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नागरिकता, शक्ति || 360° Rapid Revision || राजनीती विज्ञान || Political Science || नागरिक शास्त्र || TGT PGT || UGC Net DEC 2026

    नागरिकता  (Citizenship)



    • अंग्रेजी शब्द Citizenship लैटिन भाषा के civis से बना है| 

    • Civis का अर्थ- नगर के निवासी|


    • किसी भी देश में दो तरह के व्यक्ति रह सकते हैं-

    1. नागरिक        (2)   विदेशी



    नागरिकता का अर्थ- 

    • वह स्थिति जिसमें व्यक्ति किसी राजनीतिक समुदाय का पूर्ण और उत्तरदाई सदस्य होता है और सार्वजनिक जीवन में भाग लेता है|

    • नागरिक ऐसा व्यक्ति है, जो राज्य के प्रति निष्ठा रखता है और उसे राज्य का संरक्षण प्राप्त होता है|

    • नागरिक वह होगा जिसको सभी सिविल तथा राजनीतिक अधिकार व स्वतंत्रताएं प्राप्त हो जबकि विदेशी को ये सब प्राप्त नहीं होते हैं|



    नागरिक अधिकार- 

    • ऐसे अधिकार है जो किसी राज्य के नागरिक को केवल नागरिकता के आधार पर प्राप्त होते हैं और जिन्हें कानून के द्वारा सुरक्षित किया जाता है|

    • प्रमुख नागरिक अधिकार- कानून के समक्ष समानता, दैहिक स्वतंत्रता, वाणी, विचार और आस्था की स्वतंत्रता, मुक्त विचरण की स्वतंत्रता, व्यापार और व्यवसाय की स्वतंत्रता, अनुबंध की स्वतंत्रता और संपत्ति का अधिकार 

    • नागरिक अधिकारों का स्रोत- नागरिकता



    नागरिकता की परिभाषा-

    • गेटल “नागरिकता किसी व्यक्ति की वह स्थिति है जिसके अंतर्गत वह अपने राज्य में साधारण और राजनीतिक अधिकारों का प्रयोग करता है एवं अपने कर्तव्यों का स्वभाविक पालन करने के लिए सदैव तत्पर रहता है|”

    • लास्की “नागरिकता का आशय उस व्यक्ति से है जो संगठित समाज का सदस्य मात्र ही नहीं, बल्कि संगठित समाज के आदेशों का वाहक एवं कर्तव्यों का स्वाभाविक पालनकर्ता भी होता है|”

    • कैटलिन “नागरिकता किसी व्यक्ति की वह वैधानिक स्थिति है, जिसके कारण वह राजनीतिक रूप में संगठित समाज की सदस्यता प्राप्त कर राजनीतिक एवं सामाजिक लाभ प्राप्त करता है|”

    • डेविड हेल्ड “नागरिकता उस अधिकार का नाम है, जिसकी वजह से सभी लोगों को समान अधिकार और कर्तव्य प्राप्त होते हैं| सभी समान स्वतंत्रताएं, एक जैसे नयायोचित बंधनों और एक जैसे दायित्वों का उपयोग करते हैं|



    नागरिकता की अवधारणा का विकास-


    प्राचीन काल में नागरिकता

    • नागरिकता का विचार अपने आरंभिक रूप में प्राचीन यूनानी और रोमन राजनीतिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत देखने को मिलता है| 

    • प्राचीन यूनानी चिंतन में नागरिकता सीमित लोगों को प्राप्त थी|

    • यूनानी चिंतन में नागरिकता और नागरिक- नगर राज्य की सदस्यता के रूप 


    अरस्तु- 

    • अरस्तु अपने ग्रंथ पॉलिटिक्स में सीमित नागरिकता का समर्थन करता है| 

    • अरस्तु ने नागरिकता को शासक वर्ग का विशेषाधिकार माना है|

    • अरस्तु के अनुसार “नागरिक वही है, जो किसी न्याय व्यवस्था और व्यवस्थापिका के सदस्य के रूप में भाग लेता है तथा जिसे अवकाश प्राप्त है|

    • अरस्तु के अनुसार दास, स्त्री, श्रमिक, शिल्पी नागरिक नहीं है|

    • अरस्तु के अनुसार नागरिकता के लिए व्यक्ति में उच्च नैतिक स्तर और बौद्धिक स्तर की आवश्यकता होती है|


    प्लेटो-

    • प्लेटो की नागरिकता भी अभिजात्यवर्गीय थी, क्योंकि दार्शनिक व सैनिक वर्ग को महत्वपूर्ण मानता है|

    • स्त्री-पुरुष में कोई अंतर नहीं किया है| 


    विश्व नागरिकता-

    • एपिक्यूरियन, स्टोइक व सिजविक विचारको ने नगर राज्य की जगह विश्व नागरिकता का विचार दिया, अर्थात ये नगर राज्य के नागरिक न होकर विश्व नागरिक हैं|

    • डनिग “जब यूनानी और बर्बर जातियों को पृथक करने वाली दीवार टूट गई, एथेंस, थ्रेस, एशिया, मिस्र के रहने वाले व्यक्ति वस्तुतः एक राजनीतिक पद्धति के सदस्य बन गये तो विश्व नागरिकता का विचार चिंतनशील मनुष्यों के लिए स्वीकारणीय हो गया|”


    व्यापक नागरिकता-

    • रोमन विचारको ने नागरिकता को व्यापक और व्यवहारिक स्वरूप प्रदान किया| 

    • रोमन साम्राज्य में शासक के अलावा सामान्य जनों और युद्ध में पराजित लोगों को भी नागरिकता दी गई|


    • बोदाँ ने परिवार के मुखिया को ही नागरिक माना है|



    मध्यकाल में नागरिकता- 

    • मध्ययुगीन यूरोप में जब राजनीतिक सत्ता पर धार्मिक सत्ता का वर्चस्व स्थापित हो गया, तब नागरिकता का विचार विशेष चर्चा का विषय नहीं रहा| 



    आधुनिक काल में नागरिकता

    • 15-16 वीं सदी में बौद्धिक पुनर्जागरण, धर्मसुधार आंदोलन, औद्योगिक क्रांति आदि के फलस्वरुप उदारवाद का जन्म हुआ तो नागरिकता की संकल्पना व स्वरूप में परिवर्तन हुआ|

    • 1688 की गौरवपूर्ण क्रांति में नागरिक अधिकारों की मांग पर विशेष बल दिया गया, इसके फलस्वरूप केवल पुरुषों को ही नागरिक अधिकार प्राप्त हुए||

    • ब्रिटेन में 1928 में महिलाओं को नागरिक अधिकार प्रदान किया गया|

    • फ्रांस की क्रांति 1789 में पहली बार सभी के लिए नागरिक अधिकारों की मांग की गयी थी|


    • Note - न्यूजीलैंड ने सर्वप्रथम सार्वभौमिक मताधिकार 1893 में अपनाया|





    नागरिकता के सिद्धांत-


    1. उदारवादी सिद्धांत- 

    • समर्थक- TH मार्शल (मुख्य प्रवक्ता), जॉन लॉक, J S मिल

    • इस सिद्धांत के अनुसार नागरिकता की बुनियाद नागरिक अधिकार है|

    • इस सिद्धांत में अधिकारों के विकास पर बल दिया जाता है, अतः इसे नागरिकता का विकासात्मक सिद्धांत भी कहा जाता है|


    T H मार्शल-

    • T H मार्शल ने अपनी पुस्तक Citizenship and social class 1950 में लिखा है कि “नागरिकता विभिन्न व्यक्तियों के लिए समान अधिकार और कर्तव्य, स्वतंत्रताएं और प्रतिबंध, शक्तियां और उत्तरदायित्व निर्धारित करती है|”

    • मार्शल “नागरिकता एक ऐसी स्थिति की खोज है, जिसमें व्यक्ति को ऐसा अनुभव हो कि उसे अन्य व्यक्तियों के समान दर्जा प्राप्त है और वह अन्य के समान अधिकार प्राप्त कर सकता है|”

    • मार्शल के अनुसार नागरिकता किसी समुदाय के सदस्यों को समुदाय की साझी विरासत में हिस्सा दिलाती है|

    • मार्शल के अनुसार नागरिकता का विचार नागरिक अधिकारों की व्यवस्था से शुरू होता है फिर यह क्रमश राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों की व्यवस्था करके उत्कर्ष तक पहुंचता है|


    • उदारवादी सिद्धांतों के अनुसार नागरिकता का उद्देश्य नागरिक कल्याण है|



    1. स्वेच्छातंत्रवादी सिद्धांत-

    • समर्थक- राबर्ट नॉजिक (प्रमुख प्रवक्ता), आईजिया बर्लिन, F A हेयक, मिल्टन फ्रीडमैन

    • इस सिद्धांत के अनुसार नागरिकता स्वतंत्र चयन और अनुबंध का परिणाम है| यह बाजार-समाज के प्रतिरूप को नागरिक जीवन का उपयुक्त आधार मानता है|

    • यह सिद्धांत नागरिकों को सार्वजनिक वस्तुओं का विवेकशील उपभोगता मानता है|

    • यह सिद्धांत बाजार समाज, प्रतिस्पर्धात्मक समाज का समर्थक है|

    • राबर्ट नॉजिक के अनुसार राज्य को एक विशाल उद्यम मानना चाहिए नागरिक उसके ग्राहक या सेवार्थी है|

    • हरबर्ट स्पेंसर अहस्तक्षेप की नीति का समर्थक है|

    • मिल्टन फ्रीडमैन, हरबर्ट स्पेंसर की भांति राज्य को एक स्टॉक एक्सचेंज कंपनी मानता है|

    • हेयक “राज्य के लिए एक ही मूल मंत्र है चुप रहे|


    1. समुदायवादी सिद्धांत-

    • समर्थक- हन्ना आरेंट, माइकल वाल्जर, बेंजामिन बार्बर, विमकिमलिका, मैकिंटायर, माइकल सैंडेल, चार्ल्स टेलर 

