लोकतंत्र का अर्थ-
अंग्रेजी पर्याय Democracy शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के डेमोस (Demos) से हुई है|
Demos का अर्थ है ‘जनसाधारण’ इसमें Cracy (क्रेसी) शब्द जोड़ा गया है जिसका अर्थ है ‘शासन या सरकार’
इस प्रकार लोकतंत्र का अर्थ “जनसाधारण” या जनता का शासन या सरकार है|
Note- Democracy शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस ने पांचवी शताब्दी में किया था|
लोकतंत्र की परिभाषाएं-
अब्राहम लिंकन- इन्होंने अपने गैट्सबर्ग भाषण (1863) में लोकतंत्र तो “जनता का, जनता द्वारा तथा जनता के लिए शासन” कहा|
प्लेटो “यदि लोकतंत्र का कोई वास्तविक अर्थ है तो वह ईश्वर के पास है जिसे उसने अभी तक हम तक नहीं पहुंचाया है|”
प्रो. डायसी “लोकतंत्र एक ऐसी शासन व्यवस्था है, जिसमें समाज का अपेक्षाकृत एक बड़ा अंश शासन कार्यों में लिप्त होता है|”
ब्राइस “लोकतंत्र शब्द का प्रयोग हेरोडोटस के जमाने से ही ऐसी शासन प्रणाली का संकेत देने के लिए होता है, जिसमें कानून की दृष्टि से राज्य की नियामक सत्ता किसी विशेष वर्ग या वर्गों के हाथों में नहीं रहती बल्कि समुदाय के सभी सदस्यों में निहित होती है|”
मैकाइवर “लोकतंत्र शासन की पद्धति होने के बजाय यह निर्धारित करने का तरीका है कि कौन शासन करेगा तथा किस प्रकार शासन किया जाएगा|”
सीले “लोकतंत्र वह शासकीय व्यवस्था है जहां प्रत्येक व्यक्ति भागीदार होता है|”
जवाहरलाल नेहरू “लोकतंत्र का अर्थ है सहिष्णुता- न केवल उन लोगों के प्रति जिनसे हम सहमत हो, बल्कि उनके प्रति भी जिनसे हम असहमत हो|
लोकतंत्र का उदय एवं विकास-
प्राचीन काल में लोकतंत्र-
सुमेरियन नगर- राज्यों में लोकतंत्र के कुछ तत्व नजर आते हैं| भारत में भी महाजनपदीय व्यवस्था (वैशाली विशेष रूप से) में लोकतंत्र के प्रमाण मिलते हैं|
पश्चिमी में लोकतंत्र का उद्गम यूनानी नगर राज्यों (विशेषत: एथेंस) में देखा जाता है| इस लोकतंत्र की प्रमुख विशेषताएं निम्न है-
नगर-राज्य (पोलिस) के सार्वजनिक मामलों में सभी स्वतंत्रजनों की समान सहभागिता|
सार्वजनिक निर्णयो तक पहुंचने के लिए स्वतंत्र वाद-विवाद|
समुदाय के कानून और प्रचलित प्रक्रिया के प्रति व्यापक आदर-भाव
लोकतंत्र की आलोचना-
प्लेटो- प्लेटो ने इस तरह के लोकतंत्र की निंदा की है कि-
जनसाधारण इतने शिक्षित नहीं होते हैं कि वे सर्वोत्तम शासकों और सबसे बुद्धिमतापूर्ण नीतियों का चयन कर सके|
लोकतंत्र के अंतर्गत वाक्पटु और मिष्टभाषी राजनीतिज्ञ जनसाधारण को प्रभावित करके उसके वोट प्राप्त कर लेते हैं और सार्वजनिक पद प्राप्त कर लेते हैं|
परंतु ये लोग अत्यंत स्वार्थी और अयोग्य होते हैं||
अतः वे राज्य को ध्वंस की ओर ले जाते हैं|
अरस्तु-
अरस्तु के शासन वर्गीकरण में लोकतंत्र को विकृत शासन व्यवस्था में रखा है|
इन्होंने लोकतंत्र को बहुत सारे लोगों का शासन कहा है जो साधारणत: निर्धन, अशिक्षित, अयोग्य है|
मध्यकाल में लोकतंत्र-
मध्यकाल में तो लोकतंत्र का जिक्र नहीं मिलता है| इस काल में तो राजनीति पर आस्था, सत्ता पर इसाइयत और योग्यता पर वंश हावी था|
आधुनिक काल में लोकतंत्र-
पश्चिम में पुनर्जागरण, धर्म सुधार आंदोलन, मध्ययुग की सामंती प्रणाली का ह्यस आदि के दौर में लोकतंत्र का वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ|
1215 में मैग्नाकार्टा में जहां कुछ अधिकार सामंतो को दिए गए थे| फिर 1628 के अधिकार प्रतिवेदन ने राजाओं के अधिकार सीमित किए| उसके बाद 1688 कि गौरवपूर्ण क्रांति तथा 1689 के अधिकार पत्र ने शासकों की अपरिमित शक्तियों को कम करके उन्हें शासितो प्रति उत्तरदायी बनाया|
इंग्लैंड की गौरवमयी क्रांति 1688 के समय अंग्रेज विचारक जॉन लॉक ने विचार व्यक्त किया कि मनुष्य के तीन प्राकृतिक अधिकार होते हैं जो स्वतंत्रता, जीवन, और संपत्ति है| इन अधिकारों की रक्षा के लिए कानून, राज्य और शासन संस्थाएं स्थापित होती है|
अमेरिकी स्वतंत्रता क्रांति (1776) ने जीवन, स्वतंत्रता, सुख की साधना के अधिकार, फ्रांसीसी क्रांति 1789 ने स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्व पर बल दिया|
पश्चिमी समाज में लोकतंत्र का प्रवेश से क्रमशः इस प्रकार हुआ है-
पहले सरकार पर नियंत्रण,
उसके बाद में सरकार के निर्माण में जनता की भागीदारी तथा
उसके बाद में सर्व-कल्याणकारी राज्य|
समाजवादी समाज में लोकतंत्र का प्रवेश उल्टा है-
पहले कल्याणकारी राज्य,
बाद जनता की भागीदारी और
फिर अंत में सरकार पर नियंत्रण|
पहले लोकतंत्र के अंतर्गत पुरुषों को ही मताधिकार दिया गया|
1820 और 1830 के दशकों ने अमेरिका के एक- एक करके कई राज्यों ने मताधिकार का विस्तार किया|
फ्रांस में 1848 में व्यस्क पुरुष मताधिकार लागू किया गया|
स्त्री मताधिकार संयुक्त राज्य अमेरिका में 1919, इंग्लैंड में 1928, फ्रांस में 1945 और स्विट्जरलैंड में 1971 में दिया गया| कुवैत में स्त्री मताधिकार 2005 में दिया गया|
जेम्स ब्राइस के मत में लोकतंत्र-
जेम्स ब्राइस ने अपनी दो कृतियां ‘The American Commonwealth (1888) ‘Modern Democracies 1921 में लोकतंत्र को एक शासन प्रणाली के रूप में प्रस्तुत किया है|
