे उसके परिणाम कैसे भी निकले
इसके अनुसार सभी मनुष्य जन्म से समान है|
अवसर की समानता-
समर्थक- आधुनिक उदारवादी व समतावादी विचारक
इसमें समान के साथ समान व्यवहार व असमान के साथ असमान व्यवहार पर बल दिया जाता है|
जॉन रॉल्स- मूलभूत प्राथमिक वस्तुओं का सामान वितरण
अमर्त्य सेन- क्षमता के रूप में समानता
ड्वॉर्किन- संसाधनों की समानता
लॉयड थॉमस
लॉयड थॉमस ने अवसर की समानता के तीन मॉडल दिए है-
अवसर की आदर्श समानता
अवसर की प्रतिस्पर्धी समानता
अवसर की गैर-प्रतिस्पर्धी समानता
परिणामों की समानता-
समर्थक- मार्क्सवादी विचारक
परिणामों की समानता पर बल दिया जाता है, उसके लिए प्रक्रिया चाहे कैसी भी अपनाई जाए|
आर्थिक समानता पर बल
कार्ल मार्क्स-
कार्ल मार्क्स ने अपनी कृति Critique of Gotha Programme 1875 में कानूनी समानता को अस्वीकार किया है|
मिलोवन जिलास-
पुस्तक- The New Class 1957
इस पुस्तक में साम्यवादी समाज में समानता की आलोचना की है|
मिलोवन जिलास "साम्यवादी समाज में समानता केवल एक दिखावा है ,वास्तविक रूप में पार्टी के मुट्ठी भर पदाधिकारियों ने पूरी व्यवस्था पर नियंत्रण कर रखा है|”
मिलोवन जिलास ने इन सर्वशक्तिशाली राजनीतिक व नौकरशाही पदाधिकारियों को New Class (नवोदित वर्ग) कहा है|
हैरी फ्रैंकफर्ट का पर्याप्तता का सिद्धांत
समानता का लक्ष्य सभी को ‘बराबर’ करना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि हर व्यक्ति के पास एक सुखद जीवन जीने के लिए पर्याप्त संसाधन हों|
लास्की-
कृति- A Grammar of Politics 1925
समानता को विचारों का सामंजस्य कहते हैं|
लास्की के अनुसार समानता की अवधारणा की तीन प्रमुख स्थितियां है-
विशेषाधिकारों का अभाव
समान अवसरों की उपलब्धि
सबकी प्राथमिक वस्तुओं की पूर्ति की प्राथमिकता
16 वीं सदी में ब्रिटेन में समानता संबंधी दो धाराएं प्रचलित हुई थी-
लेवेलर्स
राजनीतिक समानता के समर्थक
डिगलर्स
आर्थिक समानता के समर्थक
स्वतंत्रता और समानता में संबंध-
स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे के विरोधी हैं-
नकारात्मक दृष्टिकोण
प्रकृति में असमानता विद्यमान
प्रमुख समर्थक- अरस्तु, लार्ड एक्टन, डी टॉकवीले, F A हेयक, बर्लिन
लार्ड एक्टन “समानता के आवेश ने स्वतंत्रता की आशा को व्यर्थ कर दिया है|”
अरस्तु “प्रकृति ने असमानता दी है, कुछ लोग जन्म से ही दास बनने के लिए तथा कुछ शासक बनने के लिए नियत होते हैं|”
F A हेयक ने अपनी पुस्तक The Constitution of Liberty 1960 में स्वतंत्रता और समानता को एक दूसरे का विरोधी बताया है|
अभिजनवादी विचारक पैरेटो, मोस्का, मिचेल्स आदि समानता के प्रबल विरोधी हैं|
स्वतंत्रता और समानता एक दूसरे के पूरक हैं-
सकारात्मक दृष्टिकोण
प्रमुख समर्थक- लॉस्की, टोनी, बार्कर, हॉबहाउस, मेकफ़र्सन, जॉन रोल्स, अमर्त्य सेन
महात्मा गांधी “स्वतंत्रता का अर्थ नियंत्रण का अभाव नहीं, अपितु व्यक्तित्व के विकास की अवस्थाओं की प्राप्ति है|”
स्वतंत्रता समानता के बिना एक सीमित गुंबद के समान-
लॉस्की “जिस समाज में असमानताए हैं, वहां जब भी कोई व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता की मांग उठाएगा तो शक्तिशाली उसे ललकारेगे और उसका विरोध करेंगे| अर्थात स्वतंत्रता समानता के बिना एक सीमित गुंबद के समान होगी|”
बार्कर “समानता एक बहुरूपिया विचार है|”

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