    • नागरिकता का मुख्य लक्षण- नागरिक सहभागिता

    • इनके अनुसार नागरिक ऐसा व्यक्ति है जो राजनीतिक वाद-विवाद और निर्णय प्रक्रिया में भाग लेकर अपने समाज का भावी रूप निर्धारित करने में सक्रिय भूमिका निभाता है|

    • समुदायवादी विचारक मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी मानते हैं, तथा समुदाय तथा व्यक्ति के मध्य घनिष्ठ संबंधों पर बल देते हैं| 

    • नागरिक, समुदाय में सहभागिता द्वारा सामान्य हित की पूर्ति करता है|

    • विमकिमलिका अपनी पुस्तक “Multiculturalism and Citizenship” में नागरिकता का आधार संस्कृति को मानते हैं|

    • माइकल वाल्जर अधिकारों की राजनीति के बजाय सामान्य शुभ की राजनीति का समर्थन करते हैं| 

    • वाल्जर अपने दृष्टिकोण को आलोचनात्मक साहचर्यवाद (Critical Associationalism) कहते हैं| 

    • रॉबर्ट पुटनम ने सामाजिक पूँजी (Social Capital) की अवधारणा दी है, जो एक सक्रिय नागरिक के सद्गुणों जैसे आपसी भरोसा, भागीदारी और एकता पर आधारित है|  


    1. मार्क्सवादी सिद्धांत-

    • समर्थक- एंथनी गिडिन्स (मुख्य प्रवक्ता), मार्क्स, लेनिन, स्टालिन

    • मार्क्सवादी नागरिकता को वर्ग संघर्ष का परिणाम मानते हैं| 

    • इसके अनुसार शोषक वर्ग दूसरे वर्ग का शोषण करके जो अधिकार प्राप्त करता है वह अधिकार नागरिकता का आधार है|

    • ऐसी स्थिति में श्रमिक वर्ग (शोषित वर्ग) अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं| अतः नागरिकता का लक्ष्य श्रमिकों के अधिकारों का संरक्षण करना है|

    • कार्ल मार्क्स ने उदारवादी पूँजीवादी लोकतांत्रिक नागरिकता को बुर्जुआ नागरिकता कहा है| 

    • एंथनी गिडिन्स ने अपनी पुस्तक A Contemporary Critique of Historical Materialism और Profiles and Critiques in Social Theory में मार्शल के विचारों का खंडन किया है|


    • एंथनी गिडिन्स ने दो तरह के नागरिक अधिकारों में अंतर किया है-

    1. व्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के समक्ष समानता- इन अधिकारों को पूंजीपति वर्ग ने सामंती विशेषाधिकारों के विरुद्ध संघर्ष करके प्राप्त किया था|

    2. आर्थिक नागरिक अधिकार- इन अधिकारों को कामगार वर्ग ने पूंजीपति वर्ग के विरुद्ध संघर्ष करके प्राप्त किया था|


    • एंथनी गिडिन्स अपनी पुस्तक The Nation-State and Violence 1985 में नागरिकता संबंधी विचार देता है|

    • एंथनी गिडिन्स के अनुसार नागरिकता का आधार आर्थिक अधिकार व सकारात्मक अधिकार होने चाहिए|

    • एंथनी गिडिन्स के अनुसार समाजवादी देशों में ही नागरिकता है, पूंजीवादी देशों में नागरिकता की अवहेलना होती है|


    1. बहुलवादी सिद्धांत- 

    • प्रमुख समर्थक- B.S टर्नर, डेविड हेल्ड

    • यह दृष्टिकोण नागरिकता को एक जटिल और बहुआयामी प्रक्रिया मानता है|

    • इस सिद्धांत के अनुसार नागरिकता न केवल राज्य की सदस्यता है, बल्कि अन्य संघों और समुदायों की सदस्यता भी है|

    • इस सिद्धांत का सर्वोत्तम निरूपण B.S टर्नर की कृति Citizenship and Capitalism- The Debate over Reformism 1986 के अंतर्गत मिलता है|

    • डेविड हेल्ड ने अपनी पुस्तक Political Theory and modern States 1989 में नागरिकता को बौद्धिक जागरण, धार्मिक सुधार आंदोलन तथा औद्योगिकरण का परिणाम बताया है| 


    • B.S टर्नर ने T H मार्शल के ऐतिहासिक मॉडल के विकल्प के रूप में नागरिकता के विकास की चार लहरें बताई है-

    1. पहली लहर- 

    • नागरिकता से संपत्ति की शर्त हटाना इससे नागरिकता का दायरा अधिक व्यापक और समावेशी (Inclusive) हो गया| 

     

    1. दूसरी लहर-

    • लिंग-आधारित भेदभाव की समाप्ति 


    1. तीसरी लहर-

    •  नागरिकता में आयु, रिश्तेदारी और परिवार की भूमिका को मान्यता 


    1. चौथी लहर-

    • नागरिक अधिकारों का प्रकृति और पर्यावरण तक विस्तार



    वैश्वीकरण और नागरिकता-


    • वैश्वीकरण के फलस्वरुप अनेक अधिकारों की मांग उठने लगी है, इसलिए नागरिकता की कुछ नवीन अवधारणाओं का उदय हुआ है-


    1. सार्वभौमिक नागरिकता (Cosmopolitan Citizenship) -

    • समर्थक- डेविड हेल्ड, मार्था नुसबाम 

    • इसके अनुसार प्रत्येक मानव को नागरिकता प्राप्त होनी चाहिए अर्थात मानव को किसी न किसी राजनीतिक समुदाय का सदस्य बनना चाहिए|

    • अर्थात यह अवधारणा शरणार्थियों को किसी न किसी देश का नागरिक बनाए जाने पर बल देती है|


    1. विश्व नागरिकता- 

    • इसके अनुसार प्रत्येक मानव को विश्व की नागरिकता प्राप्त होनी चाहिए, अर्थात एक देश के नागरिकों को सभी देशों में कुछ निश्चित मानवीय अधिकार प्राप्त होने चाहिए| 

    • जैसे- भारतीय संविधान के भाग -3 में अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30 को छोड़कर सभी मौलिक अधिकार भारतीय नागरिकों के अलावा विदेशियों को भी प्राप्त है|


    1. क्षेत्रीय नागरिकता-

    • इस अवधारणा के अनुसार क्षेत्रीय स्तर की नागरिकता पर बल दिया जाता है| इसके लिए विश्व में विभिन्न क्षेत्रीय स्तर पर अधिकारों के घोषणा पत्र जारी किए गए हैं| जैसे- यूरोपीय अधिसमय (1950), अमेरिका अधिसमय (1954), हेलस्की समझौता (1975), अफ्रीकी अधिसमय (1982)|

    • यूरोपियन संघ ने 27 देशों को एकल नागरिकता या क्षेत्रीय नागरिकता प्रदान की है|


    1.  दोहरी नागरिकता- 

    •  इससे तात्पर्य है दो देशों की नागरिकता|



    औपचारिक नागरिकता और तात्विक नागरिकता-

    • किसी राष्ट्र-राज्य की सदस्यता प्राप्त होना ही औपचारिक नागरिकता है|

    • जबकि किसी राष्ट्र-राज्य के अंतर्गत पूर्ण सदस्यों को जो नागरिक, राजनीतिक और सामाजिक अधिकार प्राप्त होते हैं वह तात्विक नागरिकता के अंतर्गत आते हैं|


    T H मार्शल व तात्विक नागरिकता का विकास (समान और सार्वभौमिक नागरिकता का सिद्धांत)-


    • तात्विक नागरिकता के 3 पक्ष है-

    1. नागरिक अधिकार

    2. राजनीतिक अधिकार

    3. सामाजिक अधिकार


    • मार्शल ने अपनी कृति ‘Citizenship and Social Class’ 1950 में ब्रिटेन में हुए तात्विक नागरिकता के विकास को बताया है, जो निम्न है-


    1. नागरिक नागरिकता-

    • 18 वीं सदी में ब्रिटेन में नागरिक नागरिकता का विकास हुआ, जो नागरिक अधिकारों से जुड़ी हुई थी|

    • न्यायालय नागरिकों के नागरिक अधिकारों की रक्षा करते थे|

    • मार्शल के अनुसार नागरिक अधिकार- कानून के समक्ष समानता, दैहिक स्वतंत्रता, वाणी, विचार और आस्था की स्वतंत्रता, संपत्ति रखने और अनुबंध करने का अधिकार


    1. राजनीतिक नागरिकता-

    • 19वीं सदी में ब्रिटेन में राजनीतिक नागरिकता का विकास हुआ जो राजनीतिक अधिकारों से जुड़ी हुई थी|

    • प्रतिनिधि राजनीतिक संस्थाएं नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करती हैं|

    • मार्शल के अनुसार राजनीतिक अधिकार- चुनाव में भाग लेने का अधिकार और राजनीतिक सत्ता से जुड़ी हुई संस्थाओं में कार्य करने का अधिकार सम्मिलित है|


    1. सामाजिक नागरिकता-

    • 20वीं सदी में ब्रिटेन में सामाजिक नागरिकता का विकास हुआ, जो सामाजिक अधिकारों से जुड़ी हुई थी|

    • नागरिकों को सामाजिक कल्याणकारी सेवाएं तथा स्कूल (शिक्षा) समुचित सामाजिक अधिकार प्रदान करते है|

    • मार्शल के अनुसार सामाजिक अधिकार- निश्चित स्तर की आर्थिक और सामाजिक खुशहाली का अधिकार तथा सभ्यता और संस्कृति की धरोहर को दूसरे के साथ मिलजुलकर प्रयोग करने का अधिकार|



    कल्याणकारी राज्य सिद्धांत-

    • समर्थक- TH मार्शल 

    • समाजिक और आर्थिक अधिकार प्राय लोकतंत्रीय प्रणाली के अंतर्गत कल्याणकारी राज्य में प्रदान किए जाते हैं|

    • बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में ब्रिटेन में कल्याणकारी राज्य का उदय हुआ जो धीरे-धीरे अन्य लोकतंत्रीय देशों में भी लोकप्रिय हो गया|