ब्राइस “लोकतंत्र जनसाधारण का शासन है, जिसमें वे वोटों के माध्यम से अपनी प्रभुतासंपन्न इच्छा को व्यक्त करते हैं|’ और संक्षेप में कहा जाय तो “बहुमत का शासन’|”
अन्य शासन प्रणालियों की तुलना में लोकतंत्र को वरीयता-
ब्राइस अन्य शासन प्रणालियों की तुलना में लोकतंत्र को वरीयता देता है|
ब्राइस कहता है कि अन्य शासन प्रणालियों के गुण-दोषो से लोकतंत्र के गुण-दोषो की तुलना करें तो लोकतंत्र का औचित्य सिद्ध हो जाएगा|
ब्राइस के अनुसार किसी भी शासन की कसौटी जनकल्याण है, जो सभी शासन प्रणालियां करती हैं| परंतु लोकतंत्र का एक अतिरिक्त गुण यह है कि यह मनुष्यों को आत्म शिक्षा के लिए प्रेरित करता है|
ब्राइस के मत में लोकतंत्र सीधे सीधे ‘जनता का शासन’ नहीं है| लोकतंत्र में जनसाधारण दो तरह से अपनी सत्ता का प्रयोग करते हैं-
वे ऐसे लक्ष्य निर्धारित करते हैं, जिनकी पूर्ति करना उसकी सरकार का ध्येय होना चाहिए|
वे उन लोगों की निगरानी करते हैं जिनके हाथों में वे प्रशासन की बागडोर सौंप देते हैं|
A.V डायसी के मत में लोकतंत्र-
डायसी ने अपनी कृति ‘Law and Public Opinion in England during the Nineteenth Century’ (19वीं शताब्दी के इंग्लैंड में कानून और लोकमत) 1905 में लोकतंत्र को ऐसी प्रणाली माना है जिसमें विधि निर्माण बहुमत से निर्धारित होता है|
लोकतंत्र के प्रकार-
पूर्वभासी लोकतंत्र-
पूर्वभासी लोकतंत्र शब्द का प्रयोग एलविन टॉफ्लर ने अपनी पुस्तक ‘Future Shock 1970’ में किया|
अन्य प्रवक्ता- गिगरिक, हैडडी टॉफ्लर, के एरिक ड्रैक्लर, रोबिन हेनसन|
इस प्रकार के लोकतंत्र में लोकतांत्रिक रूप से लिए गये निर्णय भविष्य के उन मामलों से जुड़े होते हैं, जो मतदाताओं की सोच में जरूरी होते है|
प्रति रक्षात्मक लोकतंत्र-
इस प्रकार के लोकतंत्र में लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा हेतु लोगों के कुछ स्वतंत्रताओ व अधिकारों को सीमित रखा जाता है|
विमर्शी लोकतंत्र-
विमर्शी लोकतंत्र शब्द का प्रयोग- जॉसेफ बास्सेट
अन्य समर्थक- जॉन एलस्टर, हेबरमास, कोहन, रोल्स, गुटमन, थॉमसन, बैंनहालीब आदि|
विमर्शी लोकतंत्र को तर्कमुलक लोकतंत्र भी कहा जाता है| इस लोकतंत्र में प्रत्येक नीति विकल्प पर प्रत्येक कोण से तथा विस्तार से चर्चा की जाती है|
डेमार्की-
डेमार्की शब्द का प्रयोग- जॉन बर्नहाइम
जॉन बर्नहाइम की कृति- Is Democracy Possible? (1985)
डेमार्की एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था की कल्पना करता है, जहां राज्य सरकार एवं लोक सेवक आदि कर्मचारी नहीं होते हैं| यह बिना चुनावों का लोकतंत्र है|
इसमें प्रतिनिधियों का चयन चुनाव के बजाय यादृच्छिक चयन (लॉटरी द्वारा चयन) द्वारा किया जाता है
नागरिकों में से यादृच्छिक रूप से चुने गए लोग निर्णय लेने वाली समितियों में कार्य करते हैं।
इसका उद्देश्य दलीय राजनीति, चुनावी प्रतिस्पर्धा और पेशेवर राजनीतिज्ञों के प्रभाव को कम करना है|
प्रत्यक्ष लोकतंत्र-
शास्त्रीय रूप का स्वच्छ लोकतंत्र जहां सभी नागरिकों के पास संप्रभुता होती है|
ई- लोकतंत्र-
ऐसे लोकतंत्र में शासन प्रक्रियाओं में इलेक्ट्रॉनिक संचार, इंटरनेट आदि का प्रयोग किया जाता है|
तृणमूल लोकतंत्र-
अर्थ- स्थानीय स्तर से लोकतांत्रिक निर्णय-निर्माण में आम नागरिकों की प्रत्यक्ष और सक्रिय भागीदारी
ऐसे लोकतंत्र में सरकार को छोटी-छोटी विकेंद्रित संस्थाओं में विभक्त किया जाता है| जैसे- भारत में पंचायती राज
अनुदार लोकतंत्र-
फरीद जकारिया (Fareed Zakaria) ने 1997 के अपने प्रसिद्ध लेख The Rise of Illiberal Democracy के माध्यम से इस अवधारणा को व्यापक चर्चा में लाया|
लोकतंत्र का वह रूप जहां निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास सीमित शक्तियां होती हैं|
ऐसी राजनीतिक व्यवस्था है, जिसमें नियमित चुनाव और लोकतांत्रिक सरकार तो होती है, लेकिन उदार लोकतंत्र की संस्थाएँ और नागरिक स्वतंत्रताएँ पूरी तरह सुरक्षित नहीं होतीं है|
उदारवादी लोकतंत्र-
उदार लोकतंत्र के निम्न विशेषताएं है-
एक से अधिक राजनीतिक दलों में राजनीतिक सत्ता के लिए मुक्त प्रतिस्पर्धा
राजनीतिक पद किसी विशिष्ट वर्ग की बपौती न हो|
सार्वजनिक व्यस्क मताधिकार पर आधारित आवधिक चुनाव|
नागरिक स्वतंत्रताओं की व्यवस्था
न्यायपालिका की स्वतंत्रता
नागरिक अधिकारों की व्यवस्था
संविधान एवं संवैधानिकतावाद, निजी संपत्ति व्यवस्था आदि|
बाजारी लोकतंत्र-
जॉन टोमासी (John Tomasi) ने Free Market Fairness (2012) में Market Democracy की अवधारणा को विकसित किया|
ऐसा लोकतंत्र जो बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के अनुरूप हो| जहां एक लोकतांत्रिक राज्य तंत्र तथा एक उदारवादी-नैतिक-सांस्कृतिक व्यवस्था हो, जो बहुलता को प्रोत्साहन करें|
निर्दलीय लोकतंत्र-
जयप्रकाश नारायण ने भारत में दलविहीन लोकतंत्र (Partyless Democracy) की अवधारणा का समर्थन किया था|
इस प्रकार के लोकतंत्र में राजनीतिक दल नहीं होते हैं| और सामयिक तथा स्वतंत्र चुनाव आवश्यक होते हैं|
सहभागी लोकतंत्र-
सहभागी लोकतंत्र के समर्थक- कैरोल पेटमैन व मैकफरसन