    • विलियम बेवरिज की प्रसिद्ध बेवरिज रिपोर्ट 1942 के अनुसार लोक कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य पांच महा बुराइयों का अंत करना है-

    1. अभाव

    2. रोग

    3. दरिद्रता 

    4. अज्ञान

    5. बेकारी



    नागरिकता के सिद्धांत की समालोचना-

    1. नारीवादी समालोचना

    2. उपाश्रितवर्गीय समालोचना


    1. नारीवादी समालोचना-

    • समाज में स्त्रियों को पूर्ण नागरिकता प्राप्त हो जाने पर ही भी नागरिक जीवन में पराधीन बनी रहती हैं |

    • राजनीतिक सत्ता में स्त्रियों का हिस्सा बहुत कम है|

    • अंतरराष्ट्रीय राजनीति के क्षेत्र में तो स्त्रियों के प्रतिनिधित्व की दशा बहुत ही खराब है|


    1. उपाश्रितवर्गीय समालोचना-

    • केवल कानूनी या औपचारिक स्तर पर सब नागरिकों के समान अधिकारों की व्यवस्था कर देने से समाज के उपाश्रितवर्गों की स्थिति को सुधारने में कोई सहायता नहीं मिलती|

    • अर्थात जब तक उपाश्रित वर्ग को इंसानों की तरह जीने के लिए आवश्यक परिस्थितियां प्रदान नहीं की जाती, तब तक देश में पूर्ण नागरिकता के विकास पर गर्व करना व्यर्थ ही नहीं, भ्रामक भी होगा| 



    मातृक नागरिकता-

    • समर्थक- जीन एल्स्टन व सारा रुडिक

    • यह परवाह के नीतिशास्त्र पर आधारित है|

    • इनके अनुसार मातृत्व गुण महिलाओं को यह शिक्षा देता है कि वह जिंदगी को संरक्षण दे और असुरक्षित को सुरक्षा दे| मातृत्व के ऐसे गुणों को राजनीति व नागरिकता में स्थान देना चाहिए|



    निष्क्रिय नागरिकता (Passive Citizenship)-

    • समर्थक- रोमन सिद्धान्त, उदारवादी विचारक, टी. एच. मार्शल, हेयक, नोजिक, नव-दक्षिणपंथी (New Right) 

    • अन्य नाम- निजी नागरिकता, तटस्थ, न्यूनतम नागरिकता, उदारवादी नागरिकता 

    • व्यक्तिगत अधिकारों व निजी हितों पर बल

    • नागरिको द्वारा कर्तव्यों, दायित्वों और सार्वजनिक भागीदारी की बजाय व्यक्तिगत अधिकारों, निजी कल्याण और स्वहित पर बल 

    • प्राचीन रोम निष्क्रिय नागरिकता का श्रेष्ठ उदाहरण है, जहाँ नागरिकता को मुख्यतः कानूनी हैसियत के रूप में माना जाता था| 

    • इसमें नागरिक निजता सिंड्रोम पाया जाता है| 


    • नागरिक निजता सिंड्रोम-

    • निष्क्रिय नागरिकता में जब नागरिक सार्वजनिक मामलों के प्रति पूरी तरह उदासीन हो जाये और अपना ध्यान केवल परिवार, व्यक्तिगत योजनाओं और स्वार्थ तक सीमित कर ले| 

    • हेबरमास ने अपनी कृति Legitimation Crisis (1973) में इसे नागरिक निजतावाद कहा है| 

    • बर्जर (Berger) ने इसे ध्यान घाटे का लोकतंत्र (Attention Deficit Democracy) कहा है| 



    सक्रिय नागरिकता (Active Citizenship)-

    • समर्थक- यूनानी सिद्धान्त, अरस्तू, मैकियावली, रूसो, समुदायवादी, विमर्शी लोकतंत्रवादी, विलियम गैल्स्टेन, गांधीवादी दृष्टिकोण

    • अन्य नाम- गणतंत्रवादी नागरिकता या अरस्तुवादी नागरिकता 

    • अधिकारों के बजाय कर्तव्यों पर बल

    • सक्रिय सार्वजनिक सहभागिता, सामान्य शुभ (Common Good), नागरिक सद्गुण और उत्तम नागरिकता पर बल


    विलियम ग्लैस्टन-

    • पुस्तक- Liberal Purposes: Goods, Virtues and Diversity in the Liberal State 1991

    • गैलेस्टन ने एक उदारवादी राज्य में सक्रिय नागरिकता को बनाए रखने के लिए चार प्रकार के नागरिक सद्गुण बताये है-

    1. सामान्य सद्गुण- साहस, विधि का पालन, निष्ठा।

    2. सामाजिक सद्गुण

    3. आर्थिक सद्गुण

    4. राजनीतिक सद्गुण



    विभेदित नागरिकता की अवधारणा या समूह विभेदित नागरिकता -

    • समर्थक- आइरिस मैरियन यंग (मुख्य प्रवक्ता), विल किमलिका, भीखू पारेख, चार्ल्स टेलर

    • आइरिस यंग एक अमेरिकी राजनीतिक दार्शनिक और समाजवादी नारीवादी सिद्धांतकार थीं| 

    • यंग का दृष्टिकोण परमाण्विक व्यक्तिवाद तथा सामूहिक समुदायवाद के विकल्प के मध्य एवं उससे दूर संजातीय तथा सांस्कृतिक समूहों और उनकी विभिन्नता के अस्तित्व के सवाल को अधिक गंभीरता से उठाता है| 

    • विभिन्नता को नकारने के कारण यंग ने उदार व्यक्तिवाद और समुदायवाद दोनों की निंदा की|

    • यंग की विभेदित नागरिकता की अवधारणा पूर्ण रूप से व्यक्तिगत अधिकारों को समाप्त नहीं करती है, बल्कि व्यक्तिगत अधिकारों को वंचित समूह के सामूहिक अधिकारों के साथ संतुलन में लाने का प्रयास करती है|  

    • यंग वंचित समूह की राजनीति में आत्म प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर बल देती है| 


    • यंग शोषित अथवा वंचित समूहों के भिन्न मतों एवं दृष्टिकोणों की प्रभावी मान्यता व प्रतिनिधित्व के लिए लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में एक संस्थागत तंत्र पर बल देते हैं, जिसमें निम्न शामिल है- 

    1. समूह के सदस्यों का आत्म- संगठन

    2. संस्थापित संदर्भो में नीति प्रस्तावों का समूह विश्लेषण तथा समूह निर्माण 

    3. समूह वीटो शक्ति


    • यंग का सिद्धांत शोषित अथवा वंचित सामाजिक समूहों के विशिष्ट प्रतिनिधित्व की मांग करता है| 

    • यंग उत्पीड़न या दमन के पांच पहलुओं की पहचान करती है-

    1. शोषण (Exploitation)

    2. प्रभावहीनता (Marginalization)

    3. शक्तिहीनता (Powerlessness)

    4. सांस्कृतिक साम्राज्यवाद (Cultural imperialism)

    5. हिंसा (Violence)


    • विल किमलिका- समूह-समतावादी बहुसंस्कृतिवाद

    • भीखू पारेख- संवाद आधारित बहुसंस्कृतिवाद

    • चार्ल्स टेलर- मान्यता की राजनीति 



    बहुआयामी नागरिकता

    • समर्थक- हीटर 

    • हीटर का मत है कि भविष्य में नागरिकता केवल एक राज्य (देश) तक सीमित नहीं रहेगी।

    • व्यक्तियों को राज्य के ऊपर (जैसे वैश्विक या क्षेत्रीय) और राज्य के अधीन (स्थानीय) संस्थाओं की भी नागरिकता प्राप्त करनी होगी|  



    अर्ध-नागरिकता’ का सिद्धांत-

    • समर्थक- एलिजाबेथ कोहेन

    • कोहेन के अनुसार समाज में लोगों की कई श्रेणियाँ ऐसी होती हैं जो न तो पूर्ण नागरिक होती हैं और न ही उन्हें राजनीतिक रूप से पूरी तरह बहिष्कृत किया जाता है| 

    • कोहेन इन्हें अर्ध-नागरिक कहती हैं|

    • कोहेन का मत है कि अर्ध-नागरिकता की स्थिति एक अपवाद नहीं है, बल्कि यह दुनिया की हर लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का एक स्थायी और अपरिहार्य अंग है| 



    नागरिकता का विरोधाभास-

    • मार्शल के अनुसार नागरिकता प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार के साथ समान सामाजिक महत्व भी देती है|

    • यदि इस सिद्धांत को अपनाया जाए तो नागरिकता के पूंजीवाद के संबंधों में विरोधाभास और द्वैधताओं को बढ़ाता है|

    • मार्शल इसे नागरिकता का विरोधाभास मानते हैं, और उनका मत है कि इससे भविष्य में टकराव हो सकता है| 



    भारत में नागरिकता-

    • संविधान के भाग-2 में अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता के बारे में वर्णन है|

    • इसमें संविधान के लागू होने के समय (26 जनवरी 1950) नागरिक बने व्यक्तियों के बारे में उल्लेख है|

    • 26 जनवरी 1950 के बाद नागरिकता के बारे में उपबंध संसद विधि बनाकर निर्धारित कर सकती है|

    • इसके लिए संसद ने नागरिकता अधिनियम अधिनियम 1955 बनाया जिसमें 1986, 1992, 2003, 2005 मे संशोधन किया| 


    केवल नागरिकों को मिले अधिकार-

    • मौलिक अधिकार- अनुच्छेद 15, 16, 19, 29, 30

    • लोकसभा व राज्य विधानसभा के निर्वाचन के लिए मत देने का अधिकार (अनुच्छेद- 326)

    • संसद का सदस्य होने का अधिकार (अनुच्छेद- 84)

    • राज्य के विधानमंडल का सदस्य होने का अधिकार (अनुच्छेद 173) 


    निम्न पदों के लिए केवल नागरिक ही पात्र है-

    1. राष्ट्रपति [अनुच्छेद 58(1) (क)]

    2. उपराष्ट्रपति पद [अनुच्छेद  66 (3) (क)]

    3. उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश [अनुच्छेद  124 (3)]

    4. उच्च न्यायालय का न्यायाधीश [अनुच्छेद  217 (2)]

    5. महान्यायवादी [अनुच्छेद 76(2)]

    6. राज्यपाल [अनुच्छेद 157]

    7. महाधिवक्ता [अनुच्छेद 165]


    अनुच्छेद 5  संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता-

    • अनुच्छेद- 5 सविधान के प्रारंभ (26 जनवरी 1950) पर भारतीय नागरिकता के बारे में बताता है|

    • सविधान प्रारंभ पर एक व्यक्ति जो भारत में अधिवास करता है, निम्न में से एक शर्त पूरी करने पर भारत का नागरिक होगा-

    (क) जो भारत के राज्य क्षेत्र में जन्मा था| या 

    (ख) जिसके माता या पिता में से कोई भारत के राज्य क्षेत्र में जन्मा था| या

    (ग) जो संविधान लागू होने से ठीक पहले कम से कम 5 वर्ष तक भारत के राज्य क्षेत्र में मामूली तौर पर निवासी रहा है| 


    Note- अधिवास शब्द को संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है| मोहम्मद रजा बनाम बॉम्बे राज्य वाद 1966 में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि “स्थाई आवास तथा वहां अनिश्चितकाल के लिए रहने का इरादा अधिवास के दो प्रमुख तत्व हैं|”


    स्टेट ट्रेडिंग कार्पोरेशन ऑफ इंडिया बनाम CTO वाद 1963-

    • पद “व्यक्ति” केवल नैसर्गिक व्यक्तियों को शामिल करता है| यह किसी विधायी व्यक्ति जैसे कम्पनी, कार्पोरेशन इत्यादि को शामिल नहीं करता| 


    पृथ्वी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया वाद 1982-

    • पद “व्यक्ति” अनुच्छेद 33 के अधीन सशस्त्र बल के किसी सदस्य को भी शामिल करता हैं, परन्तु यह किसी कम्पनी या व्यक्तियों के संघ या समूह को चाहे निगमित हो या नहीं शामिल नहीं करता| 


    कादर अली बनाम असम राज्य वाद 1972- (गुवाहाटी उच्च न्यायालय का मामला)

    • किसी भारतीय का 1 मार्च 1947 से 26 जनवरी 1950 की कालावधि में नौकरी के लिए पाकिस्तान में प्रवजन का आशय नौकरी करके पाकिस्तान में स्थायी रूप से बसना है| अतः अनुच्छेद 5 के अधीन नागरिकता की शर्तें पूरी करते हुए भी ऐसा व्यक्ति अनुच्छेद 7 के अर्थों के अंतर्गत भारतीय नागरिक नहीं माना जाएगा|


    नगीना देवी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया 2010- (पटना उच्च न्यायालय का मामला)

    • अधिवास के आधार पर नागरिकता के लिए यह आवश्यक है कि संविधान के लागू होने के समय व्यक्ति का भारत में अधिवास रहा हो|



    अनुच्छेद- 6  पाकिस्तान से भारत को प्रवजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार-

    • अनुच्छेद 6 संविधान प्रारंभ पर पाकिस्तान से भारत आने वाले व्यक्तियों के लिए नागरिकता के प्रावधान करता है|

    • ऐसा व्यक्ति जिसका स्वयं, माता या पिता में कोई, दादा या दादी या नाना या नानी में कोई का अविभाजित भारत (भारत शासन अधिनियम 1935 में परिभाषित भारत) में जन्म हुआ हो, दो शर्तों पर भारत का नागरिक बन सकता है-

    1. यदि वह 19 जुलाई 1948 से पहले भारत आया था तथा आने की तारीख से भारत के राज्यक्षेत्र में मामूली तौर से निवासी रहा है तो संविधान के प्रारंभ पर भारत का नागरिक समझा जाएगा|

    2. यदि वह 19 जुलाई 1948 को या इसके बाद भारत आया हो व नागरिकता प्राप्ति के लिए पंजीकरण करा लिया हो तथा सम्बंधित अधिकारी द्वारा भारत का नागरिक पंजीकृत कर लिया हो, तो भारत का नागरिक समझा जाएगा| 


    लेकिन पंजीकरण आवेदन के लिए कम से कम 6 माह तक (पंजीकरण आवेदन से पहले) भारत में निवास आवश्यक है, नहीं तो पंजीकृत नहीं किया जायेगा|



    अनुच्छेद- 7     पाकिस्तान को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार- 

    • यह अनुच्छेद पाकिस्तान को जाने वाले व्यक्तियों की नागरिकता के बारे में प्रावधान करता है|

    • इस अनुच्छेद अनुसार यदि व्यक्ति 1 मार्च 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान चला जाता है, तो भारत का नागरिक नहीं रहेगा, चाहे अनुच्छेद 5 व अनुच्छेद 6 की शर्तें पूरी करता हो|


    • परंतु इस अनुच्छेद की कोई बात ऐसे व्यक्ति पर लागू नहीं होगी जो पाकिस्तान जाने के पश्चात भारत में पुनर्वास के लिए या स्थाई रूप से लौटने के लिए किसी अनुज्ञा के अधीन (जो विधि के प्राधिकारी द्वारा या उसके अधीन जारी की गयी है) लौट आया हो, इस सम्बन्ध में ऐसा माना जाएगा कि उसने अनुच्छेद 6 के खंड (ख) के तहत 19 जुलाई 1948 के पश्चात प्रव्रजन किया है|



    अनुच्छेद- 8      भारत के बाहर रहने वाले भारतीय उद्भव के कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार-

    • यह अनुच्छेद भारत से बाहर रहने वाले भारतीय उद्भव के व्यक्तियों के नागरिकता अधिकार के बारे में प्रावधान करता है|

    • ऐसा व्यक्ति जिसका स्वयं का या माता या पिता में कोई अथवा दादा या दादी में कोई या नाना-नानी में कोई एक का जन्म अविभाजित भारत (भारत शासन अधिनियम 1935 में परिभाषित भारत) में हुआ हो तथा वह स्वयं भारत शासन अधिनियम 1935 में परिभाषित भारत से बाहर रह रहा हो| संविधान प्रारंभ से पहले या बाद में जिस देश में निवास कर रहा है, वहां वह भारत के राजनयिक या कौसलीय प्रतिनिधि के पास पंजीकरण के लिए आवेदन करता है तथा राजनयिक या कौसलीय प्रतिनिधि के द्वारा उसको भारत का नागरिक रजिस्ट्रीकृत कर लिया जाता है, तो वह भारत का नागरिक समझा जाएगा| 



    अनुच्छेद- 9     विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित करने वाले व्यक्तियों का नागरिक न होना- 

    • यह अनुच्छेद दूसरे देश की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित करने वाले व्यक्तियों के नागरिकता के प्रावधान करता है| 

    • यदि किसी व्यक्ति ने दूसरे देश की नागरिकता स्वेच्छा से ग्रहण कर ली है तो वह अनुच्छेद 5, अनुच्छेद 6, अनुच्छेद 8, के आधार पर भारत का नागरिक नहीं समझा जाएगा| 



    अनुच्छेद- 10    नागरिकता के अधिकारों का बना रहना- 

    • प्रत्येक व्यक्ति जो अनुच्छेद 5, 6, 7, 8, 9 के अंतर्गत भारत का नागरिक है या समझा जाता है, संसद के द्वारा बनायी गयी विधियों के अधीन रहते हुए ही भारत का नागरिक बना रहेगा|



    अनुच्छेद- 11  संसद द्वारा नागरिकता के अधिकार का विधि द्वारा विनियमन किया जाना- 

    • नागरिकता के अर्जन व समाप्ति के संबंध में कानून/ विधि बनाने का अधिकार संसद को है|

    • अनुच्छेद 5, 6, 7, 8, 9, 10 के उपबंध संसद की शक्ति (नागरिकता संबंधी) का अल्पीकरण नहीं करेंगे|


    Note- 

    1. नागरिकता के अधिकार को संसद द्वारा पारित विधि के अलावा अन्य किसी रीति से नहीं छीना जा सकता|- इब्राहिम वजीर बनाम स्टेट ऑफ बॉम्बे, वाद 1952

    2. भारतीय विधि में एकमात्र अधिवास की व्यवस्था है और वह है भारत का अधिवास|- प्रदीप बनाम स्टेट ऑफ यूनियन 1989



    नागरिकता अधिनियम- 1955

    • यह अधिनियम नागरिकता की समाप्ति और नागरिकता के अर्जन के बारे में बताता है| जो निम्न है-


    1. नागरिकता का अर्जन- नागरिकता की प्राप्ति के पांच आधार/ शर्तें हैं-

    1. जन्म से नागरिकता-

    • प्रत्येक व्यक्ति जिसका जन्म 26 जनवरी 1950 को या उसके बाद भारत में हुआ है (चाहे माता- पिता भारतीय न हो) तो वह भारत का नागरिक होगा|

    • 3 दिसंबर 2004 के बाद भारत में जन्मे व्यक्ति (माता-पिता दोनों या दोनों में से एक भारत का नागरिक हो तथा दूसरा अवैध प्रवासी न हो) तब ही भारत का नागरिक माना जाएगा|

    • Note- भारत में पदस्थ विदेशी राजनयिक एवं शत्रु देश के बच्चों को भारत की नागरिकता अर्जन का अधिकार नहीं है|


    1.  वंश/ अवजनन के आधार पर नागरिकता- 

    • 26 जनवरी 1950 को या उसके बाद भारत के बाहर पैदा हुआ व्यक्ति भी वंश के आधार पर भारत का नागरिक बन सकता है यदि उसके जन्म के समय माता या पिता में से कोई भी भारतीय हो|


    1. पंजीकरण के द्वारा-

    • ऐसे भारतीय मूल के व्यक्ति जो भारत में मामूली तौर पर निवासी हो तथा

    • वे स्त्रियां जो भारत के किसी नागरिक से विवाह कर लेती हैं पंजीकरण के द्वारा भारतीय नागरिक बन सकते/ सकती है|