सहभागी लोकतंत्र ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था है जिसमें नागरिक केवल चुनाव के समय मतदान तक सीमित नहीं रहते, बल्कि नीति-निर्माण और सरकारी निर्णयों में लगातार एवं सक्रिय रूप से भाग लेते हैं|
आमूलीय लोकतंत्र-
समर्थक- शांटल माउफे (Chantal Mouffe) और एर्नेस्टो लेक्लाउ (Ernesto Laclau)
मूल धारणा- लोकतंत्र कोई एक बार में बनी बनाई स्थिर व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह एक अपूर्ण, समावेशी, निरंतर चलने वाली और बदलाव योग्य प्रक्रिया है|
जहाँ पारंपरिक उदारवादी लोकतंत्र केवल 5 साल में एक बार वोट देने और प्रतिनिधि चुनने तक सीमित रहता है, वहीं आमूलीय लोकतंत्र निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में आम जनता की सीधी और सक्रिय भागीदारी (Direct Citizen Participation) पर बल देता है|
प्रतिनिध्यात्मक लोकतंत्र-
लोकतंत्र का वह रूप जहां लोगों द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा संप्रभुता का प्रयोग किया जाता है|
गणतंत्रात्मक लोकतंत्र-
गणतंत्रात्मक लोकतंत्र वह लोकतांत्रिक व्यवस्था है जिसमें राज्य का प्रमुख वंशानुगत राजा नहीं होता, बल्कि उसका चयन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जनता/निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किया जाता है|
सामाजिक लोकतंत्र-
लोकतंत्र का वह रूप जो अन्याय के उन्मूलन के लिए काम करता है| तथा लोगों द्वारा समाजवादी प्रकार की सरकार की स्थापना का प्रयास किया जाता है|
लोकतांत्रिक शासन, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता के बीच संतुलन स्थापित करने पर बल
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को बनाए रखते हुए राज्य के माध्यम से सामाजिक कल्याण और असमानता को कम करने का प्रयास
लोकतंत्र के गुण-
लोकतंत्र के निम्न गुण हैं-
सत्ता के दुरुपयोग की रोकथाम
शासन के कार्यों में जनसाधारण का सहयोग
शासन प्रणालियों में सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली
सार्वजनिक विषयों की स्वतंत्र चर्चा से जन-शिक्षा को प्रोत्साहन
देशभक्ति की भावना का संचार
परस्पर सद्भावना और सम्मान का विस्तार
नैतिक, क्रियाशील उत्तरदायी शासन
लोगों को उदार बनाता है|
कानूनों की अवहेलना की संभावना कम रहती है|
लोकतंत्र की कमियां-
निम्न कमियां बताएं जाती है-
अनुत्तरदायी भीड़तंत्र
भ्रष्ट नेतृत्व
अकुशलता
अज्ञानता, अशिक्षा
अतिव्यय
राजनीतिक दलों का निरंतर हस्तक्षेप
निष्कर्षत: लोकतंत्र में कुछ कमियां जरूर पायी जाती हैं,लेकिन अन्य शासन प्रणालियों की तुलना में श्रेष्ठ शासन प्रणाली है|
सी.डी बर्न्स के शब्दों “इस बात से कोई इनकार नहीं करता कि वर्तमान प्रतिनिधि सभाओं में अनेक त्रुटियां है| पर यदि मोटरगाड़ी खराब हो जाय तो उसकी जगह बैलगाड़ी का इस्तेमाल करना मूर्खता होगी, चाहे इसकी कल्पना कितने भी मधुर क्यों न लगे|”
लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक शर्त-
जनता अधिकांशत: शिक्षित, संवेदनशील और उत्तरदायित्व की भावना से परिपूर्ण होनी चाहिए|
लोकतांत्रिक राज्यों को सार्वजनिक शिक्षा का विस्तृत प्रबंध करना चाहिए तथा जनसंपर्क के साधनों की सहायता से जनता में मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था जागनी चाहिए|
देश में शांति और व्यवस्था का वातावरण हो|
आर्थिक समानता और सामाजिक न्याय की स्थापना की जाय|
समाज में वर्ग- विशेष के विशेषाधिकार को प्राप्त किया जाय|
राज्य में स्वतंत्रता, समानता, न्याय, स्थानीय शासन की व्यवस्था हो|
संविधानवाद, निष्पक्ष चुनाव- संगठित राष्ट्रवादी राजनीतिक दल होने चाहिए|
लोगों द्वारा सामान्य हित, कर्तव्यों का पालन एवं ईमानदारी लोकतंत्र की सफलता के नैतिक शर्त है|
नेताओं, अफसरो,मंत्रियों और विधायकों को लोगों का सेवक बनकर कार्य करना चाहिए|
सहिष्णुता,सहभागिता जैसे गुण भी लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक है|
लोकतंत्र के विभिन्न सिद्धांत-
लोकतंत्र का शास्त्रीय सिद्धांत-
समर्थक-
जॉन लॉक- Two Treatises of Government 1689
मांटेस्क्यू- The Spirit of Laws 1748
रूसो- The Social Contract 1762
एडम स्मिथ- The Wealth of Nations 1776
कांट- Critique of Pure Reason 1781
थॉमस जैफरसन- Declaration of Independence 1776 (अमेरिकी स्वतंत्रता की घोषणा)
जेरेमी बेंथम- A Fragment on Government 1776
मैडिसन- The Federalist Papers
टाकविले- Democracy in America 1835
जॉन स्टूअर्ट मिल- On Liberty 1859
लोकतंत्र के शास्त्रीय सिद्धांत की विशेषताएं-
व्यक्ति की गरिमा पर बल, व्यक्ति लोकतंत्र की मूल एवं प्रारंभिक इकाई| जैसे-
जॉन लॉक- व्यक्ति एक अच्छा, नैतिक, विवेकयुक्त, सामाजिक प्राणी है|
बेंथम- व्यक्ति अपने हित का स्वयं निर्णायक है|
रूसो- व्यक्ति एक भोला प्राणी है|
कांट- व्यक्ति अन्य व्यक्तियों में मानवता देखने वाला जीव है|
लोकतंत्र में व्यक्ति स्वायत्त होना चाहिए|
J.S मिल के अनुसार व्यक्ति अपने मन, शरीर, मस्तिष्क तथा अपने स्वयं का स्वयं स्वामी होता है|
व्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अधिकारों का उसके व्यक्तित्व के विकास से निकटता का संबंध है|
व्यक्ति अपने लक्ष्य का स्वयं प्रतिपादक होता है| राज्य व्यक्ति के साध्य का साधन है| जैसे-
जॉन लॉक- लोगों द्वारा राज्य बनाए जाने का मुख्य लक्ष्य उनके जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति की रक्षा करना है|
बेंथम- राज्य व्यक्ति के अधिकतम सुख प्राप्ति का साधन है|
मिल- राज्य वह कार्य करता है, जो व्यक्ति नहीं कर पाता है|
स्मिथ- पूंजीपति को स्वतंत्र कर दो वह समाज को स्वतंत्र कर देगा|
राज्य व सरकार के कार्य व शक्तियां सीमित होते हैं|
जैसे-जॉन लॉक, स्मिथ व बेंथम ने अहस्तक्षेप राज्य का समर्थन किया है|
राज्य के कानूनों से व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं अधिकारों को खतरा हो सकता है, इस कारण अनेक विचारक सरकार की मनमानी शक्तियों पर रोक लगाने की बात करते हैं| जैसे-
मांटेस्क्यू शक्ति पृथक्करण पर बल देता है|
मैडिसन सरकार की निरंकुशता पर अंकुश लगाने की बात करता है|
जेफरसन केंद्र की शक्तियां को सीमित किए जाने पर बल देता है|
वाल्टेयर व्यक्ति की स्वतंत्रता का पक्ष लेता है|
राज्य व्यक्ति की सहमति का फल है| जैसे-
सामाजिक समझौतावादी राज्य को व्यक्ति के समझौते का परिणाम मानते हैं|
शास्त्रीय लोकतंत्र में व्यस्क मताधिकार द्वारा सार्वजनिक भागीदारी होती है|
संविधानवाद, विधि का शासन, लिखित संविधान, निर्वाचन द्वारा प्रतिनिधियों पर नियंत्रण तथा कार्यपालिका का विधायिका के प्रति उत्तरदायी होना आदि पर बल देता है|
लोकतंत्र के समकालीन सिद्धांत-
लोकतंत्र का विशिष्टवर्गीय या अभिजात्यवादी सिद्धांत-
समर्थक- विलफ्रेड पैरेटो, गीतानो मोस्का, रॉबर्ट मिशेल्स, मैनहाइम, जोसेफ ए शुंपीटर, रेमंड आरो, ज्योवानी सार्टोरी, सी. राइट मिल्स
प्रत्यक्ष लोकतंत्र का विरोध|
लोकतंत्र में सभी व्यक्ति शासन नहीं करते, बल्कि सदा ही कुछ व्यक्ति ज्यादातर लोगों पर शासन करते हैं अर्थात अभिजात्य व्यक्ति आम आदमियों पर शासन करते है|
विलफ्रेड पैरेटो और गीतानी मोस्का-
इटली के दो प्रसिद्ध समाजवैज्ञानिक
गीतानी मोस्का की पुस्तक- The Ruling Class 1896
विलफ्रेड पैरेदो और गीतानी मोस्का ने यह सिद्धांत दिया है कि किसी भी सामाजिक संगठन के अंतर्गत महत्वपूर्ण निर्णय केवल गिने-चुने लोग ही करते हैं, चाहे उन संगठनों का बाह्य रूप कैसा भी क्यों न हो|
मोस्का-
हर समाज में लोगों के दो वर्ग बन जाते हैं| एक वर्ग शासन करता है और दूसरे वर्ग पर शासन करता है|
रॉबर्ट मिशेल्स-
मिशेल्स ने ‘गुटतंत्र का लोह नियम’ दिया|
इसके अनुसार अधिकांश जनता स्वभाव से जड़ आलसी व राजनीतिक दृष्टि से अपरिपक्व होती है जो अपना शासन स्वयं चलाने में असमर्थ होते हैं|
तथा कुछ व्यक्ति या नेता बड़े चतुर दबंग और अपनी बात मनवाने की कला में पारंगत होते हैं| ऐसे लोग अपने वाक्यटुता के बल पर लोगों की भावनाओं को भड़का कर सत्ता प्राप्त कर लेते हैं|
इस तरह समाज में कोई भी शासन प्रणाली क्यों न हो वह अवश्य ही गुटतंत्र (इने- गिने लोगों का शासन) का रूप धारण कर लेती है|’ इसे ही ‘गुटतंत्र का लोह नियम’ कहते हैं|
मैनहाइम-
कृति- Ideology and Utopia: An Introduction to the Sociology of Knowledge 1929
लोकतंत्र में जनता नहीं नेता शासन करते है|
जनसाधारण निश्चित अंतराल के बाद वोट डालकर अपनी इच्छा को प्रकट करते हैं| तथा अपने मताधिकार के बल पर नेताओं को बहुमत के हित में निर्णय करने के लिए बाध्य कर सकते हैं |
मैनहाइम के अनुसार नेताओं का चुनाव योग्यता के आधार पर होना चाहिए|
शुंपीटर के विचार-
कृति- Capitalism, Socialism and Democracy (1942)
लोकतंत्र में राजनीतिक निर्णय नेताओं द्वारा लिए जाते हैं|
इनके अनुसार लोकतंत्र में राजनीतिक निर्णय नेताओं द्वारा लिए जाते हैं, लेकिन नेता असीमित सत्ता का प्रयोग नहीं कर सकते क्योंकि जनसाधारण के वोट प्राप्त करने के लिए वहां नेताओं में खुली प्रतियोगिता होती है|
इनके अनुसार किसी भी राजनीति शासन प्रणाली की पहचान उसकी संस्थाओं, वहां कानून व नीतियो को बनाने वालों को कैसे नियुक्त किया जाता है? तथा उन्हें पद से कैसे हटाया जाता है? आदि के आधार पर होती है|
वेबर-
वेबर “लोग ऐसा नेता चुनते हैं, जिन पर उन्हें विश्वास हो| चुनाव के बाद यही नेता कहता है कि मेरा हुक्म मानो| इसके बाद जनता या पार्टी को नेता के कार्यों में हस्तक्षेप करने की स्वतंत्रता नहीं होती है| बाद में जनता उसके क्रियाकलापों की समीक्षा कर सकती है| यदि उस नेता ने गलतियां की है तो बेशक उसे सूली पर चढ़ा दें|”
रेमंड आरो-
पुस्तक- Social Structure and the Ruling Class 1950 में
रेमंड आरो ने लोकतंत्र व अन्य शासन प्रणालियों के विशिष्ट वर्गों में बुनियादी अंतर बताया है|
सोवियत किस्म के समाज में एक ही विशिष्ट वर्ग को शासन में अधिकार होता है, जबकि उदार लोकतंत्र में विशिष्ट वर्ग की बहुलता तथा शासन में नियंत्रण एवं संतुलन की व्यवस्था पाई जाती है|
अतः उदार लोकतंत्र में असीमित सत्ता का प्रयोग संभव नहीं है|
सार्टोरी-
कृति ‘डेमोक्रेटिक थ्योरी’ 1958
सार्टोरी ने नेताओं की भूमिका को विशेष महत्व दिया है