    1. प्राकृतिक रूप से/ देशीयकरण के द्वारा-

    • ऐसा विदेशी व्यक्ति जो भारत में रहने का इच्छुक है तथा उस देश की नागरिकता त्यागता है तो वह आवेदन करके प्राकृतिक रूप से भारत का नागरिक बन सकता है|


    1. राज्य क्षेत्र में मिल जाने पर नागरिकता-

    • कोई अन्य राज्य क्षेत्र भारत का भाग बन जाता है तो उस क्षेत्र के व्यक्तियों को संसद विधि बना कर भारत का नागरिक घोषित कर सकती हैं|

    • उदाहरण- नागरिकता पांडिचेरी आदेश- 1992


    1. नागरिकता की समाप्ति-

    • नागरिकता अधिनियम 1955 के अनुसार नागरिकता समाप्ति के तीन आधार है-

    1. स्वैच्छिक त्याग- स्वेच्छा से पूर्ण आयु प्राप्त व्यक्ति भारत की नागरिकता त्याग सकता है|

    2. बर्खास्तगी के द्वारा- जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे देश की नागरिकता स्वेच्छा से ग्रहण कर लेता है तो उसकी नागरिकता बर्खास्त हो जायेगी|

    3. वंचित करना- निम्न मामलों में किसी व्यक्ति को नागरिकता से वंचित किया जा सकता है-

    1. नागरिकता फर्जी तरीके से प्राप्त कर लेता है|

    2. संविधान के प्रति अनादर जताता है|

    3. युद्ध के दौरान शत्रु को राष्ट्र विरोधी सूचना देता है|

    4. भारत के बाहर 7 वर्ष से रह रहा हो (छात्रों पर लागू नहीं)

    5. पंजीकरण कराने के 5 वर्ष के दौरान किसी दूसरे देश में 2 वर्ष की सजा हो गयी हो|


    Note- भारत में एकल नागरिकता अपनायी गयी है अर्थात भारतीय नागरिकता| 















    शक्ति (Power)


    शक्ति का अर्थ-

    • अंग्रेजी में Power 

    • Power शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा Potere से

    • Potere का अर्थ- ‘योग्य के लिए’ अर्थात निहित योग्यता’


    • भिन्न भिन्न विचारको ने शक्ति के अलग-अलग अर्थ बताएं हैं| शक्ति की कोई सर्वसहमत परिभाषा नहीं मिलती है| इस संबंध में स्टीवन ल्यूकस ने लिखा है कि वस्तुतः शक्ति की संकल्पना विवाद का विषय रही है|


    हम शक्ति को अनेक अर्थो में परिभाषित कर सकते हैं जो निम्न है-


    1. शक्ति निहित योग्यता है-

    • शुमैन “शक्ति लोगों को नियंत्रित एवं प्रभावित करने की योग्यता है|”

    • मार्गेंथाऊ “राजनीति के संदर्भ में शक्ति का अर्थ है मनुष्य की शक्ति, जो दूसरे मनुष्यों के मस्तिष्क एवं कार्य के ऊपर हो|”

    • डहल “शक्ति किन्ही पात्रों के बीच वह संबंध है जिसके द्वारा एक पात्र, अन्यो को विशेष प्रकार के व्यवहार के लिए बाध्य करें, अन्यथा वे उस विशेष प्रकार का व्यवहार न करते|

    • लॉसवेल तथा कैप्लान “योग्यता के रूप में शक्ति, अन्य लोगों पर प्रत्यक्ष प्रकार के प्रभाव को कहते है|”

    • ईस्टन “शक्ति उस संबंध को कहते हैं, जिसमें एक व्यक्ति अथवा एक समूह, दूसरों के कार्यों को इस प्रकार निश्चित करता है कि जिसमें वे अपने उद्देश्यो की प्राप्ति कर सकें|”

    • जॉर्ज कैटलिन “अपने संकल्प को कार्यान्वित करने की सामान्य इच्छा ही शक्ति होती है|” 


    • इस प्रकार शक्ति का मूल उद्देश्य लोगों को नियंत्रित करना होता है तथा शक्ति एक पक्षीय न होकर द्विपक्षीय है|


    1. शक्ति व राजनीति में घनिष्ठ संबंध है- 

    • केटालिन “राजनीति, ‘शक्ति का विज्ञान’ है|”

    • लॉसवेल “एक अनुभवी समाजशास्त्र के रूप में राजनीति विज्ञान, शक्ति के निरूपण व प्रयोग का अध्ययन है|”

    • बियरस्टेड “शक्ति समाज की मौलिक व्यवस्था का आधार है जहां कहीं सुव्यवस्था है, वहां शक्ति का अस्तित्व अवश्य होता है|”

    • हेराल्ड लासवैल “राजनीति का सरोकार शक्ति को संवारने और मिल-बांटकर उसका प्रयोग करने से है|”

    • रॉबर्ट डहल “राजनीति में शक्ति, शासन, सत्ता का विस्तृत प्रयोग किया जाता है|

    • माइकल कर्टिस “राजनीति का अर्थ शक्ति और उसके प्रयोग के बारे में व्यवस्थित विवाद है, इसके अंतर्गत प्रतिस्पर्धी मूल्यो, विचारों, व्यक्तियों, हितों और मांगों में से किसी न किसी का चयन करना होता है|


    1. शक्ति बल व हिंसा है-

    • डेविड ह्यूम ने अपने लेख ‘Of the Original Contract’ 1748 में शक्ति को बल व हिंसा दोनों से जोड़ा है| 

    • ह्यूम के मत में राजनीति ‘सभी प्रकार के सरकारी बल व हिंसा की प्राप्ति पर आधारित है, जिसमें किसी सहमति अथवा लोगों की स्वीकृति आदि का कोई स्थान नहीं होता|


    • Note- सरकार द्वारा बल व हिंसा का प्रयोग कानूनी दायरे में रहकर किया जाता है|


    1. शक्ति दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता है-

    • मैक्स वेबर “शक्ति का अर्थ किसी सामाजिक संबंध के अंतर्गत एक कर्ता के द्वारा दूसरों की इच्छा के विरुद्ध अपनी इच्छा को कार्यान्वित करने की संभावना|”

    • आर.एम. मैकाइवर “ शक्ति किसी भी संबंध के अंतर्गत ऐसी क्षमता है जिसमें दूसरों से कोई काम लिया जाता है या आज्ञापालन कराया जाता है|”

    • बर्टेंड रसेल “शक्ति मनचाहा प्रभाव पैदा करना है|”

    • बर्ट्रेंड रसेल “शक्ति समाज की आधारभूत व्यवस्था (Order) का सहारा है| जहाँ कहीं सभ्यता है, वहाँ शक्ति का अस्तित्व अवश्य पाया जाता है| 


    • Note- शक्ति की चिर-प्रचलित अवधारणा के अनुसार शक्ति का अर्थ- दूसरों के ऊपर प्रयुक्त शक्ति या दूसरों पर नियंत्रण की क्षमता| परंतु समकालीन सामाजिक चिंतन के अंतर्गत शक्ति का अर्थ कुछ करने की क्षमता या योग्यता है|


     कुछ अन्य विद्वानों द्वारा शक्ति का अर्थ-

    • थॉमस हॉब्स ने शक्ति को वर्तमान के उन साधनो को बताया है जिससे भविष्य में कुछ प्राप्त किया जा सकता है|

    • हन्ना एरेंट (ऑन वॉयलेंस) ने शक्ति को न केवल कुछ करने की मानवीय योग्यता बताया है बल्कि लोगों द्वारा एक साथ कुछ करने की योग्यता है|

    • हन्ना पिटकिन (ओबलीगेशन एंड कांसैट) “शक्ति कुछ करने की योग्यता, क्षमता है- शक्ति क्षमता, योग्यता, साधन है|”

    • माइकल मान (The Sources of Social Power, 1986) शक्ति को सामाजिक शक्ति कहते हैं|”

    • गिडिन्स (द कांस्टीट्यूशन ऑफ़ सोसाइटी) शक्ति को समाज की संगठनीय संपत्ति अर्थात सामाजिक भागीदारी कहता है|



    शक्ति क्या नहीं है-

    1. शक्ति बल नहीं है- शक्ति का रूप सदैव सामाजिक होता है, परंतु बल गैर-सामाजिक तत्व है|

    2. शक्ति वीरता नहीं है- वीरता अपने रूप में वैयक्तिक होती है, जबकि शक्ति का रूप सामूहिक होता है|

    3. शक्ति सत्ता नहीं है- सत्ता शक्ति का स्रोत है, जबकि शक्ति सत्ता से निकलती है|

    4. शक्ति हिंसा नहीं है- हिंसा में बल होता है, यातना होती है, उत्पीड़न होता है, जो प्राय गैर कानूनी होता है| जबकि शक्ति कानून के दायरे में बल प्रयोग करती हैं|



    शक्ति सकारात्मक भी है तथा नकारात्मक भी है-

    • नकारात्मक शक्ति- इसका संबंध व्यक्ति की उस क्षमता से है जो अन्यो से वह कुछ करवा लेता है जो अन्यथा वह लोग नहीं करते हैं| शक्ति का यह रूप उदारवादी परंपरा से जुड़ा है तथा व्यक्ति के पास शक्ति के प्रयोग का अधिकार होता है|

    • सकारात्मक शक्ति- यह कुछ करने की शक्ति है| यह अपने व्यक्तित्व को विकसित करने की क्षमता है|



    शक्ति के आधार-

    • जॉन आर. पी. फ्रेंच जूनियर व बर्ट्राम रेवेन (The Bases of Social Power 1959) ने शक्ति के 5 आधार बताएं है-

    1. वैधपूर्ण शक्ति (Legitimate Power)- यह शक्ति वह शक्ति है, जो व्यक्ति को किन्ही दायित्वो को निभाने के बदले में प्राप्त होती हैं|

    2. निर्देश्य शक्ति या संदर्भ शक्ति (Referent Power)- निर्देश्य शक्ति व्यक्ति द्वारा दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करने तथा निष्ठा बनाने से पनपती है| यह व्यक्ति को उसके करिश्माई व्यक्तित्व के कारण प्राप्त होती है|