लोकतंत्रीय व्यवस्था में विशिष्टवर्ग एक विशेष भूमिका निभाते है| ये विशिष्टवर्ग चुनाव के मैदान में उतर कर आपस में मुकाबला करते हैं|
जनसाधारण शासन चलाने में समर्थ नहीं होते हैं इसलिए शासन संचालन सुयोग्य नेताओं का कार्य है|
C.B मैक्फर्सन ने अपनी कृति Democratic Theory: Essays in Retrieval 1973 में आलोचना करते हुए लिखा है कि “लोकतंत्र के विशिष्ट वर्गीय सिद्धांत ने लोकतंत्र को एक मानवीय आकांक्षा के स्तर से नीचे गिराकर बाजार संतुलन की प्रणाली में बदल दिया है|”
लोकतंत्र का बहुलवादी सिद्धांत-
जनक- शुम्पीटर, वेबर, मैडिसन,आरो
समर्थक- ट्रूमैन, बैंटली, रॉबर्ट डहल, लिंडब्लाम आदि
इस सिद्धांत को समूह सिद्धांत, अनुभवसिद्ध लोकतांत्रिक सिद्धांत भी कहते हैं|
इस सिद्धांत के अनुसार उदार लोकतंत्र का अर्थ अपेक्षाकृत स्वायत्त समूह के बीच सौदेबाजी की प्रक्रिया है|
मेडिसनियन लोकतंत्र-
बहुलवाद का पहला व्यवस्थित विकास जेम्स मेडिसन द्वारा ‘The Federalist Papers’ (1787–89) में किया गया|
मेडिसन ने अनियंत्रित बहुसंख्यकवाद से अल्पसंख्यकों के अधिकारों और संपत्ति को बचाने के लिए ‘शक्तियों के पृथक्करण’ और ‘संघवाद’ पर आधारित विभाजित सरकार का प्रस्ताव रखा|
इसे ‘मेडिसनियन लोकतंत्र’ कहा जाता है|
F.A बेंटली-
कृति-The Process of Government (1908) के अंतर्गत यह विचार व्यक्त किया है कि लोकतंत्र ऐसा राजनीतिक खेल है जिसमें तरह-तरह से समूह हिस्सा लेते हैं|
डेविड ट्रूमैन ने The Governmental Process 1951 में इस विचार की पुष्टि की|
रॉबर्ट डहल-
डहल ने अपनी पुस्तक ‘Who Governs? Democracy and Power in an American City’ (1961) में अमेरिका के ‘न्यू हेवन’ शहर का अनुभवजन्य अध्ययन किया| उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि कोई भी स्थायी अभिजात वर्ग या शासक राजनीतिक प्रक्रिया पर पूरी तरह हावी नहीं होता है|
रॉबर्ट डहल ने अपनी कृति ‘A Preface to Democratic Theory 1956 के अंतर्गत लोकतंत्रीय प्रक्रिया का ऐसा प्रतिरूप विकसित किया, जिसे उसने बहुलतंत्र की संज्ञा दी है| बहुलतंत्र के अंतर्गत अनेक सवायत समूह आपस में समझौता करते हैं अतः सार्वजनिक नीति उन सब समूह की परस्पर क्रिया का परिणाम होती है|
सहभागिता पूर्ण लोकतंत्र का सिद्धांत-
समर्थक-
केरोल पैटमैन- पार्टिसिपेशन एंड डेमोक्रेटिक थ्योरी 1978, द प्रॉब्लम्स ऑफ पॉलिटिकल ऑब्जेक्शन (1985), ए क्रिटिक ऑफ लिबरल थ्योरी 1985
C.B मैक्फर्सन- द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ लिबरल डेमोक्रेसी 1977
एन पालन्ताज- स्टेट पावर सोशलिज्म 1980
सहभागितामूलक लोकतंत्र का सिद्धांत ‘प्रतिनिधि लोकतंत्र’ के प्रतिरूप को चुनौती देते हुए जनसाधारण की राजनीतिक सहभागिता को लोकतंत्र का बुनियादी लक्षण मानता है|
राजनीतिक सहभागिता-
यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत कोई व्यक्ति सार्वजनिक नीतियों और निर्णयो के निर्माण, निरूपण और कार्यान्वयन की प्रक्रिया में सक्रिय भाग लेते हैं| यह सरकार और नागरिकों के बीच सक्रिय परस्पर क्रिया की मांग करते हैं|
राजनीतिक सहभागिता या लोकतंत्र सहभागिता के विभिन्न रूप
प्रो. हेल्ड का कहना है कि ‘दक्षिणपंथी कानूनवादी’ लोकतंत्र के विपरीत सहभागितापूर्ण लोकतंत्र एक वामपंथी प्रतिमान है|
रॉबर्ट डहल-
रॉबर्ट डहल (A Preface to Democratic Theory 1985) ने सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और व्यापक भागीदारी की निम्न परिस्थितियां बतायी हैं-
सामान मत- प्रत्येक नागरिक को समान मताधिकार एवं प्रत्येक के मत का समान महत्व
प्रभावपूर्ण भागीदारी- समूची सामूहिक निर्णय प्रक्रिया में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी|
प्रबुद्ध विवेक- नागरिकों में प्रबुद्ध विवेक होना चाहिए|
विषय सूची पर आम आदमी का पूर्ण नियंत्रण
व्यापकता- जन-सामान्य में मानसिक विक्षिप्तो को छोड़कर सभी व्यस्क नागरिकों को शामिल किया जाना चाहिए|
विचारात्मक या विमर्शी लोकतंत्र का सिद्धांत-
विचारात्मक या विचार- विमर्शमूलक लोकतंत्र के सिद्धांत को 1990 के दशक के आरंभिक वर्षों में विशेष लोकप्रियता मिली है|
समर्थक-
विमर्शी लोकतंत्र शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग जॉसेफ बासेट ने किया जॉसेफ बासेट की पुस्तक ‘The Mild Voice of Reason’ 1994 है|
जे कोहेन एवं जे रोजर्स- On Democracy: Toward a Transformation of American Society 1983
S.L हर्ली- Natural Reasons: Personality and Polity 1989
जॉन रॉल्स- Political Liberalism 1993
युर्गेन हेबरमास- Between Facts and Norms: Contributions to a Discourse Theory of Law and Democracy 1996
विचारात्मक लोकतंत्र का सिद्धांत लोकप्रिय प्रभुसत्ता और उदार लोकतंत्र से जुड़े विचारों में समन्वय स्थापित करने का प्रयास है|
लोकप्रिय प्रभुसत्ता के समर्थक लोकप्रिय शासन की मांग करते हैं, जबकि उदार लोकतंत्र के समर्थक नागरिक स्वतंत्रताओं को लोकतंत्र का आधार तत्व मानते हैं| वही विचारात्मक लोकतंत्र का सिद्धांत इन दोनों तत्वों को मिलाकर राजनीतिक विचारणा या विचार विमर्श को बढ़ावा देना चाहता है|
डराइजिक (Discursive) ने विमर्शी लोकतंत्र को तर्कमुलक लोकतंत्र कहा है|
आमूल लोकतंत्र का सिद्धांत-
समर्थक-
शांटल माउफे (Chantal Mouffe) और एर्नेस्टो लेक्लाउ (Ernesto Laclau)
जॉन बर्नहाइम- इस डेमोक्रेसी पॉसिबल? डेमोक्रेसी, नेशन स्टेट्स एंड द वर्ल्ड सिस्टम
विलियम ई. कोनोली- Democracy and Territoriality 1991
आमूलीय लोकतंत्र सिद्धांत उदारवादी प्रतिनिधि लोकतंत्र की त्रुटियों के विरुद्ध विकसित हुआ|
जहाँ पारंपरिक उदारवादी लोकतंत्र केवल 5 साल में एक बार वोट देने और प्रतिनिधि चुनने तक सीमित रहता है, वहीं आमूलीय लोकतंत्र निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में आम जनता की सीधी और सक्रिय भागीदारी (Direct Citizen Participation) पर बल देता है|
आमूलीय लोकतंत्र का प्रतिमान तीन प्रकार के प्रचलित लोकतांत्रिक सिद्धांतों के तत्वों का संगम है-
उत्तर आधुनिकतावादी (खुलापन)
नव मार्क्सवादी (समानता)
गणतंत्रवादी (सक्रिय नागरिकता)
कोहेन ने आमूलीय लोकतंत्र के राजनीतिक चिंतन में दो मुख्य तत्व बताएं हैं-
सार्वजनिक निर्णय निर्माण में व्यापक जन भागीदारी
संवाद प्रक्रिया
अरनेस्टो लाक्लाऊ तथा शांटल माउफे (Chantal Mouffe)-
पुस्तक- Hegemony and Socialist Strategy: Towards a Radical Democratic Politics 1985 ( हेजेमनी एंड सोशल स्ट्रेजी टुवर्डस ए रेडिकल डेमोक्रेसी पॉलिटिक्स)
ये आमूलीय लोकतंत्र के प्रतिमान में स्वतंत्रता, समानता तथा भिन्नता के तत्वों को सम्मिलित किए जाने पर जोर देते हैं|
जनवादी लोकतंत्र का सिद्धांत-
जनवादी लोकतंत्र की धारणा मार्क्सवादी चिंतन के साथ जुड़ी है|
द्वितीय विश्वयुद्ध (1939 से 45) के बाद जब पूर्वी यूरोप के देशों (हंगरी, पोलैंड, पूर्वी जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, बल्गेलिया और रोमानिया) में तत्कालीन सोवियत संघ की छत्रछाया में साम्यवादी प्रणालियां स्थापित की गई तो उन्हें ‘जनवादी लोकतंत्र’ की संज्ञा दी गई|
यह उदार लोकतंत्र (पूंजीवादी) व सर्वहारा लोकतंत्र दोनों से ही अलग है|
जनवादी लोकतंत्र के अंतर्गत बुर्जुवा, निम्न-बुर्जुवा, किसान और सर्वहारा वर्ग अपनी मिली-झूली सरकार बनाते हैं| लेकिन सर्वहारा वर्ग की प्रधानता रहती है|
पूर्वी यूरोप के ‘जनवादी लोकतंत्रो की सरकारों में साम्यवादी दलों के साथ-साथ गैर साम्यवादी दलों को भी सम्मिलित किया जाता था|
मार्क्सवादी दृष्टिकोण-
मार्क्सवादी लोकतंत्र की मुख्य कसौटी यह है कि शासन जनसाधारण के हित में कार्य करें, तथा जनसाधारण का शोषण न हो और तभी संभव है जब समाज धनवान और निर्धन वर्गों में बटा न रहे|
मार्क्सवाद द्वारा उदार लोकतंत्र की आलोचना की गई है, जो निम्न है-
उदार लोकतंत्र केवल पूंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा करता है|
उदार लोकतंत्र विचारधारात्मक भ्रांति पैदा करता है|
उदार लोकतंत्र समाज वर्ग- विभाजन को स्थायित्व प्रदान करता है|
लोकतंत्रीय केंद्रवाद का सिद्धांत-
इस सिद्धांत की नीव सोवियत संघ के संस्थापक नेता V.I लेनिन ने रखी थी|
और यह सिद्धांत सोवियत संघ के प्रत्येक संविधान में विहित था|
जनवादी चीन की साम्यवादी दल और शासन के संगठन के लिए भी यही सिद्धांत अपनाया गया|
इस सिद्धांत का तात्पर्य है कि दल या शासन के निचले अंग अपने ऊंचे अंगों का निर्वाचन करेंगे तथा ऊंचे अंग जनसाधारण के प्रति उत्तरदायी होंगे और निचले अंग अपने ऊंचे अंगों के निर्णयों का पालन करने को बाध्य होंगे|
प्रतिनिधि लोकतंत्र का सिद्धांत-
शासन कार्यों में भाग लेने के आधार पर लोकतंत्र को दो भागों में बांट सकते हैं-
प्रत्यक्ष लोकतंत्र
अप्रत्यक्ष / प्रतिनिधि लोकतंत्र
प्रत्यक्ष लोकतंत्र-
प्रत्यक्ष लोकतंत्र प्राचीन यूनानी नगर- राज्यों में प्रचलित था जहां सारे नागरिक समय-समय पर एकत्रित होकर स्वयं सार्वजनिक निर्णय करते थे|
आधुनिक स्विट्जरलैंड में भी प्रत्यक्ष लोकतंत्र का उदाहरण मिलता है|
18 वीं सदी में ज्यों जॉक रूसो ने प्रत्यक्ष लोकतंत्र का समर्थन किया तथा इसे शुद्ध लोकतंत्र कहा|
प्रतिनिधि लोकतंत्र -
आज के बड़े व जटिल समाज में प्रत्यक्ष लोकतंत्र व्यवहारिक नहीं है| अतः आज आधुनिक समाज में प्रतिनिधि लोकतंत्र प्रचलित है|
प्रतिनिधि लोकतंत्र का प्रचलन उदारवादी समाजों से हुआ था अतः इसे उदारवादी लोकतंत्र भी कहते हैं|
इसमें जनता अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन संचालन करती है|
एंथनी डाउन्स-
पुस्तक- An Economic Theory of Democracy 1957 में बताता है कि
इनका मत है कि लोकतंत्रीय व्यवस्था में प्रतिस्पर्द्धात्मक चुनाव होते हैं, जिसमें राजनीतिज्ञ व्यापारियों की भांति राजनीति रूपी बाजार में अपनी माल रूपी नीतियों को बेचते हैं|
ऐसे बाजार में लोग पसंद की वस्तुएं खरीदते हैं अर्थात अपनी पसंद के दल को निश्चित समय के लिए राज्यसत्ता सौंपते हैं|
प्रतिनिधित्व के सिद्धांत-
प्रतिनिधित्व का प्रतिक्रियावादी सिद्धांत-
प्रवर्तक- थॉमस हॉब्स, एलेक्जेंडर हैमिल्टन
यह सिद्धांत व्यवस्था और सत्ता की आवश्यकता पर बल देता है|
इसके अनुसार कार्यपालिका और संसद लोकहित का सर्वोत्तम रक्षक और साधक है|