    3. सुविज्ञ शक्ति या विशेषज्ञ शक्ति (Expert Power)- यह व्यक्ति को उसकी निपुणता के फलस्वरूप प्राप्त होती है, क्योंकि एक व्यक्ति अपनी बुद्धि, योग्यता, सुविज्ञाता के फलस्वरुप एक विशेषज्ञ बन जाता है|

    4. पारितोषिक शक्ति (Reward Power)- यह शक्ति व्यक्ति को अन्य लोगों को पुरस्कार के रुप में कुछेक सुविधाएं दिए जाने के बदले प्राप्त होती है| ऐसी शक्ति रखने वाले व्यक्ति की लोग आज्ञा पालन इसलिए करते हैं, क्योंकि या तो उन्हें कुछ प्राप्त होगा या उन्हें वंचित होना पड़ेगा|

    5. अवपीड़क शक्ति या दंडात्मक शक्ति (Coercive Power)- यह एक ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को किसी चीज या सुविधा के लिए वंचित करता है या दंड देता है|



    शक्ति के लक्षण-

    1. ‘शक्ति’ संकल्पना विवादास्पद है, क्योंकि इसके संबंध में विद्वान एकमत नहीं है|

    2. यह लोगों के बीच विद्यमान संकल्पना है|

    3. शक्ति द्विपक्षीय, सापेक्ष व सम्बन्धात्मक होती है अर्थात शक्ति का पता केवल तुलना से ही चलता है| 

    4. यह संकल्पना समूह विशेष को साकार स्थिति प्रदान करती हैं| जैसे- परिवार मे पिता-पुत्र की स्थिति, कक्षा में अध्यापक- छात्र की स्थिति, राज्य में शासक-शासित की स्थिति|

    5. शक्ति के प्रयोग में उच्च-अधीनस्थ सम्बन्ध (Superior-Subordinate Relationship) का वर्गीकरण स्वाभाविक है| 

    6. यह संकल्पना कानूनरत, औपचारिक, अवैयक्तिक होती है|

    7. शक्ति संकल्पना राज्य से जुड़ी होने के कारण कुछ प्रदान करती हैं, जैसे- सुविधाएं तथा कुछ से वंचित भी करती हैं, जैसे- कानून की अवहेलना पर दंड देना|

    8. राजनीतिक शक्ति मुख्यतः मनोवैज्ञानिक शक्ति है, न कि केवल भौतिक या शारीरिक शक्ति

    9. शक्ति की अभिव्यक्ति कानूनों में होती है|

    10. यह उद्देश्य आधारित होती है|

    11. शक्ति नियंत्रण को जन्म देती है जैसे दूसरों पर नियंत्रण|

    12. शक्ति सामान्यतः Zero Sum Game (शून्य योग खेल) और Non-Zero Sum Game (गैर-शून्य योग खेल) दोनों आधारों पर कार्य करती है| जैसे-

    1. अनुभागीय शक्ति (Sectional Power)- यह विषम (Asymmetrical) और Zero Sum संबंधों पर आधारित रहती है|

    2. गैर- अनुभागीय शक्ति (Non-Sectional Power)- यह Non-Zero Sum पर आधारित है| 



    शक्ति के विविध आयाम-

    • शक्ति के तीन आयाम है-

    1. राजनीतिक शक्ति

    2. आर्थिक शक्ति

    3. विचारधारात्मक शक्ति


    1. राजनीतिक शक्ति-

    • इसमें नीतियां व कानून बनाने, कानूनों को लागू करने, कर लगाने और वसूल करने, किसी वर्ग को आर्थिक सहायता प्रदान करने, किसी वर्ग का कोई दायित्व निर्धारित करने, कानून की अवहेलना करने वाले को दंड देने की शक्ति शामिल की जाती है|

    • राजनीतिक शक्ति के उपकरण- पुलिस, न्यायालय, कारागृह, सैन्य शक्ति


    1. आर्थिक शक्ति-

    • इसका अर्थ है- धन संपदा, उत्पादन के साधनों या अन्य दुर्लभ संसाधनों के बल पर निर्धन लोगों या निर्धन राष्ट्रों पर नियंत्रण स्थापित करने की शक्ति|


    1. विचारधारात्मक शक्ति-

    • इस शक्ति से अभिप्राय हैं, किसी विचारधारा के बल पर लोगों के सोचने-समझने के ढंग को प्रभावित करने की शक्ति| 

    • विचारधारात्मक शक्ति किसी शासन या व्यवस्था को लोगों की दृष्टि में उचित ठहराती हैं, इसे वैधता प्रदान करती हैं|

    • किसी भी समाज में शासक वर्ग सर्वोत्तम शासन प्रणाली के बारे में कुछ विचारों को बढ़ावा देते हैं, जिन्हें हम राजनीतिक विचारधारा कहते हैं|



    शक्ति की संरचना या शक्ति के दृष्टिकोण-


    1. परम्परागत एवं यथार्थवादी दृष्टिकोण (Traditional & Realist Approach)-

    • समर्थक- थ्यूसीडाइड्स, कौटिल्य, मैकियावेली, थॉमस हॉब्स, हेगेल, नीत्शे, मॉर्गेन्थाऊ 

    • राज्य की सर्वोच्चता और उसके स्थायित्व पर बल

    • शक्ति राज्य के अस्तित्व की अनिवार्य शर्त 

    • शक्ति के पूर्ण केन्द्रीकरण, तार्किक प्रयोग पर बल 


    • थ्यूसीडाइड्स- 

    • ग्रीक विचारक

    • कृति- The Peloponnesian War

    • प्रथम यथार्थवादी विचारक 

    • शक्ति का विश्लेषण तत्कालीन ग्रीक नगर-राज्यों के आपसी संघर्षों के संदर्भ में किया

    • अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की ‘यथार्थवादी संकल्पना’ (Realist Concept) का जनक 

    • थ्यूसीडाइड्स “मानव की प्रकृति में ही शक्ति की अत्यधिक चाहत होती है, जिसके कारण प्रत्येक नगर-राज्य सर्वशक्तिमान बनना चाहता है और जिसका अंतिम परिणाम युद्ध (War) होता है|”


    • कौटिल्य- 

    • भारतीय राजनीतिक चिंतन में राज्य के संचालन और सुरक्षा के लिए ‘दण्ड-शक्ति’ के प्रयोग पर बल दिया है| 


    • निकोलो मैकियावेली-

    • आधुनिक युग में सर्वप्रथम शक्ति के यथार्थवादी महत्व को मैकियावेली ने ही प्रतिपादित किया है| 


    • थॉमस हॉब्स-

    • हॉब्स ने अपनी प्रसिद्ध कृति लेवियाथन में राज्य को असीमित शक्ति प्रदान की है| 


    • हेगेल-

    • हेगेल ने राष्ट्र-राज्य की शक्ति पर बल दिया है| 

    • राज्य की सर्वोच्चता का समर्थन किया।

    • हेगेल ने ‘जर्मन राष्ट्र-राज्य’ को शक्ति का साक्षात् रूप माना है| 


    • नीत्शे-

    • नीत्शे ने राजनीति और मानव जीवन में शक्ति के महत्व पर अत्यधिक बल दिया है| 


    Will to Power (शक्ति की इच्छा)-

    • नीत्शे की अवधारणा 

    • नीत्शे के अनुसार, मनुष्य में केवल जीवित रहने या सुख प्राप्त करने की इच्छा ही नहीं होती, बल्कि अपनी शक्ति, क्षमता, प्रभाव और आत्म-विकास को बढ़ाने की प्रवृत्ति भी होती है| 


    • मॉर्गेन्थाऊ-

    • आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के यथार्थवादी विचारक 

    • कृति- Politics Among Nations: The Struggle for Power and Peace (1948) 


    1. वर्ग प्रभुत्व का सिद्धांत-

    • समर्थक- कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, एंटोनियो ग्राम्शी, व्लादिमीर लेनिन, कार्ल काउत्स्की, रोजा लक्जमबर्ग, जार्ज ल्यूकाच

    • यह सिद्धांत मूलत: मार्क्सवाद की देन है| 

    • इस सिद्धांत की व्याख्या निम्न प्रकार से की जा सकती है-

    1. आर्थिक शक्ति राजनीतिक शक्ति का आधार है-

    2. शक्ति के संगठन का एक रूप वर्ग है-

    3. शासक वर्गों का प्राधान्य बुर्जुआ समाज की दृढ़ता का मुख्य स्रोत है- 


    1. आर्थिक शक्ति राजनीतिक शक्ति का आधार है-

    • समाज में जिसके पास आर्थिक शक्ति होती है वहीं राजनीतिक शक्तियों का प्रयोग करता है| आर्थिक शक्ति के आधार पर समाज दो वर्गों में बट जाता है-

    1. धनवान वर्ग या संपत्तिशाली वर्ग 

    2. निर्धन वर्ग या सम्पत्तिहीन वर्ग 


    • धनवान वर्ग अपनी आर्थिक शक्ति को सुदृढ़ करने के लिए राजनीति, कानून, अधिकारीतंत्र, न्यायालय इत्यादि का अविष्कार करता है और वैधता प्रदान करने के लिए नैतिकता और विचारधारा का सहारा लेता है|


    1. शक्ति के संगठन का एक रूप वर्ग है-

    • मार्क्सवाद के अंतर्गत ‘वर्ग की संकल्पना’ शक्ति के संगठन के रूप में की गई है| 

    • द जर्मन आईडियोलॉजी में कार्ल मार्क्स ने लिखा है कि “वर्ग अपने आप में बुर्जुवा समाज की उपज है|”

    • कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो में मार्क्स ने लिखा है कि “अब तक के सारे समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास है|”


    • जर्मन मार्क्सवादी कार्ल कॉट्स्की ने वर्ग, व्यवसाय और हैसियत की चर्चा करते हुए यह तर्क दिया कि ‘कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो’ के अंतर्गत जिन वर्ग संघर्षों का उल्लेख किया है, उनमें से बहुत सारे हैसियत समूहो के परस्पर संघर्ष थे|