इसमें कार्यपालिका के लिए राजतंत्र को उपयुक्त माना है|
इसके अनुसार कार्यपालिका व संसद उच्च कोटि के ज्ञान और विवेक से संपन्न होती है, उन्हें लोकहित की ओर ध्यान तो देना चाहिए लेकिन लोकहित से बंधना नहीं चाहिए|
जनसाधारण को राज्य का समर्थन करना चाहिए|
इस सिद्धांत में सत्ताधारियों पर जनसाधारण के नियंत्रण की कोई व्यवस्था नहीं|
प्रतिनिधित्व का रूढ़िवादी सिद्धांत-
प्रवर्तक- एडमंड बर्क, जेम्स मेडिसन
यह सिद्धांत सार्वजनिक नियंत्रण को तो स्वीकार करता है, लेकिन शासन प्रक्रिया में जनसाधारण की सहभागिता को अनुमति नहीं देते हैं|
इसमें जनसाधारण विशिष्टवर्ग में से ही अपने शासक का चयन कर सकता है|
चयन के बाद जनता को यह अधिकार नहीं होता है कि वे अपने प्रतिनिधियों को कोई निर्देश दे सके, लेकिन प्रतिनिधियों से संतुष्ट न होने पर अगले चुनाव में बदल सकते हैं|
प्रतिनिधित्व का उदारवादी सिद्धांत-
प्रवर्तक- जॉन लॉक, टॉमस जैफर्सन
यह सभी सिद्धांतों में से सबसे अधिक लोकप्रिय है|
इस सिद्धांत के अनुसार सभी लोग समान हैं और सब शासन करने में समर्थ है| अतः प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिनिधि के रूप में चुनाव लड़ने का अधिकार है|
इसमें शासन में जनसाधारण की सहभागिता को स्वीकार किया जाता है तथा सार्वजनिक नियंत्रण भी स्वीकार किया जाता है|
प्रतिनिधित्व का आमूल- परिवर्तनवादी सिद्धांत-
प्रवर्तक- ज्यां लॉक रूसो, नववामपंथी
यह प्रतिनिधि लोकतंत्र को अस्वीकार करता है तथा इसमें लोकमत को सबसे ऊंचा स्थान दिया जाता है|
इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्यक्ष या शुद्ध लोकतंत्र की सच्चा लोकतंत्र है तथा सबसे अभीष्ट शासन प्रणाली है|
प्रतिनिधित्व की प्रक्रिया-
इसमें निम्न को शामिल करेंगे-
निर्वाचकमंडल
वयस्क मताधिकार
चुनाव की प्रणालियां
निर्वाचन प्रक्रिया
प्रतिनिधित्व का आधार
निर्वाचकमंडल-
किसी देश में जिन लोगों को मतदान का अधिकार होता है, उन सभी के समूह को निर्वाचक मंडल कहते हैं|
निर्वाचकमंडल साधारणत: भौगोलिक आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों में बांटा जाता है| निर्वाचन क्षेत्र दो प्रकार के होते हैं-
एक सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र
बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र
वयस्क मताधिकार-
व्यस्क मताधिकार का अर्थ है कि एक निश्चित आयु पूर्ण कर लेने पर बिना किसी भेद-भाव के नागरिकों मताधिकार प्रदान करना|
Note- मानसिक विक्षिप्तता, अपराध व भ्रष्टाचार आदि के आधार पर नागरिकों मताधिकार से वंचित करना व्यस्क मताधिकार का उल्लंघन नहीं है|
चुनाव की प्रणालियां- चुनाव के लिए दो तरह की पद्धति अपनायी जाती है-
प्रत्यक्ष चुनाव- इसमें मतदाता सीधे अपने प्रतिनिधि चुनते|
अप्रत्यक्ष चुनाव- इसमें मतदाता द्वारा प्रत्यक्ष रुप से चुने गये प्रतिनिधियों से बने निर्वाचक मंडल द्वारा चुनाव किया जाता है|
निर्वाचन प्रक्रिया-
इसके द्वारा मतदाता अपने प्रतिनिधि को सत्ता प्रयोग के लिए चुनते हैं|
प्रतिनिधित्व का आधार- प्रतिनिधित्व के दो आधार हो सकते हैं-
क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व- इसके अंतर्गत पूरे देश को लगभग बराबर जनसंख्या वाले भौगोलिक क्षेत्रों में बांट दिया जाता है तथा प्रत्येक क्षेत्र में मतदाता प्रतिनिधि चुनते हैं |
कृत्यात्मक प्रतिनिधित्व- इसमें भिन्न-भिन्न कृत्यों से जुड़े हुए लोग अपने अपने कृत्यों के आधार पर प्रतिनिधि चुनते हैं|
निर्वाचन प्रणालियां-
लोकतंत्रीय व्यवस्था में मुख्यतः तीन प्रकार के निर्वाचन प्रणाली पायी जाती है -
बहुलमत प्रणाली
बहुमत प्रणाली
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली
बहुलमत प्रणाली-
इस प्रणाली में एकसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र में तीन या तीन से अधिक उम्मीदवार चुनाव में भाग लेते हैं तथा मतदाता किसी एक उम्मीदवार को वोट देता है| जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा बहुत मिलते हैं उसे विजेता घोषित किया जाता है|
इसका मुख्य नियम है- जो सबसे आगे जीत उसकी (First post the post)
Note- इसमें निर्वाचित उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत ( कुल वैध मतों का 50% से अधिक) प्राप्त करना जरूरी नहीं होता है|
उदाहरण- ब्रिटिश संसद, अमेरिकी प्रतिनिधि सभा, भारत की लोकसभा व राज्यसभा व विधानसभाएँ आदि|
बहुमत प्रणाली-
इस प्रणाली में एकसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र में तीन या तीन से अधिक उम्मीदवार भाग लेते हैं तथा उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए पूर्ण बहुमत (कुल मान्य मतों का 50% से अधिक) प्राप्त करना होता है|
पूर्ण बहुमत की प्राप्ति के लिए दो तरीके अपनाए जाते हैं-
वैकल्पिक मत प्रणाली-
इसमें मतदाता विभिन्न उम्मीदवारों को 1,2,3 आदि वरीयता- क्रम में मतदान करता है|
यदि किसी उम्मीदवार को प्रथम वरीयता में बहुमत प्राप्त नहीं होता है तो प्रथम वरीयता में जिसको सबसे कम मिलता है उसको हटा दिया जाता है|
तथा अन्य उम्मीदवारों की प्रथम वरीयता में उनकी द्वितीय वरीयता को जोड़ देते हैं|
इस प्रक्रिया को तब तक दोहराया जाता है जब तक कि किसी उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत प्राप्त न हो
उदाहरण- ऑस्ट्रेलिया का अवर सदन, संयुक्त राज्य अमेरिका का राष्ट्रपति, भारत का राष्ट्रपति|
दूबारा मतदान प्रणाली-
इसमें मतदाता केवल एक ही उम्मीदवार को मत देता है|
लेकिन किसी भी उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं होता है तो पूर्ण बहुमत प्राप्ति के लिए कुछ शर्तों के साथ दोबारा मतदान कराया जाता है|
उदाहरण-
फ्रांस के राष्ट्रपति के चुनाव में किसी भी उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत प्राप्त न होने की स्थिति में जिन दो उम्मीदवारों को सबसे ज्यादा वोट मिले हैं उन दोनों में फिर से चुनाव करवाया जाता है|
फ्रांस के नेशनल असेंबली में पहले मतदान के दौरान जब किसी भी उम्मीदवार को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो जिन दलों को 12.5 प्रतिशत या ज्यादा वोट मिलते हैं उनमें फिर से चुनाव कराया जाता है|
आनुपातिक प्रतिनिधित्व-
इस प्रणाली का प्रयोग बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र में होता है|
यह एक जटिल प्रणाली है जिसे कार्य रूप देने के लिए दो तरीके अपनाए जाते हैं -
सूची प्रणाली
एकल हस्तांतरणीय मतदान प्रणाली
सूची प्रणाली-
इस प्रणाली में प्रत्येक राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की सूची तैयार करते हैं|
सूची में प्रत्येक उम्मीदवार का एक क्रम होता है| (1,2,3.4-)
इसमें मतदाता को विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों की सूची दी जाती है, मतदाता जिसमें किसी एक सूची पर निशान लगा देता है, अर्थात इसमें उम्मीदवार का चयन इस आधार पर होता है कि उनका सूची में क्या क्रम था तथा प्रत्येक दल को कितने प्रतिशत वोट मिले हैं|
इसमें कहीं-कहीं मतदाता को दलीय सूचियों में फेरबदल करने की छूट भी होती है|
जैसे- स्विट्जरलैंड और लक्जमबर्ग के विधानमंडल चुनाव में मतदाता को छूट रहती है कि वह चाहे तो किसी सूची के क्रम को बदल दे या उनके दलों की सूचियों में से उम्मीदवार को चुन कर कोई नई सूची बना दे|
जर्मनी व इजरायल के विधानमंडलों के चुनाव में मतपत्र जो सूचियां छपी रहती हैं, मतदाता को उन्हीं में से एक सूची का चुनाव करना पड़ता है|
एकल हस्तांतरणीय मतदान प्रणाली-
इसके अंतर्गत मतदाता 1,2 ,3,4….आदि वरीयता क्रम में मतदान करता है|
चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार को चुनाव-कोटा (Electoral Quota) के बराबर वोट प्राप्त होना जरूरी है|
यदि किसी उम्मीदवार को प्रथम वरीयता में चुनाव -कोटा के बराबर मत मिल जाते हैं तो वह निर्वाचित घोषित कर दिया जाता है, नहीं तो सबसे कम मत प्राप्त उम्मीदवार को हटाकर अन्य उम्मीदवारो की पहली वरीयता में दूसरी वरीयता के मत जोड़ देते हैं|
तथा यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक की क्वोटा प्राप्त न हो जाय|
उदाहरण- आयरिश गणराज्य, माल्टा के राष्ट्रीय चुनाव|
अल्पमत के प्रतिनिधित्व की विधियां
अल्पमत को प्रतिनिधित्व देने के निम्न उपाय सुझाए गए हैं-
समवर्ती बहुमत
सहवर्तनमुलक लोकतंत्र
समवर्ती बहुमत-
जॉन सी कैलहन ने समवर्ती बहुमत का सिद्धांत दिया है|
इसमें यह व्यवस्था की गई है कि कोई भी निर्णय तभी मान्य होना चाहिए तब उससे प्रभावित होने वाले सभी मुख्य-मुख्य वर्ग हितों की सहमति प्राप्त कर ली गई है|
सहवर्तनमुलक लोकतंत्र-
यह व्यवस्था ऐसे समाजों के लिए उपयुक्त है, जो धार्मिक, विचारधारात्मक, भाषाई, क्षेत्रीय, सांस्कृतिक, जातीय या सजातीय आधार पर भिन्न-भिन्न संप्रदायों में बटे हो|
सहवर्तनमुलक लोकतंत्र के 4 मूल सिद्धांत है- अरेंड लिपहार्ट (Arend Lijphart) के अनुसार सहवर्तनमूलक लोकतंत्र के चार प्रमुख सिद्धांत हैं-
कार्यकारी शक्ति का सम्मिलित प्रयोग या महागठबंधन- इसके अंतर्गत सभी महत्वपूर्ण संप्रदायों के प्रतिनिधि मिली-झूली सरकार बनाते हैं|
विभिन्न संप्रदायों के लिए अधिक स्वायत्तता या खंडीय स्वायत्तता- भिन्न-भिन्न संप्रदायों को अपने-अपने मामलों में निर्णय करने का अधिक से अधिक अधिकार व स्वायत्तता
आनुपातिकता- राजनीतिक पदों, प्रशासनिक नियुक्तियां और सार्वजनिक निधि का आवंटन भिन्न-भिन्न संप्रदायों की जनसंख्या के अनुपात में
अल्पमत का निषेधाधिकार या पारस्परिक वीटो- महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रत्येक प्रमुख समूह को अपने हितों की रक्षा के लिए वीटो का अधिकार| यह अल्पसंख्यक समुदाय के लिए अपने हितों की रक्षा का अंतिम अस्त्र है|
सहवर्तनमुलक लोकतंत्र के उदाहरण-
ऑस्ट्रेलिया 1945 से 1966 तक, नीदरलैंड 1917 से 1967 तक, लेबनान 1943 से 1975 तक|
लेबनान के संविधान में यह व्यवस्था है कि यदि वहां का राष्ट्रपति ईसाई हो तो प्रधानमंत्री मुस्लिम होना चाहिए| या राष्ट्रपति मुस्लिम हो तो प्रधानमंत्री ईसाई होना चाहिए|
तंजानिया में वहां का राष्ट्रपति मुख्यभूमि से हो तो उपराष्ट्रपति जंजीबार द्वीप से होना चाहिए|

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