    • ‘कैपिटल’ खंड तीन (1894) के अंतर्गत मार्क्स ने कहा है कि आदिम साम्यवाद के विलय के बाद जो भी व्यवस्थाएं अस्तित्व में आई, उन सब में समाज दो वर्गों में बंटा था - 

    1. उत्पादन के साधनों के स्वामी

    2. प्रत्यक्ष उत्पादनकर्ता|


    1. शासक वर्गों का प्राधान्य बुर्जुआ समाज की दृढ़ता का मुख्य स्रोत है- 

    • बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध में ग्राम्शी ने प्राधान्य का सिद्धांत दिया| 

    • एंटोनियो ग्राम्शी इटालवी मार्क्सवादी थे| 

    • इन्होंने तर्क दिया कि बुर्जुआ समाज केवल आर्थिक शक्ति के बल पर शासन नहीं करता, बल्कि उसकी विचारधारात्मक शक्ति भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है| 

    • विचारधारा के अंतर्गत बुर्जुआ समाज का शासक वर्ग अपने हितों से जुड़े मूल्यों और मान्यताओं को शिक्षा, धर्म और प्रचार के माध्यम से लोगों की आस्था का विषय बना देता है| 

    • अतः लोग उसके शासन की वैधता को मन से स्वीकार कर लेते हैं तथा विरोध नहीं करते हैं|


    1. विशिष्ट वर्गवादी या अभिजन सिद्धांत-

    • समर्थक- परम्परावादी अभिजनवादी, बहुलवादी अभिजनवादी 

    • इस सिद्धांत के अनुसार किसी भी समाज या संगठन के अंतर्गत सारे महत्वपूर्ण निर्णय इने-गिने लोग ही करते हैं बाकि केवल उनका अनुसरण करते हैं| 


    • इस दृष्टि से समाज दो भागों में बटे रहते हैं- 

    1. विशिष्ट वर्ग (Elites)

    2. जनसाधारण या जनपूंज (Masses)


    • विशिष्टवर्ग ही शक्ति का प्रयोग करता है जो अल्पसंख्यक होता है| जनपूंज के ऊपर शक्ति का प्रयोग किया जाता है,जो बहुसंख्यक होते हैं|


    • परम्परावादी अभिजनवादी- विल्फ्रेडो परेटो, मोस्का, रॉबर्ट मिशेल्स, जोस ऑर्टेगा वाई गैसेट 


    • विल्फ्रेडो पैरेटो-

    • पुस्तक- Mind and Society 1935 

    • पैरेटो “इतिहास, कुलीनों का कब्रिस्तान है|”

    • अभिजन सिद्धांत (Elite Theory)- समाज में शक्ति और शासन का नियंत्रण मुख्यतः अल्पसंख्यक अभिजन वर्ग के हाथों में रहता है|  

    • शेर और लोमड़ी (Lions and Foxes)- परेटो ने अभिजन वर्ग के दो प्रकार बताए है- 

    1. शेर- जो ताकत और बल प्रयोग से सत्ता बनाए रखते हैं|

    2. लोमड़ी- जो सहमति और चालाकी से शासन करते हैं| जैसे- उद्यमी, कलाकार और नवोन्मेषी लोग| 


    • मोस्का- The Ruling Class 1939


    • रॉबर्ट मिशेल्स- 

    • पुस्तक- Political Parties: A Sociological Study of the Oligarchical Tendencies of Modern Democracy

    • प्रमुख विचार- “अल्पतंत्र का लौह नियम” (Iron Law of Oligarchy)


    • बहुलवादी अभिजनवादी- सी. राइट मिल्स, मैक्स वेबर, जोसेफ शुम्पीटर, एंथनी डाउन्स


    • सी. राइट मिल्स (C. Wright Mills):

    • पुस्तक- The Power Elite (1956)

    • मिल्स ने अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आलोचनात्मक अध्ययन किया 

    • मिल्स के अनुसार अमेरिका में व्यापारी वर्ग, राजनीतिक वर्ग, सैन्य वर्ग मिलकर एक ऐसा अभिजन वर्ग बनाते हैं, जो सम्पूर्ण सत्ता को अपने हितों में नियंत्रित करता है| 


    • मैक्स वेबर-

    • पुस्तक- Politics as a Vocation 1919 

    • इन्होने राजनीति को व्यवसाय माना है| 

    • इनके अनुसार लोकतंत्र राजनीतिक नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धा है| 


    • जोसेफ शुम्पीटर- 

    • पुस्तक- Capitalism, Socialism and Democracy (1942) 


    • एंथनी डाउन्स- 

    • पुस्तक- An Economic Theory of Democracy 1957 


    1. नारीवादी सिद्धांत-

    • समर्थक- बेट्टी फ्रीडन, सिमोन द बुआर, केट मिलेट, जीन बेथके एल्शटेन आदि 


    • इस सिद्धांत की मान्यता है कि समाज में लिंग के आधार पर शक्ति का विस्तृत प्रयोग किया जाता है| इस कारण इस दृष्टिकोण को लिंग परिप्रेक्ष्य की संख्या दी जाती है|

    • यह सिद्धांत पितृतंत्र को समाज व्यवस्था का प्रधान लक्षण मानता है|

    • यह सिद्धांत पुरुष प्रधान समाज के प्रति विद्रोह का शंखनाद है| 

    • इस सिद्धांत के अनुसार स्त्रियां एक उत्पीड़क वर्ग है| पुरुषों द्वारा यह उत्पीड़न न केवल सामाजिक जीवन में किया जाता है, बल्कि घरेलू कार्यों, योन संबंधों आदि सभी क्षेत्रों में किया जाता है|

    • यह सिद्धांत स्त्रियों को एक भगिनी-समाज के रूप में संगठित होने की प्रेरणा देता है| 

    • इसके अनुसार स्त्रियां चाहे धनी हो या निर्धन हो, उच्च जाति की हो या निम्न जाति की, श्वेत हो या अश्वेत- इन सब अंतरों को भुलाते हुए स्त्रियों को पुरुषों के विरुद्ध एकजुट हो जाना चाहिए, और अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष करना चाहिए|

    • नारीवादियों का मत है कि राजनीति का सरोकार केवल सार्वजनिक जीवन तक ही नहीं बल्कि घरेलू और व्यक्तिगत जीवन से भी होना चाहिए|



    1. बहुलवादी सिद्धांत-

    • समर्थक- आर्थर बेंटले, डेविड ट्रूमैन, वी. ओ. की जूनियर, G विल्सन

    • शक्ति के बहुलवादी सिद्धांत अनुसार समाज में सारी शक्ति किसी एक वर्ग या विभाग के हाथ में केंद्रित नहीं रहती, बल्कि शक्ति अनेक समूहों में बटी रहती है|

    • आर्थर बेंटले- The Process of Government (1908)

    • डेविड ट्रूमैन- The Governmental Process (1951)

    • वी. ओ. की जूनियर- Politics, Parties and Pressure Groups 


    • ‘व्हाइटहॉल बहुलतावाद’ (Whitehall Pluralism)-

    • G विल्सन की अवधारणा अमेरिका के सम्बन्ध में, शक्ति फैलाव की अवधारणा 

    • यदि सरकार का कोई एक विभाग किसी विशेष समूह के हितों की अनदेखी करता है, तो दूसरे विभागों का इस मुद्दे पर अपना अलग दृष्टिकोण और नियंत्रण हो सकता है| 



    1. शक्ति का रचनात्मक सिद्धांत- 

    • समर्थक- हन्ना आरेंट, C B मैक्फर्सन, टाल्कॉट पार्सन्स 

    • जहा शक्ति का परंपरागत सिद्धांत शक्ति को दूसरों पर बल प्रयोग करना या दूसरों को अपने स्वार्थ की पूर्ति का साधन बनाने की क्षमता मानता है|

    • वही शक्ति का रचनात्मक सिद्धांत शक्ति को कुछ करने की क्षमता मानता है| इसके अनुसार शक्ति से अभिप्राय अपनी इच्छा और उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अपेक्षित भौतिक और मानवीय संसाधनों तक पहुंच और उसका प्रयोग करने की क्षमता है|


    • हन्ना आरेंट-

    • जर्मन यहूदी महिला हन्ना आरेंट ने शक्ति की रचनात्मक परिभाषा देने का प्रयत्न किया है|  


    हिंसा और शक्ति में अंतर-

    • इन्होंने अपनी कृति On Violence 1969 में हिंसा और शक्ति में अंतर किया है| 

    • जब शासक जनसाधारण की इच्छा के विरुद्ध अपना प्रयोजन सिद्ध करने के लिए बल प्रयोग करते हैं, तो वह हिंसा है| 

    • जबकि आरेंट के अनुसार शक्ति व्यक्तिगत नहीं है| शक्ति का प्रयोग लोगों के परस्पर सहयोग से सामूहिक रूप में होता है, अतः राजनीतिक संस्थाएं शक्ति की अभिव्यक्तिया है|


    सार्वजनिक जगत और राज्य में अंतर- 

    • आरेंट ने सार्वजनिक जगत और राज्य में भी अंतर किया है| 

    • जब जनसाधारण स्वेच्छा से ऐसा व्यवहार करते हैं, कि वे एक दूसरे के अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर देते हैं, तब वे सार्वजनिक जगत का निर्माण करते हैं|  

    • लेकिन जब कोई बाह्य संगठन उन्हें किसी विशेष ढंग से व्यवहार करने के लिए विवश करता है, तब वे राज्य में रह रहे होते हैं|


    • Note- आरेंट के अनुसार शक्ति सार्वजनिक जगत को एकजुट रखती है जबकि हिंसा उसके अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर देती है|


    अन्ना आरेंट के अनुसार शक्ति का विश्लेषण



    • C B मैक्फर्सन

    • कनाडा के समकालीन दार्शनिक C B मैक्फर्सन ने सृजनात्मकता स्वतंत्रता की संकल्पना प्रस्तुत करते हुए आधुनिक लोकतंत्र के अंतर्गत शक्ति के प्रयोग क्षेत्र का विश्लेषण प्रस्तुत किया है|

    • मैक्फर्सन ने अपने कृति Democratic Theory: Essays in Retrieval 1973 के अंतर्गत पश्चिमी लोकतंत्रीय सिद्धांत में दो तत्व बताएं हैं- 

    1. उपयोगिता का अधिकतम विस्तार

    2. शक्तियों का अधिकतम विस्तार


    • शक्तियों के अधिकतम विस्तार के अंतर्गत मैक्फर्सन ने शक्तियों के दो प्रकारों में अंतर किया है-

    1. दोहन शक्ति

    2. विकासात्मक शक्ति


    1. दोहन शक्ति-

    • अपने उद्देश्यों की सिद्धि के लिए दूसरों की क्षमताओं का प्रयोग करना 


    1. विकासात्मक शक्ति-

    • मनुष्य द्वारा अपनी क्षमताओं का विकास और प्रयोग करना

    • मैक्फर्सन के अनुसार मनुष्य की विकासात्मक शक्ति का अधिकतम विस्तार ही सृजनात्मकता स्वतंत्रता है|


    • टाल्कॉट पार्सन्स-

    • सहमति पर आधारित शक्ति- पार्सन्स का मत हैं कि शक्ति मूलतः उन लोगों की सहमति पर निर्भर करती है जिन पर इसका प्रयोग किया जाता है| 

    • शक्ति ‘अर्थव्यवस्था में धन (Money)’ के समान- पार्सन्स मानते हैं कि आर्थिक व्यवस्था में जो महत्व धन का होता है, सामाजिक व्यवस्था में वही महत्व शक्ति का होता है|


    • महात्मा गांधी ने भी जनसाधारण को शक्ति प्रदान करने पर विशेष बल दिया है|



    1. उत्तर- आधुनिकतावादी दृष्टिकोण (Post-Modernist Approach)-

    • उत्तर आधुनिकतावादी मिशेल फूको “राजनीति शक्ति आधारित उत्पीड़न और शोषण की प्रक्रिया है|”


    • मिशेल फूको-

    • Discipline and Punish (1975)

    • The History of Sexuality, (1976)

    • Power/ Knowledge (1980)


    • शक्ति पर विचार- 

    1. शक्ति सर्वव्यापी है- शक्ति समाज के विभिन्न संबंधों में मौजूद रहती है| यह केवल संसद, सरकार, पुलिस या सेना तक सीमित नहीं है| 

    2. शक्ति और ज्ञान का संबंध- शक्ति और ज्ञान एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं| ज्ञान का निर्माण और उसका उपयोग सत्ता-संबंधों से प्रभावित हो सकता है| वहीं ज्ञान भी लोगों तथा संस्थाओं को नियंत्रित करने की क्षमता प्रदान करता है|  

    3. विमर्श की अवधारणा- किसी विषय के बारे में ज्ञान तथा सत्य के लिए विमर्श 

    4. अनुशासनात्मक शक्ति (Disciplinary Power)- शक्ति निगरानी, प्रशिक्षण, परीक्षा, समय-सारणी और व्यवहार के मानकीकरण के माध्यम से व्यक्तियों को अनुशासित करती है|  

    5. शक्ति उत्पादक भी है- शक्ति केवल दमन नहीं करती, बल्कि ज्ञान, पहचान, व्यवहार और सामाजिक मानदंडों का निर्माण भी करती है|

    6. पैनॉप्टिकॉन (Panopticon)- फूको ने जेरेमी बेंथम की पैनॉप्टिकॉन जेल की अवधारणा का विश्लेषण किया| ऐसी व्यवस्था में बंदी को यह निश्चित रूप से पता नहीं होता कि उस पर कब निगरानी रखी जा रही है| परिणामस्वरूप वह स्वयं अपने व्यवहार को नियंत्रित करने लगता है|

     

    • प्रशासकीयता और बायोपावर (Governmentality & Biopower)-

    1. प्रशासकीयता (Governmentality)-

    • फूको ने राज्य व शक्ति के सम्बन्ध में इस शब्द का प्रयोग किया|  

    • प्रशासकीयता ‘सरकार की कला’ है, जिसमें यह अध्ययन किया जाता है कि सरकार जनता पर कैसे नियंत्रण स्थापित करती है और उसे अनुशासन में कैसे रखती है|


    1.  बायोपावर (Biopower)-

    • फूको ने ‘Biopower’ की नवीन अवधारणा दी| इनका मानना है कि शक्ति हर जगह मौजूद है तथा पूरे समाज में केशिकाओं की तरह फैली हुई है| 


    • फूको के अनुसार शक्ति की प्रकृति-

    1. बहुआयामी व जटिल

    2. सापेक्ष (Relative) 

    3. परिचय की निर्माता- हम शक्ति को नहीं बनाते, अपितु ‘शक्ति हमें बनाती है’; यह हमारी पहचान तय करती है| 


    • शक्ति के खिलाफ तीन तरह के संघर्ष-

    1. जातीय, सामाजिक एवं राष्ट्रीय प्रभुत्व के खिलाफ संघर्ष 

    2. शोषण के खिलाफ संघर्ष 

    3. सब्जेक्शन (Subjection)- ‘कर्ता बनने’ (To be a subject) और ‘अधीन होने’ (To be subjected) के रूपों के विरुद्ध संघर्ष 


    • प्रतिरोध की अवधारणा-

    • मिशेल फूको “जहाँ शक्ति है, वहाँ प्रतिरोध भी है और फिर भी यह प्रतिरोध शक्ति के सम्बन्ध में बाहरी स्थिति (Position of Exteriority) नहीं है| 


     

    माइकल मान का राज्य शक्ति सिद्धांत (Michael Mann’s Theory of State Power)-

    • पुस्तक- The Sources of Social Power 1986 

    • मुख्य विचार- राज्य की शक्ति को समझने के लिए उसकी संस्थागत क्षमता और समाज में फैले शक्ति-संबंधों का अध्ययन आवश्यक है| 

    • माइकल मान ने अपने प्रसिद्ध लेख The Autonomous Power of the State: Its Origins, Mechanisms and Results (1984) में राज्य की स्वायत्त शक्ति का विश्लेषण किया है|  


    • माइकल मान ने राज्य की शक्ति को दो भागों में विभाजित किया है-

    1. निरंकुश शक्ति (Despotic Power) 

    2. अवसंरचनात्मक शक्ति (Infrastructural Power) 


    1. निरंकुश शक्ति (Despotic Power)-

    • राज्य के शासक अभिजात वर्ग की वह क्षमता, जिसके आधार पर वह नागरिक समाज के प्रमुख समूहों से नियमित संस्थागत बातचीत या सहमति के बिना निर्णय ले सकता है| 


    1. अवसंरचनात्मक शक्ति (Infrastructural Power)-

    • राज्य की वह क्षमता, जिसके माध्यम से वह अपने प्रशासनिक तंत्र द्वारा पूरे क्षेत्र में नीतियों और निर्णयों को लागू करता है तथा समाज की गतिविधियों का समन्वय करता है| 


    स्टीवन ल्यूक्स (Steven Lukes) का शक्ति सिद्धांत-

    • पुस्तक- Power: A Radical View (1974) में शक्ति की अवधारणा का विश्लेषण 

    • ल्यूक्स ने शक्ति के तीन आयामों (Three Dimensions of Power) या तीन चेहरों का सिद्धांत दिया है-

    1. निर्णय लेने की शक्ति (Decision-Making Power) 

    2. निर्णय-निर्माण के एजेंडे को नियंत्रित करने की शक्ति (Agenda-Setting Power) 

    3. विचारों एवं इच्छाओं को प्रभावित करने की शक्ति (Ideological Power) 


    1. निर्णय लेने की शक्ति (Decision-Making Power)-

    • यह शक्ति का प्रत्यक्ष एवं दृश्यमान रूप है| 

    • इसमें दो या अधिक पक्षों के बीच संघर्ष तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया का अध्ययन किया जाता है| 

    • जो व्यक्ति या समूह अपने हितों के अनुसार निर्णय करवाने में सफल होता है, उसके पास शक्ति होती है| 

    • यह आयाम रॉबर्ट डहल से संबंधित है| 


    1. निर्णय-निर्माण के एजेंडे को नियंत्रित करने की शक्ति (Agenda-Setting Power)-

    • इसमें यह देखा जाता है कि किन मुद्दों पर निर्णय लिया जाएगा और किन मुद्दों को चर्चा से बाहर रखा जाएगा| 

    • शक्तिशाली समूह कुछ विषयों को राजनीतिक चर्चा में आने से रोक सकते हैं| 

    • यह शक्ति प्रत्यक्ष संघर्ष के साथ-साथ निर्णय-प्रक्रिया को नियंत्रित करती है| 

    • यह आयाम पीटर बचराच (Peter Bachrach) और मर्टन बराट्ज (Morton S. Baratz)  के विचारों से संबंधित है| 


    1. विचारों एवं इच्छाओं को प्रभावित करने की शक्ति (Ideological Power)-

    • यह शक्ति का सबसे गहरा एवं अदृश्य रूप है| 

    • इसमें लोगों की इच्छाओं, विश्वासों, धारणाओं और विचारों को प्रभावित किया जाता है अर्थात वैचारिक नियंत्रण किया जाता है| 

    • शक्तिशाली व्यक्ति या संस्थाएँ लोगों को यह विश्वास दिला सकती हैं कि मौजूदा व्यवस्था स्वाभाविक या उचित है| 


    स्टीवन ल्यूक्स की गुप्त संघर्षों की अवधारणा-

    • यह शक्ति के तीसरे आयाम से संबंधित है| 

    • समाज में संघर्ष हमेशा प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देते है| 

    • कई बार शक्तिशाली समूह लोगों की इच्छाओं, विचारों और धारणाओं को इस प्रकार प्रभावित करते हैं कि लोग अपने वास्तविक हितों के विरुद्ध होने वाली परिस्थितियों को भी स्वीकार कर लेते हैं| 


     



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